न्यायिक असहमति : सुनहरे कल की नींव
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न्यायिक असहमति : सुनहरे कल की नींव

Written byArchiveArchive
Sep 5, 2016, 12:00 am IST
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दिंनाक: 05 Sep 2016 13:04:42

 

भारत में न्यायपालिका का लोकतंत्र के एक मजबूत स्तम्भ की तरह सम्मानित स्थान है। कुछ अवसरों को छोड़ दें तो न्यायपालिका ने संविधान की उत्कृष्ट व्याख्याएं करते हुए अनेक ऐतिहासिक निर्णय दिए हैं। लेकिन इसके साथ ही, यह भी तय है कि न्यायिक असहमति ही देश में सुनहरा कसुनिश्चित करती है

ऐश्वर्या भाटी

संविधान का 99वां संशोधन बिल संसद से तो आम सहमति से पारित हो गया, परन्तु सर्वोच्च न्यायालय बहुमत के फैसले के आधार पर निरस्त करार दिया गया। इस फैसले की विस्तार से विवेचना की गई, तरह-तरह की टिप्पणियां की गईं, वाद-विवाद हुआ। इस पर राजनीति तो होनी ही थी। असल में असहमति के जिस फैसले पर ध्यान आकर्षित होना चाहिए था, वह भीड़ में कहीं खो गया।

आज जरूरत है भीड़ में खोए न्यायमूर्ति चेलामेश्वर के असहमति के उस फैसले की तह में जाने की। क्या जजों की नियुक्ति में न्यायपालिका का एकाधिकार संविधान का बुनियादी ढांचा है? क्या बुनियादी ढांचा सिद्धांत के प्रति न्यायपालिका का आकर्षण विधायिका के शिविर में ट्रोजन (लकड़ी का मिथकीय घोड़ा)की तरह सेंध लगा सकता है? क्या राष्ट्र के तीनों अंगों के बीच शक्तियों का विभक्तिकरण संविधान का बुनियादी ढांचा नहीं हैं? क्या कार्यपालिका को जजों की नियुक्ति से पूर्णत: बाहर रखने से जांच और संतुलन के सिद्धांत का हनन नहीं होगा? असहमति के फैसले में सवालों की टकटकी थी। कॉलेजियम व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर कटाक्ष भी था। न्यायपालिका को दीमक की तरह खोखला करने वाले कारणों की विवेचना भी थी। काफी कुछ लिखा गया और बहुत कुछ बिना लिखे कह दिया गया। संविधान के अनुच्छेद 124 तथा 217 की भाषा तो पूरी तरह स्पष्ट है। मंत्रणा लेने का अर्थ सहमति कदापि नहीं हो सकता। कॉलेजियम व्यवस्था का संविधान में वर्णन तक नहीं है, इस व्यवस्था का जन्म 1993 में 'सेकैण्ड जजेस केस' से हुआ था।

अब जरा संविधान सभा की बहसों पर नजर डालें। आपको शायद यह जानकर अचम्भा हो कि हमारे संविधान निर्माताओं ने भी ठीक इसी प्रश्न पर गंभीरता से चिंतन किया था कि जजों की नियुक्ति ब्रिटिश पद्धति के अनुरूप की जानी चाहिए या इसमें अमेरिका का तरीका अपनाना चाहिए और न्यायपालिका के प्रमुख न्यायाधीश से मंत्रणा करके होनी चाहिए, या सहमति से। संविधान सभा ने गहन चिंतन एवं वाद-विवाद के पश्चात बीच का रास्ता चुना तथा मंत्रणा के स्थान पर सहमति लाने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। विधायिका की इस व्यवस्था को संविधान की तर्ज पर व्यवस्थित करने के प्रयास को 'फोर्थ जजेस केस' ने 2015 में विफल कर दिया। भविष्य की परतों में कहीं 'फिफ्थ जजेस केस' की खुदबुदाहट सुनाई दे रही है।

भारत की न्यायपालिका हमारे देश का गौरव रही है। जनहित याचिका, जो पारंपरिक याचिका का अपवाद है, के माध्यम से न्यायपालिका ने संविधान के मूलभूत भौतिक अधिकारों को राष्ट्र के उन दूरदराज हिस्सों तक पहुंचाया, जहां प्रगति के सूरज की किरणें शायद अब तक भी नहीं पहुंच पातीं। भारतीय सर्वोच्च न्यायालय हमारे लोकतंत्र के लिए हमेशा एक ज्योति पुंज की तरह मार्गदर्शक रहा है। पिछले 66 वर्षों में हमारे सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने आजादी के समकक्ष ही एक लंबी लड़ाई लड़ी है, जिसका प्रतिबिंब हजारों-लाखों निर्णयों में पूरी प्रखरता के साथ दिखाई देता है।

इनसे भारतीय संविधान के सुन्दर शब्दों को सार्थकता मिली है। भारतीय सर्वोच्च न्यायालय का यह सफर शौर्यपूर्ण, शानदार और प्रेरक रहा है। चाहे फिर वह अनुच्छेद 21 की विशद व्याख्या हो, जिसमें आत्म-सम्मान के साथ जीने के अधिकार या साफ और प्रदूषण रहित वातावरण के अधिकार की बात हो, या फिर अनुच्छेद 14 की सकारात्मक समानता की। केशवानंद भारती मामले में संविधान के भौतिक मूल्यों का संरक्षक बनकर उभरना हो, या खतरनाक उद्योगों में लगे बाल मजदूरों के लिए अभिभावक की भूमिका अपनाना। शायद यही कारण है कि आज भारत के हर नागरिक को हमारी न्यायपालिका में सबसे अधिक     विश्वास है।

परन्तु ऐसा नहीं है कि भारतीय सर्वोच्च न्यायालय हर चूक से अछूता है। आपातकाल के दौरान जब भारत के 9 उच्च न्यायालयों ने एक सुर में यह कहा था कि जीवन के अधिकार को निलंबित नहीं किया जा सकता तब सर्वोच्च न्यायालय ने उसे पलटते हुए घुटने टेक दिए थे और भारतीय नागरिकों को जीवन के अधिकार से वंचित कर दिया था। विधायिका ने 44 वें संशोधन एक्ट से जीवन के अधिकार को निलंबन के लिए अयोग्य बना दिया था। सर्वोच्च न्यायालय के पिछले 66 वर्ष के सफर के उतार-चढ़ावों से एक बात स्पष्ट है कि कानून की ही तरह न्यायिक व्यवस्थाएं भी ऊर्जावान हैं और कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर किसी एक दशक का असहमति का निर्णय अगले दशक का बहुमत का निर्णय बनकर उभरा है। इसका सबसे प्रखर उदाहरण है 60 के दशक का सर्वोच्च न्यायालय का सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य मामले में आया निर्णय। न्यायमूर्ति मुधोलकर का असहमति वाला निर्णय, गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य मामले के पड़ाव से गुजरकर, 1973 के केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के सुप्रसिद्ध मामले में बहुमत के निर्णय का मील का पत्थर बना। बहुमत का फैसला आज का सिकन्दर तो अवश्य है, परन्तु भविष्य का बीज तो न्यायिक असहमति की कोख में ही पलता है। (लेखिका सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता एवं बार एसोसिएशन की पूर्व सचिव हैं)

 

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