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1923 – 2016
समृति : लेफ्टिनेन्ट जनरल (से.नि.) जे.एफ.आर. जैकब
लेफ्टिनेन्ट जनरल जैक फर्ज राफेल जैकब (पी.वी.एस.एम.) ने 13 जनवरी की सुबह 8:30 बजे नई दिल्ली के सेना अस्पताल मेंे अन्तिम सांस ली। उन्हें 1 जनवरी को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। निमोनिया के कारण वे अनेक रोगों से पीडि़त थे। सैनिक के उच्च आदर्शों के जीवन्त रूप जैकब को 1971 के बंगलादेश मुक्ति संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए लम्बे समय तक याद किया जाएगा।
फौलादी इरादों और जोश से भरे जनरल जैकब का जन्म 1923 में कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ था। उनके पिता एक समृद्ध कारोबारी थे। परिवार यहूदी था। इनके पूर्वजों का एक समूह बगदाद (इराक) में रहता था, जो 18वीं शताब्दी के मध्य में विस्थापित होकर भारत आया था और कलकत्ता में बस गया। उनके माता-पिता को यह भान नहीं था कि जो बच्चा उनकी गोद में है, वह एक दिन युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा और वह युद्ध एक नए देश के निर्माण की वजह बनेगा।
जैकब ने दार्जिलिंग के नजदीक कुर्सियांग के विक्टोरिया स्कूल (आवासीय) से पढ़ाई की। 19 वर्ष की उम्र में वे अपने पिता की सलाह को दरकिनार करते हुए ब्रिटिश इंडियन आर्मी में भर्ती हो गए। ऑफिसर्स टे्रनिंग स्कूल, महू से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद 1942 में वे सशस्त्र सेना में अधिकारी बने। उन्होंने उत्तरी इराक में अपनी सेवाएं दीं। वहां उनका प्रशिक्षण पाशा की अरबी टुकड़ी के साथ हुआ। इसके बाद कुछ समय के लिए उन्होंने मोंटगुमरी की एड्थ आर्मी के साथ दक्षिण अफ्रीका में अफ्रीका कोर्प्स के खिलाफ संघर्ष में भाग लिया। बाद में उनकी यूनिट बर्मा गई और वहां युद्ध की समाप्ति तक रही।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जैकब ने इंग्लैण्ड के आर्टिलरी स्कूल से स्नातक किया। इसके बाद अमरीका से एडवांस्ड आर्टिलरी और मिसाइल के क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल की। 1967 में पदोन्नति देकर उन्हें मेजर जनरल बनाया गया। फिर उन्होंने पूर्वी कमान के चीफ ऑफ स्टाफ के रूप में अपनी सेवाएं दीं। यह दौर उनके जीवन में बेहद उथल-पुथल वाला रहा। उन्होंने 1971 के युद्ध से जुड़े अभियानों के विभिन्न पहलुओं में हिस्सा लिया। इसके बाद ही भारतीय सेना और बंगलादेश की मुक्ति बाहिनी को संयुक्त रूप से अभूतपूर्व जीत मिली थी। जनरल जैकब ही थे, जिन्होंने अपनी कुशल रणनीति से पाकिस्तानी जनरल ए.ए.के. नियाजी को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया था। नियाजी पर आत्मसमर्पण का दबाव बढ़ाने में जैकब की भूमिका उस फौलाद को दर्शाती है जिसके वे बने हुए थे। 16 दिसम्बर, 1971 को वे जनरल नियाजी से मिलने के लिए अकेले ही गए थे। उनके मुख्यालय में पहुंचकर जैकब ने आत्मसमर्पण का दस्तावेज उनको पढ़कर सुनाया। नियाजी ने प्रतिवाद करते हुए कहा था, 'किसने कहा कि मैं आत्मसमर्पण कर रहा हूं। आप तो सिर्फ संघर्ष-विराम की बात करने आए हैं।' बाद में उस घटना का जिक्र करते हुए जैकब ने बताया था कि इसके बाद वे नियाजी को अलग ले गए और उनसे बोले, 'मैं आपके सामने शर्त रखता हूं कि आपके साथ जेनेवा समझौते के तहत व्यवहार किया जाएगा। हम जातीय अल्पसंख्यकों सहित हरेक को सुरक्षा देंगे। अगर आप आत्मसमर्पण करते हैं तो हम आपको सुरक्षा दे सकते हैं, अगर नहीं करेंगे तो फिर जो कुछ होगा उससे मेरा कोई लेना-देना नहीं रह जाएगा।' इसके बाद उन्होंने जनरल नियाजी को सोचने के लिए आधे घंटे का समय दिया। उस घटना को याद करते हुए जनरल जैकब ने एक बार बताया था, 'वह आधा घंटा मेरे जीवन का सबसे ज्यादा लंबा आधा घंटा था। लाखों लोगों की किस्मत मेरी दो टूक बात पर दुश्मन सेना के कमाण्डर के जवाब पर निर्भर थी। यह सिर्फ मैं ही जानता था कि मैं कुछ बढ़-चढ़ कर बोल गया था।'
आधे घंटे के बाद नियाजी भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए राजी हो गए। लेकिन जैकब ने साफ किया कि उन्हें भारतीय सशस्त्र बल और मुक्ति बाहिनी की संयुक्त कमान के सामने आत्मसमर्पण करना होगा। यही वजह है कि जनरल जैकब बंगलादेश के लोगों के लिए चहेते थे।
सेना में 37 वर्ष तक अपनी सेवाएं देने के बाद जनरल जैकब 1978 में सेवानिवृत्त हुए। उस समय वे पूर्वी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ थे। 1990 में वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। उन्होंने पार्टी को सुरक्षा सलाहकार के रूप में अपनी सेवाएं दीं। बाद में वे गोवा और फिर पंजाब के राज्यपाल भी रहे। वे भारत और इस्रायल के सम्बंधों को बढ़ाने के पक्ष में रहते थे। नई दिल्ली स्थित उनका घर इस्रायली राजनयिकों, शोधकर्ताओं और सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए तीर्थ की तरह था।
उनके निधन पर देश के प्रमुख लोगों ने दु:ख जताया है और उन्हें श्रद्धांजलि दी है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर आदि ने उनकी अद्वितीय वीरता और स्पष्ट बोलने की प्रवृत्ति की दिल खोलकर प्रशंसा की। – मेजर जनरल (से.नि.) ध्रुव सी. कटोच
(लेखक सी.एल.ए.डब्ल्यू एस. के पूर्व निदेशक और वर्तमान में 'सैल्यूट' पत्रिका के सम्पादक हैं)











