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घाटी के चंद मुहल्लों तक सिमट आया 'वर्चस्व' और राजनीति में अपनी घटती प्रासंगिकता को बचाने के लिए अलगगाववादी 'नेतृत्व' पुराने उपद्रवी हथकंडे अपना रहा है, शैक्षणिक संस्थान उनके नए निशाने
पिछले कुछ दिनों से सुर्खियों को देखते हुए ऐसा लग रहा था मानो पूरा जम्मू-कश्मीर उबल रहा है। जगह-जगह भारत विरोधी प्रदर्शन, पथराव, पुलिस की गोलियां, आतंकवादी मुठभेड़ और यही तो अलगाववादी ताकतें चाहती थीं कि भारत और विदेशों में रहने वाले लोग समझें कि राज्य में सब तबाह हो रहा है।
दरअसल, घाटी में अलगाववादी 'नेतृत्व' की प्रासंगिकता तेजी से खत्म हो रही है। उनका स्थानीय जनाधार तेजी से गिर रहा है। उनका वर्चस्व बस चंद मुहल्लों तक सिमट गया है। यहां तक कि उनके बंद के आह्वान पर भी कोई ध्यान नहीं देता। अशांति का माहौल बनाने की उनकी यह कवायद अपना छीजता वर्चस्व वापस हासिल करने की है। लिहाजा अपने गिने-चुने इलाकों से उन्होंने वही पुराना खेल शुरू कर दिया है—पथराव के लिए युवाओं को उकसाना, पुलिस कार्रवाई, सेना की जवाबी कार्रवाई और उसके साथ उछाले गए मानवाधिकार उल्लंघन के जुमलेे। वे अपने मीडिया को ठीक से संभालते हैं और अब सोशल मीडिया को साधना भी सीख गए हैं।
दिलचस्प बात यह है कि कश्मीर का भूक्षेत्र राज्य का सिर्फ 15 प्रतिशत है। बाकी 85 प्रतिशत में जम्मू और लद्दाख हैं। इन दोनों इलाकों में आबादी का एक बड़ा हिस्सा मुस्लिमों का है, बावजूद इसके वहां शांति है और भारत-विरोधी या पाकिस्तान समर्थक नारेबाजी जैसी घटनाएं नहीं होतीं। पर कश्मीर के छोटे से छोटे इलाके में भी एक छोटी चिनगारी के चटकते ही मीडिया उसे ऐसे प्रचारित करने लगता है मानो पूरे राज्य में हर मुसलमान पाकिस्तान समर्थक नारे लगा रहा है और 'आजादी' की मांग कर रहा है । अभिमत बनाने के लिहाज से कश्मीर क्षेत्र में मीडिया की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। (देखें बॉक्स)
कश्मीर घाटी सहित जम्मू-कश्मीर राज्य में ज्यादातर लोग शांतिप्रिय हैं और दिल से पूरी तरह भारतीय। त्रासदी यह है कि कोई उस आबादी से बात नहीं कर रहा। विभाजन के दौरान और बाद के कालखंड के राजनीतिक नेतृत्व ने जो गलतियां कीं, वह विषबेल आज विषवृक्ष बन गई है। राज्यभर में भारत समर्थक आवाज हमेशा से बहुमत में रही है, पर दुर्भाग्य से दिल्ली हमेशा भारत विरोधी ताकतों के इशारे पर नाचने वाले अलगाववादियों से बातचीत करती रही। अलगाववादी और आतंकवादी इसी स्थिति को अपनी व्यूह रचना के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं।
खबरों में जो हम रोज देख-सुन रहे हैं, वह सच नहीं, बल्कि स्थानीय मीडिया के पक्षपाती रुख के साए में चतुराई से प्रस्तुत परिदृश्य है। आम आदमी उलझन और निराशा में कैद मूक दर्शक बना हुआ है। जम्मू-कश्मीर में लगभग सभी चुनावों में मतदान प्रतिशत काफी ऊंचा रहा, इसके बावजूद मतदाताओं को लोकतंत्र और शासन प्रणाली से कोई समाधान नहीं मिला। समस्याएं खड़ी करने से अलगाववादियों का एक और मकसद सधता है—राज्य में भाजपा के गठजोड़ से बनी नई सरकार, और केंद्र को निशाना बनाना। उनके लिए महबूबा मुफ्ती के मुख्यमंत्री पद का कार्यभार संभालने से बढ़कर बेहतर समय नहीं हो सकता था।
इस वैचारिक शतरंजी खेल के लिए युवा वर्ग बहुत महत्वपूर्ण है। अपनी एअरकंडीशंड कोठियों से उपद्रव और उत्पात का खेल चलाने वाले सूरमाओं ने इसके लिए शैक्षणिक संस्थाओं में घुसपैठ का संजाल खड़ा किया है ताकि युवा मस्तिष्कों को प्रदूषित कर उन पर कब्जा जमाया जा सके। एनआईटी श्रीनगर का मामला इसका सटीक उदाहरण है। आखिर इंजीनियरिंग के छात्र इस सीमा तक कैसे चले गए कि 'गैर-स्थानीय' छात्रों के कमरों के दरवाजे पीटने और उनके लिए भद्दी भाषा और विशेषण प्रयोग कर उन्हें प्रताडि़त और उत्तेजित करने तक पर उतर आए? इन सभी छात्रों ने इंस्टीट्यूट में दाखिला पाने के लिए अखिल भारतीय स्तर की परीक्षा पास की ताकि वे अच्छी कंपनियों में काम करने और भारत भर में कहीं भी प्लेसमेंट का मौका पा सकें। साफ है कि भारत से 'आजादी' उनके जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकता। 'स्थानीय' छात्रों के भारत विरोधी हंगामे से लेकर हाथों में तिरंगा लेकर शांतिपूर्वक मार्च करने वाले गैर-स्थानीय छात्रों पर पुलिस के बर्बर लाठीचार्ज तक की घटनाओं के क्रम से क्या यह स्पष्ट नहीं होता कि पर्दे के पीछे कुछ ताकतें लगातार कुचक्र चला रही थीं? पुलिस की इस क्रूर कार्रवाई की भी गंभीरता से जांच होनी चाहिए जिससे इस मुद्दे के मूल तक पहुंचा जा सके।
कश्मीरी बनाम गैर-कश्मीरी भावना को भड़काकर उसे बहस का मुद्दा बनाना अलगाववादियों के षड्यंत्र का ही हिस्सा था जो उन्होंने अपने फायदे के लिए खेला और दिल्ली के कुछ कथित निष्पक्ष मीडिया घरानों ने एनआईटी मुद्दे पर अलगाववादी नेताओं की बोली को जिस तरह दोहराना शुरू कर दिया था उसे देखते हुए अलगाववादी अपने खेल में सफल भी हो जाते। लेकिन छात्रों ने तुरंत उनका खेल भांप लिया और तुरंत स्पष्ट कर दिया कि स्थानीय कश्मीरियों के साथ उनकी दोस्ती है और उनके प्रति उन लोगों का व्यवहार बहुत अच्छा है, और यह कि कैंपस में भड़काऊ कार्रवाई करने वाला एक छोटा-सा गुट है जो समस्या पैदा करना चाहता था।
इसके लगभग तुरंत बाद हंदवाड़ा की घटना मानो शून्य से प्रकट की गई। इस पर भड़का माहौल पूरी तरह से अलगाववादी गुटों के सामाजिक मीडिया प्रबंधकों की सुलगाई चिनगारी थी। यह मिनटों में वायरल हो गया। यह 'छेड़छाड़' का अजीब मामला था जिसमें लड़की पहले दिन से ही उसके साथ छेड़छाड़ की कोई घटना होने से दृढ़ता से इनकार कर रही थी। ऐसे आरोप भी उछाले गए कि सोशल मीडिया पर वायरल हुए उसके बयान के वीडियो में उसे घटना से इनकार करने के लिए विवश किया गया। लेकिन लड़की ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने भी दोहराया कि उसे सेना के किसी जवान ने नहीं छेड़ा, बल्कि दो स्थानीय लड़कों ने उसे घसीटा और उनमें से एक लड़के, जो स्कूल वर्दी में था, ने उसका बैग छीन लिया। स्पष्ट है कि इस पूरे प्रकरण के पीछे कोई बड़ा पड्यंत्र था। वे स्थानीय लड़के कौन थे और किसके इशारे पर उन्होंने इस हरकत को अंजाम दिया?
युवा वर्ग: एक आसान शिकार
आपने कभी सोचा है कि 'उग्रवाद' के चेहरे के रूप में हमेशा युवाओं की ही शक्लें क्यों दिखती हैं? चाहे 'भारत विरोधी' प्रदर्शन हो, सुरक्षा बलों पर पथराव या आतंकवादी मुठभेड़ हो, हमेशा किशोर ही क्योंे नजर आते हैं?
दरअसल अलगाववादियों ने कई दशकों से अभिमत बनाने के खेल में महारत हासिल कर ली है। यह प्रचारित करना और उसे शेष भारत के दिमाग में बिठाना कि कश्मीर के लोग खुश नहीं इसलिए वहां 'उग्रवाद' लौट रहा है, उनके हित में है। दुर्भाग्य से मुख्यधारा का मीडिया जाने-अनजाने अलगाववादी ताकतों के कुचक्रों की कठपुतली बन गया है।
स्थानीय कश्मीरी भी इस स्थिति से नाखुश हैं। जो समर्थ हैं वे अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए राज्य से बाहर भेज देते हैं ताकि उनका बेटा या बेटी विघटनकारी चंगुल में न फंसे। आतंकवादी समूह में शामिल होने वाला हर युवक अपने मां-बाप की मर्जी के खिलाफ इस राह पर निकलता रहा है। वह बिना बताए या कभी एक पत्र लिखकर घर छोड़ जाता है। मां-बाप अपने बेटे का पता लगाने और उसे वापस लाने के लिए जी-जान लगा देते हैं, पर वह बर्बादी की राह पर इतनी दूर जा चुका होता है कि वापसी असंभव होती है। घाटी के युवाओं की मुख्य समस्या है अलगाववादी-आतंकवादी तत्वों की उन तक आसान पहुंच, इसके अलावा उनके सामने कोई रचनात्मक विकल्प भी नहीं है कि वे अपनी ऊर्जा का सार्थक इस्तेमाल कर सकें।
किसी के जीवन की बलि चढ़ा देना अलगाववादियों के लिए छोटी-सी बात है जो वे दशकों से करते आ रहे हैं। लेकिन शीर्ष अलगाववादी नेताओं के बाल-बच्चे कथित 'आजादी' आंदोलन से अलग किसी बड़े शहर या विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं या सुखी जीवन जी रहे हैं। हिज्ब-उल-मुजाहिद्दीन के नेता सैयद सलाहुद्दीन के पांच बेटे सरकारी नौकरी कर रहे हैं और वेतन पा रहे हैं। उनके सबसे छोटे बेटे सैयद मुईद उन 100 लोगों में से थे जिन्हें सुरक्षा बलों ने इस साल फरवरी में आतंकवादियों के पंपोर में उद्यमिता विकास संस्थान (ईडीआइ) परिसर में किए हमले में बचाया था। वह ईडीआइ में आइटी मैनेजर हैं। हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी के बड़े बेटे नईम पाकिस्तान के रावलपिंडी में डॉक्टर हैं। उनका दूसरा बेटा जहूर, नई दिल्ली में रहता है, जबकि उनकी बेटी फरहत जेद्दा में शिक्षक है। सभी हुर्रियत नेताओं की अन्य राज्यों या विदेशों में भी संपत्ति है।
आतंकवाद की अर्थव्यवस्था
वास्तव में देखा जाए तो कश्मीर में आतंकवाद की अर्थव्यवस्था 'आजादी' के विचार से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। दशकों से बेहिसाब धनराशि घाटी में पहुंचती रही है जिसने वहां शक्तिशाली खेमे पैदा किए। ये खेमे नहीं चाहते कि घाटी में अलगाववाद-आतंकवाद का खात्मा हो। सीमा पार से आतंक का पोषण करने के लिए या नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए दिए जा रहे पैसे आसानी से ऐसे तत्वों तक पहुंचते हैं।
कश्मीरी नेताओं के लिए 'आजादी मांगो, पैकेज पाओ' एक सुविधाजनक नारा है। केंद्र विशेष पैकेज के रूप में हर साल जम्मू-कश्मीर राज्य के लिए हजारों करोड़ रुपये मंजूर करता है। ये पैसे न जाने किन रहस्यमय छिद्रों से बहकर गुम हो जाते हैं कि घाटी की विकास की राह धन के अभाव में कुंद रह जाती है। श्रीनगर की मेरी हाल की यात्रा आंखें खोलने वाली यात्रा रही। इसके पहले 2002 में मैं कश्मीर गई थी जब 'उग्रवाद' के सबसे स्याह दौर का अंत हो रहा था और विधानसभा चुनाव होने वाले थे। निर्वाचित सरकार के 14 वर्षों के बाद भी श्रीनगर विकास के सभी मानकों पर नीचे है। हवाई अड्डे से बाहर आते ही सबसे पहले साबका बेतरतीब यातायात से पड़ता है। और नथुने धूल-धुएं भरी हवा से भर जाते हैं। बुनियादी सुविधाओं का अभाव है, पूरी घाटी में सड़कें बदहाल हैं और श्रीनगर से गुजरने वाला रास्ता धूल से अटा हुआ है।
विकास का अभाव निश्चित रूप से एक बड़ा मुद्दा है, लेकिन हैरत की बात है कि कोई भी इसके बारे में बात नहीं करना चाहता। शायद यहां अलगाववादी एजेंडे को जिंदा रखते हुए कानून और व्यवस्था की स्थिति तनावपूर्ण रखना ज्यादा सुविधाजनक है, ताकि स्थानीय निवासियों को कभी बुनियादी विकास के बारे में अपने नेताओं से पूछने का मौका ही न मिले। कहने की जरूरत नहीं कि अलगाववादी गुटों को माहौल को गर्म रखने के लिए सीमा पार से भारी धनराशि की सौगात मिलती रहती है।
सबसे खतरनाक नशीले पदार्थों की तस्करी में मिलने वाला पैसा है। नशा पिछले कुछ सालों से जम्मू-कश्मीर राज्य, खासकर घाटी को घुन की तरह चाट रहा है। यह इलाका सीमा पार प्रायोजित नशीले पदार्थों की तस्करी का बड़ा गढ़ बन रहा है और अब यहां अफीम और भांग जैसे मादक पदार्थ आसानी से मिलने लगे हैं। नियंत्रण रेखा (एलओसी) के दोनों तरफ बड़ी संख्या में तस्कर गिरोह सक्रिय हैं। कम उम्र के स्थानीय और विदेशी आतंकवादी नशे के शिकार हैं । युवकों में पहले नशे की लत डाली जाती है और फिर उन्हें आतंकवाद के लिए विवश किया जाता है। 2015 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय ड्रग कंट्रोल प्रोग्राम (यूएनडीसीपी) प्रायोजित सर्वेक्षण में पता चला कि सिर्फ कश्मीर डिवीजन में 70,000 व्यक्ति नशे के शिकार थे। हालांकि वास्तविक संख्या दो लाख से अधिक है।
पाकिस्तान की इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (आइएसआइ) के लिए ये नशीले पदार्थ जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी-आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए आय का स्रोत रहे हैं। अफगानिस्तान के अफीम के खेतों से कश्मीर घाटी तक नशीले पदार्थों के व्यापार से कमाया धन इन गतिविधियों में इस्तेेमाल होता रहा है। पाकिस्तान प्रायोजित नशीले पदार्थों के व्यापार का खामियाजा अतंत: कश्मीर के युवक ही भुगत रहे हैं।
कश्मीर में कट्टरता
अलगाववादी मानसिकता का मजहबी विस्तार अब घाटी के लोगों, खासकर युवाओं, को कट्टरपंथी बनाने की कोशिश है। कश्मीरी मुसलमान मूल रूप से सूफीवाद के समर्थक हैं। घाटी के मुस्लिम ऋषियों और संतों ने हमेशा अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णुता और बहुलवादी विचारधारा का प्रचार किया है। पर अब सूफी मत को कट्टरपंथी सलाफी-वहाबी में बदलने की साजिश की जा रही है। इसका प्रमाण है घाटी में वहाबी साहित्य का बेहिसाब प्रचार और उपलब्धता । सभी जानते हैं कि घाटी में कई मस्जिदों में स्थानीय मौलवियों को हटाकर गैर-स्थानीय या सीमा पार से लाए गए मौलवियों को नियुक्त किया जा रहा है ।
हालांकि, सड़क पर चल रहे आम आदमी पर कट्टरपंथी प्रभाव ज्यादा नहीं दिखता। गिलानी और आसिया अंद्राबी जैसे पाकिस्तान समर्थक अलगाववादियों के निरंकुश प्रयासों के बावजूद बुर्का और नकाब बहुत कम दिखते हैं। अधिकांश कश्मीरी आज भी अपने सूफी धार्मिक स्थलों और जीवित संतों के प्रति श्रद्घा भाव रखते हैं और उन्हें अपनी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा मानते हैं। ज्यादातर कश्मीरी मुस्लिम आबादी आज भी कट्टरपंथी नहीं है। विनाश का ग्रहण और पैर न पसार पाए इसके लिए जरूरी है कि सरकार कश्मीरियों की सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक चिंताओं को दूर करने के लिए तत्परता से काम करे।
जमीनी स्तर पर शासन प्रणाली की कमी
घाटी सहित पूरे जम्मू-कश्मीर में जमीनी स्तर पर शासन प्रणाली के दर्शन लगभग नहीं के बराबर हैं। देश के अन्य हिस्सों में पंचायती राज, जहां देश भर में प्रभावी ढंग से काम कर रहा है, वहीं इस राज्य में उसका कोई अस्तित्व नहीं। लोगों की हताशा का यह भी एक कारण है। विकास और भ्रष्टाचार की मुख्य समस्या का गंभीरता से समाधान जरूरी है। इसी के जरिए अतीत की गलतफहमियों और सरकारों से हुए मोहभंग का समाधान निकाला जा सकता है।
राज्य और केंद्रीय स्तर पर आज भी नौकरशाही 90 के दशक की मानसिकता पर काम कर रही है, जब आतंकवाद अपने चरम पर था। उस जमाने के नियम और प्रक्रियाएं अब प्रासंगिक नहीं हैं। जमीनी स्तर पर स्थिति बदल चुकी है और सरकारों को अब वर्तमान परिदृश्यों को संभालने के लिए तकनीकों और कार्यनीतियों को नए सिरे से लागू करने की जरूरत होगी। अच्छा होगा कि राजनेता और नौकरशाह मीडिया पर निर्भर करने के बजाए जमीनी स्तर पर रिपोर्ट लेने के लिए राज्य के सभी क्षेत्रों के लोगों से सीधे बातचीत करें। राज्य के लोगों के दिलों में दर्द हो सकता है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि वे पूरी तरह भारत के प्रति समर्पित हैं। आभा खन्ना, श्रीनगर से
मिलिए कश्मीर के 'मीडिया माफिया' से
हरेक शुक्रवार की शाम नौहाता डाउन-टाउन श्रीनगर स्थित मस्जिद के बाहर एक दृश्य रोज दिखता है। नमाज पूरी होते ही दरवाजे बंद हो जाते हैं। भीतर चेहरा ढके 20-30 युवक हाथों में भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक बैनर लिये दिखते हैं। पुलिस और सीआरपीएफ कर्मी दूसरे छोर पर खड़े इस दृश्य को देखते रहते हैं। दूसरी ओर इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के लगभग 50-60 कैमरामैन अपने स्टिल और वीडियो कैमरे 'प्रदर्शनकारियों' और सुरक्षा बलों पर ताने तैयार रहते हैं।
सेट तैयार होते ही एक्शन शुरू हो जाता है। 'प्रदर्शनकारी' भारतविरोधी और पाकिस्तान समर्थक नारे लगाते हैं और कुछ समय बाद इंतजार कर रहे सुरक्षाबल के कर्मियों पर पत्थर फेंकना शुरू कर देते हैं। एक सुरक्षित दूरी पर मीडिया के लोग इस 'प्रदर्शन' को अपने कैमरों में कैद करने में व्यस्त दिखाई देते हैं।
मजेदार बात यह है कि दरवाजे के बाहर से यह नजारा साफ दिखता है। पथराव होता है और पुलिस 'प्रदर्शनकारियों' की भीड पर मस्जिद से सटे खुले मैदान में कार्रवाई करती दिखाई देती है। लेकिन दरवाजे के बाहर दायीं ओर गली में जीवन सामान्य गति से चल रहा होता है। महिलाएं आराम से अपने दैनिक कामों के लिए आती-जाती दिखती हैं। वाहन भी गुजरते रहते हैं और गलियों में रेहड़ी-पटरी वाले भी अपना सामान बेचते रहते हैं।
मिलिए, कश्मीर घाटी के मीडिया माफिया से। यह घाटी में समाचार 'बनाने' और परोसने के तौर-तरीके एक बानगी भर है। कश्मीर घाटी में अलिखित नियम है कि मीडियाकर्मी केवल चुनिंदा कश्मीरी होना चाहिए।
पिछले कुछ दशकों से कश्मीर के मीडियाकर्मी रणनीतिक रूप से एक चालाकी भरे पक्के गठजोड़ में फंस गए हैं। इससे बाहर की दुनिया के लिए कुछ चुनिंदा खबरें ही जारी की जाती हैं जो एक खास वैचारिक लक्ष्य की पूर्ति करती हों। दूसरी खबरें या तो बहुत कम दी जाती हैं या उनकी चर्चा ही नहीं होती। हाल में एक इलेक्टॉनिक न्यूज चैनल के मुख्यालय में को-ऑडिनेटर ने पाया कि घाटी में जब-जब बंद होता है, उनका वीडियो जर्नलिस्ट हर बार एक बंद शटर के दृश्य ही भेजता है।
एनआईटी श्रीनगर के छात्रों ने भी यह अनुभव किया। ल्ंाबे समय से वे समझ नहीं पा रहे कि एनआईटी परिसर में जो घटता है उसे मीडिया में एकतरफा तरीके से क्यों दिखाया जाता है। यदि वे बाहर की दुनिया को परिसर की वास्तविक घटनाएं सोशल मीडिया के माध्यम से न बताते तो कोई जान ही नहीं पाता कि वहां वास्तव में क्या घट रहा था। सुरक्षाबल, विशेषकर सेना कई दशकों से इसका सामना कर रही है। मुख्यधारा का मीडिया किसी गैर-कश्मीर पत्रकार को श्रीनगर में तैनात नहीं करता। अब समय आ गया है कि इस नापाक गठजोड़ को खत्म कर दिया जाए और कश्मीर घाटी में स्वस्थ रिपोर्टिंग को बढ़ावा मिले।











