पानी पर आग
June 20, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम Archive

पानी पर आग

Written byArchiveArchive
Sep 19, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 19 Sep 2016 12:16:47

कावेरी जल बंटवारे का मुद्दा नदी में पानी की कमी के कारण कम, इस पर राजनीतिक रोटियां सेंकने के कारण ज्यादा गर्माया है। कर्नाटक में पूर्व प्रधानमंत्री देवगौडा जैसे नेताओं ने मामले को समझदारी से सुलझाने की बजाय ऐसे बयान दिए जिनसे जनता और भड़क गई

प्रमोद भार्गव

कर्नाटक और तमिलनाडु की जीवनरेखा मानी जाने वाली कावेरी नदी के जल को लेकर देश के दो बड़े राज्यों में पिछले दिनों हिंसा और आगजनी भड़क गई। कावेरी दोनों राज्यों के करोड़ों लोगों के लिए वरदान है, लेकिन निहित राजनैतिक स्वार्थों के चलते कर्नाटक और तमिलनाडु की जनता के बीच केवल आगजनी और हिंसा के ही नहीं, सांस्कृतिक टकराव के हालात भी उत्पन्न हो गए। इसीलिए कर्नाटक में तमिलनाडु की नंबर प्लेट लगे वाहनों को जलाने के साथ एक व्यक्ति की भी हत्या कर दी गई। सनातन भारतीय संस्कृति में पानी पिलाना पुण्य का काम माना जाता है, लेकिन यहां तो स्वार्थी तत्व एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए। इसलिए पानी में आग का मुहावरा वहां विकृत रूप में चरितार्थ होता दिख रहा था।
दरअसल तमिलनाडु में इस साल कम बारिश होने के कारण पानी की जबरदस्त किल्लत है। इस समस्या के तात्कालिक निदान के लिए राज्य ने सवार्ेच्च न्यायालय से पानी देने की गुहार लगाई थी। कम बारिश के कारण राज्य में पैदा हुई दयनीय स्थिति को उजागार करते हुए कहा गया था कि तमिलनाडु की चालीस हजार एकड़ में खड़ी फसल बर्बाद हो रही है, इसलिए उसे कृषि और किसानों की आजीविका के लिए तुरंत पानी की जरूरत है। इस बाबत अदालत ने 2 सितंबर को कर्नाटक सरकार से कहा कि 'जियो और जीने दो' की तर्ज पर 15,000 क्यूसेक पानी रोजाना 10 दिन तक तमिलनाडु को दिया जाए। हालांकि कर्नाटक सरकार ने अदालत को उत्तर देते हुए कहा था कि कम बारिश के कारण राज्य के अधिकतर जलाशय खाली हैं इसलिए पानी देना मुमकिन नहीं है। इस आदेश के जारी होने के बाद कर्नाटक में मंड्या, मैसूर व हासन सहित कई जिलों में उग्र विरोध व प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया और फिर अदालत का संशोधित आदेश आने के बाद तो पूरे प्रदेश में आग लग गई। नए आदेश में कर्नाटक को रियायत देते हुए 12 हजार क्यूसेक पानी देने को कहा गया है। लेकिन जनता को यह आदेश रास नहीं आया। हालांकि तमिलनाडु सरकार 15 हजार क्यूसेक पानी भी कम बता रही थी। अदालत आगे इस मामले पर अपनी राय देगी।
भारत में नदियों के जल का बंटवारे, बांधों के निर्माण और राज्यों के बीच उसकी हिस्सेदारी एक गंभीर व अनसुलझी रहने वाली समस्या बनी हुई है। इसका मुख्य कारण है, नदी जैसे प्राकृतिक संसाधन के समुचित व तर्कसंगत उपयोग की जगह राजनीतिक सोच से प्रेरित होकर नदियों के जल का दोहन करना है। कर्नाटक में जल विवाद के सामने आते ही पूर्व प्रधानमंत्री एच़ डी़ देवगौडा ने क्षेत्रीय मानसिकता से काम लेते हुए इस मुद्दे को भड़काने का काम किया। उन्होंने कहा कि ''इस मुद्दे पर लड़ाई जीतने के लिए राजनीतिक पार्टियों व जनता को एकजुट होना होगा।'' देश का प्रधानमंत्री रहा व्यक्ति भी जब किसी विवाद को सुलझाने की बजाय क्षेत्रीयता के आधार पर लोगों को उकसाने की बात करे तो तय है, विवाद उलझेगा ही। ऐसी ही एकपक्षीय धारणाओं की वजह से कर्नाटक-तमिलनाडु के बीच कावेरी जल विवाद पिछले 124 साल से स्थायी समस्या बना हुआ है।
दक्षिण भारत की गंगा मानी जाने वाली कावेरी नदी कर्नाटक तथा उत्तरी तमिलनाडु में बहने वाली सदानीरा नदी है। यह पश्चिमी घाट के ब्रह्मगिरी पर्वत से निकलती है और 800 किलोमीटर लंबी है। इसके आस-पास के दोनों राज्यों के हिस्सों में खेती होती है। तमिल भाषा में कावेरी को 'पोन्नी' कहते हैं। पोन्नी का अर्थ है सोना उगाना। दोनों राज्यों की स्थानीय आबादी में ऐसी लोकमान्यता है कि कावेरी के जल में समृद्धि धूलि के कण मिले हुए हैं। इस लोकमान्यता को हम इस अर्थ में लेे सकते हैं कि कावेरी के पानी से जिन खेतों में सिंचाई होती है, उन खेतों से फसल के रूप में सोना पैदा होता है। इसीलिए यह नदी कर्नाटक और तमिलनाडु की कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मूलाधार है। ब्रह्मगिरी पर्वत कर्नाटक के कुर्ग क्षेत्र में आता है, जो कर्नाटक के अस्तित्व में आने से पहलेे मैसूर राज्य में था। यहीं से यह नदी मैसूर राज्य को सिंचित करती हुई दक्षिण पूर्व की ओर बहती हुई तमिलनाडु में प्रवश करती है और फिर इस राज्य के बड़े भू-भाग को जल से अभिसिंचित करती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

1892 व 1924 में मैसूर राज्य व मद्रास प्रेसिडेंसी (वर्तमान तमिलनाडु) के बीच जल बंटवारे को लेकर समझौते हुए थे। आजादी के बाद मैसूर का कर्नाटक में विलय हो गया। इसके बाद से कर्नाटक को लगने लगा कि मद्रास प्रेसिडेंसी पर अंग्रेजों का प्रभाव अधिक था, इसलिए समझौता मद्रास के पक्ष में किया गया है। लिहाजा वह इस समझौते को नहीं मानता जबकि तमिलनाडु का तर्क है कि पूर्व समझौते के मुताबिक उसने ऐसी कृषि योग्य भूमि विकसित कर ली है, जिसकी खेती कावेरी से मिलने वाले सिंचाई हेतु जल के बिना संभव ही नहीं है। इस बाबत 1986 में तमिलनाडु ने विवाद के निबटारे के लिए केंद्र सरकार से एक ट्रिब्यूनल बनाने की मांग की। नदी विवाद जल अधिनियम के तहत 1990 में ट्रिब्यूनल बनाया गया। इस ट्रिब्यूनल ने कर्नाटक को आदेश दिया कि तमिलनाडु को 419 अरब क्यूसेक फीट पानी, केरल को 30 अरब तथा पुद्दुचेरी को 2 अरब क्यूसेक पानी दिया जाए। किंतु कर्नाटक ने इस आदेश को मानने से इंकार करते हुए कहा कि कावेरी पर हमारा पूरा हक है, इसलिए हम पानी नहीं देंगे।
कर्नाटक का तर्क है कि अंग्रेजों के शासनकाल में कुर्ग मैसूर रियासत का हिस्सा था, और तमिलनाडु मद्रास प्रेसिडेंसी के रूप में फिरंगी हुकूमत का गुलाम था। गोया, 1924 के फैसलेे को सही नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि अभी भी ट्रिब्यूनल के इसी फैसलेे और अदालत के दबाव में कर्नाटक मजबूरीवश तमिलनाडु को पानी दे रहा है, लेेकिन उसकी पानी देने की कतई मंशा नहीं है। यह पानी कर्नाटक में कावेरी नदी पर बने कृष्ण-राजा सागर बांध से दिया जाता है जबकि तमिलनाडु कावेरी के पानी पर ज्यादा हक की मांग इसलिए करता है, क्योंकि कावेरी का 54 प्रतिशत बेसिन इलाका उसके क्षेत्र में आता है। कर्नाटक में बेसिन क्षेत्र 42 प्रतिशत है। इसी आधार पर प्राधिकरण ने तमिलनाडु को कावेरी के 58 प्रतिशत पानी का हकदार बताया था। लेकिन कर्नाटक केवल एक हजार टीएमसी पानी देने को तैयार है, इसीलिए न्यायालय के संशोधित आदेश को भी जनता ने मंजूर नहीं किया।
 दरअसल, भारत में नदियों के जल बंटवारे और बांधों की ऊंचाई से जुड़े अंतरराज्जीय जल विवाद अब राज्यों की वास्तविक जरूरत के बजाय सस्ती लोकप्रियता हासिल करने और वोट बैंक की राजनीति का शिकार होते जा रहे हैं। जैसा कि देवगौड़ा के बयान से परिलक्षित होता है। इसीलिए जल विवाद केवल कावेरी नदी से जुड़ा इकलौता विवाद नहीं है, बल्कि कई और भी विवाद इसी तरह दशकों से बने चले आ रहे हैं। तमिलनाडु व केरल के बीच मुल्ला पेरियार बांध की ऊंचाई को लेकर भी विवाद गहराया हुआ है। तमिलनाडु इस बांध की ऊंचाई 132 फीट से बढ़ाकर 142 फीट करना चाहता है, वहीं केरल इसकी ऊंचाई कम रखना चाहता है। इस परिप्रेक्ष्य में केरल का दावा है कि यह बांध खतरनाक है, इसीलिए इसकी जगह नया बांध बनना चाहिए। जबकि तमिलनाडु ऐसे किसी खतरे की आशंका को सिरे से खारिज करता है। गौरतलब है कि पेरियार नदी पर बंधा यह बांध 1895 में अंग्रेजों ने मद्रास प्रेसिडेंसी को 999 साल के पट्टे पर दिया था। जाहिर है, अंग्रेजों ने अपने शासन काल में अपनी सुविधा और जरूरत के मुताबिक बांधों का निर्माण व अन्य विकास कार्य किए। लेकिन स्वतंत्र भारत में उन कार्यों, फैसलों और समझौतों की राज्यों की नई भौगोलिक सीमा के गठन व उस राज्य में रहने वाली जनता की सुविधा व जरूरत के हिसाब से पुनर्व्याख्या करने की जरूरत है, क्योंकि अब राज्यों के तर्क वर्तमान जरूरतों के हिसाब से सामने आ रहे हैं। इस लिहाज से केरल का तर्क है कि इस पुराने बांध की उम्र पूरी हो चुकी है, लिहाजा यह कभी भी टूटकर धराशायी हो सकता है। अब इस आशंका की तकनीकी समीक्षा हो और अगर शंका निर्मूल है तो जनता को जागरूक करने की जरूरत है। इस परिप्रेक्ष्य में तमिलनाडु की शंका है कि केरल जिस नए बांध के निर्माण का प्रस्ताव रख रहा है, तो यह जरूरी नहीं कि वह तमिलनाडु को पूर्व की तरह पानी देता रहेगा। इस इसलिए प्रस्ताव में दोनों राज्यों के हितों से जुड़ी शतार्ें का पहले अनुबंध हो, तब बांध को तोड़ा जाए। केरल के सांसदों ने राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन से भी इस मुद्दे में हस्तक्षेप की अपील की है। इन विवादों के चलते इस मसले का भी निवारण नहीं हो पा रहा है।
इसी तरह पांच नदियों वाले प्रदेश पंजाब में रावी व ब्यास नदी के जल बंटवारे पर पंजाब और हरियाणा पिछले कई दशकों से अदालती लड़ाई लड़ रहे हैं। इनके बीच दूसरा जल विवाद सतलुज और यमुना लिंक नहर का है। प्रस्तावित योजना के तहत सतलुज और यमुना नदियों को जोड़कर नहर बनाने से पूर्वी व पश्चिमी भारत के बीच अस्तित्व में आने वाले जलमार्ग से परिवहन की उम्मीद बढ़ जाएगी। इस मार्ग से जहाजों के द्वारा सामान का आवागमन शुरू हो जाएगा। मसलन सड़क के समानांतर जलमार्ग का विकल्प खुल जाएगा। हरियाणा ने तो अपने हिस्से का निर्माण कार्य पूरा कर लिया है, लेेकिन पंजाब को इसमें कुछ नुकसान नजर आया तो उसने विधानसभा में प्रस्ताव लाकर इस समझौते को ही रद्द कर दिया। लिहाजा अब यह मामला अदालत में है। इसी तरह कर्नाटक, महाराष्ट्र और गोवा राज्यों के बीच महादयी नदी के जल बंटवारे को लेेकर दशकों से विवाद गहराया हुआ है। गौरतलब है कि न्यायाधीश जे. एम. पंचाल व महादयी नदी जल ट्रिब्यूनल ने तीनों राज्यों को सलाह दी है कि जल बंटवारे का हल परस्पर बातचीत व किसी तीसरे पक्ष के बिना हस्तक्षेप के सुलझाएं। यह मसला सुलझता है या नहीं, यह तो बातचीत के नतीजे सामने आने के बाद पता चलेगा। बहरहाल अंतरराज्यीय जल विवादों का इसी तरह राजनीतिकरण होता रहा तो देश की जीवनदायी नदियों में कावेरी की तरह आग लगना तय है।  

तमिलनाडु के किसान एक साल में तीन फसल उगा रहे हैं, जबकि कर्नाटक के पास एक फसल के लिए भी पानी नहीं है। ऐसे में उन्हें पानी देना कैसे संभव है। इसके विरोध में हमें तमिलनाडु के लोगों की तरह एकजुट होना होगा।
— एच. डी. देवगौडा
पूर्व प्रधानमंत्री एवं जनता दल (से) के नेता

1892 व 1924 में मैसूर राज्य व मद्रास प्रेसिडेंसी (वर्तमान तमिलनाडु) के बीच जल बंटवारे को लेकर समझौते हुए थे। आजादी के बाद मैसूर का कर्नाटक में विलय हो गया। इसके बाद से कर्नाटक को लगने लगा कि मद्रास प्रेसिडेंसी पर अंग्रेजों का प्रभाव अधिक था, इसलिए समझौता मद्रास के पक्ष में किया गया है। लिहाजा वह इस समझौते को नहीं मानता जबकि तमिलनाडु का तर्क है कि पूर्व समझौते के मुताबिक उसने ऐसी कृषि योग्य भूमि विकसित कर ली है, जिसकी खेती कावेरी से मिलने वाले सिंचाई हेतु जल के बिना संभव ही नहीं है। इस बाबत 1986 में तमिलनाडु ने विवाद के निबटारे के लिए केंद्र सरकार से एक ट्रिब्यूनल बनाने की मांग की। नदी विवाद जल अधिनियम के तहत 1990 में ट्रिब्यूनल बनाया गया। इस ट्रिब्यूनल ने कर्नाटक को आदेश दिया कि तमिलनाडु को 419 अरब क्यूसेक फीट पानी, केरल को 30 अरब तथा पुद्दुचेरी को 2 अरब क्यूसेक पानी दिया जाए। किंतु कर्नाटक ने इस आदेश को मानने से इंकार करते हुए कहा कि कावेरी पर हमारा पूरा हक है, इसलिए हम पानी नहीं देंगे।
कर्नाटक का तर्क है कि अंग्रेजों के शासनकाल में कुर्ग मैसूर रियासत का हिस्सा था, और तमिलनाडु मद्रास प्रेसिडेंसी के रूप में फिरंगी हुकूमत का गुलाम था। गोया, 1924 के फैसलेे को सही नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि अभी भी ट्रिब्यूनल के इसी फैसलेे और अदालत के दबाव में कर्नाटक मजबूरीवश तमिलनाडु को पानी दे रहा है, लेेकिन उसकी पानी देने की कतई मंशा नहीं है। यह पानी कर्नाटक में कावेरी नदी पर बने कृष्ण-राजा सागर बांध से दिया जाता है जबकि तमिलनाडु कावेरी के पानी पर ज्यादा हक की मांग इसलिए करता है, क्योंकि कावेरी का 54 प्रतिशत बेसिन इलाका उसके क्षेत्र में आता है। कर्नाटक में बेसिन क्षेत्र 42 प्रतिशत है। इसी आधार पर प्राधिकरण ने तमिलनाडु को कावेरी के 58 प्रतिशत पानी का हकदार बताया था। लेकिन कर्नाटक केवल एक हजार टीएमसी पानी देने को तैयार है, इसीलिए न्यायालय के संशोधित आदेश को भी जनता ने मंजूर नहीं किया।
 दरअसल, भारत में नदियों के जल बंटवारे और बांधों की ऊंचाई से जुड़े अंतरराज्जीय जल विवाद अब राज्यों की वास्तविक जरूरत के बजाय सस्ती लोकप्रियता हासिल करने और वोट बैंक की राजनीति का शिकार होते जा रहे हैं। जैसा कि देवगौड़ा के बयान से परिलक्षित होता है। इसीलिए जल विवाद केवल कावेरी नदी से जुड़ा इकलौता विवाद नहीं है, बल्कि कई और भी विवाद इसी तरह दशकों से बने चले आ रहे हैं। तमिलनाडु व केरल के बीच मुल्ला पेरियार बांध की ऊंचाई को लेकर भी विवाद गहराया हुआ है। तमिलनाडु इस बांध की ऊंचाई 132 फीट से बढ़ाकर 142 फीट करना चाहता है, वहीं केरल इसकी ऊंचाई कम रखना चाहता है। इस परिप्रेक्ष्य में केरल का दावा है कि यह बांध खतरनाक है, इसीलिए इसकी जगह नया बांध बनना चाहिए। जबकि तमिलनाडु ऐसे किसी खतरे की आशंका को सिरे से खारिज करता है। गौरतलब है कि पेरियार नदी पर बंधा यह बांध 1895 में अंग्रेजों ने मद्रास प्रेसिडेंसी को 999 साल के पट्टे पर दिया था। जाहिर है, अंग्रेजों ने अपने शासन काल में अपनी सुविधा और जरूरत के मुताबिक बांधों का निर्माण व अन्य विकास कार्य किए। लेकिन स्वतंत्र भारत में उन कार्यों, फैसलों और समझौतों की राज्यों की नई भौगोलिक सीमा के गठन व उस राज्य में रहने वाली जनता की सुविधा व जरूरत के हिसाब से पुनर्व्याख्या करने की जरूरत है, क्योंकि अब राज्यों के तर्क वर्तमान जरूरतों के हिसाब से सामने आ रहे हैं। इस लिहाज से केरल का तर्क है कि इस पुराने बांध की उम्र पूरी हो चुकी है, लिहाजा यह कभी भी टूटकर धराशायी हो सकता है। अब इस आशंका की तकनीकी समीक्षा हो और अगर शंका निर्मूल है तो जनता को जागरूक करने की जरूरत है। इस परिप्रेक्ष्य में तमिलनाडु की शंका है कि केरल जिस नए बांध के निर्माण का प्रस्ताव रख रहा है, तो यह जरूरी नहीं कि वह तमिलनाडु को पूर्व की तरह पानी देता रहेगा। इस इसलिए प्रस्ताव में दोनों राज्यों के हितों से जुड़ी शतार्ें का पहले अनुबंध हो, तब बांध को तोड़ा जाए। केरल के सांसदों ने राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन से भी इस मुद्दे में हस्तक्षेप की अपील की है। इन विवादों के चलते इस मसले का भी निवारण नहीं हो पा रहा है।
इसी तरह पांच नदियों वाले प्रदेश पंजाब में रावी व ब्यास नदी के जल बंटवारे पर पंजाब और हरियाणा पिछले कई दशकों से अदालती लड़ाई लड़ रहे हैं। इनके बीच दूसरा जल विवाद सतलुज और यमुना लिंक नहर का है। प्रस्तावित योजना के तहत सतलुज और यमुना नदियों को जोड़कर नहर बनाने से पूर्वी व पश्चिमी भारत के बीच अस्तित्व में आने वाले जलमार्ग से परिवहन की उम्मीद बढ़ जाएगी। इस मार्ग से जहाजों के द्वारा सामान का आवागमन शुरू हो जाएगा। मसलन सड़क के समानांतर जलमार्ग का विकल्प खुल जाएगा। हरियाणा ने तो अपने हिस्से का निर्माण कार्य पूरा कर लिया है, लेेकिन पंजाब को इसमें कुछ नुकसान नजर आया तो उसने विधानसभा में प्रस्ताव लाकर इस समझौते को ही रद्द कर दिया। लिहाजा अब यह मामला अदालत में है। इसी तरह कर्नाटक, महाराष्ट्र और गोवा राज्यों के बीच महादयी नदी के जल बंटवारे को लेेकर दशकों से विवाद गहराया हुआ है। गौरतलब है कि न्यायाधीश जे. एम. पंचाल व महादयी नदी जल ट्रिब्यूनल ने तीनों राज्यों को सलाह दी है कि जल बंटवारे का हल परस्पर बातचीत व किसी तीसरे पक्ष के बिना हस्तक्षेप के सुलझाएं। यह मसला सुलझता है या नहीं, यह तो बातचीत के नतीजे सामने आने के बाद पता चलेगा। बहरहाल अंतरराज्यीय जल विवादों का इसी तरह राजनीतिकरण होता रहा तो देश की जीवनदायी नदियों में कावेरी की तरह आग लगना तय है।  

ShareTweetSendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

italian pm giorgia meloni says trump totally invented story italy and i never beg

‘मैं और इटली कभी भीख नहीं मांगते’, ट्रंप के फोटो के लिए भीख मांगने वाले दावे पर भड़कीं मेलोनी

चीन के राजवंशों में जिंदा दफना दी जाती थीं पत्नियां, सैनिक और दास-दासियां (फोटो- एआई द्वारा निर्मित)

क्यों चीन के राजवंशों में जिंदा दफनाई जाती थीं पत्नियां, दास और सैनिक? ‘चीन के काले इतिहास’ पर वामपंथी इतिहासकार चुप

मौलाना सज्जाद नोमानी

मुस्लिम वोट बैंक का ‘वीटो’ खत्म होने से परेशान मौलाना सज्जाद नोमानी और उनका इकोसिस्टम

‘जला दो पूरा लेबनान’, फूटा इजरायल के मंत्री का गुस्सा; हिज्बुल्लाह के ठिकानों पर भीषण हवाई हमले जारी

संत का आशीर्वाद लेते मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी

राष्ट्रीय चेतना और सनातन संस्कृति को सुदृढ़ कर रहा विश्व हिंदू परिषद : मुख्यमंत्री धामी

संत कबीर नगर में हिंदू युवक आनंत की हत्या कर दी गई

छेड़छाड़ का विरोध करने पर नासिर, निरहू, जैगम ने आनंद को घेरा, तलवार से हमला और फिर गला रेत कर मार डाला

Load More

ताज़ा समाचार

italian pm giorgia meloni says trump totally invented story italy and i never beg

‘मैं और इटली कभी भीख नहीं मांगते’, ट्रंप के फोटो के लिए भीख मांगने वाले दावे पर भड़कीं मेलोनी

चीन के राजवंशों में जिंदा दफना दी जाती थीं पत्नियां, सैनिक और दास-दासियां (फोटो- एआई द्वारा निर्मित)

क्यों चीन के राजवंशों में जिंदा दफनाई जाती थीं पत्नियां, दास और सैनिक? ‘चीन के काले इतिहास’ पर वामपंथी इतिहासकार चुप

मौलाना सज्जाद नोमानी

मुस्लिम वोट बैंक का ‘वीटो’ खत्म होने से परेशान मौलाना सज्जाद नोमानी और उनका इकोसिस्टम

‘जला दो पूरा लेबनान’, फूटा इजरायल के मंत्री का गुस्सा; हिज्बुल्लाह के ठिकानों पर भीषण हवाई हमले जारी

संत का आशीर्वाद लेते मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी

राष्ट्रीय चेतना और सनातन संस्कृति को सुदृढ़ कर रहा विश्व हिंदू परिषद : मुख्यमंत्री धामी

संत कबीर नगर में हिंदू युवक आनंत की हत्या कर दी गई

छेड़छाड़ का विरोध करने पर नासिर, निरहू, जैगम ने आनंद को घेरा, तलवार से हमला और फिर गला रेत कर मार डाला

प्रतीकात्मक तस्वीर

हरिद्वार बैठक: विहिप का बड़ा ऐलान, परिवार कानूनों की समीक्षा और गौ रक्षा पर जोर

20 जून का पंचांग

20 जून का पंचांग: जानें कल के ग्रह-नक्षत्र और लग्न का पूरा प्रभाव

Parastu Ahmadi

कौन हैं Parastoo Ahmadi, और क्यों उन्हें और अन्य संगीतकारों को सुनाई गई 74 कोड़ों की सजा?

योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश

अयोध्या मामले पर बोले सीएम योगी : 15 दिन और देख लें, एसआईटी दूध का दूध और पानी का पानी करेगी

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies