युवा प्रतिभाओं की 'उड़ान'
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युवा प्रतिभाओं की 'उड़ान'

Written byArchiveArchive
Oct 5, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 05 Oct 2016 11:24:43

 

 

उभरती थियेटर प्रतिभाओं को उड़ान के जरिए एक ऐसा मंच मिला, जहां न केवल उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया बल्कि इस क्षेत्र के दिगजों ने उनका हौसला भी बढ़ाया

 

अश्वनी मिश्र

माज तक अपनी बात पहुंचाने का एक बड़ा प्रभावशाली माध्यम रंगमंच है। ेअगर इसे समाज का आईना कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। रंगमंच के कुछ उभरते कलाकारों को पहचान देने और युवाओं को भारतीय संस्कृति से जोड़ने के लिए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली में 26-29 सितंबर के बीच तीन दिवसीय उड़ान उत्सव का आयोजन संपन्न हुआ। इससे पहले 20-22 सितंबर को उड़ान उत्सव का आयोजन दिल्ली विश्वविद्यालय में हुआ था। इसमें राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के 50 से ज्यादा कॉलेजों के छात्रों ने भाग लेकर अपने अभिनय का लोहा मनवाया। निर्णायक टीम ने 10 टीमों के 217 छात्रों को कार्यशाला के लिए चुना था।  इन्हीं उभरते हुए कलाकारों को तीन दिवसीय कार्यशाला में कला जगत की अनेक हस्तियों ने कला क्षेत्र की बारिकियां समझाईं। भोजपुरी अभिनेता मनोज तिवारी ने जहां 10 सर्वश्रेष्ठ टीम के कलाकारों के साथ फिल्म बनाने की घोषणा की वहीं सुदीप्तो सेन ने तीन विद्यालयों के छात्रों को सहायक निर्देशक की भूमिका का अवसर प्रदान करने की बात कही। चुने हुए 30 सर्वश्रेष्ठ प्रतिभागी भारत में विभिन्न स्थानों पर नाटक करेंगे और इसी टीम के साथ श्री सेन कश्मीर में जवानों के लिए नुक्कड़ नाटक करेंगे। उत्सव के समापन अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल ने 'चाणक्य' नाटक का जिक्र करते हुए कहा कि नाटक व्यक्तित्व और समाज को निखारता है। देश को जोड़ता है। तुलसीदास और कालिदास के कला का जिक्र करते हुए उन्होंने इसकी महत्ता बताई। समारोह में उपस्थित एनएसडी के निदेशक श्री वामन केंद्रे ने कहा कि नाटक मनुष्य को मनुष्य बनाता है।

 

नाटक व्यक्तित्व और समाज को निखारता है और यह समाज को एक सूत्र में जोड़ने का कार्य करता है।

-डॉ.कृष्ण गोपाल, सह-सरकार्यवाह

 

 

संसार के विकसित देशों का इतिहास भारत की तुलना में बहुत ही कम है। भारत प्राचीनतम देश है और यहां की संस्कृति सबसे समृद्ध है।

-डॉ.मनमोहन वैद्य, अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख

 

 

उड़ान उत्सव में जिन प्रतिभागियों ने अच्छा प्रदर्शन किया है, ऐसे उभरते कलाकारों  को  फिल्म में  मौका दंेगे।

-संदीप मारवाह,  संस्थापक निदेशक  , एएएफटी

 

 

कार्यक्रम के पहले और दूसरे दिन क्रमश: रा.स्व.संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख डॉ. मनमोहन वैद्य ने कहा कि देश में अनेक भाषाएं, अनेक जातियां, विभिन्न देवी-देवता और इनकी उपासना करने वाले लोग रहते हैं। लेकिन फिर भी हम सब एक हैं। वह क्या है, जो हमें एकता के सूत्र में बांधता है? इस एकता का आधार क्या है? उन्होंने नमक का उदाहरण देते हुए समझाया कि नमक का आकार व रंग चाहे जो भी हो, उसका स्वाद नमकीन ही होगा। इसी प्रकार हम भारतवासी चाहे किसी भी प्रांत, जाति, भाषा, रंग के क्यों न हों, हमारी राष्ट्रीयता हमें एकता के सूत्र में जोड़ती है। उन्होंने कहा कि आज संसार के विकसित देशों का इतिहास भारत की तुलना में बहुत ही कम है। भारत प्राचीनतम देश है और यहां की संस्कृति सबसे समृद्ध है। भारत विश्व में 'विविधता में एकता' के लिए प्रसिद्ध है। ऐसे भारत पर असहिष्णु होने का आरोप लगाया जाता है। जिस भारत में एक परिवार में रहने वाले अलग-अलग देवताओं की उपासना करते हों, उस भारत को असहिष्णु मानना कहां तक न्याय संगत है? समाज में समय-समय पर दोष आते हैं लेकिन एकता का आधार सभी दोषों का निराकरण करता है और एकता के सूत्र में बांधता है।

उत्सव में उपस्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख श्री जे.नंद कुमार ने कहा कि कला सर्वत्र व्याप्त है। हम सभी कला के उपासक हैं। कला संस्कृति वाहक है। कला शांति है, दयालुता है, चिन्मयानंद है, समर्पण है सिखाने वाली व समाधान रखने वाली व समभाव रखने वाली है। उन्होंने कहा कि मैं इस विचार से सहमत नहीं हूं कि नाटक सर्वप्रथम ग्रीक से आया। नाट्य परंपरा भारत की प्राचीन परंपरा है। 'भरतमुनि' के नाट्यशास्त्र  जैसे ग्रंथ में चारों वेदों का सार है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र की रचना दूसरी शताब्दी में हुई थी।  श्री कुमार ने कहा कि नाटक वही उत्तम होता है जिसे संपूर्ण परिवार एक साथ देखे। नाटक देशभक्ति, शांति, विश्व सेवा की भावना के साथ स्वतंत्रता देने वाला होता है, टुकड़े करने के लिए नहीं। कला की सीमाओं पर उन्होंने कहा कि कला सभी को आजादी देने वाली यानी सीमित दायरें में न बंधने वाली, नए विचारों को जन्म देने वाली होती है। हम संपूर्ण विश्व को ध्यान में रखकर ही कार्य करते हैं। हमें समाज में उदात्त भावनाओं का, राष्ट्रीयता का, देश के वीरों की गौरव गाथा की, एक नई सोच समाज में लानी होगी। शुद्ध-विशुद्ध चरित्रों का निर्माण करना होगा। नाटक एक सशक्त माध्यम है। इसके द्वारा मन में राष्ट्रीयता की भावना का बीजारोपण कर उच्च आदर्शवादी समाज की स्थापना करने में योगदान करें। भारत में विश्व बंधुत्व की भावना है, अनेकता में एकता है। भारत विश्व गुरु रहा है और रहेगा।

उड़ान उत्सव के जरिए जिन दस टीमों का चयन किया गया था उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन करते हुए बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, राष्ट्रवाद, महिला सशक्तिकरण एवं जवानों पर केंद्रित प्रस्तुतियां दीं। समारोह में महाभारत धारावाहिक के जरिए जन-जन के ह्दय में स्थापित नाटक के प्रमुख पात्र (श्रीकृष्ण) प्रसिद्ध अभिनेता श्री नीतिश भारद्वाज की गरिमामय उपस्थित रही। श्री भारद्वाज ने उभरते हुए कलाकारों को कला क्षेत्र की छोटी-छोटी बारीकियों की जानकारी दी और अब तक के अपने अनुभवों से उन्हें रूबरू कराया। उन्होंने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि कला और संस्कृति जीवन में योगदान प्रदान करती है। योगदान शब्द बहुत विशाल है। इसमें योग और दान दो शब्द समाहित हैं। 'योग' का मतलब है कि जब कोई कलाकार कार्य करता है तो कर्म से फल की आशा न रखें, जैसा की श्रीमद्भगवद् गीता में कहा गया है। तथा फल को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरणा के रूप में प्रयोग करें, यही कला के क्षेत्र का योग है। दूसरा है, दान, जो कला के क्षेत्र में करने जा रहे हैं, राष्ट्र के लिए, समाज के लिए वही दान है। 

जहां तक प्रशिक्षण का प्रश्न है, विद्यार्थियों को वह यहां से मिलेगा। लेकिन सबसे बड़ा विद्यालय जीवन ही होता है और यही अनुभव हमें सिखाते हैं। कलाकारों को कला क्षेत्र से जुड़ी चीजें बताते हुए श्री भारद्वाज ने कहा कि कला का क्षेत्र व्यापकता की ओर ले जाता है। प्रत्येक सजीव वस्तु अपने आपको अभिव्यक्त करती है। एक पौधा होता है छुईमुई, जो हाथ लगाने से मुरझा जाता है, क्योंकि भावनाएं हैं, रस हैं।  कला अपनी भावना व्यक्त करने का सबसे उत्तम साधन है। लेकिन कला के लिए स्वतंत्रता अत्यावश्यक है। एक दायरा निश्चित है, हमें उसी सीमा में रहकर काम करना पड़ता है। कोई भी कला ऐसी न हो, जो समाज की भावना को राष्ट्र की चेतना को इस प्रकार से झकझोर दे कि घाव छोड़ जाए, क्योंकि हमारा मुख्य कार्य मनोरंजन है जिसमें प्रबोधन का कार्य करने के लिए कड़वी चीजें करनी पड़ती हैं। लेकिन यह ध्यान में रखना चाहिए कि यह इतना कड़वा भी न हो कि समाज इसे सहन न कर सके। इसलिए कला सदैव राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत होनी चाहिए। एएएफटी के संस्थापक निदेशक श्री संदीप मारवाह ने कहा कि लोगों के अंदर राष्ट्रीयता और अच्छे संस्कार होने चाहिए।

उड़ान उत्सव के जरिए जहां उभरती हुई प्रतिभाओं को अपनी कला को प्रदर्शित करने का मंच मिला, वहीं भविष्य में आगे बढ़ने के लिए कलाक्षेत्र से जुड़े अनेक अनुभवशाली लोगांे के खटट्े-मिट्ठे अनुभव भी मिले, जो उन्हें आगे बढ़ने के लिए ऊर्जा और प्रेरणा देने वाले साबित होंगे। 

 

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