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उरी में सैन्य ठिकाने पर हमला भारत को उस बिन्दु तक ले आया है जहां पाकिस्तान को उसके दुस्साहस का जवाब देना जरूरी है। प्रभुसत्ता को ढाल की तरह इस्तेमाल करते हुए आतंक को शह देने और इसकी पैरवी करने वालों को उचित जवाब देना अब वैश्विक जरूरत और समय की मांग है। सरकार पर दबाव है लेकिन क्या हो सकता है भारत का जवाब? सैन्य रणनीतिकार के नजरिए से एक आकलन
ले.जनरल (से.नि.) अजय कुमार सिंह
भारत ने अपने तमाम पड़ोसी देशों के साथ, जिनमें पाकिस्तान भी शामिल है, अपनी तरफ से कदम आगे बढ़ाते हुए दोस्ती का हाथ बढ़ाया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में भी पड़ोसी देशों के राष्ट्राध्यक्षों को बुलाकर अपनी सकारात्मक सोच का परिचय दिया था। यह अच्छी शुरुआत थी और माना जा रहा था कि पाकिस्तान दोस्ती के इस हाथ का सम्मान करेगा लेकिन पाकिस्तान की ओर से सतही प्रतिक्रिया मिलने के बावजूद हमारे प्रधानमंत्री और सरकार ने कई मौकों पर रिश्ते सुधारने संबंधी प्रयास किये। लेकिन बदले में तीखे बयान और उग्र कार्रवाई ही देखने में आई। पाकिस्तान ने पठानकोट सैन्य हवाई अड्डे पर उग्रवादी हमले को शह दी, सीमा पार घुसपैठ को बढ़ावा दिया, घाटी में सुनियोजित तरीके से भारत विरोधी षड्यंत्र रचाया, लेकिन तब भी हमारे नेतृत्व ने परिपक्वता और संयम दर्शाते हुए यह जता दिया कि भारत के धैर्य की एक सीमा है।
उरी में सैन्य ठिकाने पर हमला हमें उस बिन्दु तक ले आया है, देश में भी चारों तरफ इसका उचित जवाब देने की मांग उठ रही है। सरकार पर दबाव बना हुआ है। इस संदर्भ में हम यहां यह चर्चा करेंगे कि भारत के पास प्रतिक्रिया करने के लिए क्या-क्या विकल्प हैं। सबसे पहले हम पाकिस्तान के संदर्भ में मौजूदा जमीनी वास्तविकताओं से परिचित हो लें।
1 पाकिस्तान हमारे लिए एक प्रमुख राष्ट्रीय सुरक्षा चिंता का विषय है और रहेगा।
2 पाकिस्तानी सेना भारत के प्रति एक बुनियादी सामरिक नीति के तहत द्वेषपूर्ण रवैया अपनाये रखेगी।
3 परोक्ष युद्ध लंबे समय से पाकिस्तान की रणनीति का एक अहम हिस्सा रहा है।
4 इसकी यह नीति धुंधलके और इसे नकारने के साथ एक तालमेल के साथ चलाई जाती है।
5 तालिबान, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और दूसरे आतंकी गुट पाकिस्तान, पाकिस्तानी सेना और आईएसआई द्वारा खड़े किये गए हैं और पाले-पोसे जाते
रहे हैं।
पाकिस्तान की रणनीति
पाकिस्तान की मौजूदा रणनीति परोक्ष युद्ध के साथ जम्मू-कश्मीर पर केन्द्रित रहने की दिखती है जिसमें आतंकवाद और आंदोलन दोनों शामिल हैं। इस मुद्दे के उछलने पर उसे अस्वीकार कर देना और परमाणु निरोधक क्षमता का इस्तेमाल करते हुए भारत को परंपरागत प्रतिक्रिया का मौका न देना। बुरहान वानी की मौत के बाद से लेकर उरी हमले तक के बीच का वक्त इसी का एक स्वरूप था जो शायद अफगानिस्तान और बंगलादेश में इसकी जघन्य कार्रवाइयों से दुनिया का ध्यान हटाने के लिए था। साथ ही यह भारत द्वारा बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के हनन के मामले उठाये जाने पर प्रतिक्रिया स्वरूप ही था।
परमाणु समीकरण
पाकिस्तान का मानना है कि उसकी परमाणु सामर्थ्य भारत को दूर रखने के लिए एक रणनीतिक प्रतिरोधी की तरह है। पाकिस्तान का ऐसा मानना उसकी चूक है और अब पाकिस्तान के इस झांसे को उजागर करने का वक्त शायद आ गया है। इस पर विचार करने के लिए कुछ बिन्दु इस प्रकार हैं-
परमाणु हथियार निरोधक क्षमता के लिए होते हैं, युद्ध में लड़ाई के लिए नहीं। भारत ने अपनी तरफ से कह रखा है कि यह किसी गैर परमाणु सज्ज देश के खिलाफ परमाणु हथियार इस्तेमाल नहीं करेगा, न ही इनका पहले इस्तेमाल करेगा। पाकिस्तान का नेतृत्व जोखिम उठाने पर अमादा रहता है लेकिन आत्मघाती नहीं है, इसलिए उनका सारा ध्यान सैन्य रणनीति, प्रशिक्षण और उपकरणों पर ही है।
भारत के सामने पाकिस्तान के लगातार उकसावे पर हरकत में आने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं जिनके बारे में पूरी दुनिया जानती है कि हमें किस तरह देश के दुश्मनों से अपनी रक्षा करने की जरूरत है। हमारी प्रतिक्रिया आंतरिक, कूटनीतिक और वाह्य-सैन्य क्षेत्रों में तालमेल से होनी चाहिए जिसमें हमारे पास उपलब्ध तमाम सामथ्योंर् का इस्तेमाल हो। हमारे असैन्य जबाव के लिए कई प्रकार के कड़े कदम उठाये जा सकते हैं, जैसे-कूटनीतिक स्तर पर सख्ती करके, अपने उच्चायुक्त को वहां से वापस बुलाकर, विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मुदद उठाकर, सार्क में पाकिस्तान का बहिष्कार करके, आर्थिक तौर पर पिछले कुछ समय से पाकिस्तान को दी गईं विभिन्न छूटों को निरस्त करके, अमेरिका तथा अन्य देशों की तरफ से प्रतिबंध लगवाकर उसे अलग-थलग किया जा सकता है।
सैन्य प्रतिक्रिया की बात करें तो हमारे पास युद्ध करने के कई तरीके उपलब्ध हैं। नियंत्रण रेखा पर सैन्य/ आतंकी ठिकानों पर हमले करना। नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम को निरस्त करना और विभिन्न एजेंसियों और विशेष दस्तों के जरिये पाक के मर्म स्थलों पर चोट करना। इसके अलावा कुछ मध्यम दर्जे के विकल्प भी हैं जैसे- नियंत्रण रेखा के पार लक्ष्य विशेष पर तेज गोलीबारी करना, चुनिंदा हवाई हमले करना,पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में आतंकी नेतृत्व को निशाना बनाना, लंबी दूरी की मिसाइल दागना।
असैन्य क्षमताएं
हमारे उच्चायुक्त को पाकिस्तान से वापस बुलाया जाना, संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों और अफगानिस्तान व बंगलादेश के साथ सार्क में पाकिस्तान को अलग-थलग करने जैसे विकल्प भी मौजूद हैं। इसके अलावा, अपनी पूरी क्षमता के साथ सूचना अभियान और साइबर क्षेत्र का इस्तेमाल किया जा सकता है। पाकिस्तान को मिलने वाली आर्थिक छूट पर भी नकेल कसी जा सकती है। अमेरिका और अन्य देशों की आड़ में पाकिस्तान पर कार्रवाई करने का जोर बनाया जा सकता है। चूंकि इस समय जन-भावनाएं पाक के खिलाफ हैं, उनका लाभ उठाया जा सकता है। पाकिस्तान के जलीय स्रोत भारत से जाने वाली नदियां ही हैं। अंतरराष्ट्रीय संधियों के बावजूद पाक को इस दिशा में भी करारा झटका दिया जा सकता है। हालांकि, इस दिशा में कोई भी कार्रवाई बहुत सोच-समझ कर ही
करनी होगी।
सैन्य कार्रवाई
भारत प्रत्यक्ष और गुप्त कार्रवाइयां भी कर सकता है, जिनकी बुनियाद पर युद्ध आधारित विकल्पों का जायजा लिया जा सकता है।
निम्न स्तरीय विकल्प
पाक के सैन्य/आतंकी ठिकानों पर सामरिक क्षमता को देखते हुए कार्रवाई करना। यह कार्रवाई गोलीबारी/सीमा पार हमलों के रूप में हो सकती है। हालांकि, नियंत्रण रेखा पर शांति उल्लंघन पाक के हित में जाता है, वहीं हमारे जवानों को लगातार घुसपैठ और आतंकी गतिविधियों पर नजर रखनी पड़ती है। गुप्त अभियानों में एजेंसियों और स्पेशल फोर्सेज की मदद से पाक के मर्म स्थलों पर चोट की जा सकती है। स्पेशल फोर्सेज इस मामले में बेहद सक्षम हैं परंतु उन्हें बेहद कम उपयोग में लाया गया है। फिर भी हमारे यहां इस तथ्य को समझने वाले कुछ लोग मौजूद हैं और पाक अपनी गलतियों की बड़ी कीमत चुका सकता है।
मध्यम स्तरीय विकल्प
सीमा रेखा के पार घुसपैठ को बढ़ावा देने वाले अन्य स्थानों के साथ-साथ पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों पर बमबारी। इसके अलावा, वायु सेना द्वारा सीमा रेखा में अपनी ओर उड़ान भरते हुए, लंबी दूरी के शस्त्रों की मदद से आतंकी ठिकानों पर हमले भी एक विकल्प हैं। व्यापक गुप्त कार्रवाई में आतंकी आकाओं को निशाना और पाक अधिकृत कश्मीर व बलूचिस्तान में मौजूद असंतोष को हवा दी जा सकती है। आतंकी ठिकानों पर दूर से निशाना साधना। उपरोक्त कार्रवाइयों के साथ यह भी घोषित किया जाए कि इन्हें भारत विरोधी कार्रवाई करने वालों और उन्हें प्रश्रय देने वालों के खिलाफ अंजाम दिया जा रहा है। सीमित/ पूर्ण युद्ध से जुड़े उच्चस्तरीय विकल्पों पर सुरक्षा की दृष्टि के अलावा इसलिए भी विमर्श नहीं किया जा सकता क्योंकि भारत शांतिप्रिय देश है और वह तब तक कोई अतिवादी कदम नहीं उठाएगा जब तक पाकिस्तान ऐसा नहीं करता। परंतु यह साफ है कि यदि सरकार ऐसा कोई कदम उठाने का फैसला करती है तो सेना के पास क्षमता और राजनीतिक-सैन्य लक्ष्यों को पूरा करने की योजना है। अक्सर क्षमताओं में कुछ कमी पर चर्चा होती है, परंतु इसके बावजूद, हम अपने मौजूदा स्रोत की मदद से पाकिस्तान को सबक सिखाने की क्षमता रखते हैं।
आंतरिक सुधार
दरअसल, मौजूदा गंभीर घटना जैसी स्थिति खुद में सुधार किए जाने की भी मांग करती है। इस विषय में कुछ बातों पर ध्यान देना जरूरी है:-
सेना को अपने सुरक्षा दायरे को सुनिश्चित करना होगा ताकि ऐसी घटना फिर न हो।
पठानकोट की घटना के बाद ले. जनरल काम्पोस समिति की सिफारिशों को तुरंत लागू किया जाए।
हमारी कार्यकारी एवं नीतिगत गुप्तचर व्यवस्था को दुरुस्त किए जाने की जरूरत है ताकि वह बेहतर काम कर सके। कई बार खतरे की घंटी बेवजह भागदौड़ का सबब बनती है।
आकस्मिक/ जवाबी विकल्पों को पूर्ववत तैयार रखा जाए ताकि हरी झंडी मिलने के बाद उन पर तुरंत अमल किया जा सके।
प्रधानमंत्री कार्यालय/ एनएसए में सर्वश्रेष्ठ सैन्य एवं कार्यकारी क्षमता वाले व्यक्तियों की मौजूदगी बढ़ाई जाए और सभी आकस्मिक कार्यकारी नीतियों को सुचारु एवं संचालित किया जाए ताकि विभिन्न परिस्थितियों से निपटने की सरकारी क्षमता
बढ़ सके।
चूंकि हम अनिश्चितता के दौर की ओर बढ़ रहे हैं, इसलिए हमारी क्षमताओं पर उचित ध्यान दिया जाए।
नाजुक कमियों को दूर करना प्राथमिकताएं हों ताकि हमारा अंतिम विकल्प हर समय क्षमतावान रहे।
साइबर एवं अंतरिक्ष क्षमताओं का विकास और गुप्तचर व्यवस्था में उनका इस्तेमाल हो, ताकि लक्ष्यों पर चौबीसों घंटे नजर रखी जा सके।
हमारी गुप्तचर प्रणाली में सुधार और सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं शामिल हों जिनकी निष्ठा
संपूर्ण हो।
सैन्य ताकतों को ड्रोन व अन्य सटीक मार करने वाले हथियारों से सुसज्जित
किया जाए।
स्थिति नियंत्रण
बिगड़ैल पाकिस्तान की क्षमताओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। उसकी क्षमताओं को जानना भी जरूरी है। हमारा पक्ष इसलिए भी मजबूत है क्योंकि हमें पूर्ण समर्थन प्राप्त है। देश भर में पाक के खिलाफ सख्त कार्रवाई किए जाने की आवाज उठी है, लेकिन इस बारे में कोई भी जल्दबाजी गलत होगी। इसलिए मामले को नियंत्रण में रखने के लिए उसके हरेक पक्ष पर गौर किया जाना जरूरी है। वहीं पाकिस्तान भी हमारी क्षमताओं से वाकिफ है, इसलिए वह मसले को एक सीमा से अधिक नहीं बढ़ने देना चाहेगा। इसलिए मूलमंत्र यही होना चाहिए कि स्थिति पर नियंत्रण रहे और आगे की भी तैयारी रहे और साथ ही स्थिति के अनियंत्रित होने का जिम्मा पाकिस्तान पर ही डाला जाए। उरी जैसी गंभीर घटना हमें आत्ममंथन के लिए भी मौका देती है। हमारी सेना को सुरक्षा तंत्र की समीक्षा करके जहां जरूरी हो, दरारें भरनी चाहिए।
(लेखक अंदमान निकोबार एवं पुदुचेरी के पूर्व उपराज्यपाल एवं पश्चिमी कमान के आर्मी कमांडर रहे हैं और सैन्य रणनीतिकार के तौर पर जाने जाते हैं)











