पितृ पक्षश्रद्धामय तर्पण
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पितृ पक्षश्रद्धामय तर्पण

Written byArchiveArchive
Sep 12, 2016, 12:00 am IST
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दिंनाक: 12 Sep 2016 14:17:55

अपने पूर्वजों के प्रति सतत श्रद्धा व्यक्त करने की हिन्दू संस्कृति में पूर्ण व्यवस्था तो है, लेकिन साथ ही ग्रंथों में अपने जीवित बुजुर्गों के प्रति भी सदैव समर्पण का भाव रखने का संदेश दिया गया है

प्रो. योगेन्द्र चन्द्र शर्मा

श्राद्ध शब्द 'श्रद्धा' से बना है। संस्कृत की एक उक्ति-'श्रद्धया दीयते तत् श्राद्धम्' के अनुसार श्रद्धा से किसी वस्तु को देना ही श्राद्ध है। यहां श्राद्ध से अभिप्राय पितरों के प्रति श्रद्धा से है। हिन्दू संस्कृति में श्राद्ध की यह गौरवशाली परम्परा प्रारम्भ से ही चली आ रही है। वैदिक साहित्य में 1500 मंत्र श्राद्ध पर ही केन्द्रित हैं। इसके उपरान्त विभिन्न पुराणों, स्मृतियों तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में भी श्राद्ध का बहुतायत से उल्लेख है। श्राद्ध का दूसरा नाम 'कनागत' है। 'कनागत' शब्द 'कन्यार्कगत' का अपभ्रंश है। कन्यार्कगत शब्द का अर्थ है सूर्य (अर्क) का कन्या राशि में जाना। श्राद्धों का यही समय होता है और इसीलिए इसे 'कन्यार्कगत' अथवा अपभ्रंश के रूप में कनागत कहा गया। तद्नुसार भाद्रपद की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर, आश्विन के कृष्ण पक्ष में अमावस्या तक कुल 15 दिन की अवधि पितृपक्ष कहलाती है। इसी अवधि में पितरों के प्रति श्रद्धा के प्रतीक श्राद्धों का आयोजन किया जाता है।

'कनागत' शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में एक अन्य मान्यता यह है कि यह शब्द 'कर्णागत' का अपभ्रंश है और इसका संबंध कर्ण के साथ जुड़ी एक कथा से है। कथा इस प्रकार है:

कर्ण प्रतिदिन सवा मन सोना दान किया करते थे। मृत्यु के उपरान्त उन्हें स्वर्ग में स्वर्ण निर्मित ऐसा महल रहने के लिए मिला, जिसमें प्रत्येक वस्तुत स्वर्ण की ही बनी थी। कर्ण परेशान हो उठे। उन्होंने इसका कारण पूछा तो पता चला कि उन्होंने प्रतिदिन केवल स्वर्ण का ही दान किया था, अन्य किसी वस्तु का नहीं। इसलिए उनका अधिकार केवल स्वर्ण प्राप्त करने का ही है। यह सुनकर कर्ण को अपनी गलती का एहसास हुआ। किसी तरह अनुनय-विनय करके उन्होंने प्रभु से 15 दिन के लिए वापस पृथ्वी पर आने की स्वीकृति प्राप्त कर ली। कर्ण वापस धरती पर आए और 15 दिन तक न केवल विभिन्न प्रकार की वस्तुएं दान में दीं, अपितु अनेक व्यक्तियों को नित्यप्रति स्वादिष्ट भोजन भी करवाया। कहते हैं कि इस घटना की स्मृति में ही कनागत मनाए जाने लगे।

कर्ण के साथ जुड़ी यह कथा किसी आधार पर प्रमाणित नहीं है और न यह तर्कसंगत प्रतीत होती है। श्राद्धों की परम्परा महाभारत की घटना से भी काफी पहले से प्रचलित है। यह संभव है कि आगे चलकर कर्ण से संबंधित यह दंतकथा भी इसके साथ आ जुड़ी हो।

श्राद्धों का आयोजन सूर्य के कन्या राशि में आने के समय ही किया जाए, इसके लिए 'हेमाद्रि' में कहा गया है-

आसाढ्या पंचमे पक्षे कन्यासंस्थे दिवाकरे।

यो वै श्राद्धं नर: कुर्य्यादेकस्मिन्नापि वासरे।।

तस्य संवत्सरं यातत्संतृप्त: पितरो ध्रुवम्।

अर्थात् आषाढ़ी पूर्णिमा से पांचवें पक्ष में जब सूर्य कन्या राशि पर स्थिर हो, तब जो मनुष्य एक दिन भी श्राद्ध करता है, उसके पितर निश्चित रूप से वर्ष भर संतृप्त रहते हैं।

हिन्दू संस्कृति में श्राद्ध न करना एक बुरी बात समझी गई है। ऐसे लोगों के लिए 'पृथ्वी चन्द्रोदय' में वृद्ध मनु का कथन है-

न तत्र वीरा जायन्ते निरोगो न शतायुष:।

न च श्रेयोऽधिगच्छन्ति यत्र श्राद्धं विवार्जितम्।।

अर्थात् जहां श्राद्ध नहीं होता, वहां न तो वीर पुरुष उत्पन्न होते हैं और न निरोग होते हैं और न शतायु ही होते हैं। वे कल्याण की प्राप्ति भी नहीं करते हैं।

मृत पूर्वजों का श्राद्ध करने के लिए वर्ष में दो दिन निर्धारित हैं। प्रथम मृत्यु-तिथि पर और दूसरा श्राद्ध के दिनों में उसी तिथि पर, जिस दिन मृत्यु हुई। यदि किसी की मृत्यु विदेश में हो जाए और मृत्यु की निश्चित तिथि ज्ञात न हो तो उसके लिए उसी माह अमावस्या को श्राद्ध करने की व्यवस्था है। श्राद्ध के लिए अमावस्या का विशेष महत्व माना गया है। प्राचीन ग्रंथों में इस दिन भूले-बिसरे पितरों का श्राद्ध करने की व्यवस्था दी गई है। कारण यह बतलाया गया है कि इस दिन पितृलोक हमारे काफी निकट रहता है। श्राद्ध के निश्चित दिन यदि कोई विघ्न उपस्थित हो जाए और उसकी वजह से श्राद्ध न किया जा सके तो उसके लिए एकादशी (श्राद्ध के दिनों में) को श्राद्ध किए जाने की भी व्यवस्था है।

श्राद्ध तीन पीढि़यों तक सभी पितरों के लिए किए जाने का विधान है। पितरों के अतिरिक्त गुरु, शिष्य, मित्र या अन्य किसी भी परिचित व्यक्ति का श्राद्ध किया जा सकता है। श्राद्ध करने का प्रथम अधिकार पुत्र या अन्य निकट के पुरुष परिजन को है। उसकी अनुपस्थिति में महिलाएं भी श्राद्ध कार्य करने की अधिकारी हैं।

श्राद्ध-कार्य में मुख्य बात है अपने पितरों का नाम लेकर उन्हें तिलांजलि देना। इसमें श्राद्ध करने वाले व्यक्ति से यह अपेक्षा की गई है कि वह श्वेत वस्त्र धारण करके अपने हाथ में जल, तिल और फूल लेकर पितरों के लिए अंजलि दे। यह भी व्यवस्था है कि इस दिन उपयुक्त पात्रों को दान दिया जाए तथा उन्हें भोजन करवाया जाए। श्राद्ध कर्म के लिए केवल ऐसे ब्राह्मण को आमंत्रित करने की बात कही गई है, जो विद्वान, वेदों का ज्ञाता, तपोनिष्ठ, ईमानदार और निर्लोभी हो।

श्राद्ध करने वाला व्यक्ति, यूं तो इस दिन दान और पूजा-पाठ पर जितना चाहे व्यय करे, किन्तु वह सब आवश्यक नहीं है। धन व्यय करने की सामर्थ्य न होने पर श्राद्ध के दिन पितरों को श्रद्धापूर्वक प्रणाम कर लेना भी पर्याप्त है। विष्णु पुराण में इस संबंध में कहा गया है-

'मेरे पास श्राद्ध करने की न क्षमता है, न धन है और न कोई अन्य सामग्री। अत: मैं पितरों को नमस्कार करता हूं। वे मेरी भक्ति से तृप्ति लाभ करें। मैंने साक्षी स्वरूप अपनी दोनों भुजाएं उठा रखी हैं।'

श्राद्ध के साथ जुड़ी हुई मुख्य बात श्रद्धा और तद्नुरूप भावना की है। शेष सब बातें गौण हैं। इसीलिए यह अपेक्षा की गई है कि श्राद्ध करने वाला व्यक्ति इस दिन न तो क्रोध करेगा, न अनावश्यक इधर-उधर जाएगा और न अन्य कोई अनुचित कार्य करेगा। श्राद्ध-कर्म में जो धन व्यय किया जाए, वह भी परिश्रम और ईमानदारी से कमाया हुआ होना आवश्यक है। निर्धारित व्यवस्था के अनुसार अन्याय, धोखाधड़ी, चोरबाजारी या भ्रष्टाचार आदि से कमाए गए धन से जो श्राद्ध किया जाता है, उससे दुरात्माएं तृप्त होती हैं, पितर नहीं।

भारतीय दर्शन के अनुसार मृत्यु के उपरान्त मनुष्य का स्थूल शरीर तो यहीं पड़ा रह जाता है और सूक्ष्म शरीर अपने कार्यों के अनुसार फल भोगने के लिए परलोक में चला जाता है। इस सूक्ष्म शरीर की तृप्ति के लिए ही श्राद्ध की व्यवस्था है।

दिवंगत आत्मा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए इन दिनों अन्य साधन भी अपनाए जाते हैं। मसलन कुछ समय का मौन धारण करना, उसकी स्मृति में संस्मरण या लेखादि लिखना, स्मारक या धर्मशाला आदि बनवाना। प्रकारान्तर से इन सब बातों को भी एक प्रकार से श्रद्धा ही कहा जा सकता है।

वर्तमान बुद्धि और तर्क के युग में सूक्ष्म शरीर और उसे तृप्त करने की बात को या श्राद्धों के औचित्य को सामान्यत: स्वीकार नहीं किया जाता। बात विवादास्पद हो सकती है। किन्तु इस रूप में इस पर विवाद नहीं होना चाहिए कि श्राद्ध पितरों के प्रति हमारी श्रद्धा के प्रतीक हैं और इस रूप में यह कार्य हमें अवश्य करना चाहिए। इस बात के साथ यह बात भी जुड़ी हुई है कि जब हम अपने मृत बुजुर्गों के प्रति इतनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं तो जीवित बुजुर्ग उससे अधिक ही श्रद्धा के पात्र हैं,

कम नहीं।

यह कार्य किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता कि हम अपने जीवित बुजुर्गों की उपेक्षा करें। पर्याप्त भोजन, औषधि और देखभाल के अभाव से वे दम तोड़ दें और मृत्यु के उपरान्त उनके श्राद्ध पर हम अनावश्यक रूप से हजारों रुपए व्यय कर दें। श्राद्ध हमसे श्रद्धा चाहते हैं, पाखण्ड या दिखावा नहीं। यह श्रद्धा सभी बुजुर्गों के प्रति होनी चाहिए, चाहे वे जीवित हों या मृतक।

 

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