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एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बेंगलुरु में 13 अगस्त को 'कश्मीर की आजादी' पर भारत विरोधियों का जमावड़ा किया। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने उसकी आड़ में भारतीय सेना को लेकर अनर्गल प्रलाप करना शुरू कर दिया। इससे दिग्विजय ही नहीं, पूरी कांग्रेस की अलगाववाद समर्थक भूमिका सामने आई है
डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
मनेस्टी इंटरनेशनल पश्चिम की एक ऐसी संस्था है जिसका दावा है कि वह दुनिया भर में मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों का पता लगाकर उनका पर्दाफाश करती है ताकि संबंधित देश की सरकार पर दबाव बनाया जा सके। इस संस्था ने अनेक देशों में अपनी शाखाएं और दफ्तर खोल रखे हैं। पैसे की इसके पास कोई कमी नहीं है। यह अलग बात है कि इसकी घ्राण-शक्ति ज्यादातर एशिया और अफ्रीकी देशों में ही प्रखर होती है। यूरोप की ठंड में उसे लकवा मार जाता है। इस की एक शाखा भारत में भी पाई जाती है।
अब कांग्रेस के बड़बोले नेता दिग्विजय सिंह की बात। पुराने जमाने में उनके पूर्वज राजा हुआ करते थे। लेकिन सरदार पटेल की सख्ती के बाद, रियासतें समाप्त हो गईं। पर विरासत में मिली साख खत्म नहीं हुई। दिग्विजय सिंह उसी के बलबूते दस साल तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने रहे। उसके बाद दिल्ली आ गए। वर्तमान में सोनिया कांग्रेस में महासचिव हैं। कहा जाता है कि वे विरासत के बल पर ही भारत का प्रधानमंत्री बनने का सपना पालने वाले राहुल गांधी के दरबार के 'नवरत्नों' में से एक हैं।
यूं तो एमनेस्टी और दिग्विजय सिंह में कोई सीधा संबंध नहीं, लेकिन दोनों कश्मीर को लेकर खासे चिंतित दिखते हैं।
एमनेस्टी ने गत 13 अगस्त को बेंगलुरु में कश्मीर में मानवाधिकारों को लेकर एक आयोजन किया। जैसी कि आशा थी, उसी के अनुरूप वहां देर तक कश्मीर की 'आजादी' को लेकर नारे लगते रहे। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि कश्मीर को लेकर वहां क्या बोला गया होगा। जाहिर है, एमनेस्टी की इस भारत विरोधी साजिश को लेकर देश भर में गुस्सा भड़कता। अब एमनेस्टी वालों ने अपना तर्क दिया है। उनका कहना है कि ''उनके किसी कर्मचारी ने कोई नारा नहीं लगाया। कश्मीर की आजादी के नारे तो आम आदमी लगा रहे थे।'' एमनेस्टी अच्छी तरह जानती है कि उसके मुलाजिमों को मोटी तनख्वाह नारे लगाने के लिए नहीं बल्कि नारे लगवाने के लिए मिलती है। और इस काम को उसके मुलाजिमों ने बखूबी अंजाम दिया है। कश्मीर में भी सैयद अली शाह गिलानी और उनकी पूरी जमात सुरक्षा बलों पर खुद पत्थर नहीं फेंकती बल्कि पैसे देकर दूसरों के बच्चों से फिंकवाती है। उनके अपने फर्जंर तो विदेशों में आराम की जिंदगी बसर कर रहे हैं और एमनेस्टी जैसों की झोलियां कश्मीर में मानवाधिकारों के तथाकथित उल्लंघन की रपटों से भरते हैं। हालांकि स्थानीय पुलिस ने संस्था और देशद्रोही नारे लगाने वालों के खिलाफ देशद्रोह का अभियोग लगाया है।
हो सकता है कि एमनेस्टी के कर्मचारियों ने भारत विरोधी नारे नहीं लगाए होंगे। और उसके वेतनभोगियों को इसकी जरूरत भी नहीं थी। यह उसके एजेंडे में भी नहीं है। लेकिन एमनेस्टी ऐसे भारत विरोधियों को मंच प्रदान करती है। यह मंच शक्तिशाली भी है और इसके पीछे यूरोप-अमेरिका की ताकत भी है। इसलिए ऐसे मंच पर आकर कश्मीर की 'आजादी' के नारे लगाने वाले बेखौफ हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि इस बड़े और अन्तरराष्ट्रीय मंच का एक रुतबा है। इसकी अपनी ताकत है। इसलिए इस मंच से कश्मीर की 'आजादी' और 'भारत तेरे टुकड़े होंगे हजार' के नारे लगाने वालों का सरकार कुछ नहीं बिगाड़ सकती । बेंगलुरु में एमनेस्टी ने यही साजिश रची और इसी के अंतर्गत भारत विरोधियों को ढाल मुहैया करवाई है। सभी जानते हैं कि आज इस प्रकार के भारत विरोधियों को इसी ढाल की सर्वाधिक आवश्यकता है। यह ढाल श्रीनगर से लेकर बेंगलुरु तक उन्हें एमनेस्टी इंटरनेशनल ही मुहैया करवा सकती है और करवा रही है। साल के अन्त में एमनेस्टी एक मोटी रपट प्रकाशित करती है। जो तीसरी दुनिया के देशों को डराने के काम आती है। उस रपट से डरी सरकारें सारा साल एमनेस्टी को सफाई देने में गुजार देती हैं। इसका एक दूसरा तर्क भी है कि भारत में तो उसका कामकाज भारतीय शख्स ही देखता है। इसलिए बेंगलुरु में कश्मीर को लेकर आयोजन करवाने वाले भारत विरोधी कैसे हो सकते हैं? एमनेस्टी के फिरंगी मालिक यह समझते हैं कि इस तर्क से सबकी बोलती बंद हो जायेगी। लेकिन शायद लंदन में बैठे इन लोगों को यह ज्ञात नहीं है कि जयचन्द उनके लिए तो महानायक हो सकता है लेकिन भारतीय अभी भी उसे खलनायक और देशद्रोही ही मानते हैं।
जवाहर लाल नेहरू के ही खानदान से ताल्लुक रखने वाली गीता सहगल, जो एक लम्बे अरसे तक एमनेस्टी इंटरनेशनल से जुड़ी रही हैं, ने ही इस संस्था के कारनामों का खुलासा किया है। उनके अनुसार यह संस्था इस्लामी आतंकवादी समूहों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहयोग करती है। इतना ही नहीं, इस संस्था के वित्तीय स्रोत भी शक के घेरे में रहते हैं। वैचारिक लिहाज से भी इसका दीवाला निकल गया है, जो नाम तो मानवाधिकारों का लेती है लेकिन छद्म समर्थन आतंकवादियों का करती है। सहगल के अनुसार, यह संस्था ब्रिटेन में जिहादी साहित्य प्रकाशित और प्रसारित करने वाले लोगों को समर्थन देती है।
गीता सहगल इस संस्था में रही हैं इसलिए इसके गली-मुहल्लों को अच्छी तरह जानती हैं। लेकिन सोनिया गांधी की कांग्रेस में इन जानकारियों की कोई कीमत नहीं है । वहां के 'नवरत्न' तो दिग्विजय सिंह हैं जो जाकिर नायक को 'शान्तिदूत' बताते हैं। उनके हिसाब से अपनी जान पर खेल कर भारत के सीमान्त क्षेत्रों की रक्षा कर रहे 'सुरक्षाबल नायक नहीं हैं, वे तो आम कश्मीरियों के मानवाधिकारों का हनन करने वाले खलनायक हैं।' अपनी पार्टी की नीति के अनुकूल ही कर्नाटक की सोनिया कांग्रेस सरकार तुरंत एमनेस्टी इंटरनेशल के बचाव में उतरी। राज्य के गृह मंत्री जी. परमेश्वर ने कहा, ''यह संस्था बेंगलुरु में काफी समय से काम कर रही है। कश्मीर को लेकर इसने जो कार्यक्रम आयोजित किया उसमें कुछ भी तो गलत नहीं था।'' दरअसल 'कश्मीर की आजादी' के नारे को लेकर सोनिया कांग्रेस के भीतर उसके पक्ष में एक आम सहमति बनती दिखाई दे रही है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जब 'कश्मीर की आजादी' और 'भारत के हजार टुकड़े' करने की इच्छा प्रकट की गई थी तो राहुल गांधी तुरंत उसके समर्थन में जेएनयू पहंुच गए थे।
बेंगलुरु में यही सब हुआ है। लेकिन एमनेस्टी के दुर्भाग्य से सरकार ने भयग्रस्त होने की बजाए उससे ही सवाल-जवाब शुरू कर दिए। उसको मिल रहे करोड़ों रुपए के स्रोतों के बारे में पूछना शुरू कर दिया । एमनेस्टी के मंच पर कश्मीर की 'आजादी' को लेकर गाए बेसुरे गीतों के पीछे छिपे साजिंदों की तलाश शुरू हो गई। इससे हड़कंप मचना लाजिमी था। भारत में पहली बार किसी ने फिरंगी मालिकों के इस जमावड़े को घेरा था। तब अचानक सोनिया कांग्रेस के महासचिव और राहुल गांधी के 'नवरत्नों' में से एक दिग्विजय सिंह नमूदार हुए। उन्होंने एमनेस्टी इंटरनेशनल के एजेंडे को ही आगे बढ़ाते हुए कश्मीर को लेकर अब तक की बहस को ही एक नया मोड़ देने की कोशिश की। उन्होंने कहा, ''कश्मीर के एक हिस्से पर भारत ने कब्जा किया हुआ है और दूसरे हिस्से पर पाकिस्तान ने कब्जा किया हुआ है। इसलिए सरकार को वहां के लोगों से बात करनी चाहिए।'' कश्मीर को लेकर हो रही बहस को यह एक बहुत ही शातिराना तरीके से नया मोड़ देने की राष्ट्रविरोधी कोशिश थी। भारत के अन्दर एक और गुलाम नबी फाई बनने की कोशिश। फाई अमेरिका में बैठकर कश्मीर के प्रश्न को पश्चिमी साम्राज्यवादी ताकतों के हितों के अनुरूप ढालने की कोशिश कर रहा था और यही काम दिग्विजय सिंह ने भारत में बैठ कर करना शुरू कर दिया। एमनेस्टी से उनके प्रत्यक्ष तार जुड़े हों या न जुड़े हों, लेकिन दोनों एक ही रास्ते पर चलते दिखाई देने लगे। घिरने पर दिग्विजय ने कह दिया, ''जबान फिसल गई। चमड़े की जीभ है। फिसल भी तो सकती है।''
विडंबना दिग्विजय यह इतने अनुभवी होने के बाद भी कुछ ज्यादा ही 'फिसलने' लगे हैं। जहां तक जम्मू-कश्मीर के लोगों से बातचीत का सवाल है, उससे कौन इनकार कर सकता है। दिग्विजय जानते हैं कि मोदी सरकार तो अब आई है, पिछले सत्तर साल से कांग्रेस कश्मीरियों के नाम पर बातचीत ही तो करती रही है। उसने इसको लेकर लॉर्ड माऊंटबेटन से बातचीत की, ब्रिटेन सरकार से बातचीत की, अमेरिका से बातचीत की, सुरक्षा परिषद से बातचीत की, पाकिस्तान से बातचीत की, भूमि के नीचे से लेकर ऊपर तक के हर अलगाववादी और आतंकवादी से बातचीत की। कश्मीर उसी बातचीत का नतीजा आज भुगत रहा है। कांग्रेस ने कश्मीरियों से बातचीत करने की बजाए एजेंटों या दलालों से बातचीत का रास्ता अपनाया। फिर चाहे वह शेख अब्दुल्ला हों, चाहे बख्शी गुलाम मोहम्मद। मीर कासिम हों या फारुख या उमर। कांग्रेस यही समझती रही और अब भी समझती है कि कुछ एजेंट सारे जम्मू-कश्मीरियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन एजेंटों के माध्यम से बातचीत करने का ही नतीजा था कि घाटी में लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि 'दिल्ली से चला लोकतंत्र पठानकोट तक आकर रुक जाता है। बातचीत जरूर होनी चाहिए, लेकिन वह बातचीत जम्मू के लोगों से होनी चाहिए, लद्दाखियों से होनी चाहिए। गुज्जरों से होनी चाहिए, बकरवालों से होनी चाहिए। बल्तियों से होनी चाहिए । दरदों से होनी चाहिए। पहाडि़यों से होनी चाहिए। जनजाति समूहों से होनी चाहिए। गद्दियों से होनी चाहिए। मोनपा से होनी चाहिए । शिया समाज से होनी चाहिए, दलित समाज से होनी चाहिए। मीरपुरियों से होनी चाहिए। कश्मीरियों से होनी चाहिए। लेकिन सरकार इन सभी से तो बातचीत नहीं करती। वह या तो आतंकवादियों से बात करती है या फिर एजेंटों से बात करती है। या फिर गिलानियों, हमदानियों, बुखारियों, करमानियों से बात करके मान लेती है कि सारे जम्मू कश्मीर से बात हो गई है।'
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इस बात का श्रेय जाएगा कि उन्होंने दलालों या एजेंटों को परे हटाकर सीधे-सीधे प्रदेश के लोगों से संवाद स्थापित किया। उससे घाटी में भी एक नई हवा बहने लगी। यह नई और ताजी हवा ही आतंकवादियों को दर्द दे रही है और गिलानियों, हमदानियों और करमानियों का नजला बढ़ा रही है। आज घाटी में जो हो रहा है, वह आतंकवादियों की एलर्जी और गिलानियों के जुकाम का दुष्परिणाम है। पाकिस्तान की साजिश तो किसी से छिपी नहीं है। पर घाटी को पटरी से उतारने का इन सभी का यह अंतिम प्रयास ही सिद्ध होगा, क्योंकि नरेन्द्र मोदी ने बहस को जो नई दिशा दे दी है, उसमें जम्मू कश्मीर के लोगों की भूमिका प्रमुख हो जायेगी और एजेंट अप्रासंगिक हो जायेंगे। इसलिए कि पाकिस्तान को खुल कर सामने आना पड़ा और बुरहान वानी को 'शहीद' घोषित करना पड़ा। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से लेकर बरास्ते हैदराबाद विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय से होते हुए, बेंगलुरु में एमनेस्टी और पुणे में दिग्विजय सिंह द्वारा की जा रही ये सारी हरकतें इन अंतिम प्रयासों को सफल बनाने की छटपटाहट मात्र कही जा सकती हैं।











