सूखे का संकट
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सूखे का संकट

Written byArchiveArchive
Nov 30, 2015, 12:00 am IST
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दिंनाक: 30 Nov 2015 12:33:11

 

 मनोज वर्मा
बात बहुत पुरानी नहीं हैं, कोई दो साल पहले की ही तो है। केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली संप्रग सरकार हुआ करती थी और प्राकृतिक आपदाओं के मामले में भी  कुछ राज्यों खासतौर से भाजपा शासित राज्यों को केंद्र की कांग्रेस सरकार के आगे सहायता के लिए कई-कई बार गुहार लगानी पड़ती थी। लेकिन सूखे के मामले में कांग्रेस शासित कर्नाटक राज्य ने जैसे ही केंद्र की मोदी सरकार को सूचित किया और सहायता मांगी तो केंद्र सरकार ने भी सहायता देने में देर नहीं लगाई। इसकी एक वजह यह भी है क्योंकि केंद्र में इस समय नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं, जो गुजरात में कई साल मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उन्हें प्राकृतिक आपदा के समय राज्यों की जरूरत और दर्द का अहसास भी है और अनुभव भी। लिहाजा सूखे के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर केंद्रीय किसान एवं कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह तक राज्यों को मदद देने के मामले में केंद्र की ओर से कोई कसर बाकी रखना नहीं चाहते। ताकि राज्यों को यह कहने का मौका न मिले कि केंद्र ने कुछ नहीं किया।
असल में तो मोदी सरकार की अगुवाई में केंद्र सरकार की यह बदली हुई कार्यशैली का ही एक उदाहरण है कि केंद्रीय किसान एवं कल्याण मंत्रालय राज्यों से बार-बार सूखे के संबंध में रपट मांग रहा है और साथ ही केंद्रीय योजनाओं से मदद लेने की अपनी तरफ से आगे बढ़कर पेशकश भी कर रहा है। पर कई राज्यों ने सूखे का आकलन करने और केंद्र को रपट भेजने में जो सुस्ती दिखाई, उसका असल खामियाजा किसानों को उठाना पड़ रहा है।  बिहार, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, झारखंड ऐसे राज्य हैं, जहां सूखे का संकट है लेकिन इसके बावजूद इन राज्यों ने सूखे के संबंध में केंद्र को सूचित करने में फुर्ती नहीं दिखाई। जबकि कांग्रेस शासित कर्नाटक सरकार ने अपने राज्य में सूखे के संबंध में सबसे पहले केंद्र सरकार को सूचित किया और केंद्र सरकार ने भी कर्नाटक को पन्द्रह सौ चालीस करोड़ रुपए की सहायता राशि जारी कर दी।
छत्तीसगढ़ के लिए 1367 करोड़ की राशि की अनुशंसा कृषि मंत्रालय द्वारा की जा चुकी है। उत्तर प्रदेश और ओडिशा में भी स्थिति का जायजा लेने केंद्रीय टीम भेज दी गई हैं। वहीं केंद्र की टीमें महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में सूखे का आकलन कर राज्य की रपट तैयार करने में जुटी हैं। बिहार, झारखंड और तेलंगाना राज्यों से भी सूखे के संबंध में रपट भेजने को कहा गया है। दरअसल सरकार उस इलाके को सूखाग्रस्त मानती है, जहां वर्षा सामान्य से 20 प्रतिशत कम होती है। जिन इलाकों में बारिश का आंकड़ा सामान्य से 50 प्रतिशत या उससे भी कम होता है तो उसे भीषण सूखे की श्रेणी में रखा जाता है। इस आधार पर देश के 614 में से 302 जिले सूखे की चपेट में हैं। केंद्रीय मौसम विभाग की घोषणा के आधार पर 18 राज्यों पर सूखे का संकट मंडरा रहा है। आंध्र प्रदेश के 13 में से सात जिले, मध्य प्रदेश के 51 में से 41 और महाराष्ट्र के 35 में से 20 जिले सूखे की चपेट में हैं। ओडिशा और छत्तीसगढ़ ने भी सूखे के संबंध मेें केंद्र को सूचित किया है और केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने अपनी टीम समीक्षा के लिए राज्य में भेज दी हैं। सूखे की स्थिति पर एक तरफ स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह नजर रखे हुए हैं। वहीं बिहार, उत्तर प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों की सूखे के संबंध में उदासीनता चिन्ता में डालने वाली है।  
सबसे बदत्तर स्थिति उत्तर प्रदेश की है, जहां पहले किसानों ने बेमौसम बारिश की मार झेली और अब सूखे से बर्बादी का सामना कर रहे हैं। कारण देश में सबसे ज्यादा सूखा इस बार उत्तर प्रदेश में पड़ा है। भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक राज्य के 31 जिलों में 50 फीसद से भी कम बारिश हुई है। पश्चिमी उ.प्र. हो या पूर्वी उ.प्र., सूखे की मार चारों ओर है। किसानों का कहना है कि न तो नहर में पानी है और न ही पिछले साल की खराब हुई फसल का सरकार ने कोई मुआवजा दिया है। बेशक प्रकृति पर किसी का जोर नहीं है और सूखा एक प्राकृतिक आपदा है। लेकिन उत्तर प्रदेश की सरकार सोती रही और जब आंख खुली तो देर हो चुकी है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कहते हैं कि राज्य सरकार ने सूखे से निपटने के लिए पूरे इंतजाम किए हैं। सरकार ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में राज्य के 50 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने आदेश में राज्य के कुल 75 जिलों में से 50 को सूखाग्रस्त घोषित करते हुए इन जिलों में राजस्व वसूली तत्काल प्रभाव से रोकने के आदेश दिए हैं। ़पिछले 4 साल में उत्तर प्रदेश में बारिश की मात्रा लगातार कम हुई है। लेकिन हालात को अगर सरकार ने पहले ही गंभीरता से लिया होता तो शायद तस्वीरें इतनी भयावह नहीं होंती। इस साल मानसून के शुरुआत में बारिश अच्छी हुई, तो किसानों ने धान की खेती कर दी, लेकिन अंत बेहद खराब और साथ में तकलीफदेह। बारिश नहीं तो नहरें भी लगभग सूखी हैं और बिजली आती नहीं लिहाजा किसान महंगे डीजल से सिंचाई करने को मजबूर हैं। पिछली बार बेमौसम ओलों ने फसलें खराब की थीं और इस साल सूखे ने फसल को सुखा दिया है। किसानों के लिए अपनी जीविका चलाना काफी कठिन होता जा रहा है। किसान परेशान हंै और सूबे की सरकार सिर्फ वादे कर रही है।
उधर महाराष्ट्र के कृषि मंत्री एकनाथ खड़से ने भी माना है कि राज्य के 14,708 गांव सूखे की स्थिति का सामना कर रहे हैं, जहां फसलों का मूल्य 50 फीसद से भी कम है। बकौल खड़से,'इस साल मानसून 189 तालुकों में 75 फीसद से भी कम रहा, जबकि 14,708 गांवों में मूल्य 50 फीसद से कम है। 14,708 गांवों में से ज्यादातर गांव (8,522) औरंगाबाद संभाग के तहत आते हैं। इन गांवों में सूखे की स्थिति घोषित की गई है।'
असल में देश में सूखा लगभग एक स्थायी घटना का रूप लेता जा रहा है। हर साल गर्मियों में देश के कई राज्य किसी न किसी सीमा तक सूखे की समस्या से जूझते दिखते हैं। खेती के खस्ताहाल, कर्ज के बोझ और गरीबी, भुखमरी, कुपोषण से पहले से ही बेहाल गांवों के खेतिहर मजदूर, गरीब और छोटे किसानों के लिए सूखे ने परिस्थितियां असहनीय बना दी हैं। सच तो यह है कि देश में सूखे की आज जो स्थिति नजर आती है वह कोई अचानक नहीं पैदा हुई है। यदि देश में सूखे और अकाल के इतिहास पर नजर डाली जाये तो पता चलता है कि पिछले लम्बे समय से सूखे की समस्या देश के लिए स्थाई समस्या बनती जा रही है। मसलन 1877, 1899, 1918, 1972, 1987 और 2002 देश में सूखे के सबसे बदतर साल रहे हैं।
वास्तव में, देश में लगभग हर तीसरे साल सूखे जैसी स्थिति बनती है। 19वीं शताब्दी में अकाल और सूखे की संख्या जहां 38 थी, वह 20वीं शताब्दी में बढ़कर 60 हो गयी और भौगोलिक रूप से इसका क्षेत्रफल भी विस्तृत होता गया। आज देश के कुल क्षेत्रफल का लगभग 16 प्रतिशत हिस्सा सूखा या कम बारिश वाला है। देश की कुल खेती योग्य भूमि का 68 प्रतिशत किसी न किसी सीमा तक सूखे से प्रभावित है। लेकिन सूखे की इस स्थिति के लिए सिर्फ बारिश की कमी या मानसून की अनियमितता ही जिम्मेदार नहीं है।
असल में जो देश के विभिन्न भागों में मानसून के दौरान जितना पानी बरसता है,अगर उसका व्यवस्थित रूप से संचय किया जाता, सिंचाई के लिए नहरों की उचित व्यवस्था की जाती, भूमिगत जल के संरक्षण के लिए कारगर कदम उठाये जाते, मुनाफे के लिए होने वाले इसके अन्धाधुन्ध उपयोग पर नियन्त्रण लगाया गया होता और पूरे देश के स्तर पर कृषि के विकास की एक योजनाबद्ध नीति अपनाने के साथ जल संचयन की आधुनिकतम तकनीकों का इस्तेमाल किया गया होता तो सूखे के कुप्रभावों से बचा जा सकता था। फिर भी आपदाओं को देखते हुए मोदी सरकार किसानों के कल्याण के लिए कई अहम फैसलों का एलान पहले ही कर चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी साल अप्रैल में खराब फसल के मुआवजे की रकम 50 फीसद बढ़ा दी थी। साथ ही मोदी सरकार के एजेंडे में प्रधानमंत्री सिंचाई योजना भी प्राथमिकता में है। लेकिन असल बात यह कि जब तक राज्य सरकारें जमीनी स्तर पर तैयारी नहीं करेंगी तब तक केंद्र की योजनाएं भी कारगर ढंग से क्रियान्वित नहीं हो पाएंगी।     ल्ल

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