| दिंनाक: 18 Jan 2016 13:03:39 |
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कवि-कथाकार-विचारक-संपादक तथा संगीतप्रेमी के रूप में डॉ. सीतेश आलोक की रचनाशीलता में भारतीय मूल्यबोध, मानवीय सरोकार तथा अपनी तरह का एक हठी-आग्रह एक 'अंडर-करंट' की तरह व्याप्त है। उनका लेखन फरमाइशी या फैशनपरस्त नहीं है। वे हमेशा लीक से हटकर लिखते आए हैं। वे ऐसे विषयों को भी छूने का साहस जुटाते हैं जिन्हें छूने से अधिकांश लेखक कतराते हैं। इस मायने में वे एक विशिष्ट और विरले लेखक हैं। हाल ही में उनका एक कहानी-संग्रह 'मुहिम' प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह में लेखक की 10 कहानियां हैं जिनमें 'मुहिम' नामक लम्बी कहानी लगभग 50 पृष्ठों की है।
रेंगती हुई शाम', 'अंधा सवेरा' और 'तुम कहो तो' से ये आगे की यात्रा है। इस संग्रह की अधिकांश कहानियां अनेकानेक साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं एवं आकाशवाणी से भी प्रसारित हो चुकी हैं। इन कहानियों की मौलिकता इनकी सबसे बड़ी ताकत है। कहानियों के चरित्र और कथानक अपना अलग ही वैशिष्ट्य रखते हैं और ये किसी बने-बनाए सांचे में ढलकर या किसी वाद-विशेष से प्रभावित होकर सामने नहीं आते। इसलिए भीतर तक उद्वेलित करते हैं। इस संग्रह की एक कहानी हैं-'नंगा नाच'। इस कहानी में एक अध्यापक अपनी बेटी के साथ रहते हैं। उसके स्कूल का एक चौकीदार एक दु:खद घटना में पत्नी सहित मर जाता है। अध्यापक उनके एकमात्र बच्चे को अपने साथ रख लेता है। उसे अच्छी दीक्षा दी जाती है। महापुरुषों की कहानियां सुना-सुनाकर संस्कारित किया जाता है। लेकिन एक दिन वही लड़का बड़ा होकर अध्यापक को बेहोशी की दवा देकर उसके घर से पेंशन के 40,000 रुपए लेकर फरार हो जाता है। अंत में वह अध्यापक बेटी से कहता है- 'अरे ले लिया तो कौन बड़ा अपराध कर दिया बेचारे ने?'… कोई नचनियां फिल्म में पांच मिनट नाच के लाखों कमाती है और कहीं कोई चौका-छक्का मार के करोड़ों बनाता है… और मास्टर बेचारा तो टके में टरका दिया जाता है। चारों ओर नंगा नाच हो रहा है।'
कहानी के संकेतों को देखें तो, अध्यापक पूरे समाज के दूषित-माहौल पर चोट करता है और इस लड़के को 'बेचारा' कहता है। लेखक यहां यह संदेश देता है कि समाज का वातावरण बाजारवाद के चलते या दौलत की लत में इतना अधिक दूषित हो चुका है कि हमारे मूल्यों और संस्कारों की बातें नयी पीढ़ी को मजाक लगती हैं। नि:संदेह ये परिस्थितियां हमें पतन की ओर ले जा रही हैं। ऐसे में छोटी-मोटी चोरी करने वाले को लेखक अध्यापक के माध्यम से 'बेचारा' ही कहलवाता है।
'दो घंटे' नामक कहानी में एक पात्र किसी शहर में जाता है और वहां दो घंटे के लिए एक होटल में कमरा लेता है। इन्हीं दो घंटों में वह तरह-तरह के अनुभवों से गुजरता है। बड़ी ही दिलचस्प कहानी है ये। कहानी के अंत में, जब वह व्यक्ति कमरा खाली करने के लिए 'रिसेप्शन' पर खड़ा होता है, एक जवान लड़के और लड़की को वहां दो घंटे के लिए एक कमरा देने का आग्रह करते हुए देख्नता है। उन्हें देखकर वह समझ जाता है कि वे लड़का-लड़की किसलिए केवल 2 घंटे के लिए कमरा ले रहे हैं। उसे तभी उस होटल के सफाई कमर्चारी की बात याद आती है। 'दो घंटे में तो बौत कुछ हो जाता है, सेठ।' यहां लेखक अनेक प्रसंगों और घटनाओं के माध्यम से एक साथ एक ही कहानी में समाज की अनेक विकृतियों की तरफ इशारा करने में सफल हुआ है। और समझदार पाठकों को इशारा ही काफी होता है।
'हजारों साल का हिसाब' कहानी में लड़के और लड़की के लालन-पालन में हमारे समाज द्वारा बरती जाने वाली दोगली मानसिकता को उजागर किया गया है। यह भेदभाव, जो कि हजारों साल से हमारे समाज में प्रथा का रूप ले चुका है, इस कहानी में उभर कर सामने आया है। 'नए घर में' कहानी तीन बहनों की कहानी है। एक ज्यादा पढ़ी-लिखी बहन कालेज प्रवक्ता बनना चाहती है जो कि अंत तक बेरोजगार रहती है और कम पढ़ी-लिखी को छोटी-मोटी नौकरियां मिल जाती हैं। घर की स्थिति सुधरने लगती है। ज्यादा पढ़ी-लिखी बहन नए खरीदे गए घर में अपने को और अपनी डिग्री को लेकर असमजंस में रहती है और अपने तो अलग-थलग महसूस करती है। ये कहानी हमारी शिक्षा प्रणाली और रोजगार प्रणाली पर एक कटाक्ष की तरह है। एक कहानी है 'चांदनी के लिए'। इसमें एक लेखक रात को बिजली चले जाने के बाद बाहर चांदनी का आनन्द लेने निकलता है। वह चांदनी में सराबोर होकर इतना भावुक और भावविभोर हो जाता है कि सरकार को एक पत्र लिखकर आग्रह करता है कि चांदनी रात में सरकार रात को दो घण्टे के लिए रोजाना बत्ती गुल कर दे और लोगों से चांदनी का आनन्द उठाने के लिए कहे। यह कहानी प्रकृति के प्रति अनुपम प्रेम दर्शाती है।
कुल मिलाकर ये कहानियां अपने समाज में विस्मृत मूल्यबोध को पुन: रोपित करती हुई कहानियां हैं। ये हमें झकझोरती भी हैं और जगाती भी हैं। ये हमारे अवचेतन में गहरे पैठ जाने वाली कहानियां हैं, ये मात्र मनोरंजन के लिए नहीं हैं। – नरेश शांडिल्य