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एनजीओ आज मुद्दों को छोड़ जेब भरने के ठौर जैसे हो गए हैं। विदेशों से आए अकूत पैसे के दम पर भारत में सेकुलर जमात से जुड़े ये तथाकथित एनजीओ भारत-विरोध को हवा देने में ही जुटे रहते हैं
आशीष कुमार 'अंशु'
आईबी (इंटेलीजेंस ब्यूरो) की कई रपटों में स्पष्ट हुआ है कि इस देश में मजहब और 'रिलिजन' के नाम पर विदेशों से मोटा पैसा मंगाया जाता है और फिर उसे जिस तरह खर्च किया जाता है, उसे आईबी संदिग्ध मानती है। पिछले साल एफसीआरए (फॉरन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट) की वजह से प्रतिबंधित की गई मजहबी/रिलिजियस संस्थाओं की सूची से अनुमान लगा सकते हैं कि किस राज्य में पांथिक सौहार्द को कितना खतरा है? आंध्र प्रदेश में विदेशी पैसों की हेराफेरी में सात ईसाई और एक मुस्लिम संस्था को बंद कराया गया। गुजरात में जिन चार मजहबी संस्थाओं में हेरा-फेरी पाई गई वे सभी मुस्लिम 'कल्याण' का काम रही थीं। 2007-08 और 2008-09 में अपना वार्षिक लेखा ना जमा कराने की वजह से 4,138 एनजीओ ने अपना एफसीआरए खोया। इसमें सबसे अधिक संख्या (794) तमिलनाडु की थी। उसके बाद आंध्र प्रदेश (670) और केरल (450) का नंबर था। 2014 में वार्षिक लेखा जमा न कराने के लिए 10,343 संस्थाओं को नोटिस भेजे गए हैं।
'उद्गम' के संस्थापक मयूर जोशी बताते हैं कि आसाराम बापू की गिरफ्तारी के बाद उन क्षेत्रों में कन्वर्जन करने वाली संस्थाएं फिर सक्रिय हैं जो वहां तब आसाराम बापू के आश्रम के रहते असफल साबित हुई थीं।
भारत में अभी लगभग 20 लाख एनजीओ हैं, जिनमें से 40,000 एनजीओ को विदेश से पैसा मंगाने का अधिकार है। एनजीओ पर पिछले साल की इंटेलिजेंस ब्यूरो रपट में उल्लेख है कि इस पैसे का इस्तेमाल देश विरोधी गतिविधियों में होता है। आतंकी संगठनों के पास भी यह पैसा जा रहा है। सच है कि सभी एनजीओ इस तरह की गतिविधियों में शामिल नहीं हैं लेकिन काफी एनजीओ इनमें लिप्त हैं। आईबी की रपट के बाद सवाल उठ रहे हैं कि जिन एनजीओ ने विदेशों से पैसा लिया है, उन्होंने पैसे के उपयोग के संबंध में कोई स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं दी?
सरकार उन एनजीओ को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतती नजर आ रही है, जिनके पास विदेशों से पैसा आता है। हाल में 69 गैर सरकारी संगठनों पर लगाई गई रोक इसी दिशा में उठाया गया कदम दिखती है। इन 69 गैर सरकारी संगठनों में सबसे अधिक 14 संगठन आंध्र प्रदेश के हैं। उसके बाद 12 तमिलनाडु के। गुजरात और ओडि़शा के पांच-पांच संगठन हैं। उत्तर प्रदेश, केरल और जम्मू-कश्मीर के चार-चार और दिल्ली के तीन संगठन हैं। इन सभी पर विदेश से पैसा मंगाने पर रोक लगी है।
दो साल पहले जून 2014 में आईबी की रपट आई और जुलाई से ऐसे संदिग्ध गैर सरकारी संगठनों की जांच में तेजी आई थी। उसके बाद ही 'ग्रीनपीस' और 'क्लाइमेट वर्क्स फाउंडेशन' की जांच शुरू हुई। इन संगठनों के लिए पैसा खर्च करने से पहले गृह मंत्रालय से अनुमति लेने का प्रावधान कर दिया था।
2011-12 में सबसे अधिक पैसा (889.99 करोड़ रु.) चेन्नै में आया था। उसके बाद मुम्बई (825़ 40 करोड़ रु.) और बेंगलूरु (812़ 48 करोड ़रु.) थे। 'वर्ल्ड विजन ऑफ इंडिया'(चेन्नै) को सबसे अधिक रकम यानी 233.38 करोड़ रु. मिली। पथनमथिट्टा (केरल) के एनजीओ 'द बिलीवर्स चर्च, इंडिया' को 190.5 करोड़ रु. मिले। इसी प्रकार अनंतपुर (आंध्र प्रदेश) के एक एनजीओ को लगभग 145 करोड़ रु. मिले। ये एनजीओ इतनी बड़ी रकम के एक छोटे से हिस्से के खर्च किए जाने के संबंध में ही जानकारी देती हैं, जो उन्हांेने अपने एनजीओ के उद्देश्य पर खर्च किया है। बाकी बड़ी रकम के खर्च का कोई उल्लेख नहीं मिलता।
3 जून, 2015 को 'इम्पेक्ट ऑफ एनजीओज ऑन डेवलपमेन्ट' नाम से जारी इंटेलीजेंस ब्यूरो की गुप्त रपट में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि विदेशों से मिले पैसों के दम पर भारत में कुछ गैर सरकारी संस्थाएं देश के विकास से जुड़ी परियोजनाओं का विरोध कर रहीं हैं। इससे सकल घरेलू उत्पाद में प्रत्येक साल दो से तीन प्रतिशत का नुकसान हो जाता है। रपट में कुछ गैर सरकारी संस्थाओं के नामों का स्पष्ट उल्लेख है। मसलन 'ग्रीनपीस इंडिया', 'एमनेस्टी इंटरनेशनल', 'कॉर्डेड', 'एक्शन एड' आदि। रपट के अनुसार ये गैर सरकारी संगठन पीयूसीएल और नर्मदा बचाओ आन्दोलन जैसे समूहों की मदद से अपनी गतिविधियों को अंजाम देते हैं।
भारत में गैर सरकारी संगठनों को एक साल में 150 से अधिक देशों से करीब10,000 करोड़ रु. आते हैं। आईबी की रपट बताती है कि इस रकम का बड़ा हिस्सा प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के नाम पर खड़े एनजीओ से लेकर परमाणु ऊर्जा और जीएम क्रॉप तक के विरोध में लगे एनजीओ के पास जाता है। बड़े उद्योगों द्वारा चलाई जा रही परियोजनाओं के खिलाफ चलने वाले आन्दोलनों को जाता है। इसी के दम पर वेदान्ता और पॉस्को विरोधी अभियानों को मीडिया में जगह मिलती है।
विश्व बैंक के अनुसार 70 के दशक के मध्य से अचानक एनजीओ की संख्या में दुनियाभर में तेजी आई। विकसित और विकासशील देशों में बड़ी संख्या में एनजीओ पंजीकृत हुए। उसके बाद एनजीओ पंजीकरण का जो सिलसिला प्रारंभ हुआ, वह आज भी जारी है। दुनियाभर में विकास के क्षेत्र पर खर्च होने वाली रकम का 15 प्रतिशत हिस्सा एनजीओ के माध्यम से खर्च हो रहा है। विकासशील देशों में लगभग 30,000 एनजीओ इस पैसे पर सक्रिय हैं।
9 सितंबर, 2009 को एनजीओ पर 'विजिल पब्लिक ओपिनियन फोरम, चेन्नै' द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'एनजीओ'ज, एक्टिविस्ट्स एंड फॉरन फंड्स, एंटी नेशन इंडस्ट्री' के लोकार्पण अवसर पर देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने वक्तव्य में विदेशी पैसों और संदिग्ध एनजीओ के कामकाज पर गम्भीर सवाल उठाया था। ''भारत के किसी भी हिस्से में चले जाइए, वहां शालाएं चल रहीं हैं। महाशाला, गोशाला, धर्मशाला। कौन चला रहा है इन्हें? ये वही लोग हैं जिन्होंने अपना जीवन समाज को समर्पित किया है। ये वही लोग हैं, जिनकी शक्ति उनका समाज है।अन्न क्षेत्र किसी सरकारी दफ्तर में पंजीकृत नहीं है। लेकिन देश भर में यह चल रहे हैं।''
दूसरी तरफ एनजीओ का स्वरूप बदल रहा है। कई गैर सरकारी संस्थाएं किसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह काम करने लगी हैं। वे अपनी छवि समाज में बेहतर बनाए रखने के लिए पीआर कंपनियों पर मोटी रकम खर्च कर रही हैंं। समाज कार्य करने के लिए मिले पैसे का एक बड़ा हिस्सा अपनी छवि सुधारने पर खर्च किया जा रहा है।
समाज का विश्वास एनजीओ पर कम हुआ है। तीस्ता ने अपने ट्रस्ट के एफसीआरए वाले खाते से 12 लाख रुपए से अपने पति जावेद आनंद के क्रेडिट कार्ड का भुगतान किया। यह पैसा खाने-पीने और अपनी व्यक्तिगत जरूरतों पर खर्च किया गया था, जो एफसीआरए 2010 कानून की धारा 8 (1) का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने एफसीआरए के अंतर्गत मिले पैसे का 65 प्रतिशत अपने एनजीओ के प्रशासनिक कामकाज पर लगाया, जो एफसीआरए कानून का उल्लंघन है। एफसीआरए के पैसे से अफवाहें फैलाने, दुष्प्रचार रचने के लिए तीस्ता ने एकमुश्त एसएमएस भी खरीदे। एफसीआरए खाते से ढाई लाख रु.अपने घरेलू खाते में डाल लिए। तीस्ता के पति जावेद को पाकिस्तान में एक कांफ्रेन्स के लिए जाना था, जिसका तीस्ता के एनजीओ से कोई संबंध नहीं था। उसके लिए भी पैसे एफसीआरए खाते से दिए गए। तीस्ता का सबरंग प्रकाशन संस्थान एफसीआरए के अन्तर्गत नहीं आता है। उसे 2004-2014 के बीच फोर्ड फाउंडेशन से 2,90,000 यूएस डॉलर मिले।
तीस्ता के साथ लंबे समय तक काम कर चुके और उसकी संस्था में भ्रष्टाचार से आहत होकर अलग हुए रईस खान पठान, जो वर्तमान में समन फाउंडेशन चलाते हैं और सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड के सदस्य हैं, एनजीओ को कमाने का जरिया बनाने की कम्युनिस्ट तकनीक के बारे में बताते हैं- ''एनजीओ बनते हैं, मुद्दे को लेकर। फिर उस मुद्दे को गरम किया जाता है। मुद्दा जब पर्याप्त गरम हो जाता है, एनजीओ एफसीआरए के लिए अर्जी देता है। मुद्दे के आग बनते ही एफसीआरए आसानी से मिल जाता है। एफसीआरए इन संस्थानों को कैसे इतनी आसानी से मिल जाता है, उन्हें पैसा कौन भेजता है, पैसा जिनके लिए भेजा गया है, उन्हें मिलता है या नहीं मिलता? इसकी चिन्ता न आईबी, न एफसीआरए लेने वाला एनजीओ करता है और न सरकार करती थी।…यदि तीस्ता पैसे का सही इस्तेमाल करतीं तो मैं उसे क्यों छोड़ता। वह बेईमान न निकलती तो गुलबर्गा सोसायटी के लोग उसके खिलाफ न्यायालय में क्यों जाते?''
एनजीओ को लेकर जिस तरह के गम्भीर सवाल सामने आ रहे हैं, सिविल सोसायटी ऑर्गनाइजेशन और एनजीओ के सामने उससे साफ निकल आने की चुनौती है। उन्हें यह स्पष्ट करना होगा कि दुनियाभर के 150 से अधिक देशों के दान दाताओं की रुचि भारत में क्यों है और वे भारत के नाम पर 10,000 करोड़ से अधिक की रकम क्यों खर्च करने को तैयार हैं, जबकि जिन मुद्दों के लिए वे भारत में पैसा खर्च कर रहे हैं, उससे जुड़ी समस्याएं उनके अपने देश में कम नहीं हैं? यदि कोई आन्दोलन पांच साल के लिए चलता है तो उस आन्दोलन में कितने पैसे की मदद, कहां-कहां से आई, इसकी जानकारी आन्दोलन चलाने वाला संगठन सार्वजनिक क्यों नहीं करता? ये सारे सवाल एनजीओ से हैं और इन सवालों को समय रहते उसे ही सुलझाना है।











