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'मैं पुरानी दिल्ली के दरियागंज इलाके में रहता हूं। दिल्ली के ही एक विद्यालय में बतौर शिक्षक कार्यरत हूं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अन्तर्गत मेरा विद्यालय आता है और यह बिल्कुल दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा पर ही है। वैसे मैं अपना और विद्यालय का नाम कुछ अज्ञात कारणों से नहीं बता रहा हूं। प्रत्येक सुबह 5 बजे उठना और नित्यकर्म करके विद्यालय के लिए निकलना। यह रोज की दिनचर्या का एक हिस्सा बन चुका है। चूंकि विद्यालय समय 8 बजे से है तो समय से पहुंचने के लिए घर से जल्दी निकलना होता है। विद्यालय पहुंचते ही प्रार्थना शुरू होती है। प्रार्थना के बाद कक्षा में पढ़ाई कराने के लिए जाते तो हैं लेकिन यह कक्षा में जाना ही होता है। विद्यालय में दिल्ली और पड़ोसी राज्य के भी बच्चे आते हैं। पर कभी मैंने इन बच्चों में कोई अमीर या अफसर का बेटा नहीं देखा। फिर भी कक्षा में जाने के बाद बच्चों को थोड़ा काम देना एक तरीके से मजबूरी ही होती है क्योंकि मुझे मिडडे मील की तैयारियों के लिए भी लगना होता है। मैं एक बच्चे को 5 से 12 तक के पहाड़े दोहराने के लिए बोल देता हूं और इसी समय का उपयोग हम मिडडे मील की तैयारी के लिए कर लेते हैं। बच्चों को भी आस लगी होती है कि दोपहर का खाना मिलेगा जिसका उन्हें आने से ही इंतजार लगा रहता है। कभी-कभी तो मैंने यहां तक देखा कि कुछ बच्चों के बस्ते में कॉपी-किताबों की जगह प्लेट और छोटी थालियां रखी होती हैं। खैर पढ़ना-पढ़ाना तो दूर,बस खाने की आवाज लगते ही एक साथ बच्चे दौड़ पड़ते हैं। खाने की उनकी बेसब्री बताती है कि अधिकतर बच्चे गरीब हैं और खाने के लिए आए हैं। इसके बाद एक बार फिर कक्षा लग जाती है लेकिन यह कक्षा सुबह जैसी नहीं होती। क्योंकि खाने के बाद बच्चों की संख्या कम हो जाती है। लेकिन मुझे फिर भी इनको पढ़ाने का समय नहीं मिलने वाला। क्योंकि बच्चों को पुस्तकें बांटने से लेकर वजीफा, कार्यालय का काम, मिडडे मील का हिसाब,आदि… आदि…। इसी सब चक्कर और अध्यापकों की कमी के कारण बच्चे पढ़ नहीं पाते जो उनकी मासिक परीक्षा की कॉपी में साफ दिखाई देता है। वे पास नहीं हुए हैं लेकिन हम बच्चों को फेल नहीं कर सकते। लेकिन सच पूछे तो उनमें से कोई पास भी नहीं है। मुझे स्कूल के काम के लिए लिपिक तो मिला नहीं है जो यह सब काम करे। सब काम तो मुझे ही करने हैं। सेमिनार में भी हम अध्यापक ही जाते हैं। वहां शिक्षा की रीति-नीति सुधारने की बातें तो बड़ी होती हैं लेकिन जो सुझाव और निर्देश दिए जाते हैं वह खासे अटपटे होते हैं। कई बार तो शिक्षक सेमिनार आदि में अपनी असहमति जताते भी हैं लेकिन इससे कोई फर्क पड़ता हो ऐसा लगता नहीं। 'मास्टर जी, जो कहा जा रहा है करो चुपचाप।' सो, मरे मन से 'शिक्षा' के भंवर में वहाए जा रहे हैं बच्चों को। छुट्टी के समय बच्चे ऐसे भागते हैं जैसे जेल से छूटे हों। ऐसे उनका एक-एक दिन कटता जाता है और यही आज के सरकारी विद्यालय की पढ़ाई का सच है।
असल में यह एक शिक्षक की विद्यालय समय की दिनचर्या है जो उसने पाञ्चजन्य के साथ साझा की। अब समझा जा सकता है कि देश के सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई का स्तर क्या होगा ? ऐसे ही जर्जर हो चुकी सरकारी शिक्षा पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अभी हाल में उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है किसभी सरकारी कर्मचारी, नौकरशाहों, विद्यायकों, सांसदों के बच्चों को प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाना अनिवार्य किया जाये। ऐसी व्यवस्था की जाये कि अगले शिक्षा सत्र से इस पर अमल सुनिश्चित हो सके। इसके लिए जो भी जरूरी हो उसकी व्यवस्था की जाए। अगर इसके बाद भी जिन नौकरशाहों, विद्यायकों, सांसदों और सरकारी कर्मचारियों के बच्चे निजी विद्यालयों में पढ़ें तो उनके वेतन से फीस के बराबर कटौती की जाए और उस रकम को प्राथमिक विद्यालयों के विकास में लगाया जाए। हाल ही में यह आदेश न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल की अध्यक्षता वाली खंड पीठ ने शिकुमार पाठक और कुछ अन्य लोगों की याचिका पर दिया। इस ऐतिहासिक निर्णय के आते ही एक बहस छिड़ गई और लोग सवाल करने लगे कि क्या सरकारी कर्मचारी अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में पढ़ाएंगे? या फिर हर बार की तरह इसका भी कोई नया काट ढंूढ लेंगे? आदेश ने उत्तर प्रदेश सहित देश के सरकारी कर्मचारियों के मध्य एक हड़कंप मचा दिया है। अपनी तरफ इस आंच को आते देख वे शोर मचाने लगे और तर्क देने लगे कि हमें अपने बच्चे को इच्छानुसार विद्यालय में पढ़ाना हमारा संवैधानिक अधिकार है। हड़कंप मचना स्वाभाविक भी था, क्योंकि न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के सरकारी विद्यालयों की ही पोल नहीं खोली बल्कि देश की सरकारी विद्यालयी व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया।
न्यायालय ने अपनी तीखी टिप्पणी में यह भी जोड़ा है कि जब तक इन लोगों के बच्चे सरकारी विद्यालयों में नहीं पढ़ेंगे तब तक सरकारी विद्यालयों की हालत नहीं सुधरेगी। वैसे आंकड़ों की मानें तो सरकारी विद्यालयों में न ठीक ढंग से पानी है, न शौचालय की व्यवस्था है, न भवन हैं और न ही आज के तकनीकी भरे युग के संसाधन। तो पढ़ाई कैसे हो इन विद्यालयों में ये समझा जा सकता है। वैसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जो आदेश दिया है वह एक सुखद स्वप्न की कल्पना तो कराता है, लेकिन जो सरकारी विद्यालयी शिक्षा के हालात हैं उस पर सोचने पर मजबूर करता है। क्योंकि सरकारी विद्यालयों की शिक्षा और इसकी हालत जगजाहिर है। अब जब स्थिति जगजाहिर है तो जानबूझकर क्यों कोई अपने बच्चों को ऐसी जगह पढ़ाएगा, जहां पढ़ाने के अलावा अन्य सभी काम होते हों। समय-समय पर सरकारी और गैर सरकारी रपटें सरकारी शिक्षा की कलई खोलती हैं।
रपट बताती हैं कि अनेक महात्वाकंाक्षी योजनाओं के बाद भी देश में पांचवीं तक के छात्रों की संख्या में पिछले वर्ष 23 लाख बच्चों की कमी आई है। जिसमें अकेले उत्तर प्रदेश की कक्षाओं से ही 7 लाख बच्चे घट गए हैं। रपट यह भी बताती हैं कि देशभर में पांचवीं और आठवीं में क्रमश: 13.24 करोड़ और 6.64 करोड़ यानी कुल 19.88 करोड़ बच्चे प्रारम्भिक शिक्षा हासिल कर रहे हैं। इतनी बड़ी तादाद में सरकारी विद्यालयों से बच्चों का कम होना सवाल खड़े करता है कि आखिर इतनी सुविधाओं के बावजूद ऐसा क्यों? कमी कहां है और इसका जिम्मेदार कौन है? या फिर सभी सुविधाएं हवा-हवाई हैं? डॉ. रमाशंकर पाण्डेय राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, लैंसडाउन, उत्तराखंड में प्रवक्ता हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आए फैसले और सरकारी विद्यालयों के गिरते स्तर पर वे कहते हैं 'आज देश का कोई भी सक्षम माता-पिता अपने बच्चे को सरकारी प्राथमिक विद्यालय में नहीं भेजना चाहता। कारण साफ है कि इन विद्यालयों का शिक्षा स्तर बेहद निम्न है। राजनेताओं और नौकरशाहों की बात की जाये तो शायद ही उनमें कोई ऐसा होगा, जिसके बच्चे सरकारी विद्यालय में पढ़ रहे होंगे, जबकि सारी नीतियां एवं उनके क्रियान्वयन की नैतिक जिम्मेदारी इन्हीं पर है। इसी उदाशीनता के कारण लाखों की संख्या में गली-मोहल्ले में कान्वेंट विद्यालय सरकार को चिढ़ा रहे हैं। वे आगे कहते हैं 'असल में प्राथमिक शिक्षा ही किसी व्यक्ति के जीवन की नींव होती है, जिसपर उसके संपूर्ण जीवन का भविष्य तय होता है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 ,1 अप्रैल, 2010 से प्रभावी तौर लागू है और इस अधिनियम को लागू हुए पांच वर्ष हो गए लेकिन शिक्षा को लेकर जो हमारा सपना था तो वह कहीं भी रूप लेता नहीं दिख रहा। हां, इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला अगर लागू होता है तो वास्तव में इसका परिणाम बहुत ही सुखद होगा। गली-गली में फल-फूल रहे कॉन्वेंट विद्यालय तो बंद होंगे ही साथ ही सरकारी शिक्षा तंत्र दुरुस्त हो जायेगा।' वर्ष 2014-15 के आर्थिक सर्वे पर नजर डालते हैं तो उसके आंकड़े चौंकाते हैं। जिला विद्यालय सूचना प्रणाली के अनुसार प्राथमिक विद्यालयों में कुल नामांकन 2007-08 और 2013-14 के दौरान (प्राथमिक और उच्च प्राथमिक) के विद्यालयों में प्रवेश क्रमश: 13.37 करोड़ के स्थान पर 11 लाख 7 हजार बच्चों की कमी के साथ 12.1 करोड़ रह गया है। जबकि निजी विद्यालयों में यह आंकड़ा 27 करोड़ के लगभग बढ़ा है। साथ ही शहरी इलाके में लगभग 60 फीसद प्राथमिक विद्यालय निजी हैं यानी उच्च वर्ग एवं मध्यम उच्च वर्ग के सभी परिवार के 86 फीसद बच्चे निजी विद्यालयों में पढ़ते हैं।
कैसे पढं़े बच्चे जब शिक्षक ही नही हंै!
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का आदेश वैसे तो अपने आप में ऐतिहासिक है। लेकिन जिस प्रकार की हालत सरकारी विद्यालयों की हैं उसे देखकर शंका होती है कि क्या ऐसी स्थिति में अमीर घरों के बच्चे सरकारी विद्यालयों में पढ़ेंगे। ऐसा नहीं है कि सिर्फ उत्तर प्रदेश के ही सरकारी विद्यालयों की हालत खराब है अपितु यह स्थिति कमोवेश पूरे देश के प्राथमिक विद्यालयों की है। क्योंकि कहीं विद्यालय हैं तो अध्यापक नहीं और अध्यापक हैं तो उन्हें पढ़ाना नहीं। अकेले उत्तर प्रदेश के विद्यालयों में ही 1.75 लाख शिक्षकों की कमी है।
शिक्षकों की कमी के चलते देश-प्रदेश के हजारों विद्यालय ऐसे हैं जहां एक शिक्षक 100 से 150 बच्चों तक को संभालते हैं। कहीं-कहीं तो अकेले शिक्षामित्र के सहारे पर ही पूरा विद्यालय चलता है। आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि देश में इस समय 13.62 लाख प्राथमिक विद्यालय हैं और इनमें लगभग 49 लाख से अधिक शिक्षक तैनात हैं। पूरे देश में अनुमानित 19.88 करोड़ बच्चे प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ रहे हैं। देश के करीब 1.5 लाख विद्यालयों में 12 लाख से भी ज्यादा पद खाली पड़े हैं, जिसके कारण 1 करोड़ से ज्यादा बच्चे विद्यालयों से बाहर हैं। इसका प्रभाव यह हो रहा है कि उत्तर प्रदेश सहित कई प्रदेशों के बच्चों के सीखने-पढ़ने व समझने के स्तर में बराबर गिरावट हो रही है। अब समझा जा सकता है कि ऐसी स्थित में कैसे सरकारी विद्यालयों में शिक्षण कार्य होगा और प्रश्न उठता है कि क्या ऐसी स्थिति में सरकारी कर्मचारी अपने बच्चों को ऐसे माहौल में पढ़ाएंगे।
पेयजल और बैठने की व्यवस्था तक नहीं
यूनीसेफ की रपट पर नजर डालें तो देश के 30 फीसद से अधिक विद्यालयों में पेयजल की व्यवस्था ही नहीं है। साथ ही 40 से 60 फीसद विद्यालयों में खेल के मैदान नहीं हैं। करीब 24 हजार विद्यालयों के पास अभी भी पक्के भवन नहीं हैं।
लड़कियों के लिए शौचालय तक नहीं!
आंकड़े बताते हैं कि देश के 31 प्रतिशत विद्यालयों में लड़कियों के लिए शौचालय की व्यवस्था ही नहीं है। अब ऐसी स्थिति में ग्रामीण वातावरण को देखते हुए अभिभावक लड़कियों को विद्यालय जाने से रोक देते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है। इसका ताजा उदाहरण झारखंड के जमशेदपुर के खरसावां में देखने को मिला जब 261 लड़कियों ने शौचालय न होने के कारण विद्यालय छोड़ दिया।
सरकारी सुविधाएं चाहिए, सरकारी विद्यालय नहीं
सरकारी अधिकारियों को सरकारी बंगला, गाड़ी, सुरक्षा एवं अन्य सभी सुविधाएं चाहिए पर उनको सरकारी विद्यालय और सरकारी अस्पताल नहीं चाहिए। इस विषय पर वरिष्ठ पत्रकार मधुकिश्वर कहती हैं 'यह बड़ा अजीब है कि सरकारी अधिकारियों को सरकार की सभी सुविधाएं चाहिए लेकिन अस्पताल और विद्यालय नहीं चाहिए। असल में उनको अपने बनाए तंत्र पर विश्वास नहीं है। उनको पता है कि प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षा का स्तर क्या है और विद्यालयों की हालत क्या है? उनको यह भी पता है कि यहां पढ़ने वाले बच्चों का स्तर किस तरह का होता है।' वह आगे कहती हैं 'मैं तो बराबर कहती आई हूं कि यहां पढ़ाई न के बराबर होती है और शिक्षा की हालत बदहाल है।' उनसे यह पूछा कि न्यायालय के फैसले के बाद क्या सरकारी कर्मचारी अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में पढ़ाएंगे? तो वे कहती हैं 'मुझे नहीं लगता कि यह आदेश का पालन करेंगे। क्योंकि कानून तो छोटे लोगों के लिए होता है अफसरों और बड़े लोगों के लिए नहीं। लेकिन जिस दिन अगर इनके बच्चों को सरकारी विद्यालय जाना पड़ जाएगा उसी दिन से प्राथमिक शिक्षा और इन विद्यालयों की हालत सुधर जायेगी।'
किसी विद्यालय की महानता या गरिमा का निर्धारण उसकी इमारतों या उपकरणों से नहीं होता बल्कि कार्यरत अध्यापकों की विद्वता व चरित्र निर्धारण से होता है।
-डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
सरकारी खजाने से वेतन या सुविधा ले रहे बड़े लोगों के बच्चे जब तक अनिवार्य रूप से प्राथमिक शिक्षा के लिए सरकारी विद्यालयों में नहीं पढ़ेंगे, तब तक उनकी दशा में सुधार नहीं होगा।
– इलाहाबाद उच्च न्यायालय
फैसले पर जनता की प्रतिक्रिया
दुर्भाग्य है कि जिन्होंने समाधान सुझाया उन्होंने ही समस्या उत्पन्न की। अब जब न्यायालय का आदेश आया तो वे सहमें से हैं। वहीं अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव से आंचलिक भाषा-बोलियां उपेक्षित हो गईं। इसी का परिणाम है कि छ.ग. क्षेत्र में मिशनरियां अपने अनुरूप शिक्षा प्रसारित करने लग गईं। मिशनरियों को पता है कि भारत का भविष्य यानी प्राथमिक शिक्षा में ही विष घोल दिया जाए तो परंपरा,संस्कृति,सदाचार सब समाप्त हो जायेगा।
-राजीव रंजन प्रसाद, लेखक एवं उपन्यासकार
जिस शिक्षा व्यवस्था से निकलने वाले बच्चों पर देश का भविष्य तय होता है आज उसी व्यवस्था की नींव लगभग चरमरा कर ढहने के कगार पर है। लेकिन अब भी समय है जब सरकार और समाज मिलकर इस नींव की पुनर्स्थापना कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए उसे स्वयं आगे आकर उदाहरण प्रस्तुत करना होगा।
-अवनिका गौतम, झारखंड न्यायिक सेवा
दुनिया के देशों में नौकरशाह और सरकारों द्वारा बनाई गई नीतियों पर ही सबको चलना होता है, लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। यहां जो नौकरशाह-नेता नीति बनाते हैं वे उन पर नहीं चलते। जब उन पर इन्हीं नीतियों पर चलने का दवाब डाला जाता है तो वे तमाम तरह के तर्क देकर उसे काटने लग जाते हैं। आखिर उन्हें अपनी बनाई नीतियों पर चलने में परेशानी क्या है?
-सार्थक चतुर्वेदी, अधिवक्ता,सर्वोच्च न्यायालय
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सही स्थान पर चोट की है। प्राथमिक शिक्षा को सुधारने के लिए कोठारी आयोग ने पूरे देश में एक समान शिक्षा की बात की थी पर आयोग के सुझाव को मिशनरी एवं अभिजात्य वर्ग के दबावों के कारण लागू नहीं किया जा सका, जिसका परिणाम है कि आज देश में आर्थिक-सामाजिक विषमता लगातार बढ़ रही है। -अभिषेक सिंह चौहान, शोधार्थी, बीएचयू
निजी और सरकारी विद्यालयों में बहुत अंतर है। एक तरफ निजी एवं कॉन्वेंट विद्यालय संसाधनों से समृद्ध हैं तो दूसरी ओर सरकारी विद्यालयों में संसाधनों की भारी कमी है। ऐसे में अमीरों और अफसरों के बच्चे इन सरकारी विद्यालय में कैसे पढ़ेंगे? अगर न्यायालय का फैसला लागू होता है तो निश्चित ही सरकारी शिक्षा में सुधार होगा।
विनोद वशिष्ठ, शिक्षक, दिल्ली
' फैसला लागू हुआ तो सुधरेगी तीन साल में साख '
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के पूर्व निदेशक प्रो. जे.एस.राजपूत पाञ्चजन्य से बात करते हुए कहते हैं 'मैं शिक्षा को लेकर ऐसे बड़े निर्णय की प्रतीक्षा ही कर रहा था। मैं न्यायालय के इस निर्णय का स्वागत करता हूं और धन्यवाद करता हूं कि उसने सरकारी शिक्षा की सुध ली। यह आदेश शिक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम है। क्योंकि आज देश के 60 फीसद बच्चों की अनदेखी की जा रही थी। केवल हमने कहने के लिए 1-8 तक शिक्षा का अधिकार दे दिया। लेकिन शिक्षा में कोई सुधार नहीं हुआ।' वे कहते है 'सरकारी विद्यालयों में बच्चों को सामाजिकता, पारंपरिक संस्कृति, कौशल, प्रबंधन, गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा दिलाना ही होगा। अगर ऐसा नहीं होगा तो हर वर्ष प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों की कमी होती रहेगी। इसके पीछे भी कारण साफ है कि सरकारी विद्यालयों से अभिभावकों का मोहभंग होता जा रहा है। क्योंकि शिक्षा का स्तर दिनोंदिन गिरा है । अगर कुछ पुराने दौर हम में जाएं तो देखते हैं कि 1955-60 के आस-पास जो लोग पढ़ते और पढ़ाते थे वे बताएंगे कि उस समय की शिक्षा की हालत बहुत ही अच्छी थी। अध्यापकों की गुणवत्ता और पढ़ाने के प्रति उनका प्रेम समाज में उनको सम्मान दिलाता था। आज लोग उस समय के शिक्षकों को गर्व से याद करते हैं। लेकिन तब के समय और अब के समय में बदलाव आया है। समाज का सरकारी विद्यालयों से मोहभंग होता चला गया। क्योंकि अध्यापक और सरकारी शिक्षा की गुणवत्ता में बेतहाशा कमी हुई।' इसके पीछे वे मानते हैं और कहते हैं' तब गांव-देहात के विद्यालयों में स्थानीय समाज का बहुत बड़ा योगदान होता था। अब ऐसा नहीं रहा। दुर्भाग्य है कि शिक्षा की जो प्राथमिक चीज है उसे भी नष्ट करने का काम किया गया। घर और विद्यालय की भाषा में समरसता होनी चाहिए लेकिन हुआ इसके उलट। वहां पर मातृभाषा के स्थान पर बच्चे के मुंह में अंग्रेजी डाल दी गई। अगर आप यूनेस्को की 'लर्निंग द ट्रेजर विद इन'- डिलोस कमीशन रपट को देखें तो पाएंगे कि 21वीं सदी की शिक्षा के बारे में वह कहती है कि प्रत्येक देश की शिक्षा की जडं़े उस देश की संस्कृति से जुड़ी होनी चाहिए। लेकिन यहां पर इसे भुलाया गया। अब भी अगर इलाहाबाद उच्च न्यायालय का आदेश लागू होता है तो सरकारी शिक्षा की तीन साल में ही साख सुधर जायेगी।' गांव-देहात से लेकर शहरों में अभिभावकों के अंग्रेजी के प्रति आकर्षण पर वे कहते हैं 'हम अंधानुकरण के चलते पाश्चात्य व्यवस्था को अपनाते आए हैं। भाषा, संस्कृति, रहन-सहन और उनके चिंतन तक हम लेने में नहीं हिचकते। अब पश्चिम के देशों की भाषा अंग्रेजी है तो भारत भी वही नकल करता है। असल में समाज हमारा अंग्रेजी बोलने वाले को श्रेष्ठ मानता है। ऐसे में वह प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र में उनको व उनके बच्चों को आगे खड़ा करती है। इसका कारण है कि हमने अपनी मातृभाषा को भुलाया और उनकी भाषा को श्रेष्ठ माना है। इसलिए अगर व्यवस्था को सुधारना है तो हमें अंग्रेजी को रोकने पर बल नहीं देना है बल्कि अपनी भाषा को प्रोत्साहन देना है। अगर ऐसा करते हैं तो शिक्षा का स्वरूप अपने आप सुधर जायेगा।'
कब-कब क्या हुआ
मुदलियार आयोग
1952-53 में मुदलियार आयोग का गठन हुआ। इस आयोग ने कहा कि देश में समान शिक्षा व्यवस्था हो और निजी और कॉन्वेंट विद्यालयों पर रोक लगे।
कोठारी समिति
1964 में गठित कोठारी समिति ने माना था कि देश के सर्वांगीण विकास के लिए1- 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा दी जाए और बच्चे पास-पड़ोस में ही पढ़े ऐसी व्यवस्था की जाए। भाषाओं को विकसित करने को आयोग ने काफी महत्वपूर्ण माना था।
शिक्षा की राष्ट्रीय नीति
राजीव गांधी ने राष्ट्रीय नीति (एनपीई) की 1986 में घोषणा की।
ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड
देश में बड़े जोरशोर से 1987-88 में यह अभियान चला था। इसका जोर प्राथमिक विद्यालयों में विभिन्न संसाधनों को बढ़ाना था।
शिक्षकों की शिक्षा
1987 में ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड के तहत ही शिक्षकों की शिक्षा और ज्ञान को बढ़ाने के लिए संसाधन उपलब्ध कराए जाने लगे।
बच्चों को आहार
1995 में प्राथमिक बच्चों की संख्या बढ़ाने और उनको कैलोरी युक्त भोजन देने के लिए आहार मुहैया कराया जाने लगा।
सभी को शिक्षा
वर्ष 2000-2010 तक देश के सभी बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से आन्दोलन छेड़ा गया।
मौलिक अधिकार
वर्ष 2001 में देश के 6-14 वर्ष तक के बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रावधान किया गया।
शिक्षा का अधिकार
वर्ष 2009 में सरकार ने शिक्षा का अधिकार नाम से कानून का निर्माण किया।
विद्यालय में सुविधाएं (विद्यालय प्रतिशत)
(एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर) 2014 )
सुविधाएं 2010 2014
छात्र-शिक्षक अनुपात के मानक का पालन 38.9 49.3
कक्षा अध्यापक अनुपात के मानक का 76.2 72.8
पालन करने वाले विद्यालय
कंप्यूटर 15.8 19.6
पेयजल 72.7 75.6
प्रयोग करने लायक शौचालय 47.2 65.2
प्रयोग लायक बालिकाओं के शौचालय 32.9 55.7
कितने शिक्षक (लाख में)
वर्ष प्राथमिक उच्च प्राथमिक हाई स्कूल इंटरमीडिएट
1950-51 5.38 0.86 10.06 1.27
2013-14 26.84 25.13 12.86 17.85
विद्यालय छोड़ने की दर
वर्ष कक्षा 1-5 कक्षा1-8 कक्षा 1-10
1950-51 64.9 78.3 82.5
2013-14 19.8 36.3 47.4
60%अमीरों के बच्चे कान्वेंट या निजी विद्यालयों में पढ़ते हैं
संयुक्त राष्ट्र की रपट की मानें तो महाराष्ट्र-गुजरात में 15-17 फीसद अध्यापक अनुपस्थित रहते हैं।
बिहार-झारखंड में 38-42 फीसद अध्यापक अनुपस्थित रहते हैं।
12 लाख शिक्षकों की कमी है देश में
पढ़ाई का स्तर (प्रतिशत में)
कक्षा दो की किताब पढ़ने में सक्षम
कक्षा पढ़ने में सक्षम छात्र
कक्षा तीन 23.6
कक्षा पांच 48.1
कक्षा आठ 74.6
शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी गैर सरकारी संस्था 'प्रथम' के एक सर्वे के मुताबिक सरकारी विद्यालयों की पांचवीं कक्षा के 50 फीसद बच्चे ऐसे हैं, जो दूसरी कक्षा की किताब तक नहीं पढ़ पाते। सर्वे में यह भी साफ है कि पांचवीं के बच्चे इतने कमजोर हैं कि वे दो संख्या को जोड़ तो लेते हैं लेकिन घटाने के हिसाब में फंस जाते हैं और भाग तो 75 फीसद बच्चे नहीं कर पाते हैं।
पढ़ाई के सिवाय गुरुजी करते हैं सब काम
मध्याह्न भोजन कैसे बनना है, सब्जी लाना, गैस-तेल, लकड़ी-कंडे का इंतजाम करना
बच्चों को पुस्तकें बांटना, छात्रवृत्ति के लिए खाता खुलवाना,विद्यालय की वर्दी बांटना
मतदाता सूची का काम, जनगणना कार्य, पल्स पोलियो दवा पिलाना,मतदान करवाना
राज्य सरकारें और केन्द्र शीघ्र लागू करें यह निर्देश
इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव से यह सुनिश्चित करने को कहना कि सरकारी कर्मचारियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ें, यह स्वागतयोग्य है। भारतीय शिक्षण मंडल हमेशा से इस कदम को उठाए जाने की मांग करता रहा है क्योंकि यह सार्वजनिक शिक्षा तंत्र में सुधार करने का एक महत्वपूर्ण कदम है। शिक्षा में सरकार के पास सर्वोत्तम मानव संसाधन है। ज्यादातर योग्य शिक्षक सरकार के पास उपलब्ध हैं। कई राज्यों में ढांचा काफी बेहतर है। बड़े मैदान, प्रयोगशालाएं हैं। सरकारी अधिकारी, प्रशासक और खुद शिक्षक इन संस्थानों से सरोकार नहीं रखते, यह दुख की बात है। उच्च न्यायालय का निर्देश इस दिशा में एक बड़े कदम की तरह है जब मुख्य सचिव, कलेक्टर या प्रधानाध्यापक का बच्चा सरकारी स्कूल में भर्ती होगा तो वे भी इस स्कूल की चिंता करेंगे। उम्मीद है यह निर्देश सभी राज्य सरकारों और केन्द्र द्वारा तेजी से लागू किया जाएगा। इसमें यह भी जोड़ा जा सकता है कि ये प्रावधान सभी मंत्रियों, विधायकों और सांसदों पर भी लागू हों, क्योंकि वे भी जनसेवक हैं।
-मुकुल कानिटकर, सह संगठन मंत्री,भारतीय शिक्षण मंडल
सरकारी अधिकारियों को सभी सरकारी सुविधाएं चाहिए लेकिन अस्पताल और विद्यालय नहीं । असल में उनको अपने बनाए तंत्र पर विश्वास नहीं है क्योंकि वे जानते हैं कि प्राथमिक विद्यालयों की हालत कैसी है।
-मधु किश्वर, वरिष्ठ पत्रकार
लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था में शिक्षा पद्धति दो प्रकार की नहीं हो सकती है। अब हरहाल में इसमें सुधार की आवश्यकता है। अगर ऐसा नहीं होता है तो देश में असामान्य स्थिति उत्पन्न होगी।
-प्रो.हरिकेश बहादुर
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय
कोई भी सक्षम माता-पिता अपने बच्चे को सरकारी प्राथमिक विद्यालय इसलिए नहीं भेजता क्योंकि यहां पर शिक्षा का स्तर बेहद निम्न है। अगर अदालत का फैसला लागू होता है तो प्राथमिक शिक्षा की खोई साख लौट आएगी।
-डॉ. रमाशंकर पाण्डेय, शिक्षक (उत्तराखंड)
क्यों पिछड़ते हैं ग्रामीण पृष्ठभूमि के बच्चे!
गांव-देहात से प्राथमिक शिक्षा और वहीं से दसवीं और बारवीं करने के बाद आगे की पढ़ाई या फिर बड़े शहरों में रोजगार पाने के लिए जब वे आते हैं तो यहां पर उनका सामना बेहतर शिक्षा और बड़े-बड़े कॉन्वेंट अंग्रेजी विद्यालयों में तरासे गए युवाओं से होता है। इसी का फायदा शहरी युवा उठाते हैं और ग्रामीण पृष्ठभूमि के युवा मात खाते हैं। हमने इसी विषय पर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रो. हरिकेश बहादुर से बात की और जानने की कोशिश की आखिर क्या कारण है कि गांव-देहात के युवा पिछड़ जाते हैं और शहरों के बच्चे आगे निकल जाते हैं। वे कहते हैं ' निजी क्षेत्र की नौकरियों में ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे पिछड़ते हैं लेकिन उसका भी प्रतिशत कम ही है। असल में आज अंग्रेजी से लदी शिक्षा का प्रभाव बढ़ा है। इस कारण कहीं-कहीं पर ग्रामीण परिवेश से गए बच्चे पिछड़ते हैं। लेकिन जब आप इसे समग्रता से लेते हैं तो ऐसा नहीं है। अधिकतर सफल लोग गांव-देहात के ही होते हैं।' वे आगे कहते हैं 'इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला संविधान के लागू होने के छह दसक बाद आया है। लेकिन अभी भी समय है। दूसरी बात लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था में शिक्षा पद्धति दो प्रकार की कैसे चल सकती है? अगर इसमें सुधार नहीं हुआ तो देश में असामान्य स्थिति उत्पन्न होगी। समय रहते इसमें परिवर्तन आवश्यक है।
शिक्षा में क्या हो बदलाव
देश में सरकारी विद्यालयों के संख्यात्मक वृद्धि की आवश्यकता नहीं है आवश्यकता है तो गुणात्मक सुधार की।
पर्याप्त अध्यापकों की नियुक्ति हो तथा अध्यापकों हेतु एक सशक्त सेवा नियामावली बनाई जाए जिससे उनकी कार्यक्षमता में सुधार हो
अध्यापकों के लिए सेवा पूर्व एवं सेवा के दौरान समय-समय पर उचित प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाए। चयनित अध्यापकों का प्रत्येक तीन वर्ष में विभागीय परीक्षा या साक्षात्कार के माध्यम से उनके विषय विशेषज्ञता की परीक्षा ली जाए और जिसको उत्तीर्ण करना प्रत्येक अध्यापक के सेवा विस्तार हेतु आवश्यक हो।
सरकार द्वारा गरीब बच्चों को लुभाने और संख्या बढ़ाने के लिए लोकलुभावन योजनाएं तत्काल बंद होनी चाहिए।
सरकारी विद्यालयों को निजी विद्यालयों की भांति तकनीकी संसाधनों से सुसज्जित किया जाए।
शिक्षा की नीतियां केवल राजधानियों में बंद कमरों में नौकरशाहों द्वारा न तय की जाएं। इन नीतियों के निर्माण हेतु जमीनी स्तर पर आंकड़े एवं सुझाव प्राप्त करके उन्हें लागू किया जाए। तथा समय-समय पर उन नीतियों की समीक्षा की जाए और और कमी मिलने पर सुधार हेतु सख्त कदम उठाए जाएं।
समान शिक्षा पाठ्यक्रम लागू हो।
शिक्षा में क्या हो बदलाव
अश्वनी मिश्र











