न्याय व्यवस्था या अन्यायकारी व्यवस्था?
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न्याय व्यवस्था या अन्यायकारी व्यवस्था?

Written byArchiveArchive
Sep 5, 2016, 12:00 am IST
inArchive

दिंनाक: 05 Sep 2016 13:04:07

ब्रजकिशोर शर्मा

आज भी हमारे न्यायालयों में अंग्रेजी का राज है। लोगों को भले ही अंग्रेजी समझ में न आती हो, पर उन्हें न्यायालय में निर्णय की प्रति अंग्रेजी में दी जाती है।जिस न्याय व्यवस्था में व्यथित व्यक्ति को उसकी भाषा में न्याय पाने का अधिकार नहीं है, उसे अन्यायकारी व्यवस्था कहने में शायद किसी को आपत्ति होगी

संविधान सभा से ही भारतीय भाषाओं की उपेक्षा प्रारंभ हो गई। हमारा संविधान अंग्रेजी भाषा में बना और हमारे शासक भी अंग्रेजी-भाषी बने। संविधान सभा में कुछ नेताओं को इसकी पीड़ा थी। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, पं. रविशंकर शुक्ल, पं. बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', सेठ गोविन्ददास आदि ने प्रयास किया संविधान हिंदी में पारित हो। सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भी इस मत के पक्ष में थे। किन्तु एक संकल्प पारित करके संविधान सभा के अध्यक्ष को यह अधिकार दिया गया कि वे संविधान का हिंदी रूपांतर तैयार कराएं। 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा के सदस्यों ने दोनों भाषाओं की प्रतियों पर हस्ताक्षर किए। बाद में यह प्रश्न उठाया गया कि हिंदी का रूपांतर अधिकृत पाठ है या नहीं। इस प्रश्न को सदा के लिए हल करने के लिए कुछ लोगों के प्रयास से संविधान का संशोधन करके उसमें एक नए अनुच्छेद 394 को जोड़ा गया और उसके अधीन राष्ट्रपति ने संविधान का हिंदी में अधिकृत पाठ प्रकाशित कराया।

राजभाषा आयोग और संसदीय समिति

संविधान के अनुच्छेद 344(1) में यह उपबंध है कि संविधान के प्रारंभ होने के 5 वर्ष पश्चात् और पुन: 10 वर्ष बाद आयोग संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी भाषा के प्रयोग और अन्य बातों के बारे में सिफारिश करेगा। पहले आयोग का गठन 1955 में हुआ। इसने 1956 में अपना प्रतिवेदन दिया। दूसरा आयोग गठित नहीं किया गया।

राजभाषा आयोग के प्रतिवेदन पर विचार करने के लिए अनु. 344(6) के अधीन 30 सांसदों वाली एक समिति गठित की गई। इसके अध्यक्ष गृह मंत्री पं. गोविन्द वल्लभ पंत थे। इसने अपना प्रतिवेदन 1958 में दिया। इसी अनुच्छेद के खंड (6) में राष्ट्रपति को यह शक्ति दी गई कि वे समिति के प्रतिवेदन पर विचार कर समुचित निर्देश दें। राष्ट्रपति ने यह निर्देश 27 अप्रैल, 1960 को दिया।

न्यायालयों की भाषा योजना

राजभाषा आयोग और संसदीय समिति के प्रतिवेदन से न्यायालयों की भाषा के विषय में एक समग्र चित्र प्रकट होता है। वह है:-

अधीनस्थ न्यायालयों (अर्थात् जिला न्यायालय और उसके नीचे के न्यायालय) में राज्य की राजभाषा का प्रयोग होगा। जैसे महाराष्ट्र में जिला स्तर तक मराठी, गुजरात में गुजराती। उच्च न्यायालयों में राज्य की राजभाषा और अंग्रेजी कुछ समय तक साथ-साथ चलेगी। बाद में राजभाषा और हिंदी का प्रयोग होगा। उच्चतम न्यायालय में अंग्रेजी तब तक रहेगी जब तक संसद अधिनियम द्वारा परिवर्तन न करे। यह स्पष्ट हो गया कि विधि के क्षेत्र में अंग्रेजी का स्थान हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं लेंगी। केवल हिंदी सर्वत्र स्थापित नहीं होगी। यह सब दृष्टि से उचित निर्णय था। जो न्याय के द्वार पर पुकार करता है उसे न्याय उसकी भाषा में ही मिलना चाहिए।

राष्ट्रपति आदेश में इस बात पर ध्यान दिया गया कि विधि से संबंधित सामग्री विशेषत: अधिनियम केवल अंग्रेजी में हैं। इसलिए केन्द्र और राज्यों के अधिनियम हिंदी और अन्य राजभाषाओं में तैयार करने की योजना बनी। इसे क्रियान्वित करने के लिए 1961 में राजभाषा (विधायी) आयोग गठित किया गया। 1963 में राजभाषा अधिनियम बनाकर हिंदी में और 1973 में एक अन्य अधिनियम द्वारा अन्य राजभाषाओं में केन्द्रीय अधिनियमों के पाठ राष्ट्रपति के प्राधिकार से प्रकाशित होना प्रारंभ हुए। इसी प्रकार केन्द्रीय नियमों, विनियमों आदि के पाठ हिंदी में बनाए गए।

1969 में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के निर्णयों के प्रकाशन के लिए तीन पत्रिकाएं प्रकाशित करने का कार्य भारत सरकार के विधायी विभाग को सौंपा गया। विधि महाविद्यालयों में हिंदी माध्यम से पढ़ाना सुलभ हो, इस दृष्टि से हिंदी में पाठ्य पुस्तकें प्रकाशित की गईं। लेखकों को प्रोत्साहित करने के लिए पुरस्कार योजना बनाई गई। आज स्थिति यह है कि पत्रिकाएं मृतप्राय: हैं। गत अनेक वर्षों से कोई नई पाठ्य पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई है। विधि मंत्रालय का इस ओर कोई ध्यान नहीं है।

अधीनस्थ न्यायालयों की भाषा

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 137 में राज्य को यह शक्ति है कि वह यह घोषित करे कि सिविल न्यायालयों की भाषा क्या होगी। इसी प्रकार दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 272 के अधीन राज्य यह घोषित कर सकता है कि दांडिक न्यायालयों की भाषा क्या होगी। इस विषय में राजस्थान और मध्य प्रदेश ने सर्वप्रथम 1 अक्तूबर, 1976 अधिसूचना निकालकर हिंदी को अपने सभी सिविल और दांडिक न्यायालयों की भाषा घोषित कर दिया। उत्तर प्रदेश में कुछ न्यायालयों के लिए हिंदी को न्यायालयों की भाषा घोषित किया गया है किंतु जिला स्तर तक नहीं। हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली आदि के न्यायालयों में हिन्दी को प्रवेश की अनुमति नहीं है। तमिलनाडु, गुजरात आदि ने केंद्र सरकार से अपनी भाषा के प्रयोग की अनुमति मांगी। केन्द्र सरकार ने अनुमति नहीं दी। आश्चर्य की बात यह है कि उक्त संहिताओं के अधीन राज्य को पूर्ण शक्ति है। केन्द्र से पूछने की आवश्यकता नहीं है। केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात आदि अनेक राज्यों में तैयारियां हो चुकी हैं किन्तु राज्य सरकारों की कोई रुचि नहीं है। वर्तमान स्थिति कितनी दु:खद है यह एक उदाहरण से स्पष्ट हो जाएगा। दिल्ली में दांडिक न्यायालय में अभियुक्त को आरोपपत्र अंग्रेजी में दिया जाता है। जो साक्षी अपना साक्ष्य हिंदी में देते हैं उसका एक लिपिक अंग्रेजी में अनुवाद करता है और इसी अनुवाद के आधार न्यायालय में अभियुक्त के भाग्य का निर्णय होता है।

उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषाएं

राजभाषा अधिनियम की धारा 7 में यह उपबंध है कि राष्ट्रपति की पूर्ण अनुमति से उच्च न्यायालय के निर्णय, डिक्री या आदेश में हिंदी या राज्य की राजभाषा का उपयोग किया जा सकेगा। अब तक केवल चार उच्च न्यायालयों ने यह अनुमति प्राप्त की है। वे हैं, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान। इन राज्यों के पुनर्गठन से जो तीन राज्य बने हैं अर्थात् छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड और झारखण्ड, उनके न्यायालयों को यह अनुमति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है। इन न्यायालयों में कार्रवाई हिंदी में हो सकती है और निर्णय हिंदी में दिए जा सकते हैं।

निष्क्रियता और भूमिका

तमिलनाडु ने अपने उच्च न्यायालय में तमिल के प्रयोग की अनुमति मांगी थी। केंद्र सरकार ने मना कर दिया। यह कारण दिया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश की सहमति नहीं है। यह कारण बड़ा विचित्र है। राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की सलाह पर कार्य करते हैं। मुख्य न्यायाधीश से न तो सलाह मांगी जानी चाहिए और न ही उन्हें सलाह देने का अधिकार है। मुख्य न्यायाधीश को स्वयं सलाह देने से मना कर देना चाहिए था। यदि सरकार को किसी विधिक मामले में न्यायालय की सलाह चाहिए तो अनुच्छेद 143 में इसका उपबंध है। यह सलाह पांच न्यायाधीशों की पीठ द्वारा सुनवाई के पश्चात् खुले न्यायालय में दी जाती है। इसका दूसरा पहलू यह है कि यह नीति का प्रश्न है विधि का नहीं। इसका निर्णय गृह मंत्री को करना चाहिए।

एक ओर तो कार्यपालिका अपना काम करने से पीछे हटती है। अपना काम न्यायपालिका पर डालती है और दूसरी ओर यह शिकायत करती है कि न्यायपालिका उसके क्षेत्र में हस्तक्षेप करती है। उच्च न्यायालयों की कार्रवाइयों के लिए भी चार उच्च न्यायालयों को अनु. 348 के अधीन अनुमति है। इन न्यायालयों में अपील, याचिका आदि हिंदी में प्रस्तुत किए जा सकते हैं। बहस भी हिंदी में हो सकती है। राजस्थान को यह अनुमति 1950 में, उत्तर प्रदेश को 1969 में, मध्य प्रदेश को 1971 में और बिहार को 1972 में दी गई। खेद की बात है कि गत 44 वर्ष में किसी भी न्यायालय को अनुमति नहीं दी गई।

वर्तमान स्थिति

वर्तमान स्थिति यह है कि 29 राज्यों में से केवल 3 राज्य (मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान) ऐसे हैं जहां जिला न्यायालय तक सभी अधीनस्थ न्यायालय जनता की भाषा में विधि के अनुसार कार्य कर रहे हैं। कुछ राज्यों में यथा गुजरात और महाराष्ट्र में बड़ी मात्रा में राजभाषा में काम हो रहा है यद्यपि राज्य सरकार ने कोई अधिसूचना नहीं निकाली है। केवल सात उच्च न्यायालयों में हिंदी में निर्णय देने की और बहस करने की अनुमति है। किन्तु आज के वातावरण में वहां अधिकांश कार्य अंग्रेजी में हो रहा है।

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी

अधिकांश राज्य सरकारों ने भिन्न-भिन्न नाम देकर अपने राज्य में नेशल लॉ यूनिवर्सिटी स्थापित की है। इन सबमें केवल अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दी जा रही है। इनके लिए करोड़ों का अनुदान और अरबों की भूमि प्रदान की गई है। विडबंना यह है कि लखनऊ में डॉ. राम मनोहर लोहिया के नाम से स्थापित विश्वविद्यालय में हिंदी का कोई स्थान नहीं है। जबकि डॉ. लोहिया आजीवन अंग्रेजी का प्रबल विरोध करते रहे। हिंदी को न्यायालय के भीतर प्रवेश न करने देने के लिए कोई एक राजनीतिक दल उत्तरदायी नहीं है।

राज्य क्या करें?

जब राज्यों में न्यायालयों में राज्य की भाषा में कार्य होने लगेगा तो समय बचेगा, अधिक वाद निपटेंगे, दक्षता बढ़ेगी। वादकारी को संतोष होगा। वह समझ सकेगा कि अधिवक्ता और न्यायाधीश क्या कह रहे हैं। साक्ष्य में क्या कहा गया है। तभी न्यायालय में न्यायदान होगा। राज्य अपने अधिवक्ताओं, अभियोजकों और अधिकारियों को यह निर्देश दें कि शपथपत्र और अन्य दस्तावेज राजभाषा में प्रस्तुत हों और बहस भी राजभाषा में हो। राज्य में जितने न्यायायिक अभिकरण हैं उनसे भी कार्य राजभाषा में लेना चाहिए। कुछ लोग स्वार्थवश अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का मुद्दा उछालते हैं। यदि ऐसा हो गया तो जहां-जहां आज जनभाषा में काम हो रहा है, वहां भी पुन: अंग्रेजी आ जाएगी। जब संविधान बना तब कुछ देशी रियासतों में हिंदी में काम हो रहा था। संविधान लागू होते ही उन सबकी भाषा अंग्रेजी हो गई।

(लेखक विधि और न्याय मंत्रालय में अपर

सचिव रहे हैं)

 

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