सुशासन का सच
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सुशासन का सच

Written byArchiveArchive
Sep 19, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 19 Sep 2016 11:29:12

तेरह सौ गाडि़यों का धूल उड़ाता काफिला। अपराध और राजनीति के गठजोड़ के सामने झुके-बिछे चार मंत्री और अनगिनत विधायक। जनता को गिरफ्त में लेता डर का शिकंजा… यह बिहार है।
नेता और सजायाफ्ता डॉन की जमानत के बाद लालू मुदित हैं और जनता स्तब्ध। इस रिहाई ने बता दिया कि बिहार की जनता ने पिछले विधानसभा चुनाव में लालू को नीतीश के मुकाबले जो ज्यादा नंबर दिए हैं, उससे उनकी ताकत उफान मारने लगी है। इस ताकत ने जता दिया कि पर्दे के पीछे रहकर बांह मरोड़ने की कल और बाहुबल अब राजद के पास है। जमानत पर छूटे बाहुबली नेता ने ताल ठोककर बता दिया कि हमारे नेता लालू प्रसाद यादव हैं, कोई और नहीं।
बिहार में सत्ता के सूत्र किसके हाथ में हैं? सुशासन की कसौटी क्या है? सूबे में जंगलराज की वापसी हुई या नहीं? छोडि़ए ना, इन सब बातों का अब कोई मतलब नहीं। डॉन की जमानत के बाद उसके गुर्गों और नेताओं के हुंकारे बता रहे हैं कि बिहार का हाल क्या है और किसकी वापसी हुई है।
शहाबुद्दीन एक नाम है, लालू प्रसाद भी एक नाम है और राजद भी एक राजनीतिक दल का नाम ही तो है, लेकिन बिहार की सियासत और जुर्म का गड्डमड्ड इतिहास बताता है कि राजनीति और अपराध के कुख्यात एकवचनों ने ही 'राजनीतिक माफिया' जैसे बहुवचन को जन्म दिया है।
शह पूरी है, शहाबुद्दीन छुट्टा। बकौल सुशासन बाबू, न्याय ने अपना काम किया है। उनके अनुसार जिस तरह शहाबुद्दीन का 11 वर्ष तक जेल में रहना न्याय प्रक्रिया का परिणाम था, उसी तरह उसकी जमानत भी न्यायिक प्रक्रिया का ही नतीजा है। नीतीश यह बात कह तो रहे हैं परंतु शहाबुद्दीन की जमानत और इसके पूर्व और पश्चात के घटनाक्रमों से उन्हें इस बात का भी एहसास हो गया होगा कि राजद से गठबंधन की उन्हें अब और आगे कैसी और क्या-क्या कीमत चुकानी पड़ेगी।
इस बात को सब जानते हैं कि न्यायिक प्रक्रिया जांच की निष्पक्षता और पुलिस प्रशासनिक व्यवस्था की तेजी के बिना पंगु है। शहाबुद्दीन की रिहाई इस बात का उदाहरण है कि बिहार की पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था को पंगु बनाने का षड्यंत्र काम कर रहा है। इस षड्यंत्र में कौन-कौन भागीदार है?
डॉन के गुर्गों द्वारा तेजाब से नहलाकर मारे गये दो भाइयों के मामले में तीसरा और सबसे बड़ा भाई अहम साक्षी था। अपराधियों को उनके किये का दंड दिलाने के लिए इस गवाह की सुरक्षा बहुत जरूरी थी, लेकिन उसे भी ललकार कर मारा गया। अपराधियों ने जो करना था किया, लेकिन सरकार मानो कंबल ओढ़कर सो गई। हत्या के बाद इस मामले में मुकदमे में देरी की गई। नीतीश कुमार को यह बताना चाहिए कि यह देरी किन कारणों से, किस स्तर पर (और किसके इशारे पर) हुई। इस देरी में षड्यंत्र के सूत्र इसलिए भी साफ हैं कि न तो सीवान पुलिस ने शहाबुद्दीन पर क्राइम कंट्रोल एक्ट (सीसीए) लगाने की कोशिश की और न ही सरकारी वकील ने न्यायालय के सामने दलील रखी कि बिहार की आपराधिक राजनीति का सबसे कुख्यात व्यक्ति अपनी रिहाई के बाद जांच को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इस एक प्रकरण ने साफ कर दिया है कि पर्दे के पीछे नीतीश कुमार अपनी क्षमता खो चुके हैं। कोई कुछ कहे लेकिन सच यह है कि सुशासन का 'गुड्डा' अब बाहुबलियों के हाथ की कठपुतली है।
वैसे, भारत में राजनीति के अपराधीकरण का रोग पुराना है और केवल बिहार तक सीमित नहीं है। शहाबुद्दीन की रिहाई ने सिर्फ संदर्भ और भारतीय लोकतंत्र के पुराने दर्द को ताजा किया है। 1993 में पूर्व गृह सचिव एन.एन वोहरा की अध्यक्षता में बनी समिति ने इस रोग का संज्ञान लिया था। 1997 में सवार्ेच्च न्यायालय ने समिति की अनुशंसाओं के क्रियान्वयन के लिए केंद्र सरकार को कहा भी था। और तो और, देश की सबसे बुजुर्ग पार्टी के युवराज ने दिल्ली में दागी राजनीतिज्ञों को राहत देने वाले अध्यादेश को फाड़ते हुए बांहें भी चढ़ाई थीं। लेकिन हुआ क्या? समितियों की अनुशंसाएं धूल में दब गईं। न्यायालयों के आह्वान राजनीतिक नारों के शोर में खो गए। दागी अध्यादेश फाड़ने वाले खुद दागियों की गोद में जा बैठे।
ऐसे में इलाज क्या है? जदयू यदि राजद की अपमान और अवमानना की हद तक जाती चिकौटियों का जवाब संयमित और सख्त लहजे में देना शुरू करे तो इलाज हो सकता है। प्रशासनिक दृढ़ता यदि बेमेल गठबंधन की मजबूरियों के सामने झुकने से इनकार कर दे तो इलाज हो सकता है। न्यायालय यदि अपवित्र राजनीतिक मंशाओं और राजनीति के अपराधीकरण का कड़ा संज्ञान लेने लगें तो इलाज हो सकता है। जनता यदि निर्वाचन के दौरान नायक और खलनायक का फर्क साफ करने का निर्भय संकल्प ले तो निश्चित ही इस रोग का निदान हो सकता है।
बहरहाल, बिहार में बोतल भले बंद हो, अपराध का जिन्न बाहर आ चुका है। लालू के चेहरे की चमक, नीतीश की हताशा और सहमी जनता का मौन, बिहार की हालत बयान कर रहा है।
रहा होगा सुशासन का कभी कोई सूरज, आज हजारों गाडि़यों के काफिलों से उठी धूल ने बिहार के शासन-प्रशासन को ढक लिया है। मत पूछिए, वहां राज है या जंगलराज।

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