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पुस्तक समीक्षा
भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म की असाधारण विशेषताओं को रेखांकित करती और भ्रामक अवधारणाओं का निराकरण करती और साथ ही पश्चिमी सार्वभौमिकता को चुनौती देती विचारोत्तेजक पुस्तक 'विभिन्नता' राजीव मल्होत्रा की एक उल्लेखनीय कृति के रूप में सामने आई है। 'विभिन्नता' उनकी मूल कृति इी्रल्लॅ ऊ्रााी१ील्ल३ का हिन्दी अनुवाद है। अनूदित होने के बावजूद यह सहज रूप से पठनीय और अत्यंत प्रभावी कृति है। इसका कारण सहज और कसा हुआ अनुवाद भी है। विषयगत गांभीर्य के साथ-साथ इसमें निहित जानकारी औैर रोचकता इस पुस्तक के वैशिष्ट्य को दोगुना करने में सहायक सिद्ध हुई हैं।
'विभिन्नता' के लेखक राजीव मल्होत्रा एक भारतीय अमरीकी शोधकर्ता, चिंतक और विचारक हैं। इससे पूर्व भी 'ब्रेकिंग इंडिया' और 'इनवेडिंग द सेक्रेड' नाम से उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें सामने आ चुकी हैं और प्रसिद्धि हासिल कर चुकी हैं।
यह पुस्तक नि:सन्देह हमें भारतीय संस्कृति को एक अलग नजरिए से देखने की समझ और विवेक प्रदान करती है। थोपी हुई गलत धारणाओं और भ्रामक सोच को हटाकर एक उदार और तर्कसंगत विचार से चीजों को देखने-समझने की दृष्टि देती है। यह पुस्तक भारतीय संस्कृति में दिखाई देने वाली विभिन्नताओं के साथ सीधे और सच्चे विचार-विमर्श की मांग भी करती है। भारत के कुछ विद्वान जो पाश्चात्य-विचारधारा का गुणगान करते नहीं अघाते, उनके लिए यह पुस्तक भारतीय विचारक, भारतीय संस्कृति और भारतीय दर्शन के परिप्रेक्ष्य में पश्चिमी-विचारधारा को आंकने की चुनौती देते हुए उनसे पुनर्विचार का अनुरोध भी करती प्रतीत होती है। जिस प्रकार महर्षि अरविन्द, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद या फिर राधाकृष्णन इत्यादि विचारकों ने पश्चिमी संस्कृति और भारतीय संस्कृति का तुलनात्मक विवेचन-विश्लेषण करने का महती कार्य किया था, ठीक उसी प्रकार मल्होत्रा की पुस्तक 'विभिन्नता' में भी यह तुलनात्मक विवेचना और विवेकपूर्ण दृष्टिकोण से पश्चिमी अवधारणाओं की गहरी खोजबीन और जरूरी पड़ताल की गई है। इस मायने में नयी पीढ़ी के लिए यह पुस्तक और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
पुस्तक के कई खण्डों में वर्णित अनेकानेक अवधारणाओं, प्रसंगों और तर्कों के माध्यम से लेखक ने खुलकर इस विमर्श को किसी 'विवेकपूर्ण सहमति' तक लाने की सफल चेष्टाएं भी की हैं। पुस्तक के कई अध्याय तो बहुत ही रोचक और नए ढंग से विमर्श को हमारे सामने लाते हैं। जैसे-'हड़पना और आत्मसात करना'; 'इतिहास वास्तव में इतिहास और मिथक के साथ और भी बहुत कुछ हैं; 'सन्निहित ज्ञान की साधना पद्धति'; 'पश्चिम की कृत्रिम एकता'; 'ईसाई हठधर्मिता एवं यूनानी दलीलें-एक विसंगति'; 'अराजकता के साथ भारतीयों का धैर्य'; 'पश्चिमी जोकर एवं भारतीय विदूषक'; 'भारतीय संस्कृति एवं अखिल एशियाई सभ्यताएं; 'हेगेल का पश्चिमी मिथक'; 'आध्यात्मिक समानता का भोलापन' और 'गांधी जी का स्वधर्म और पूर्वपक्ष' पुस्तक के ऐसे अध्याय हैं जो इस पुस्तक को असाधारण बनाते हैं और विमर्श को सार्वभौमिकता प्रदान करते हैं।
पुस्तक के प्राक्कथन में पुस्तक के रचनाकार मल्होत्रा ने सार रूप में एक महत्वपूर्ण बातें कही हैं जिसका उल्लेख यहां आवश्यक है। इस बात से इस पुस्तक की प्रासंगिकता सार्थकता और विषयगत विमर्श की दृष्टि स्वयं स्पष्ट हो जाती है, ''मैं केवल भारतीय धार्मिक परिदृश्य का उपयोग करते हुए उस विश्लेषणात्मक अवलोकन को उलटना चाहता हंू। जो प्राय: पश्चिम से पूर्व की ओर केन्द्रित होता है और अनजाने में पश्चिम को विशेषाधिकार प्रदान करता है। इसे उलटने से पश्चिमी समस्याओं का मूल्यांकन संभव हुआ है, जिसके द्वारा उसके कुछ अनदेखे पहलू उजागर हुए हैं।'' भारत की धार्मिक संस्कृति के महत्व को रेखांकित करते हुए वे लिखते हैं, ''यह देखने में आया है कि भारतीय धार्मिक संस्कृति आज विश्व में दिख रहीं कई समस्याओं को कैसे कम करने और सुलझाने में योगदान दे सकती है।'' इस वक्तव्य के परिप्रेक्ष्य में आज की वैश्विक राजनीति को देखें तो पाते हैं कि सारा विश्व आज भारत और भारतीय सोच का आदर कर रहा है और मौजूदा वैश्विक समस्याओं के निराकरण के लिए भारत की ओर देख रहा है; भारत को साथ लेने की सोच रहा है; भारत को एक जरूरी-नेतृत्व देने की बातें कर रहा है। भारत के प्रति इस प्रकार की 'सकारात्मक-सोच' बनाने में ऐसी पुस्तकों के महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
साररूप में कहा जाए तो मल्होत्रा अपनी पुस्तक 'विभिन्नता' के माध्यम से पुरातन और शाश्वत भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण अवधारणाओं-जैसे 'अनेकता में एकता','धार्मिकता'-'दार्शनिकता', 'आत्मसात करने की प्रवृत्ति'; 'वैचारिक-उदारता';'वसुधैव कुटम्बकम्', 'मैं नहीं हम' इत्यादि विशेषताओं को तर्कसंगत ढंग से पाश्चात्य-विचारों से अपेक्षाकृत श्रेष्ठ और उदार ठहराने में और खासकर नई पीढ़ी के मानस में वैज्ञानिक ढंग से भारतीय-दृष्टि को प्रतिस्थापित करने में अधिकांशत: सफल हुए हैं। इस महत्वपूर्ण और सार्थक कृति का स्वागत किया जाना चाहिए। नरेश शांडिल्य
विभिन्नता ('इी्रल्लॅ ऊ्रााी१ील्ल३'
का हिन्दी आनुवाद)
लेखक: राजीव मल्होत्रा
(अमेरिका में रह रहे प्रवासी लेखक)
अनुवादक
देवेन्द्र सिंह (हिन्दी यू.एस.ए.)
सुरेश चिपलुणकर
पृष्ठ : 475, मूल्य : 299 रुपए वर$15
प्रकाशक : हार्पर कॉलिंस पब्लिशर्स इंडिया, ए-53, सेक्टर-57
नोएडा-20301 (उ. प्र.)











