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तीन बार तलाक-तलाक-तलाक बोलने के 'शरई रिवाज' के डर से मुस्लिम महिलाएं लंबे अरसे से मानसिक तौर पर त्रस्त हैं। अब तो कुछ इमाम एसएमएस पर भी संदेश भेजकर तलाक देने की हिमायत करने लगे हैं। मुस्लिम महिलाएं ऐसी कट्टर सोच के खिलाफ लामबंद होने लगी हैं
डॉ़ प्रमोद पाठक
तलाक! तलाक! तलाक! एक ही पल में इन तीन बेरहम शब्दों की बुनियाद पर सदियों से मुस्लिम महिलाओं को गुलाम बनाकर रखा गया है। इतना ही नहीं, वे इस अजीबोगरीब क्रूर रस्म के हाथों अपने बेलिहाज शौहरों की सनक और कल्पनाओं को साकार करने को भी मजबूर होती रही हैं। लेकिन अब इस प्रथा को उत्तराखंड की एक मुस्लिम महिला शायरा बानो ने चुनौती दी है। शायरा को 13 वर्ष के वैवाहिक जीवन के बाद ऐसे ही तलाक का सामना करना पड़ा था। इसके बाद शायरा ने सवार्ेच्च न्यायालय में गुहार लगाई कि तीन तलाक की इस एकतरफा प्रथा पर पुनर्विचार किया जाए। सवार्ेच्च न्यायालय ने शायरा की याचिका पर संज्ञान लेते हुए कहा कि अन्य पक्षों को भी इस बारे में आगे आना चाहिए। ये पक्ष हैं भारत सरकार, अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और खुद शायरा बानो के पूर्व पति।
शायरा बानो द्वारा दाखिल याचिका में कहा गया है कि तीन तलाक की प्रथा घृणित है और संविधान की धारा 51ए के तहत इससे बतौर भारतीय नागरिक मुस्लिम महिलाओं के मूलभूत अधिकारों का हनन होता है। सच यह है कि मुस्लिम महिलाएं हमेशा ही इस बात को लेकर मानसिक दबाव में रहती हैं कि उन्हें कभी भी किसी थोथी बुनियाद पर तलाक दे दिया जाएगा जिसके बाद उनका जीवन नरक हो जाता है।
मुस्लिम कट्टरपंथियों के कोप के डर से मीडिया इस मुद्दे पर बहस करने से बचता रहा है। लेकिन जब बहुसंख्य मुस्लिम महिलाएं शायरा बानो की मुहिम के साथ आ जुड़ीं, तब यह डर बेबुनियाद साबित हुआ। अब भारत की न्यायिक प्रणाली के पास तीन तलाक के त्रिकोण पर फिर से बहस करने का अवसर है।
23 मार्च, 2016 को एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में प्रो़ ताहिर महमूद ने टिप्पणी की है कि बाद में पति के बर्ताव में नरमी आने के बावजूद महिलाओं को जगहंसाई झेलनी ही पड़ती है। प्रो़ ताहिर ने कुछ अन्य मुस्लिम महिलाओं के बारे में भी बताया जिनमें 1980 के दशक का शाह बानो मामला भी है जिस दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सवार्ेच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया था। गौरतलब है कि उस फैसले से मुस्लिम समाज में प्रगतिशील परिवर्तन आ सकते थे। लोकसभा के बहुमत के दम पर राजीव गांधी ने विधेयक पारित कराया था जिससे सवार्ेच्च न्यायालय का फैसला अमान्य हो गया था। इस फैसले के बाद मुस्लिम पुरुष वर्ग और पीछे की ओर चला गया था।
पहला प्रयास नहीं
यह पहली बार नहीं है कि तीन तलाक को अदालत में चुनौती दी गई हो। दो वर्ष पहले ही तमिलनाडु के वरिष्ठ वकील और पूर्व विधानसभा सदस्य बदर सईद ने उच्च न्यायालय में दलील दी थी कि तीन तलाक हमेशा एकपक्षीय, पुरुषों की सुविधा के अनुसार होता है, इसे इस्तेमाल में लाए जाने से पहले कुछ गवाहों को जरूर रखा जाना चाहिए। बतौर वकील, सईद का सामना अक्सर ऐसी परिस्थितियों से हुआ है जब काजियों ने तीन तलाक के मामले में अपना फैसला पुरुषों के पक्ष में दिया है। दूसरी ओर, यदि महिलाओं की अपने पतियों के खिलाफ शिकायत सही भी हो, तो भी उन पर शिकायत वापस लेने और समझौता करने का दबाव रहता है (इंडियन एक्सपे्रस, 21 जून, 2013)। अत: विवाह को इस्लाम में अनुबंध का दर्जा प्राप्त है। इन हालात में, विवाह तभी पूर्ण माने जाने चाहिए जबकि पति और पत्नी दोनों अनुबंध पर हस्ताक्षर न कर दें। अक्सर ऐसा नहीं होता क्योंकि लड़की के माता-पिता लिखित अनुबंध के प्रति कोई गंभीरता नहीं दिखाते। प्रगतिशील मुस्लिम समाजसेवी, दिवंगत असगर अली इंजीनियर ने मुस्लिम समाज से गुजारिश की थी कि वह न केवल लिखित अनुबंध को ही मानें बल्कि उसे पंजीकृत भी कराएं। इस तरह तलाक की सूरत में पति को अपनी पत्नी को उचित मुआवजा देना पड़ेगा और वह अपने बच्चों के साथ दर-बदर की ठोकरें खाने से बचेगी। पुरुष अक्सर दूसरी शादी कर लेता है।
ऊपर वाले का विधान
इस बार की बहस में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने दलील दी है कि तीन तलाक की प्रथा शरीयत के अनुसार है और यह ऊपर वाले का विधान है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकील एजाज मकबूल तर्क देते हैं कि मोहम्मदीय कानून पवित्र कुरान और अल हदीस की व्याख्या के अनुसार है; उसे इंसानों द्वारा चलाई जाने वाली अदालतों में चुनौती नहीं दी जा सकती। मसलन, न्याय करने बैठे काफिरों को खुदाई कानून में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की महिला सदस्य अस्मा जेहरा कहती हैं कि मुस्लिम महिलाएं कानून के अंतर्गत पूरी तरह से सुरक्षित हैं, वह कानून जिसे पहले 1930 में और बाद में 1986 में शाहबानो फैसले के बाद अमल में लाया गया था। अत: इन कानूनों की रोशनी में शरीयत को चुनौती गैर वाजिब है।
बेरहम प्रथा
जाहिर है, नई बहस अजीबोगरीब रुख अख्तियार करेगी और इसके जरिये शरीयत के कुछ हिस्सों को भी चुनौती दी जा सकती है जिसे पूर्व-इस्लामिक काल से अपनाया गया है। तीन तलाक का मामला भी इस बहस का हिस्सा बनेगा। जैसा कि ताहिर महमूद कह चुके हैं, तीन तलाक की प्रथा पूर्व-इस्लामिक समय से चली आ रही है और इस्लाम ने इस पुरातन प्रथा के अनियंत्रित क्रियान्वयन को रोकने का प्रयास किया। इससे जुड़ी एक घटना खुद पैगंबर के जीवनकाल में भी सामने आई थी। इनके जीवन के उत्तरार्ध के समय उनकी पत्नियों के बीच तनाव था। अपनी पारिवारिक कलह से जब वे बेहद तंग आ गए, उस दौरान उनके उत्तराधिकारी उमर ने पैगंबर की पत्नियों को चेतावनी देते हुए कहा कि वे उन्हें उन सबको तलाक देने की सलाह देंगे। इसके बाद पैगंबर उनसे बेहतर पत्नियां लाएंगे। इसके बाद घरेलू कलह समाप्त हो गई। इस तरह इसे पूर्व-इस्लामिक प्रथा का भी सहयोग प्राप्त है।
पैगम्बर भी मौखिक तलाक के खिलाफ थे। उनकी दो बेटियों रुकैया और उमम कुलथुम का इस्लाम के शुरुआती दौर में तलाक हुआ था। एच.के. 4़128 पति-पत्नी के बीच सुलह पर जोर देती है। परंतु नारी विरोधी मुल्लावर्ग इसकी हमेशा से एकतरफा व्याख्या करता आया है, जिसके दम पर पुरुषों को आसानी से तलाक मिल जाता है। हनीफ मुराद (द टाइम्स ऑफ इंडिया, 16 अगस्त 2013) के अनुसार अल-हदीस की व्याख्या में पैगंबर ने मौखिक तीन तलाक को नकारा है।
इस्लाम कबूलने वाले पुरुष रुकाना ने पैगंबर से कहा कि उसने एक ही वाक्य में तीन बार तलाक कह कर अपनी पत्नी को त्याग दिया। पैगंबर उससे उसके किए पर पुन: सोचने को कहते हैं। इसके बाद वे दोनों के वैवाहिक जीवन को फिर शुरू करने के लिए रुकाना की पत्नी को बुलाए जाने को कहते हैं। इस विशिष्ट हदीस की मौलिकता पर मुल्लावर्ग जरूर सवाल दागेगा, क्योंकि यह मुस्लिम समुदाय के पुरुषों के झूठे मर्दाना दंभ के खिलाफ जाती है। इसी तरह एक अन्य प्रसंग हजरत अब्दुल्ला इब्न उमर से भी जुड़ा है। कुछ इमाम यहां तक कहने लगे हैं कि तीन तलाक देते समय एक दूसरे के रूबरू होने की भी जरूरत नहीं है। इसे एसएमएस से भेजा जा सकता है या फिर केवल टाइप करके उसे भेजना भी जरूरी नहीं है। इस तरह पति और पत्नी के अलगाव को कानूनी मान लिया जाएगा। दरअसल, यह स्त्री विरोधी व्यवहार की पराकाष्ठा है।
इस्लामिक रिवायत में इस्लाम की स्थापना से पूर्व के समय को जाहिलिया मानने का आम चलन है, जिसका अर्थ है अज्ञानता का समय, जिसे हटाया जाना चाहिए। यदि ऐसा है तो तीन तलाक की प्रथा, जो इस्लाम की स्थापना से पहले से चली आ रही है, उसका भी उन्मूलन होना चाहिए। परंतु दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो सका है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड तलाक को ऊपर वाले का आदेश कहकर अदालत को गुमराह कर रहा है। यहां यह देखना जरूरी है कि अनेक मुस्लिम देशों ने मौखिक तीन तलाक को प्रतिबंधित कर दिया है। इनमें सऊदी अरब, पाकिस्तान और अन्य कुछ देश हैं।
जैसा कि आम चलन है, शनि शिंगणापुर, त्र्यंबकेश्वर और कोल्हापुर आदि मंदिरों में महिलाओं के जाने को लेकर शोर मचाने वाला मीडिया मुस्लिम महिलाओं की हालत के मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए है।
दरअसल, मुस्लिम कट्टरपंथियों के कोप के डर से मीडिया इस मुद्दे पर बहस करने से बचता रहा है। लेकिन जब बहुसंख्य मुस्लिम महिलाएं शायरा बानो की मुहिम के साथ आ जुड़ीं, तब यह डर भी बेबुनियाद साबित हुआ। अब भारत की न्यायिक प्रणाली के पास तीन तलाक के त्रिकोण पर फिर से बहस करने का अवसर है।
(गोवा स्थित लेखक मुस्लिम विषयों के जानकार हैं)










