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आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय
2 अगस्त,1861-16 जून, 1944
भारत में रसायन उद्योग के प्रणेता, अद्भुत प्रतिभा के धनी वैज्ञानिक, देशभक्त, उत्तम शिक्षक और परोपकारी आचार्य प्रफुल्लचंद्र राय ने शैक्षणिक सुधार, गरीबी उन्मूलन और सामाजिक सुधारों की भी चिंता की
'ए हिस्ट्री ऑफ हिंदू केमिस्ट्री' के रचयिता, कर्मयोगी वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचंद्र राय को प्राचीन भारतीय रसशास्त्र के संवर्धन तथा आधुनिक रसायनशास्त्र से उसके संबंध स्थापित करने के लिए जाना जाता है। भारत में रसायन उद्योग उन्हीं की देन है।
महत्वपूर्ण योगदान
भारत की प्राचीन मेधा और आयुर्वेद के संतों के शोध को प्रस्थापित किया। विश्व में सबसे पहले मरक्यूरियस नाइट्राइट की खोज। बाद में इससे 80 नए यौगिक बने। आयुर्वेद में प्रयुक्त विभिन्न धातुओं, खनिज और रत्नों के भस्मों के निर्माण की विधि खोजी। 1892 में बंगाल केमिकल और फार्मास्युटिकल वर्क्स की स्थापना
आचार्य राय न केवल देश में रसायन शास्त्र की शिक्षा, अनुसंधान और रासायनिक उद्योगों के पुरोधा थे, बल्कि इससे भी अधिक कुछ थे… उन्होंने अपना सारा जीवन भारत के सामाजिक, बौद्धिक और आर्थिक पुनरुत्थान के लिए समर्पित कर दिया।
—डॉ. राजेंद्र प्रसाद
उपयोग
एमोनियम, जिंक, कैडमियम, कैल्सियम, स्टांशियम, वैरियम, मैग्नीशियम के नाइट्राइटों के संबंध में उनका महत्वपूर्ण शोध तथा एमाइन नाइट्राइटों को विशुद्ध रूप में तैयार कर निकाला गया, उनके भौतिक और रासायनिक गुणों का पूरा विवरण आज रसायनों के प्रयोग वाले कई उत्पादों तथा प्रक्रियाओं में काम आता है।
ऑर्गेनोमेटालिक यौगिकों का केमिकल इंडस्ट्री में तथा पारद, गंधक और आयोडीन से तैयार किए गए उनके नवीन यौगिक का भी रासायनिक प्रयोगों में इस्तेमाल होता है।
प्राचीन भारतीय आयुर्वेद तथा रसायन शास्त्र से खोजी गई कई विधियों, सिद्धांतों और प्रयोगों को आधुनिक केमिस्ट्री ने आगे बढ़ाया है।
महान रसायनशास्त्री और वैज्ञानिक तथा उद्यमी प्रफुल्लचंद्र राय अपने केमिस्ट्री शिक्षक के क्लास में दिखाए गए प्रयोगों से इतने चमत्कृत हुए कि इसने उन्हें विज्ञान की पढ़ाई को प्रेरित कर दिया। बी.ए. करने के दौरान उन्होंने गिलक्रिस्ट स्कॉलरशिप के लिए परीक्षा दी और सफल हुए। इस तरह 1882 में बी.ए. की डिग्री पूरी करने से पहले ही उन्हें एडिनबर्ग विश्व विद्यालय में बी.एससी. में प्रवेश मिल गया। जब वे इंग्लैंड पहुंचे तो वहां उनका स्वागत और किसी ने नहीं, आचार्य जगदीश चंद्र बसु ने किया।
आचार्य राय के वैज्ञानिक अनुसंधान की अवधि को चार खंडों में बांटा जा सकता है। पहला, एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में अनुसंधान (1882-1888), दूसरा, प्रेसीडेंसी कॉलेज में शिक्षण और अनुसंधान (1889-1916), तीसरा, यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ साइंस (साइंस कॉलेज) में अनुसंधान (1916-1925), और चौथा अंतिम चरण (1925-1936)। 1936 में 75 वर्ष के होने के बाद उन्होंने साइंस कॉलेज से पदत्याग कर दिया और सामाजिक और अन्य गतिविधियों के लिए समर्पित हो गए। अपने शोध जीवन में राय ने 363 लेख प्रकाशित किए, इनमें से 100 से अधिक शोधपत्र थे। उनकी बहुमुखी वैज्ञानिक धारा मुख्यत: चार दिशाओं में प्रवाहित होती है—मौलिक अनुसंधान, प्राचीन भारत के वैज्ञानिक विकास का इतिहास, उद्योग के साथ विज्ञान का भारतीयकरण और अंत में रसायन उद्योग का विकास। आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय को विशेष रूप से रसायन विज्ञान की भारतीय धारा के जनक के रूप में स्थापित होने के उनके संघर्ष के लिए याद किया जाता है। एक साधारण मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि से उठकर उन्होंने यह शिखर हासिल किया। बचपन में वे उस समय की कई प्रसिद्ध हस्तियों के संपर्क में आए। एडिनबर्ग विश्वविद्यालय के प्रो़ एलेक्जेंडर क्रम ब्राउन के अंतर्गत रसायन शास्त्र में मौलिक अनुसंधान से रसायनशास्त्रियों की बिरादरी में उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली, और बाद में वर्ष 1887 में अकार्बनिक रसायन विज्ञान में डी़ एससी. की डिग्री भी। एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में अपने अध्ययन के दौरान उन्होंने पाया कि रसायनशास्त्र के विकास के इतिहास, खासकर भारतीय रसायनशास्त्र और आयुर्वेद रस-विद्या को लेकर जानकारी का कुछ अभाव है।
मर्कुरियस नाइट्राइट की उनकी खोज एक निर्णायक मोड़ था। इस अनुसंधान ने उन्हें यूरोप में प्रसिद्ध कर दिया। यूरोप के वैज्ञानिक लगातार 11 वर्ष से इस शुद्ध यौगिक को तैयार करने में लगे होने के बावजूद विफल रहे थे। प्राकृतिक उत्पादों पर उनके शोध ने बाद की अवधि में गति पकड़ी। इस खोज से राय यह दिखाने में सफल रहे कि अगर सुविधाएं मिलें तो भारतीयों के लिए अच्छे प्रयोगात्मक कार्य कर दिखाना संभव है।
वे तीन अलग-अलग धाराओं को साथ लाने में सफल रहे, औद्योगिक रसायन विज्ञान के प्रति समर्पण, शुद्ध रसायन शास्त्र में शोध और आयुर्वेदिक ग्रंथों का गहरा अध्ययन। इन सभी पर पूर्णकालिक ध्यान की आवश्यकता होती है।
धोती और कुर्ते के साथ भारत लौटने के बाद उन्होंने तेल और घी का मानकीकरण शुरू किया, ताकि उनकी शुद्धता का विश्लेषण किया जा सके। आयुर्वेद का अध्ययन करते हुए उन्होंने पाया कि 'चरक संहिता' में 'चिकित्सा स्थान' के पहले अध्याय को 'रसायन' कहा गया है, जो रोगों की रोकथाम के चिकित्सकीय प्रबंधन और कुछ हद तक उम्र बढ़ने की प्रक्रिया पर केंद्रित है। भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद में, 'रसायन' शब्द में 'रस' को पोषक तत्वों के लिए प्रयोग किया जाता है और 'आयन' को परिवहन के अर्थ में। मनुष्य शरीर में रसों को पुष्ट करने के लिए भारतीय औषधि मिश्रण भी रसायन के रूप में लगातार प्रयोग होते थे। विज्ञान के क्षेत्र में अपने देश को आगे रखने के लिए उनकी राय थी कि कोई राष्ट्र तब तक विज्ञान के क्षेत्र में गर्वपूर्ण स्थान पर नहीं पहुंच सकता, जब तक कि उसने कोई ठोस योगदान न किया हो। संस्कृत, लैटिन, फ्रेंच और जर्मन भाषाओं पर उनका समान अधिकार था। जब वे 'हिंदू रसायन विज्ञान का इतिहास' के संकलन में जुटे हुए थे, तब विद्यार्थियों को पढ़ाते हुए अपने व्याख्यानों में वे अक्सर रसायनों के हिंदुओं के ज्ञान का उल्लेख करते और इसके समर्थन में नागार्जुन को उद्धृत करते थे। उनका मानना था कि प्राचीन भारत में रसायनशास्त्र के विकास के सूत्र हड़प्पा और मोएंजो-दरो सभ्यता के काल से है, लेकिन इस योगदान का विश्व साहित्य में उल्लेख नहीं मिलता। कोई यह अनुमान लगा सकता है कि पारे के अनुसंधान पर उनकी पहल का उद्गम आयुर्वेदिक रसायनशास्त्र से हुआ होगा, जिसमें मकरध्वज तैयार किया जाता है।
प्राचीन पश्चिमी परंपराओं के साथ-साथ उन्होंने चरक, सुश्रुत और आयुर्वेदिक युग के प्रमुख कार्यों का रासायनिक सिद्धांतों की कसौटी पर परीक्षण किया। यह वह चरण था जिसमें वे कोई पांच वर्ष पहले एम.पी.ई. बर्थलट के संपर्क में आए थे। रसायन विज्ञान के इतिहास के एक छात्र के रूप में यह उनके करिअर में महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। (ए हिस्ट्री ऑफ हिंदू केमिस्ट्री, 1902 के खंड-1 की प्रस्तावना)।
आचार्य राय 'ए हिस्ट्री ऑफ हिंदू केमिस्ट्री' के प्रकाशन को अपने जीवन की अहम उपलब्धि और रसायनशास्त्री के रूप में मातृभूमि के ऋण की अदायगी और उसके गौरवशाली अतीत तथा आयुर्वेदिक संतों की उपलब्धियों को सुदृढ़ करने का प्रयास मानते हैं। यह पुस्तक उन्होंने छह अध्यायों में बांटी है: भारतीय दर्शन के परमाणु सिद्धांत के पदार्थ की संरचना और उसके गुण, ताकि उसे आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ा जा सके। दूसरा, आयुर्वेद युग के रसायन विज्ञान पर, चरक, सुश्रुत, संक्रमणकालीन अवधि, तांत्रिक युग, लेट्रो-केमिकल (रस-शास्त्र) युग, धातु और धातु विज्ञान पर है। दूसरे खंड में भी छह अध्याय हैं, नागार्जुन और बौद्ध अवधि का रसायन शास्त्र, आधुनिक काल, स्वदेशी भारतीय रसायन शास्त्र, तांत्रिक अवधि का शेष भाग और भारतीय रसायन शास्त्रियों का योगदान।
उन्होंने कच्चे माल के प्रसंस्करण तथा आयुर्वेद में प्रयोग किए जाने वाले विभिन्न धातुओं, खनिज और रत्नों के भस्मों के निर्माण का विस्तार से वर्णन किया है। रसशास्त्र से तैयार मकरध्वज सरीखी औषधि ने उनका ध्यान आकर्षित किया। पारे और गंधक का निश्चित अनुपात के साथ सम्मिलन कैसे निर्धारित किया गया था, यह उनके लिए वैज्ञानिक कौतूहल का विषय था। निश्चित अनुपात के नियम प्राचीन काल में ज्ञात नहीं थे, पारे का सल्फाइड में संपूर्ण रूपांतरण—मकरध्वज—करने के लिए कठिन प्रक्रियाओं का सहारा लिया गया था। पारा आज भी आयुर्वेदिक चिकित्सकों द्वारा व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है। उन्होंने 'रसेंद्र चूड़ामणि' का संदर्भ दिया कि जब पारे को दोगुने भार के गंधक से शमित किया जाता है, तो वह दोगुना प्रभावशाली हो जाता है। उनका मानना था कि एक स्थिति ऐसी आएगी जब बार-बार जलानेे के बाद भी भार में कोई परिवर्तन नहीं होगा। हालांकि, पश्चिमी देशों में भार में कमी को अशुद्धियों के आधार पर समझाया जाता था।
हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि मकरध्वज में स्वर्ण नहीं होता, (परमाणु उत्सर्जन अध्ययन, एएसएस), इसी तरह का निष्कर्ष आचार्य राय ने निकाला था। मकरध्वज के साथ एचपीएलसी और एचपीटीएलसी अध्ययनों के बाद एक अद्वितीय नया अणु खोजा गया, जिसमें प्रोटीन, प्राकृतिक उत्पाद और मौलिक यौगिक थे।
'द हिस्ट्री ऑफ हिंदू केमिस्ट्री' का दूसरा खंड एम़ बर्थलॅट को समर्पित है। अपने वक्तव्य में आचार्य ने कहा कि वे (बर्थलॅट) इस दुनिया में नहीं रहे कि 'मुझे सम्मानित कर पाते', उनका देहांत 1907 में हो गया था। प्राचीन भारत में धातुओं को पहचानने के लिए लौ परीक्षण प्रचलित था जो आज भी प्रयोग होता है। रसायन विज्ञान की प्रयोगशालाओं में इस विधि की शिक्षा आज तक दी जाती है।
प्राचीन भारतीय ज्ञान को सर्वोच्च
स्थान दिलाने के लिए संकल्पित आचार्य
राय रसायन विज्ञान के अद्वितीय शिखर पुरुष थे। रसायन विज्ञान के लिए समर्पित युवाओं को उन्होंने दिशा दी और कक्षा के बाहर परीक्षण, जांच और अनुसंधान के लिए पूर्णत: समर्पित रहे।
प्रतीप के़ देबनाथ (लेखक नेशनल रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेदिक ड्रग डेवलपमेंट, कोलकाता के सलाहकार हैं। कोलकाता विवि में केमिस्ट्री के पूर्व प्रोफेसर दुलाल सी. मुखर्जी के साथ)











