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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा 1950 से हर वर्ष देश में अलग-अलग स्थान पर आयोजित की जाती है। इस साल गणवेश में बदलाव की मीडिया में सुर्खियां बनने से लोगों का इस ओर विशेष ध्यान भले गया हो, लेकिन प्रतिनिधि सभा ने देश में मनमुटाव के वर्तमान परिदृश्य की पृष्ठभूमि में सामाजिक जीवन में समरसता के लिए संगठन की शक्ति पूरी शक्ति से लगाने का आह्वान किया, संघ ने शिक्षा और स्वास्थ्य समस्या पर भी उंगली रखी
आर. गणेश कृष्णन, नागौर से
राजपूताना के मारवाड़ अंचल की उल्लास भरी संस्कृति और उसकी हवाओं में तैरती शौर्यगाथाओं के स्वर्णिम इतिहास को नमन करते हुए इस साल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा राजस्थान के नागौर शहर में हुई, उस राज्य में जहां आसमान छूते किलों की प्राचीरों ने कभी अभेद्य ढाल बनकर राष्ट्र के दुश्मनों से लोहा लिया था। राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता के साथ सुगबुगाते सवालों के मद्देनजर मौजूदा माहौल में राजस्थान का चुनाव बेहद प्रासंगिक था। 11 मार्च को सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की तीन दिवसीय बैठक का उद्घाटन किया। श्री भागवत और सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी ने 13 मार्च तक चली इस सभा की अध्यक्षता की, जिसमें संघ के प्रांत स्तर तक के पदाधिकारियों, सम-विचारी संगठनों के राष्ट्रीय पदाधिकारियों, देशभर की शाखाओं के निर्वाचित प्रतिनिधियों और कुछ विशेष आमंत्रितों समेत 1,058 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। ाब्द-कर्म-स्वरूप में समृद्ध विरासत की प्रतीक प्रतिनिधि सभा का परिसर नागौर के पास एक सुरम्य गांव शारदापुरा में शारदा बाल निकेतन में बनाया गया था, जो जीवंत और समृद्ध राजस्थान के लघु रूप को दर्शा रहा था। परिसर भारत के सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक इतिहास के उन अनेक शीर्ष व्यक्तित्वों—मीरां बाई से लेकर महाराणा प्रताप तक—के भव्य चित्रों से सजा हुआ था, जिन्होंने इस वीरप्रसूता भूमि पर जन्म लिया था। परिसर में दिवंगत बालासाहब देवरस की स्मृति में एक फोटो प्रदर्शनी भी लगाई गई थी जिनका वर्तमान में जन्म शताब्दी समारोह चल रहा है। पूरा परिसर प्लास्टिक मुक्त था, इसके लिए कोई दिशानिर्देश जारी नहीं किए गए थे, बल्कि यह हर स्वयंसेवक के आत्मानुशासित व्यवहार का हिस्सा ही था। चाहे संघ स्थान हो या भोजन कक्ष अथवा बैठक कक्ष, हर जगह प्रत्येक स्वयंसेवक सहज भाव से अनुशासित आचरण का पालन कर रहा था।
मीडिया में प्रचारित किए गए समाचारों के विपरीत प्रतिनिधि सभा किसी राजनैतिक उद्देश्य के लिए नहीं, बल्कि हमेशा की तरह पिछले साल के काम की समीक्षा और आगामी वर्ष के कार्यक्रमों की योजना के लिए आहूत की गई थी। 91 वर्ष के जीवंत राष्ट्रीय संगठन की पिछले साल की गतिविधियों की समीक्षा के तौर पर सरकार्यवाह ने वार्षिक रिपोर्ट पेश की जिसमें मौजूदा राष्ट्रीय परिदृश्य और संघ कार्य की वर्तमान स्थिति सहित विभिन्न विषयों की चर्चा थी।
प्रतिनिधि सभा के पहले दिन 11 मार्च को सह सरकार्यवाह डॉ़ कृष्णगोपाल ने संघ के लगातार विकास के बारे में दिल्ली और राजस्थान से विशेष रूप से प्रतिनिधि सभा कवर करने नागौर पहुंचे प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों से चर्चा की। उन्होंने बताया कि 2012 से 2015 के बीच शाखाओं और संघ स्थानों की संख्या में क्रमश: 10,413 और 5,181 की जोरदार वृद्धि हुई है। 2016 में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई और एक ही वर्ष में 5,527 शाखाएं बढ़ गईं। साप्ताहिक मिलन की संख्या भी 937 बढ़ी। 2012 में शाखाओं की कुल संख्या 40,922 थी जो 2015 में 51,335 हो गई। 2016 में शाखाओं की यह संख्या पहले के सभी आंकड़ों को पीछे छोड़ते हुए 56,859 पर जा पहुंची, यानी एक ही साल में 5,524 शाखाओं की बढ़ोतरी दर्ज हुई।
कुल शाखाओं में 65़ 6 प्रतिशत विद्यार्थी शाखाएं हैं जबकि 91 प्रतिशत स्वयंसेवक 40 वर्ष से कम उम्र के युवा हैं। इनमेंं विद्यार्थी, कर्मचारी, कारोबारी शामिल हैं। और शाखा जाने वाले 9 प्रतिशत स्वयंसेवक ही 40 वर्ष से अधिक आयु के हैं। डॉ. कृष्णगोपाल ने बताया कि संघ भारत के 840 जिलों (संघ द्वारा किए गए वर्गीकरण के अनुसार) में से 820 यानी 95 प्रतिशत जिलों में जगह बना चुका है।

सह-सरकार्यवाह ने यह भी कहा कि प्रतिनिधि सभा संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस और पं. दीनदयाल उपाध्याय की जन्मशती और डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के 125 वीं जयंती समारोह की योजना के बारे में चर्चा करेगी जिसके तहत देश भर में समानता के संदेश, दीनदयाल जी के अंत्योदय दर्शन (समाज में सबसे अंतिम स्थान पर खड़े व्यक्ति को भी सुखी-समृद्ध बनाना) के प्रसार और गरीबों-वंचितों के उत्थान और जातिगत भेदभाव को खत्म करने की दिशा में काम किया जाएगा। विश्व हिंदू परिषद के संरक्षक रहे दिवंगत अशोक सिंहल और भाकपा के वरिष्ठ नेता ए़ बी़ बर्धन जैसी विभूतियों सहित प्रतिनिधि सभा ने पिछले साल दिवंगत हुईं देश की अनेक महान विभूतियों को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। साथ ही चेन्नै की बाढ़ आपदा,अन्य प्राकृतिक आपदाओं, आतंकवादी हमलों में मारे गए लोगों और सियाचिन हिमस्खलन में शहीद हुए जवानों के प्रति भी संवेदना व्यक्त की गई।
रिपोर्ट में बौद्धिक विभाग, प्रचार विभाग, संपर्क विभाग और सेवा विभाग का उनके प्रदर्शन के आधार पर विशेष उल्लेख किया गया। देश भर में विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य व्यक्तियों के साथ सरसंघचालक की भेंट-मुलाकातें हुईं। कई बड़े संगठनात्मक और सार्वजनिक कार्यक्रमों—जैसे अखिल भारतीय श्रृंग वाद्य शिविर स्वरांजलि (बंगलुरू में सरसंघचालक की उपस्थिति में ब्रास बैंड संचलन), अखिल भारतीय खेल कार्यशाला (मुंबई में नए खेलों पर संगोष्ठी), तरुणोदय 2015 (हरियाणा में महाविद्यालयीन विभाग की वृद्धि हेतु हुआ कार्यक्रम), ग्राम संगम (बंगलुरू में ग्राम विकास से जुड़े 18 विषयों पर चर्चा), शिवशक्ति संगम (पुणे में पश्चिम महाराष्ट्र प्रांत के 1.57 लाख से अधिक स्वयंसेवकों का विशाल एकत्रीकरण) आदि का आयोजन हुआ।
राष्ट्रीय परिदृश्य
रिपोर्ट में महिलाओं का मंदिर में प्रवेश, आतंकवाद का खतरा, देश में बढ़ता सांप्रदायिक उन्माद और विश्वविद्यालय परिसरों में गहराती राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों का मकड़जाल जैसे विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीरता से मंथन किया गया। इस पर भी विचार हुआ कि कुछ निहित स्वार्थी तत्वों ने अपने आंदोलनों के माध्यम से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को विवाद का विषय बना दिया है जबकि हमारी परंपरा के अनुसार पूजा और पवित्र स्थलों में पुरुषों और महिलाओं को स्वाभाविक रूप से बराबर का भागीदार माना गया है। इस तरह पुरुषों और महिलाओं, दोनों को ही बगैर किसी भेदभाव स्वाभाविक रूप से मंदिरों में प्रवेश का अधिकार प्राप्त है।

हालांकि कुछ अनुचित परंपराओं की वजह से कुछ जगहों पर मंदिरों में प्रवेश को लेकर आम सहमति नहीं है। जहां भी ऐसी समस्या मौजूद है, वहां बातचीत के जरिए नजरिए में बदलाव लाने के प्रयास किए जाने चाहिए।
रिपोर्ट में पिछले कुछ दशकों में सुरक्षा एजेंसियों पर किए जा रहे हमलों पर गंभीर चिंता जाहिर करते हुए कहा गया कि हमारे सुरक्षा बलों ने अपने शौर्य से शत्रुओं के नापाक इरादों को नाकाम करने में हमेशा सफलता हासिल की है। इसका ताजा उदाहरण पठानकोट एयरफोर्स बेस में दिखा। रिपोर्ट में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने का सुझाव दिया गया ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। इसके अलावा घुसपैठ, तस्करी, पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद जैसी गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए कड़ी कार्रवाई करने की बात भी कही गई। इस बात पर जोर दिया गया कि सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास और पक्की सुरक्षा के लिए ढांचागत सुविधाओं तथा संसाधनों की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए।
रिपोर्ट में देश के विभिन्न स्थानों जैसे मालदा में हुईं हिंसक घटनाओं पर गंभीर चिंता जताई गई, जिनके कारण देशभक्त और शांतिप्रिय लोग बेचैन हो उठे और कानून-व्यवस्था तंत्र के लिए चिंताजनक हालात पैदा हुए । रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ विश्वविद्यालय देश-विरोधी गतिविधियों के अड्डे बन गए हैं।
विश्वविद्यालयों से एकता और अखंडता की शिक्षा देकर देशभक्त और ज्ञानवान विद्यार्थी तैयार करने की अपेक्षा की जाती है। रिपोर्ट में सवाल उठाया गया कि ''अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश को तोड़ने और नष्ट करने के नारे कैसे सहन किए जा सकते हैं और कैसे देश की संसद को उड़ाने की साजिश में लिप्त व्यक्ति को शहीद के रूप में सम्मानित किया जा सकता है?'' अगर कोई ऐसा करता है तो उसकी हरकत भी राष्ट्र-विरोधी कहलाएगी। सर-कार्यवाह की रिपोर्ट के बाद संघ के प्रधान कार्यालय सचिव श्री विकास तेलंग ने पिछले साल नागपुर में हुई अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की कार्यवाही का ब्योरा पेश किया। शाखाओं की संख्या में बढ़ोतरी और संघ के कार्यक्रमों में बढ़ती सार्वजनिक भागीदारी को देखते हुए इसे एक संतोषजनक उपलब्धि माना गया। रिपोर्ट में आकलन के आधार पर कहा गया है कि संघ मौजूदा अनुकूल माहौल को सुनियोजित प्रयास और कड़ी मेहनत से ठोस परिणाम में तब्दील कर सकता है।
प्रस्ताव
संघ ने वर्ष 1950 से ही राष्ट्रीय जीवन से जुड़े प्रासंगिक मुद्दों पर कई प्रस्ताव पारित किए हैं। इन प्रस्तावों को अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा या अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल अनुमोदित करता है। विभिन्न ज्वलंत राष्ट्रीय मुद्दों से संबंधित प्रस्ताव तैयार करने के लिए हर साल एक प्रस्ताव मसौदा समिति बनाई जाती है। मसौदा तैयार करके उसे चर्चा के लिए प्रतिनिधि सभा के सामने रखा जाता है। हरेक प्रस्ताव चर्चा, विचार-विमर्श और बहस के बाद पारित किया जाता है। प्रतिनिधियों के सुझाए संशोधनों को शामिल करके प्रस्ताव को फिर से विचार के लिए पेश किया जाता है। इस साल अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने तीन महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए जो स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सद्भाव से जुड़े थे। इसमें आम जनता के लिए सस्ती, सुलभ और स्तरीय शिक्षा और शिक्षा क्षेत्र में विकास; प्रभावी, सस्ती और सर्वसुलभ स्वास्थ्य और चिकित्सा सेवा तथा उनमें सुधार और रोजमर्रा जिंदगी में समरसता के पालन का आह्वान किया गया है।
प्रतिनिधि सभा के दूसरे दिन यानी 12 मार्च को स्वास्थ्य और शिक्षा से जुडे दो प्रस्तावों के संदर्भ में संघ के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख श्री अनिरुद्ध देशपांडे ने संवाददाता सम्मेलन में बताया कि अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार लाते हुए आम नागरिकों को सस्ती, सर्वसुलभ और स्तरीय शिक्षा मुहैया कराने के अलावा उसे प्रभावी, सस्ती और सुलभ स्वास्थ्यसेवा और चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराने पर विशेष जोर दिया गया। श्री देशपांडे ने यह भी कहा कि सभा ने प्रस्तावित किया है कि आम जनता को गुणवत्तापूर्ण और सस्ती शिक्षा सुलभ हो, इसके लिए सरकार और समाज दोनों का दायित्व है कि सभी वगोंर् को समान रूप से शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार दिलाने की व्यवस्था की जाए।
प्रतिनिधि सभा के अंतिम दिन 13 मार्च को सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी ने पत्रकारों को को प्रतिनिधि सभा के तीन दिन चले सत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सद्भाव पर पारित तीन प्रस्तावों की विस्तृत जानकारी दी और उस संबंध में संवाददाताओं के सवालों के जवाब भी खुलकर दिए। श्री जोशी ने संगठन के कार्यक्रमों और आगामी वर्ष की योजनाओं के बारे में लिए गए निर्णयों की जानकारी भी पत्रकारों को दी। गणवेश में बदलाव संबंधी ऐतिहासिक निर्णय के बारे में उन्होंने बताया कि स्वयंसेवक अब गहरे भूरे रंग की पैंट पहनेंगे ।

प्रस्तावों का विश्लेषण करते हुए सरकार्यवाह ने बताया कि तीनों प्रस्ताव सामाजिक जीवन में गहरे गुंथे हुए हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र से जुड़े विविध मुद्दों का हल जरूरी है। बेहतर बुनियादी ढांचे के बावजूद प्राथमिक स्तर पर सभी बच्चों को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा दिए जाने का इंतजाम करना चाहिए क्योंकि चरित्र निर्माण की नींव बचपन में ही रखी जाती है। हिंदू समाज में व्याप्त भेदभाव को लेकर संघ बेहद चिंतित है, क्योंकि यह सामाजिक समन्वय के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने सामाजिक समरसता पर आघात करने वाले जाति आधारित भेदभाव के उन्मूलन पर जोर दिया है।
संगठन की स्थिति के बारे में भैयाजी जोशी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 90 वर्ष के लंबे इतिहास में आज करीब 58,000 गांवों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर संघ संगठनात्मक सामर्थ्य की नई ऊंचाइयों पर पहुंच गया है। संघ कठोर संगठन नहीं है और न ही सामाजिक परिवर्तनों की ओर से आंखें मूंदे रहने वाला संगठन है। संघ सामाजिक बदलाव के साथ कदम मिलाकर चलने के लिए तैयार है। परिवर्तन को स्वीकार करने से परहेज करने वाला कोई भी संगठन अपना अस्तित्व बनाए नहीं रख सकता। बदलाव के लिए सहर्ष तैयार संघ ने गणवेश में नेकर की जगह फुलपैंट को स्वीकार किया है, जो हमारे जीवन में आम है। उन्होंने बताया कि गहरे भूरे रंग की फुलपैंट की पसंद के पीछे कोई विशेष कारण नहीं है। वर्दी का नया डिजाइन और रूप भी कोई गंभीर चिंता का विषय नहीं है। उन्होंने बताया की कि नई पोशाक 4-6 महीने के भीतर लागू हो जाएगी।
जहां तक महिलाओं के मंदिर प्रवेश का संबंध है, संघ ने अपना दृष्टिकोण जाहिर कर दिया है कि इसके लिए संवाद और बहस के माध्यम से आम सहमति पर पहुंचना चाहिए। तीन या चार मंदिरों को छोड़कर देश में लगभग सभी मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पर कोई पाबंदी नहीं है। आंदोलन और प्रदर्शनों से वास्तविक समस्या का समाधान नहीं होगा। उनका कहना था कि राजनीतिकरण इस मुद्दे का हल नहीं है।
श्री भैयाजी जोशी ने आरक्षण पर संघ के घोषित नजरिए को दोहराया कि आरक्षण व्यवस्था को संविधान में स्थापित डॉ़ बाबासाहब आंबेडकर के दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए जारी रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि कुछ धनी लोग भी आरक्षण का फायदा उठा रहे हैं जिसकी सरकार द्वारा समीक्षा होनी चाहिए, क्योंकि समाज के पिछड़े वर्ग का ध्यान रखने की जिम्मेदारी धनी वर्ग की है। सरकार्यवाह ने संघ का यंह घोषित अभिमत दोहराया कि आर्थिक तौर पर पिछड़े वर्ग के बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के हक से वंचित नहीं किया जा सकता।
तीन दिवसीय सम्मेलन के दूसरे दिन दिवंगत बालासाहब देवरस को याद करते हुए सरसंघचालक ने एक विशेष बौद्धिक दिया। यह बौद्धिक अनुकरणीय नेतृत्व गुणों पर विस्तार से प्रकाश डालने वाला था। सरसंघचालक ने अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा और शिक्षा, सेवा, बौद्धिक और आर्थिक क्षेत्रों जैसे विभिन्न कार्यक्षेत्रों में काम कर रहे संगठनों के प्रतिनिधियों से कहा कि समाज को सही दिशा का मार्गदर्शन देने के लिए ईमानदार, कर्मठ और निस्वार्थी नेतृत्व आवश्यक है। नेता को विनम्र और दयालु होना चाहिए। वह सभी क्षेत्रों के लोगों से जुड़ा रहे और उसमें सही समय पर निर्भीक निर्णय लेने की क्षमता भी हो। एक अच्छे नेता में लोगों का सही आकलन करने का मौलिक गुण भी होना चाहिए।
विभिन्न सम-विचारी संगठनों के पदाधिकारियों ने प्रतिनिधि सभा में अपने-अपने संगठन की वार्षिक रिपोर्ट पेश की। सरसंघचालक श्री भागवत ने अंतिम सत्र का समारोप करते हुए अपने उद्बोधन में सभी प्रतिनिधियों से आग्रह किया कि प्रतिनिधि सभा से नई ऊर्जा प्राप्त कर हर किसी को मजबूत संकल्प के साथ समाज में परिवर्तन लाने के उद्देश्य के प्रति खुद को समर्पित करना चाहिए।
तीन दिवसीय सभा में गंभीर चर्चा सत्रों के साथ विभिन्न गतिविधियां हुईं। इनमें तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस को समर्पित चित्र प्रदर्शनी आकर्षण का केंद्र बनी रही। देश भर से आए प्रतिनिधियों को राजस्थान के सुस्वादु व्यंजनों को चखने का अवसर मिला। स्थानीय लोगों ने परंपरागत राजस्थानी परिधानों में देश भर से आए मेहमानों की आवभगत की। इसके धन्यवाद स्वरूप स्वयंसेवकों ने उनकी बारी आने पर उन्हें पंगत में बैठाकर स्नेह से भोजन परोसा।












