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जोड़ बना पर जान गई

Written byArchiveArchive
Sep 19, 2016, 12:00 am IST
inArchive

दिंनाक: 19 Sep 2016 13:45:27

देश में वामपंथ अपनी बची-खुची मांदों में आखिरी सांसें ले रहा है। जेएनयू को वामपंथियों का अंतिम आरामदेह शरणस्थल कहा जा सकता है। पर इस बार के छात्र संघ चुनाव के नतीजे दर्शा रहे हैं कि उनका खूनी क्रांति का आखिरी ठौर भी खतरे में है

 डॉ़ शिव शक्ति बक्सी

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में एक बार फिर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् को छात्रों का भारी समर्थन प्राप्त हुआ। आम आदमी पार्टी की छात्र इकाई के चुनाव से हटने के बाद विद्यार्थी परिषद् एवं कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई आमने-सामने थी। इस सीधे मुकाबले में विद्यार्थी परिषद् ने भारी अंतर से अध्यक्ष, सचिव एवं सह-सचिव के पद जीत लिये। इस तरह से विद्यार्थी परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय में वर्ष 2010 से लगातार छात्रों का भारी समर्थन प्राप्त करने मंे सफल रही है। इतना ही नहीं, इस वर्ष राजस्थान, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड एवं झारखंड में अब तक हुए छात्रसंघ चुनावों में हर जगह विद्यार्थी परिषद् को छात्रों का भारी समर्थन मिला है।
एक ओर जब हर तरफ से विद्यार्थी परिषद् की भारी जीत के समाचार प्राप्त हो रहे हैं, तो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में वामपंथी जीत से कइयों के मन में कुछ प्रश्न पुन: खड़े हुए हैं। दिल्ली स्थित दिल्ली विश्वविद्यालय एवं जेएनयू के बीच बमुश्किल 20 किमी. का फासला है लेकिन इतनी ही दूरी पर छात्र दो  तरह का जनादेश क्यों दे रहे हैं? क्या कारण है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में कोई गंभीर चुनौती प्रस्तुत करने में असफल वामपंथी छात्र संगठन जेएनयू में लगातार जीतते आ रहे हैं? क्या जेएनयू में विद्यार्थी परिषद् कोई गंभीर चुनौती प्रस्तुत नहीं कर पा रही? क्या जेएनयू वामपंथ का अभेद्य दुर्ग बना रहेगा? इस तरह के अनेक प्रश्न इस देश के प्रबुद्ध जनों के मनो-मस्तिष्क में मंडरा रहे हैं। इन चुनाव परिणामों के वस्तुगत निहितार्थों की गहरी छानबीन के बिना हम शायद ही इन निष्कषार्ें पर पहुंच पाएंगे कि क्या कम्युनिस्टों की इस बार की जीत उनके पुनर्जीवन का संकेत है या मृत्यु से पहले मरणासन्न रोगी की गहरी हिचकी भरी सांस।
इस बार का जेएनयू छात्रसंघ चुनाव कुछ बड़े प्रश्नों के संदर्भ में हुआ। 9 फरवरी, 2016 की घटना, जब जेएनयू परिसर में कुछ वामपंथी छात्र संगठनों की शह पर देश विरोधी नारे लगाये गए तथा इस घटना से उपजे देशव्यापी विरोध के फलस्वरूप पूरे देश की निगाहें इन चुनावों पर थीं। वामपंथी संगठनों की भ्रमित करने वाली गतिविधियां तथा भारत-विरोधी नारों के समय उनके संदेहास्पद कृत्यांे से विवि की छवि को गहरा धक्का लगा। एक ओर जब वामपंथी अपने अवांछित बयानों से जेएनयू की छवि को नुकसान पहुंचा रहे थे, वहीं दूसरी ओर विद्यार्थी परिषद् जेएनयू की छवि को बचाने मंे लगी थी। इस पूरे परिदृश्य में विद्यार्थी परिषद् एक आशा की किरण के रूप में उभरी, जो शैक्षणिक परिसरों में विभाजनकारी-विध्वंसकारी तत्वों को मुंहतोड़ जवाब देने की क्षमता रखती है। ऐसे में जो परिणाम आया है, उसे वामपंथी छात्र संगठन अपनी जीत तो मान सकते हैं, पर इस तथ्य को झुठला नहीं सकते कि जेएनयू का उनका दुर्ग अब दरक चुका है।
जेएनयू छात्रसंघ चुनाव को हमेशा वैचारिक संघर्ष के रूप में देखा जाता रहा है, परन्तु इस बार 'अवसरवादी राजनीति' का वीभत्स चेहरा देखने को मिला। आइसा-एसएफआई का असैद्धांतिक गठबंधन छात्रों को 'वाम एकता' के नाम पर ठगने के लिए गढ़ा गया। इस पूरे प्रकरण में एआईएसएफ जिसके निवर्तमान छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार हैं, एक मजाक बन कर रह गई। यह कैसी छात्र राजनीति थी कि उनके दल को चुनावों के लिए कोई उम्मीदवार ही नहीं मिल पाया या फिर कन्हैया कुमार अब प्रासंगिक ही नहीं रह गये? यह कम्युनिस्ट राजनीति के चरित्र एवं उनके वैचारिक दिवालियेपन का सबसे अच्छा उदाहरण है। एसएफआई एवं आईसा न केवल एक-दूसरे के विरुद्ध थे, बल्कि एक-दूसरे को वैचारिक दुश्मन मानते रहे हैं। दोनों एक-दूसरे को 'नकली वामपंथी' की उपाधि से नवाजते रहे हैं। आईसा-एसएफआई का नापाक एवं सत्ता-केन्द्रित गठबंधन पूरे देश में कम्युनिस्टों का वैचारिक दिवालियापन तो दिखाता ही है, साथ ही यह प्रमाणित करता है कि वे अब मरणासन्न स्थिति में पहुंच चुके हैं। वामपंथी दल भी इस सच्चाई को स्वीकार कर चुके हैं और असैद्धांतिक गठबंधन से जनता को अपने झांसे में लेने को तत्पर हैं। लेकिन इस देश की जनता ने हर जगह ऐसे नापाक गठबंधनों को नकार दिया है और ऐसे अवसरवादी तत्वों को सबक सिखाया है। यह जेएनयू में विद्यार्थी परिषद् की बढ़ी हुई ताकत का ही परिणाम है कि सारे कम्युनिस्ट दल गठबंधन करने को मजबूर हुए और अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। कम्युनिस्टों के असैद्धांतिक एवं सत्ता-केन्द्रित गठजोड़ से चुनाव के पहले ही अभाविप की वैचारिक जीत हो चुकी थी। यह कम्युनिस्टों के लिए आत्ममंथन का समय है।

इस बार के छात्रसंघ चुनाव के परिणाम विद्यार्थी परिषद् के लिए उत्साहजनक रहे हैं। विद्यार्थी परिषद् ने जब से जेएनयू में चुनौती प्रस्तुत की है, वाम छात्र संगठन के विभिन्न धड़ों का कब्जा दो-तिहाई मतों पर निरंतर बना रहा है। यह पहली बार था कि सभी कम्युनिस्ट दल एकजुट होकर विद्यार्थी परिषद् को रोकने में लगे हुए थे। आईसा-एसएफआई गठबंधन को एआईएसएफ, डीएसएफ आदि वामपंथी छात्र संगठनों का समर्थन था। आशा यह की जा रही थी कि इस तरह की 'वाम-एकता' से विद्यार्थी परिषद् की जड़ें परिसर से उखड़ जाएंगी तथा जेएनयू के छात्र इकतरफा कम्युनिस्ट-गठबंधन को समर्थन देंगा। परन्तु परिणाम कम्युनिस्टों की आशा के विपरीत आया। विद्यार्थी परिषद् का समर्थन इस विपरीत परिस्थिति में भी बढ़ा और पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत मतों की वृद्धि हुई। सबसे चौंकाने वाला परिणाम यह रहा कि जिन कम्युनिस्ट धड़ों का अलग-अलग चुनाव लड़ने के बावजूद सामूहिक तौर पर दो-तिहाई मतों पर कब्जा निरंतर बना हुआ था, यह पहली बार था कि उनका एक 'महागठबंधन' होते हुए भी वे 40 प्रतिशत मतों के नीचे आ गये। वामपंथी संगठन यदि ईमानदारी से इसका विश्लेषण करें तो उन्हें अब जेएनयू में अपने पैर उखड़ते नजर आएंगे।
इस बार का जेएनयू चुनाव बापसा (बिरसा, अंबेडकर, फुले स्टुडेंट्स एसोसिएशन) के उदय के कारण बहुत ही दिलचस्प रहा। वंचित-शोषित समाज के हितों के संरक्षण का दंभ भरने वाले कम्युनिस्टों को बापसा ने इस बार आईना दिखाया। बापसा को मिले समर्थन से यह साफ हो गया कि कम्युनिस्ट अब जेएनयू के वंचित-शोषित वर्ग से आये छात्रों को अधिक दिनों तक नहीं छल सकते। जिस प्रकार से पश्चिम बंगाल एवं केरल में कम्युनिस्ट बेनकाब हो चुके हैं और पूरे देश से जिस तरह से उनका सफाया हुआ, ठीक उसी प्रकार की प्रक्रिया का आरंभ जेएनयू में भी देखने को मिल रहा है। नंदीग्राम-सिंगूर के गरीब किसानों की कराह तथा तापसी मलिक जैसी महिला के चीत्कार के बीच जिस तरह से पश्चिम बंगाल मंे वामपंथी दम तोड़ चुके हैं, ठीक उसी तरह जेएनयू मंे भी वंचित-शोषित वगार्ें के छात्रों के प्रतिरोध एवं अनमोल रतन जैसे अपने बलात्कारियों की कारगुजारियों के बीच जेएनयू के कम्युनिस्टों का फातिहा पढ़ा जा रहा है। राष्ट्र-विरोधी, विभाजनकारी एवं विध्वंसकारी वामपंथ राजनीति को वंचित-शोषित के हमदर्द के मुलम्मे से ढ़कने की कोशिशों की जेएनयू के छात्र अब समझने लगे हैं। जिस प्रकार से छात्रों ने इस बार अपना समर्थन व्यक्त किया है, इससे यह कहने में कोई संशय नहीं कि वामपंथी राजनीति पूरी तरह से बेनकाब हो रही है। स्थापना के साथ ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पर वामपंथी विचारधारा और वामपंथी दलों का प्रभुत्वपूर्ण एकाधिकार रहा है।  अध्यापन तक में वामपंथी विचारधारा का एकल प्रभुत्व स्थापित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप नवागंतुक छात्र भी वामपंथ को अपनी नियति मान लेते हैं। पर परिषद् के उभार, प्रसार और संघर्ष ने इस दशकों पुराने वामपंथी एकाधिकार को निर्णायक चुनौती दी। परिषद् के उभार से राष्ट्रवाद एक विचारधारा के रूप में वामपंथियों के सामने सशक्त चुनौती बनकर आया। वे यह महसूस करने लगे कि वषार्ें से संजोये उनके स्वप्न को विद्यार्थी परिषद् चकनाचूर कर सकती है। और ऐसा हुआ भी। 9 फरवरी की घटना इन्हीं मंसूबों की परिणति थी, परन्तु जिस प्रकार से पूरे देश में इस घटना की भर्त्सना हुई, उससे कम्युनिस्ट दलों के सामने अस्तित्व का प्रश्न खड़ा हो गया है। अपनी निश्चित पराजय को सामने देख कम्युनिस्टों के सामने और कोई रास्ता नहीं बचा और एक अवसरवादी-सिद्धांतहीन 'महागठबंधन' सामने आया। आने वाले दिनों में विद्यार्थी परिषद् को इस महागठबंधन से निर्णायक संघर्ष करना पड़ेगा।     
        (लेखक जेएनयू- विद्यार्थी परिषद् के पूर्व
अध्यक्ष  रहे हैं।) 

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