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कौन कहता है बिहार में विकास की दर विगत दशकों में किसी अन्य प्रदेश की अपेक्षा कम रही है। चावल पक गया या नहीं, जानने के लिए केवल कुछ दाने ही मसलने, चखने से काम चल जाता है। उसी तरह पूरे राज्य में विकास की दर जानने के लिए वहां के ‘प्रथम परिवार’ की समृद्धि के विकास को देखकर ही पूरा जायजा लिया जा सकता है। बिहार की कठपुतली की डोर जिनके हाथों में है वे लालू जी ‘विद्यावान धनी अति चातुर’ हैं। यहां गुनी की जगह धनी शब्द गलती से नहीं आया है। वे ‘विद्यावान धनी अति चातुर ही हैं। लक्ष्मी और सरस्वती का ऐसा संयोग सरल नहीं है। उनके गुनी होने में संशय हो सकता है पर धनी होने में नहीं। और जितनी तेजी से देखते-देखते उनके परिवार में यह समृद्धि आई है वह भी काबिले तारीफ है। राजनीतिशास्त्र में एम. ए. और वकालत की डिग्री लेने के बाद, बाबू की सरकारी नौकरी पाकर अपने जिन सहोदर के साथ वे रहते थे, वे उसी विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे। इस तरह चतुर्थ श्रेणी वाले बड़े भाई की अपेक्षा तृतीय श्रेणी का सरकारी कर्मचारी बनकर परिवार में तरक्की का पहला सोपान उन्होंने अपनी लम्बी यात्रा के प्रथम चरण में ही चढ़ लिया था।
प्रगति के ऊंचे सोपान के लिए भारी भरकम डिग्री किसी काम की नहीं होतीं, यह मूल मन्त्र उनकी अगली पीढ़ी ने समझा, जिसने असली तरक्की की। जिन जयप्रकाश नारायण जी से लालू जी ने समाजवाद की दीक्षा ली थी, वे अमरीका की बर्कले और आइओवा विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं से बड़ी उच्च शिक्षा लेकर आये थे। उनके दूसरे गुरु थे डॉक्टर राम मनोहर लोहिया, जो बर्लिन विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. थे। लालू जी ने इन गुरुओं के बौद्धिक स्तर को भले चुनौती न दी हो पर औपचारिक शिक्षा तो उन्होंने भी विश्वविद्यालय के स्तर तक पूरी की। पर अगली पीढ़ी समझदार निकली। समाजवाद की शिक्षा घुट्टी में मिली हो तो किताबों के साथ झख मारने से क्या लाभ। अत: एक ने मैट्रिक पास किया तो दूसरे नौवीं के बाद ही विद्या के चक्कर से मुक्त हो गए। ज्यादा पढ़ाई-लिखाई के चक्कर में फंसे बिना ही दोनों अब विधायक हैं। चुनाव आयोग को निजी जानकारी देते हुए दोनों ने ईमानदारी से बताया कि औपचारिक शिक्षा के मामले में कमजोर भले हों, पर समाजवाद का परचम लहराने वाले करोड़पति वे पहले ही से थे। इस प्रकार विद्यावान गुनी अति चातुर की अपेक्षा विद्याहीन धनी अति चातुर बनने की तरफ उनका झुकाव स्पष्ट है। अब देखना यह है कि खानदानी विरासत से समृद्ध ये युवा विधायक मंत्री कितनी तेजी से करोड़ों को अरबों में बदल पाते हैं।
स्वाभाविक है कि हर क्षेत्र में तेजी दिखाने की आशा उस परिवार से की जाए जिसमें सब तेज ही तेज हैं। सबसे बड़े सुपुत्र तेजप्रताप हैं, तो उनसे छोटे वाले तेजश्वी हैं (यह दूसरी बात है कि तेजस्वी की जगह तेजश्वी लिखते हैं)। फिर सबसे बड़े वाले तेज से लेकर सबसे छोटी वाली के तेज तक के ऊपर परिवार के जिन मुखिया का वरदहस्त है वे तो सबसे तेज हैं। सच पूछो तो पूरा खानदान ही तेजोमय है।
आज के युग में आदमी विद्या हासिल करता है केवल धन संपदा का अर्जन करने के लिए। परिवार के एम.ए. पास मुखिया के ऊपर चाईबासा सरकारी खजाने से साढ़े 9 अरब रुपयों के हेरफेर में संलिप्त होने का आरोप था। अदालत के सितम्बर, 2013 के निर्णय में इसमें से 37 करोड़ रुपये का आरोप सिद्ध भी हो गया। अब जो दो उत्तराधिकारी हैं वे मैट्रिक पास हों या नौवीं पास हों, करोड़पति तो घोषित रूप से हैं। आखिर परिवार ने दशकों तक राज किया है, इतना तो बनता ही है!
कुछ लोग कहते हैं तेजश्वी तो क्रिकेट के खिलाड़ी हैं। सन 2008,2009,2011और 2012 में आईपीएल के लिए उन्हें दिल्ली डेयरडेविल ने खरीद लिया था। और उन्हें तीस-चालीस लाख रुपयों की आमदनी इसी खेल से हुई थी, मैं भी तो यही कह रहा हूं। रुपये देकर उन्हें दिल्ली डेयरडेविल ने खरीद लिया। आजकल हर खेल में रुपयों के लिए बिकने की ही परम्परा है। ये दीगर बात है कि बिके तो कई बार लेकिन खेले एक बार भी नहीं। लालू जी का कहना था कि खेलने का अवसर तेजश्वी को दिया गया या नहीं इससे क्या फर्क पड़ता है, कम से कम उन्हें बड़े-बड़े खिलाड़ियों को पानी पिलाने का अवसर तो मिला! अब परिवार की आमदनी सरकारी आवास में भैंस पाल कर दूध पिलाने से हो चाहे क्रिकेट खिलाड़ियों को पानी पिलाने से, आमदनी तो हुई न?
अरुणेन्द्र नाथ वर्मा











