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2सरे विश्वयुद्ध की विनाशलीला अपनी चरम सीमा पर थी। अमरीका ने जापान पर एटम बम और हाइड्रोइजन बम गिरा कर उस शक्ति को हमेशा के लिए ध्वस्त कर दिया था। इन दो विषैले शस्त्रों ने एक बार फिर दुनिया को इस बात पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया था कि दुनिया में कोई ऐसी संस्था अस्तित्व में आनी चाहिए जो महाशक्तियों को इस प्रकार के भयानक कदम उठाने से रोक सके। यद्यपि प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात लीग आॅफ नेशन्स बनाकर दुनिया में शांति के चाहने वालों ने यह संदेश अवश्य दिया था कि कोई ऐसी अन्तरराष्टÑीय संस्था अस्तित्व में आनी चाहिए जो दुनिया के हर देश पर अंकुश लगा सके । लेकिन जिनके पास ताकत थी वे भला ऐसा क्यों मानने लगे? इसका प्रमुख कारण था विश्व में बढ़ती लोकतंत्र की ताकत। पचास का दशक आते-आते जब अनेक देश स्वतंत्र होने लगे तो उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या बड़ी मछली छोटी मछली को नहीं खा जाएगी? कोई कितना ही ताकतवर बन जाए लेकिन वह अकेला रहकर दुनिया में नहीं जी सकता। इसलिए सहअस्तित्व की भावना से प्रेरित होकर दुनिया की तत्कालीन बड़ी ताकतों ने यह निर्णय लिया कि जियो और जीने दो का सिद्धांत अपनाकर ही भविष्य की रक्षा की जा सकती है। उस समय तक लोकतंत्र में दुनिया के अधिकांश देशों की आस्था बढ़ती जा रही थी। इसलिए विश्व जनमत को सर्वोपरि मानकर लीग आॅफ नेशन्स की ही तरह संयुक्त राष्टÑसंघ नामक अन्तरराष्टÑीय संस्था का गठन करने में सफलता प्राप्त कर ली गई। पांच बड़ी ताकतों का अहं शांत करने के लिए सुरक्षा परिषद का गठन किया गया। साथ ही यह व्यवस्था भी की गई कि उक्त परिषद, जो सबसे अधिक ताकतवर होगी, उसमें 6 अन्य देशों को भी बारी-बारी से अस्थाई सदस्यता दी जाऐगी। लेकिन 5 बड़ी ताकतों को ‘वीटो’ का विशेषाधिकार मिलेगा। अन्य सदस्य देश अपनी अवधि पूर्ण कर स्वत: निवृत हो जाएंगे। इस प्रकार महाशक्तियों का अहं शांत कर विश्व शांति की यह यात्रा प्रारम्भ हुई थी।
लेकिन बीते समय में अनेक देशों ने इतनी प्रगति कर ली है कि वे अब यह सोचने लगे हैं कि या तो इन पांच बड़ी ताकतों का विशेषाधिकार समाप्त किया जाए अथवा तो अन्य देशों के लिए भी सुरक्षा परिषद की सदस्यता प्राप्त करने का स्थायी बंदोबस्त किया जाए। राष्टÑसंघ में पांच बड़ी ताकतों की तानाशाही को तोड़ने के लिए अब अनेक देश उतावले हो गए हैं इसलिए भविष्य में जो परिवर्तन होंगे वे विश्व शांति को स्थापित करने में सफल होंगे या नहीं, इस पर विचार होने लगा है। 24 अक्तूबर 1948 में गठित हुए राष्टÑसंघ का चेहरा-मोहरा किस प्रकार का होगा, अब इस पर विचार होने लगा है।
सुरक्षा परिषद के लिए 2007 में जिस नई प्रक्रिया ‘इंटर गवर्नमेंटल नेगोशियेशन्स’ को प्रारम्भ किया गया था अब उस के सुखद परिणाम आते दिखाई पड़ रहे हैं। इस कारण अब सुरक्षा परिषद के ढांचे में सुधार पर आम सहमति बनती दिखाई पड़ रही है।
70वीं आम सभा के गठन के साथ अब उस में किए जाने वाले परिवर्तन पर विचार प्रारंभ हो रहा है। वास्तव में देखा जाए तो आज की राष्टÑसंघ की आम सभा के पास कोई ताकत ही नहीं। वह तो मात्र भीड़ एकत्रित करने के लिए है। असली शक्ति का केन्द्र तो सुरक्षा परिषद है जहां विश्व के इने-गिने राष्टÑ अपनी मनमानी से कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र हैं। अनेक देशों ने समय के साथ करवट ली है। भारत भी उस में से एक है। क्या भारत की ताकत और विश्व शांति में उसके योगदान को देखते हुए उसे सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता मिलेगी? सुरक्षा परिषद की रचना और गठन में परितर्वन किया जाए, इस पर आम सहमति बनती हुई दिखाई पड़ रही है। इसलिए आगामी 24 अक्तूबर जो राष्टÑसंघ का स्थापना-दिवस भारत की अंतरराष्टÑीय ताकत दर्शाने के लिए निर्णायक दिवस होगा। 69वीं बाम सभा के अध्यक्ष सैम कुटेसा ने जुलाई में सदस्य देशों से सुरक्षा परिषद में क्या सुधार किए जाएं, इस मुद्दे पर उनके सुझाव मांगे थे। यह एक शुभ संकेत है कि इस बार परिवर्तन की गुंजाइश के संकेत मिल रहे हैं। इन सुधारों में सुरक्षा परिषद में सदस्य देशों की संख्या बढ़ाने के संकेत शामिल हैं। जिन नए देशों को सुरक्षा परिषद में स्थान मिलेगा उन्हें भी वर्तमान सदस्यों की तरह वीटो का अधिकार प्राप्त होगा या नहीं, सबसे बड़ा सवाल है। यदि ऐसा होता है तो भारत सहित कुछ अन्य देशों को भी स्थायी सदस्यता दिए जाने के आसार उज्जवल दिखाई पड़ रहे हैं। इन स्थायी पांच देशों को पी-5 देश कहा जाता है। लेकिन ये पांच देश, जो चार अस्थायी सदस्य देश जी-4 के नाम से पुकारे जाते हैं, उन्हें स्थायी सदस्यता देकर अपना रुतबा कम करने का जोखिम भला क्यों उठाएंगे?
70वीं आम सभा के गठन के साथ अब उस में किए जाने वाले परिवर्तन पर विचार प्रारंभ हो रहा है।
इस समय दो प्रश्न हमारे लिए मुख्य हैं। पहला तो यह कि भारत की मजबूत स्थिति को देखते हुए पांच स्थायी देश क्या भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने देंगे? भारत का विस्तार और भारत की भूमिका को देखते हुए अनेक देश यह चाहते हैं कि भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता मिल जानी चाहिए। यदि मिल भी जाए तो क्या वे पांच स्थायी देश भारत को वीटो का अधिकार देंगे? यदि नहीं देते हैं तो फिर उस सदस्यता का भला क्या महत्व होगा? भारत की ही तरह ब्राजील, जापान, दक्षिण अफ्रीका और नाइजीरिया भी स्थायी सदस्यता के लिए अपनी उम्मीदवारी की प्रतीक्षा में हैं। उनका कद और उनकी अंतरराष्टÑीय स्थिति को देखते हुए उनकी अवहेलना नहीं की जा सकती है। दुनिया के 108 देश, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था का दम भरते हैं, उनमें भारत अग्रणी है। इन सभी की तुलना में भारत ने लोकतांत्रिक मूल्यों की जिस प्रकार प्रतिष्ठा बढ़ाई है उसकी बराबरी कोई अन्य देश फिलहाल तो नहीं कर सकता है। भारत की प्रगति और उसके लोकतांत्रिक मूल्यों की एक अपनी अलग ही छवि है जो उसकी सुरक्षा परिषद में स्थायी पद की दावेदारी को मजबूत बनाता है। जी-4 को स्थायी सदस्यता का विरोध करने वाले संगठन ‘यूनाइटिंग फॉर कनसेंसस’ का गठन 1990 में हुआ था। इसे कॉफी क्लब भी कहा जाता है। इटली के नेतृत्व में बने इस संगठन में पाकिस्तान, मेक्सिको और मिस्र का समावेश है। वर्ष 1995 तक इस में स्पेन, अर्जेंटीना, तुर्की, दक्षिण कोरिया समेत लगभग 50 देश शामिल हो चुके थे। उनका कहना है कि राष्टÑसंघ का विस्तार करने से उसमें असमानताएं बढेंÞगी। वर्तमान में इसके 13 अन्य देश ‘कोर’ सदस्य हैं। भारत के लिए सबसे महत्व का सवाल यह है कि वह स्थायी रूप से सुरक्षा परिषद का सदस्य बनेगा या नहीं? दूसरा सवाल है उसे वीटो का अधिकार प्राप्त होगा या नहीं? चीन और पाकिस्तान ही नहीं, पर्दे के पीछे अन्य देश हैं जो भारत को यह महत्व का स्थान मिलते नहीं देखना चाहते।
मुजफ्फर हुसैन










