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विघ्नहर्ता गणेश ऐसे देवता हैं जिनकी पूरी दुनिया दीवानी है। चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, जापान, कंबोडिया जैसे अनेक देशों में आज भी विनायक की प्रतिमाएं मिलती हैं और वहां के लोग इन्हें किसी न किसी रूप में पूजते हैं। विश्व में सबसे अधिक मुस्लिम इंडोनेशिया में रहते हैं। यहां की मुद्रा पर गणेश जी का चित्र अंकित है।

प्रशांत वाजपेयी
मानव चेतना को अभिव्यक्त करने के लिए भारत में हजारों वर्षों से प्रयोग होते आ रहे हैं। प्रयोगों और साधना की इस अनंत श्रृंखला को आध्यात्मिक परंपरा कहा जाता है। हमारी देव प्रतिमाएं मानो मानव की चेतना के नक्शे हैं, जिन पर चलकर अज्ञात के दरवाजे तक पहुंचा जाता है। जीव चेतना की परम संभावना को ईश्वर, परमात्मा, ब्रह्म आदि कहा गया। ईश्वर हमारे लिए कोई परम शासक अथवा अधिनायक नहीं है, जो दंड और पुरस्कार का निर्णय करता है। भारत के निर्भीक ऋषियों ने घोषणा की कि ईश्वर भी एक रास्ता है, मंजिल नहीं। और रास्ता चलने वाले पर निर्भर करता है। दिल्ली पहुंचने के लिए एक व्यक्ति चंडीगढ़ से चलना शुरू करता है, दूसरा आगरा से और तीसरा जयपुर से। सब पहुंचेंगे एक ही शहर, परंतु सब के रास्ते अलग-अलग होंगे। सबके अनुभव अलग-अलग होंगे। सबके साधन अलग-अलग होंगे।
इसलिए हिन्दू चिंतन के अनुसार ईष्ट देवता भी अपने भक्तों और साधकों की आवश्यकतानुसार अलग-अलग रूपों में ढल जाते हैं। शिव को ही देखिए। योग साधकों के लिए वे प्रथम योगी और योग प्रवर्तक हैं। तो औघड़ों और कुछ तंत्र साधकों के लिए भांग-धतूरे के सेवन में लिप्त फिर भी सबसे अलिप्त। दक्षिण के कुछ मछुआरों के समुदाय के लिए वे महान मछुआरे हैं, तो किसी जनजातीय बस्ती में वन के अधिपति और महान शिकारी। कहीं भूतनाथ हंै, तो कहीं पशुपतिनाथ।
शिव पुत्र गणेश भी अपने भक्तों के भावों को ग्रहण करते हुए अनेक रूपों में ढल गए। दूर-दूर गए, भारत के बाहर, धरती के दूसरे हिस्सों में। भक्तों, साधकों के साथ वे दक्षिण-पूर्व एशिया में गए तो महात्मा बुद्ध के शिष्यों के साथ तिब्बत, चीन और जापान पहुंचे। हालांकि ऐतिहासिक और पुरातात्विक प्रमाण बताते हैं कि इसके पूर्व भी धरती के अनेक हिस्सों में उन्हें पूजा जाता रहा है। यह हजारों वर्षों से भारतीय नाविकों, अन्वेषकों और व्यापारियों के विश्व संचार का प्रमाण है।
म्यांमार में गणेश महापेन (परमानंद ) के नाम से पूजे जाते हैं। यहां भी भारत की ही तरह उन्हें विघ्ननाशक माना जाता है। उनके आविर्भाव की कथा भी थोड़े प्रकारांतर के साथ वैसे ही प्रचलित हैं जैसे अपने देश में। अनेक प्राचीन देवस्थलों में उन्हें पद्मासन लगाए देखा जा सकता है।
कंबोडिया में विनायक की खमेर काल (छ टी तथा 7वीं शती ) की अनेक प्रतिमाएं हैं। इसी प्रकार वियतनाम में भी अनेक प्राचीन गणेश प्रतिमाएं हैं। यहां के चाम कला संग्रहालय में नौवीं शताब्दी की गणेश प्रतिमा है। साइगॉन संग्रहालय में गणेश विग्रह के तीन नेत्र हैं, जो यहां की योग परंपरा की ओर इंगित करते हैं।
जावा, बाली और बोर्नियो की गणेश प्रतिमाओं पर स्थानीय असर देखा जा सकता है। विश्व की सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया में उन्हें फ्रा-फीकानेसुआन कहा जाता है। यहां उन्हें कला-शिक्षा और व्यापार से जोड़कर देखा जाता है। ललित कला मंत्रालय के प्रतीक में गणेश स्थित हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियों और टीवी चैनल्स के मुख्यालयों में गणपति की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं।
फिल्मों या टीवी सीरियल्स की शूटिंग शुरू होने से पहले हिंदू विधि-विधान से गणेश पूजन होता है। मंदिरों के नाम भी हिंदू संस्कृति को प्रतिध्वनित करते हैं, जैसे सीलोम का वट फ्रा श्री उमादेवी मंदिर। इन मंदिरों में थाईलैंड के बौद्ध भी गणेश व अन्य देवताओं का पूजन करते हैं। यहां गणेश कूटनीति के भी अधिष्ठाता हैं। बैंकॉक के सेंट्रल वर्ल्ड (पूर्व वर्ल्ड ट्रेड सेंटर) के बाहर भी गणेश विद्यमान हैं।
जापान में गणपति कांगितेन भौतिक और पारलौकिक दोनों ज्ञान प्रदान करते हैं। राजधानी टोक्यो में इनके अनेक मंदिर हैं। कांगितेन की लोकप्रियता के अनेक आयाम हैं। साधक इन्हें बुद्धत्व का प्रदाता मानते हैं।
इंडोनेशिया में फिल्मों या टीवी सीरियल्स की शूटिंग शुरू होने से पहले गणेश पूजन होता है। मंदिरों के नाम भी हिंदू संस्कृति को प्रतिध्वनित करते हैं, जैसे सीलोम का वट फ्रा श्री उमादेवी मंदिर। इन मंदिरों में थाईलैंड के बौद्ध भी गणेश व अन्य देवताओं का पूजन करते हैं।
तिब्बत में भी गणेश की पूजा विघ्नहर्ता के रूप में की जाती है। कभी-कभी इन्हें नृत्य करते हुए चित्रित किया जाता है। तांत्रिक बौद्ध साधना में लाल रंग के गणेश की पूजा महारक्त के नाम से होती है। महारक्त का उद्गम अवलोकितेश्वर से माना जाता है। अवलोकितेश्वर वह चेतना है जिसमें सभी बोधिसत्वों की करुणा समाई हुई है। तिब्बत के बौद्ध तंत्रशास्त्र में महारक्त (गणेश) को इस प्रकार वर्णित किया गया है – ''आठ दल के कमल पर बैठे, नीले रंग के मूषक के साथ, गजमुख, तीखे दांत, गहरे तीन नेत्र, बारह हाथ, हाथों में आयुध, रक्त और मानव मांस भरा हुआ खप्पर, आदि'' यह वर्णन महाकाली के अधिक निकट जान पड़ता है।
जापान में गणपति कांगितेन के नाम से पूजे जाते हैं। कांगितेन भौतिक और पारलौकिक दोनों ज्ञान प्रदान करते हैं।
राजधानी टोक्यो में इनके अनेक मंदिर हैं। कांगितेन की लोकप्रियता के अनेक आयाम हैं। साधक इन्हें बुद्धत्व का प्रदाता मानते हैं। युवक-युवतियां प्रेम में सफलता पाने के लिए इनकी आराधना करते हैं, और व्यापारी अपने व्यापार के फलने-फूलने की मनोकामना लेकर इनके पास आते हैं।
मंगोलिया में भी बौद्ध पंथ की महायान शाखा के अंतर्गत महारक्त की पूजा होती है। यहां पर ये एरडेम कुरियाची के नाम से बुलाए जाते हैं। एरडेम कुरियाची सभी प्रकार के ज्ञान-विज्ञान के अधिष्ठाता हैं। चीन में गणपति की साधना अनेक रूपों में होती आई है। यहां अलग-अलग स्थानों पर ये विभिन्न रूपों में स्वयं को प्रकट करते हैं। खोतान (तुर्केस्तान , सिक्यांग) में कत्थई रंग के चार भुजाओं वाले गणेश मिलते हैं, जो बाघाम्बर धारण करते हैं। खाकलिक (दे खोतान से 120 किमी) अत्यंत कृश काया वाल, सिर के पीछे तेजोवलय, हाथ में मोदक लिए हुए हैं। बेजख्लिक की गुफाओं में पद्मासन पर बैठे हुए गणेश हाथ में कमल और चिंतामणि धारण किये हुए हैं। तुन हुआंग के प्राचीन चित्र में विनायक चंद्र, सूर्य और नवग्रहों के साथ हाथ में फरसा लिए हुए चित्रित किए हुए हैं। इन सभी मान्यताओं और परंपराओं पर दृष्टि डालने पर यह सुखद अनुभूति होती है कि भारत की अध्यात्म परंपरा की शाखाएं जहां भी पहुंची हैं, उन्होंने वहां के मानव समुदाय को अपने अंतर्मन की अभिव्यक्ति का अवसर दिया है। गणपति इस कार्य के लिए सवसुलभ माध्यम के रूप में विश्व में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। वे लोगों के मन में गहरे बसे हुए हैं।
आखिर ईश्वर मानव के लिए है। उसकी करुणा है कि वह मानव के उद्धार के लिए नित-नए रूप धारण करता है। हाथ पकड़कर साकार से निराकार की ओर, महारक्त से बुद्धत्व की ओर ले जाता है।











