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नंद के आनंद भयो…

Written byArchiveArchive
Aug 22, 2015, 12:00 am IST
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दिंनाक: 22 Aug 2015 15:00:11

 

जन्माष्टमी विशेष
भारतीय संस्कृति में कृष्ण का विशेष स्थान है। भारतीय साहित्य पर भी यदि किसी एक व्यक्ति का सर्वाधिक प्रभाव रहा है, तो वह कृष्ण ही हैं। सैकड़ों वर्षों से वे हमारे शास्त्र, दर्शन और साहित्य के विभिन्न पक्षों से जुड़े हुए हैं। कृष्ण के अनेक रूप हैं। वे धीर, वीर, गंभीर विचारक, निष्काम कर्मयोगी, कूटनीतिज्ञ, ज्ञानी और ब्रह्मवेत्ता होने के साथ ही कुशल नर्तक, बांसुरीवादक और रसिक शिरोमणि भी हैं। इसीलिए उनके विभिन्न पक्षों पर विभिन्न विद्वानों ने काफी लिखा और उस पर चिन्तन किया। ईश्वर-भक्तों ने कृष्ण को ईश्वर के अवतार के रूप में स्वीकारा, ज्ञानियों ने उन्हें महान चिंतक और विचारक के रूप में देखा, योद्धाओं ने उन्हें सुदर्शन चक्रधारी और पराक्रमी वीर व्यक्ति के रूप में पहचाना और रसिकजनों ने उन्हें गोपियों के बीच नृत्य करने वाले प्रेमी के रूप में अपने हृदय में बसाया।
कृष्ण ने हमारे इतिहास को प्रभावित किया है। वे ज्ञानातीत होने के साथ ही कालातीत भी हैं। देवकी-पुत्र के रूप में कृष्ण की चर्चा हमें छान्दोग्य उपनिषद में मिलती है, लेकिन वहां भी उन्हें ऋषि अंगिरस का शिष्य बतलाया गया है। देवकी और वसुदेव के पुत्र के रूप में वासुदेव कृष्ण का स्पष्ट उल्लेख महर्षि पाणिनी की 'अष्टाध्यायी' में है। वहां हमें कृष्ण के साथ ही अर्जुन और बलराम (संकर्षण) का भी उल्लेख मिलता है। महाभारत में तो कृष्ण की विस्तृत चर्चा है ही, ईसा से शताब्दियों पूर्व न केवल भारत में कृष्ण को ईश्वर के रूप में प्रतिष्ठित किया जा चुका था, बल्कि विदेशों में भी इसका प्रचार-प्रसार हो रहा था। इसके प्रमाण के रूप में हम लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के यूनानी शासक अगाथोकल्स द्वारा जारी किये गए उस सिक्के को ले सकते हैं, जिसके एक ओर सुदर्शन चक्रधारी कृष्ण तथा दूसरी ओर हलधर बलराम की आकृतियां अंकित हैं। यह सिक्का अफगानिस्तान के उत्तर में अमू दरिया (ओक्सस या वक्षु नदी) के निकट अईखानूम नामक स्थान पर की गई खुदाई में मिला था।
लगभग इसी अवधि में शुंग नरेश काशीपुत्र भागभद्र के शासनकाल में हेलियोदोरस नामक व्यक्ति यवन-नरेश के राजदूत के रूप में यहां आया था और उसने वैष्णव धर्म की दीक्षा ली थी। उसने विदिशा में कृष्ण के एक मंदिर के सामने एक गरुड़ ध्वज (प्रस्तर-स्तंभ) भी स्थापित किया था। इस पर लिखे अभिलेख में हेलियोदोरस ने अपने को वासुदेव कृष्ण का परम भक्त घोषित किया है।
प्राचीन काल में पिता के नाम के अनुरूप ही पुत्र के नामकरण की परम्परा थी। इसलिए पिता वसुदेव के नाम पर पुत्र का नाम वासुदेव पड़ा। जहां तक कृष्ण का संबंध है, डॉ. भंडारकर के अनुसार यह ब्राह्मण- गोत्र हो सकता है। प्राचीन काल में क्षत्रिय जन अपने नाम के साथ अपने पुरोहित ब्राह्मण के गोत्र को भी जोड़ लेते थे और शायद इसीलिए वासुदेव के साथ कृष्ण नाम जुड़ा और कालान्तर में जनसाधारण में केवल कृष्ण नाम ही लोकप्रिय हो गया। श्यामवर्ण के कारण भी शायद उन्हें कृष्ण कहा जाने लगा हो।
वैदिक साहित्य में ऋग्वेद में आये पूर्वोक्त उल्लेख के अतिरिक्त भी कुछ अन्य स्थानों पर कृष्ण का नाम आया है, जहां उन्हें यमुना के किनारे इन्द्र से युद्ध करते हुए बतलाया गया है। उल्लेखनीय है कि वासुदेव कृष्ण की भी इन्द्र से संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हुई थी और तब उन्होंने गोवर्धन पर्वत की सहायता से ब्रजवासियों की रक्षा की थी। इससे कुछ विद्वानों का अनुमान है कि वासुदेव कृष्ण का वैदिक कृष्ण से भी कोई संबंध संभव है।
प्रसिद्ध लेखक श्री चन्द्रकान्त बाली ने महाभारत के आधार पर की गयी गणना से निकाले गये निष्कर्षों में कृष्ण-जन्म का अनुमानित वर्ष 3238 ईसा पूर्व बतलाया है। उस दिन भाद्रपद अष्टमी कृष्ण पक्ष, रोहिणी नक्षत्र बुधवार था। इसी तिथि के आधार पर उन्होंने कृष्ण गाथा के आगे की भी गणना की है। तदनुसार गोवर्धन धारण की घटना सात वर्ष की आयु में हुई और कंस-वध उन्होंने 15 वर्ष की आयु में किया। इसके उपरांत कृष्ण विद्याध्ययन के लिए चले गये। गुरुकुल में वे 12 वर्ष तक रहे और वहां से लौटने के बाद वे कौरव-पांडव संघर्ष में उलझ गए।
भारतीय काल-गणना के अनुसार हमारे यहां कुल चार युग हैं- सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग। कृष्ण का जन्म द्वापर के उत्तरार्द्ध में हुआ। अब पिछले 5100 वर्षों से कलियुग चल रहा है। इस प्रकार यही अनुमान लगाया जा सकता है कि कृष्ण का जन्म लगभग छह हजार वर्ष पूर्व हुआ होगा।
श्री चन्द्रकान्त बाली की कालगणना भी लगभग इसी के अनुरूप है। प्राचीन साहित्य में कृष्ण का वर्णन लगभग तीन हजार वर्ष पहले से मिलता है। संभव है कृष्ण का वर्णन उस प्राचीन साहित्य में भी रहा हो, जो अब उपलब्ध नहीं है। स्पष्ट ही कृष्ण में देवत्व की विचारधारा का विकास धीरे-धीरे हुआ होगा और उनके जीवन के साथ अन्य घटनाएं भी धीरे-धीरे जुड़ी होंगी।                       -प्रो. योगेश चन्द्र शर्मा

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