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तिब्बत, आंतरिक मंगोलिया और सिंक्यांग पर अपने कब्जे को बरकरार रखने के लिए चीन सरकार हर वह उपाय कर रही है, जो उसे अच्छा लगता है। इसके बावजूद इन तीनों क्षेत्रों में चीन को लगातार लोगों की चुनौती मिल रही है। परेशान चीन दमन और दबाव के जरिए चुनौतियों का मुकाबला कर रहा है
छह दशक पहले पूर्वी तुर्किस्तान (चीनी नाम झिनजियांग, जिसे सिंक्यांग भी कहते हैं), तिब्बत और आंतरिक मंगोलिया पर जबरन कब्जा करने के बाद चीन अब अपनी हान आबादी को इन देशों पर अपनी औपनिवेशिक पकड़ मजबूत करने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। इन तीन क्षेत्रों पर निरंतर औपनिवेशिक आक्रमण के जरिये चीन सुनियोजित तरीके से इन अधिकृत देशों पर औपनिवेशिक कब्जे को मजबूत करने पर ध्यान दे रहा है। ये इलाके चीनी गणराज्य की जमीन का एक तिहाई भूभाग हैं और वहां 80 प्रतिशत से ज्यादा खनिज संपदा है।
इन क्षेत्रों में चीन ने मुख्य क्षेत्र के लाखों हान नागरिकों को बसाया है। इन लोगों ने इस क्षेत्र के बड़े शहरों और नगरों की जनसंख्या के चरित्र को ऐसे बदल दिया है कि वे पहचान में ही नहीं आते। यहां बसाए गए लोग इन क्षेत्रों के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक चरित्र पर छा गए हैं। इन लोगों ने यहां के मूल निवासियों को उनके अपने इलाके में अल्पसंख्यक बनाकर रख दिया है। इस कारण माहौल में हताशा, तनावपूर्ण असहायता और असंतोष का भाव तारी है। इस हालात को लेकर स्थानीय निवासियों में कई तरह की प्रतिक्रियाएं होती हैं। जैसे तिब्बत में पांच साल में आत्मदाह की 151 घटनाएं हुई हैं। सिक्यांग और आंतरिक मंगोलिया में बसाए गए लोगों और सुरक्षा बलों पर हिंसक हमले होते हैं।
इस लेख में 2009 की ऐसी ही एक हिंसक घटना की चर्चा की जा रही है। यह घटना चीनी और तीन उपनिवेशों के अधिकृत समुदायों के बीच बढ़ती दूरी की मिसाल है।
27 जून, 2009 को यू ट्यूब पर एक सनसनीखेज वीडियो क्लिप आई, जिसमें उईगर विरोधी हिंसा को दिखाया गया था। यह घटना पिछली रात चीन के प्रमुख औद्योगिक शहर गुवांग्झू में हुई थी। इसके 10 दिन बाद चीन के सिंक्यांग में भयंकर दंगे हुए थे। क्लिप के हर फ्रेम से यह दिखाया गया है कि किस तरह हान युवाओं ने अपने साथी तीन उईगर कामगारों का पीछा करके उन्हें तीन मिनट से भी कम वक्त में बेरहमी से मार डाला।
इस हफ्ते मैं फिर उसी वेबसाइट (http://www.youtube.com/
watch?v=6_PJTO2k0PM ), पर गया तो वह क्लिप हटाई जा चुकी थी। लेकिन मजेदार बात यह है कि मैं उसी घटना का वही फुटेज और कई अन्य फुटेज कुछ अन्य वेबसाइटों पर देख पाया। 21 अप्रैल, 2016 को उपलब्ध नई वेबसाइटें हैं- https://www. youtube.com/
watch?v=6uN32RSb92w&oref=https%3A%2F%2Fwww.youtube.com%2F&has_verified=1) जो लोग इसके शिकार बने थे वे उन 800 उईगरों में से थे, जिन्हें 2009 में एक महीने पहले चीनी सरकार की एजेंसी ने स्थानीय फैक्ट्री में कम मजदूरी पर काम करने के लिए भेजा था। दुर्भाग्यवश इन गरीब उईगरों को हान मजदूरों का शिकार होना पड़ा, जिन्हें हजारों की संख्या में फैक्ट्री से हटा दिया गया है। इन सारी हत्याओं को मजदूरों के डोरमेट्री काम्पलेक्स से रेकार्ड किया गया है जहां खून को बाद में पोंछ दिया गया है।
जब हान उपद्रव और हत्याकांड सारे औद्योगिक शहर में फैलता है तब चीन सरकार कहती है कि उपद्रवों में केवल दो लोग ही मरे। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मीडिया गैर सरकारी सूत्रों के हवाले से कहता है कि दो महिलाओं सहित 18 उईगर मरे और 300 घायल हुए।
जिस युवा हान ब्लॉगर ने यह वीडियो क्लिप पोस्ट की है, उसने खुद को स्वाभिमानी चीनी लिखा है। हालांकि ब्लॉग में सारी दुनिया में हुई निंदा की भरमार है। तब भी ज्यादातर चीनियों द्वारा इसका समर्थन आज के चीन में हान और गैर-हान समुदायों के बीच गहराती खाई को प्रदर्शित करता है। एक चीनी प्रतिक्रिया में कहा गया है, ''तुकार् को सबक सिखाओ।'' एक अन्य चीनी ब्लॉगर कहता है, ''चीनी उन्हें नापसंद करते हैं –और उनसे जानवरों और गुलामों जैसा बर्ताव करते हैं—।'' एक अन्य हान युवा ने उईगर युवाओं की पिटाई पर खुशी प्रगट की और कहा, ''मुझे खुशी है कि चीनी अपना कर्तव्य पूरा कर रहे हैं।'' एक आम हान की प्रतिक्रिया होती है, ''ये जंगली इसी काबिल हैं।'' लेकिन सबसे तीखी प्रतिक्रिया एक युवा हान की थी, ''हम सबने वीडियो देखा और हंसे। मैंने पॉपकोर्न और कोकाकोला का आनंद लिया। आपको कैसा लगा?'' हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि ये हान चीनी युवा चीन के अल्पसंख्यकों के प्रति आम हान नजरिये 'जंगली' का प्रतिनिधित्व नहीं करते। छह हजार मील लंबी चीन की दीवार बनने के समय से ही सभी गैर-हान लोगों को इसी गाली से संबोधित किया जाता है। यह घटना सिक्यांग को भड़काने के लिए पर्याप्त थी, जहां स्थानीय उईगर हमेशा आक्रोश में रहते हैं। दरअसल, 1949 में जब चेयरमेन माओ ने उनके देश (जिसे पहले पूर्वी तुर्किस्तान कहा जाता था) को आजाद कराने के लिए पीपल्स लिबरेशन आर्मी भेजी थी, तब 5 जुलाई, 2009 को इस्लामी उईगर सिक्यांग की राजधानी उरुमक्वी की सड़कों पर उतर आए। उईगर अपने आत्मसम्मान से भरपूर और आक्रामक स्वभाव के लिए मशहूर हैं। इन लोगों ने कुछ ही घंटों में यहां बसाए गए 100 से ज्यादा हान नागरिकों की हत्या कर दी। उन्होंने बड़े पैमाने पर हानों की कारों और मकानों को जला दिया। देखते ही देखते यह हिंसा दूसरे प्रमुख शहर काशगर तक जा पहुंची, जहां बीजिंग ओलंपिक से पहले उईगरों ने 16 चीनी सैनिकों की हत्या कर दी। अब मैं पाता हूं कि इस साइट http://www.youtube.com/watch?v=u7f पर 5 जुलाई, 2009 के उईगर प्रदर्शनों के जो वीडियो चित्र मिले थे, वे हटा लिए गए हैं। लेकिन उईगरों को अगले दिन इसका नतीजा भुगतना पड़ा जब सभी चार तरह के पुलिस बलों के साथ हान युवा आव्रजक स्थानीय लोगों के खिलाफ हमले पर उतर आए। हथियारबंद हान युवक सशस्त्र बलों के साथ आराम से घुल-मिल गए थे। दुनियाभर के अखबारों में छपे अन्य फोटो में वर्दीधारी चीनी पुलिस और दंगाई हान युवक एक जैसे लकड़ी के डंडे लिए हुए थे। जब पुलिस उईगर प्रदर्शनकारियों से निबट रही थी तब हान युवा स्थानीय लोगों को घरों से निकाल कर पीट रहे थे। जब सरकारी मीडिया ने हान युवकों को 'मुस्लिम आतंकवादियों' द्वारा पीडि़त बताते हुए फोटो जारी किए तब चीनी सरकार की एजेंसियों ने मरने वालों की संख्या 184 बताई। उईगर नेताओं का कहना है कि उनके 800 से ज्यादा लोग मारे गए और 1400 लोगों को पुलिस ले गई।
औपनिवेशिक विभाजन
इन हिंसक प्रदर्शनों में दोनों तरफ के नारे उल्लेखनीय थे। यहां गुस्साए उईगर अपने देश पर पुलिस कब्जे और बाहरी लोगों की उपस्थिति के खिलाफ चीनी आव्रजकों के सामने चिल्लाते हुए दिख रहे हैं, चीन वापस जाओ। वही इसके विपरीत हान युवक देशभक्ति के नारे, एकता और आधुनिक समाज बनाने के नारे लगा रहे थे। वे इसके जरिये जता रहे थे कि इतने सुदूर क्षेत्र में उनकी मौजूदगी राष्ट्रीय एकता को प्रतिपादित करती है और सामंजस्य में सहायक है। हू जिन ताओ की सरकार देश में तिब्बत, सिक्यांग और आंतरिक मंगोलिया में बढ़ते अलगावाद को दूर करने के लिए ये दो बातें रेखांकित करने वाले नारे लगवाती है। लेकिन चीन सरकार का दुर्भाग्य यह था कि उसी दिन विदेशी पत्रकारों की टीम उरुमक्वी में मौजूद थी और चीनी शासन के दौरान सिक्यांग की आर्थिक प्रगति का जायजा ले रही थी। इस कारण चीन सरकार की घटना पर परदा डालने की कोशिश कामयाब नहीं हो पाई। उईगरों की यह हिंसक प्रतिक्रिया और तिब्बत के बौद्ध नागरिकों की अहिंसक प्रतिक्रिया अलग होती है। हालांकि वे भी चीनी कब्जे के खिलाफ लड़ रहे हैं। हालांकि उनका उभार शांतिपूर्ण और अहिंसक होता था, लेकिन उनके दो माह लंबे प्रदर्शन ने 2,500 किमी दूर से चीनी शासकों को झकझोर दिया।
विजय क्रांति (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 'सेंटर फॉर हिमालयन एशिया स्टडीज एण्ड इंगेजमेंट' के चेयरमैन हैं)











