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सामाजिक कार्यकर्ता के लिए कोई भी व्यक्ति गुरु नहीं होना चाहिए, अन्यथा वह ध्येयनिष्ठ न होकर व्यक्तिनिष्ठ बन जाता है। वास्तव में संगठन ही उसके लिए गुरु है। समस्त समाज ही उसका गुरु

Written byArchiveArchive
Jul 18, 2016, 12:00 am IST
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समर्पण हो तो ऐसा

दिंनाक: 18 Jul 2016 14:15:53

हो़ वे़ शेषाद्र्रि
पनी संस्कृति में सेवा को महत्तम स्थान दिया गया है। उसको 'धर्म' की सबसे ऊंची सीढ़ी भी माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि 'सेवाधर्म परमगहनो योगिनाम प्यगम्या:'। अर्थात् योगियों के लिए भी समझने में कठिन लगने वाला 'सेवाधर्म' है। भगवद्गीता में सेवा के बारे में कही हुई यह बात ध्यान में रखने योग्य है-'तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिन:'। अर्थात् गुरु के पास आने वाले ज्ञानार्थी शिष्य को पहले प्रणाम करके सेवा की दीक्षा लेकर बाद में भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रश्नों को पूछने पर तत्वदर्शी, ज्ञानी लोग उपदेश करते हैं। अर्थात् आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति के लिए भी अपने गुरु की सेवा करना आवश्यक है। भगिनी निवेदिता ने तो और एक कदम आगे बढ़कर यह बात कही है—''केवल आध्यात्मिक विद्या के बारे में ही नहीं, कोई भी लौकिक विद्या सीखने वाले विद्यार्थी को भी अपने गुरु के बारे में इसी प्रकार की मनोवृत्ति को अपनाना आवश्यक है।'' इस संदर्भ में महर्षि दयानन्द सरस्वती के जीवन का एक मार्मिक प्रसंग बहुत प्रेरणादायक है। उनके गुरु स्वामी बिरजानन्द जन्म से नेत्रहीन थे। इसलिए दयानन्द जी को गुरु की सेवा में दिन-रात लगना पड़ता था। एक दिन स्वामी दयानन्द गुरु महाराज का हाथ पकड़कर आश्रम ले जा रहे थे। रास्ते में गुरु के पांव में कचरा लग गया। तत्क्षण वे क्रोध से तिलमिला उठे। अपनी छड़ी लाने के लिए दयानन्द जी को कहा और उस छड़ी से उन्हें पीटने लगे। तब तक मारते रहे, जब तक कि उनका हाथ थक नहीं गया। दयानन्द जी ने शांति से वह सजा सहन कर ली। थोड़ी देर बाद जब गुरु महाराज वापस आकर अपने बिस्तर पर लेट गए तो दयानन्द जी उनके पास गए और विनम्र भाव से कहा,''मेरी भूल के कारण आपके हाथों को काफी कष्ट हुआ, कृपया क्षमा करें''। ऐसा कहकर वे उनके हाथों को श्रद्घा से दबाने लगे। ऐसे प्रसंगों के बारे में थोड़ी गहराई से सोचने पर हमारे ध्यान में यह बात स्पष्ट हो जाएगी कि सेवा को अपने यहां मानव जीवन में इतना ऊंचा स्थान क्यों दिया गया है?
इस प्रकार सेवा करते समय अपने गुरु अथवा अन्य श्रेष्ठ अग्रजों की पसन्द-नापसन्द व कई प्रकार के स्वभाव के साथ आपको मेल बिठाना पड़ता है। इसके लिए उसको अपने स्वयं के अहंकार को क्रमश: कम करते जाना पड़ेगा। बड़ों के व्यवहार से अपने मन को कष्ट पहुंचाने वाले, मान-अपमान या शारीरिक कष्ट और परेशानियां—इन सबको शान्ति से सहन करना पड़ेगा। इस दृष्टि से शिष्य को प्रतिदिन अपने अन्तर्मन को परखते रहना चाहिए।
सामाजिक क्षेत्र में सेवाव्रती के नाते काम करने वाले व्यक्ति के लिए तो सेवा के सच्चे समर्पण की प्रवृत्ति अनिवार्य बन जाती है। समाज में अनेक प्रकार के विचित्र प्रवृत्तियों के लोग रहते हैं। एक 'गुरु' की बात क्या, समाज में तो प्रतिदिन हमें नए-नए 'गुरु' मिलते रहते हैं। ऐसे लोगों की सेवा करनी है तो सेवाव्रती का संयम, विनम्रता, समर्पण की प्रवृत्ति आदि गुण उच्च स्तर के होने चाहिए। इसका एक और पहलू है। सामाजिक सेवा कार्य अकेले एक व्यक्ति के बस की बात नहीं है। उसे अपने साथ अपने जैसे ही, उसी समर्पण की भावना से परिश्रम करने वाले सहयोगियों को मिलाना पड़ता है। इन दोनों प्रकार की मानसिक तैयारी जो नहीं कर सकता, वह दीर्घकाल तक कोई भी सार्थक सामाजिक काम नहीं कर सकेगा।
इसके विपरीत जो कार्यकर्ता अपने से निर्मित संगठन के साथ एकरस व एकरूप होकर उसी में अपने व्यक्तित्व को विलीन कर डालता है, ऐसे संगठन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के चन्द्र-समान निरन्तर विकसित होते जाते हैं। ऐसे व्यक्तियों की भूमिका एक गिलास पानी में डाले हुए शर्करा जैसी है, जो उस पूरे पानी को मीठा बना देता है। परन्तु स्वयं अपने मूल स्वरूप में नहीं रहता।
किसी भव्य विशाल वटवृक्ष को देखकर ऐसा कौन व्यक्ति होगा जो पुलकित नहीं होगा? परन्तु उसका मूल बीज रूप तो राई जितना छोटा होता है। किसी को उस पर आसानी से विश्वास नहीं भी हो सकता है कि इस छोटे बीज से इतना बड़ा वृक्ष कैसे खड़ा हो सकता है? वह बीज धरती के अन्दर अंधेरे में, मिट्टी में अपने आपको खुशी से गाड़ लेता है, और क्रमश: अपने कवच को तोड़कर अपने शरीर को मिट्टी में मिला लेता है। उसी में से एक छोटा-सा, कोमल पौधा सिर उठाकर बाहर के प्रकाश में आ जाता है और धीरे-धीरे भूमाता के भव्य अलंकार के नाते खड़ा हो जाता है।

स्वामी दयानंद सरस्वती के गुरु स्वामी बिरजानन्द जन्म से  नेत्रहीन थे। इसलिए दयानन्द जी को गुरु की सेवा में दिन-रात लगना पड़ता था। एक दिन स्वामी दयानन्द गुरु महाराज का हाथ पकड़कर आश्रम ले जा रहे थे। रास्ते में गुरु के पांव में कचरा लग गया। तत्क्षण वे क्रोध से तिलमिला उठे। अपनी छड़ी लाने के लिए दयानन्द जी को कहा और उस छड़ी से उन्हें पीटने लगे। तब तक मारते रहे, जब तक कि उनका हाथ थक नहीं गया। दयानन्द जी ने शांति से वह सजा सहन कर ली। थोड़ी देर बाद जब गुरु महाराज वापस आकर अपने बिस्तर पर लेट गए तो दयानन्द जी उनके पास गए और विनम्र भाव से कहा,''मेरी भूल के कारण आपके हाथों को काफी कष्ट हुआ, कृपया क्षमा करें''। ऐसा कहकर उनके हाथों को श्रद्घा से दबाने लगे।

ााजिक कार्यकर्ता के लिए कोई भी व्यक्ति 'गुरु' नहीं होना चाहिए, अन्यथा वह ध्येयनिष्ठ न होकर व्यक्तिनिष्ठ बन जाता है। वास्तव में संगठन ही उसके लिए गुरु है। समस्त समाज ही उसका गुरु है। अब प्रश्न आ सकता है कि यदि कोई व्यक्ति एक संगठन प्रारम्भ करेगा तो वह स्वयं से निर्मित संगठन का गुरु क्यों नहीं बन सकता? इसकी एक सुन्दर उपमा शिल्पी की हो सकती है। वह ठीक प्रकार के पत्थर को चुनकर उसमें से अपने मन में चित्रित भगवान की मूर्ति को तराशता है। छेनी और हथौड़ा चलाकर उसे आकार देता रहता है। पूर्ण रूप से मूर्ति के तैयार हो जाने पर, उसे मंदिर के गर्भगृह में रखकर, उसमें प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है। तब उसे तैयार करने वाला मूर्तिकार स्वयं उसके सामने दण्डवत् प्रणाम करता है। ऐसा करते समय उसके मन में यह विचार नहीं रहता कि इसको तैयार करने वाला मैं ही हूं। किसी भी यशस्वी संगठन का निर्माण करने वाले व्यक्ति की यही मनोवृत्ति होनी चाहिए। ऐसा संगठन उसके चले जाने के बाद भी वैसे ही फलता-फूलता रहेगा। इसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक पूज्य डॉ़ हेडगेवार से बढ़कर और कोई उत्कृष्ट उदाहरण नहीं हो सकता।
संघ की बाल्यावस्था में ही वे इस दुनिया से विदा हो गए। उनके चले जाने को आज साठ साल बीत चुके हैं, फिर भी संघ अपने देश और विदेशों में भी चतुर्दिक प्रगति करता हुआ, हमारे राष्ट्रजीवन के सभी क्षेत्रों में प्रभाव जमाता हुआ, बढ़ता ही जा रहा है। संघ का निर्माण करते समय उसके बारे में उनका स्वयं का दृष्टिकोण क्या था, इसका मार्मिक दर्शन उनके शब्दों में ही हमें मिल जाएगा।
एक दिन संघ के सारे वरिष्ठ सहयोगियों ने डाक्टर जी को पूर्व सूचना न देते हुए स्वयंसेवकों के सामने उनको सरसंघचालक के पद पर प्रतिष्ठित करा दिया। उस रात डॉ़ हेडगेवार ने अपनी दैनंदिनी में उस जिम्मेदारी को स्वीकार करते समय स्वयं के दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए ये वाक्य लिखे,
''इस संघ का जन्मदाता मैं नहीं हूं, आप सब लोग ही हैं। आपकी इच्छा और आज्ञा से मैं एक धात्री का काम करता रहूंगा। इस काम के मैं अयोग्य हूं, ऐसा लगने पर दूसरे किसी योग्य व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त कर लीजिए। आज जितने आनन्द से मैंने यह पद स्वीकार किया है, उतने ही आनन्द से मैं नए व्यक्ति की आज्ञा पर स्वयंसेवक के नाते काम करता जाऊंगा, क्योंकि मेरे लिए केवल संघकार्य का मूल्य है, व्यक्तित्व का नहीं। संघ के हित में कोई भी बात करने में किसी भी प्रकार का अपमान मुझे प्रतीत नहीं होगा।'' यशस्वी सामाजिक कार्यकर्ता बनने की इच्छा रखने वाला कोई भी हो, उसे अपने हृदय में इन शब्दों को सदा-सर्वदा गुंजायमान रखना पड़ेगा।
(लेखक-1987 से 2000 तक रा.स्व.संघ के सरकार्यवाह थे। यह आलेख पाञ्चजन्य के 8 जुलाई, 2001 अंक से लिया गया है) 

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