| दिंनाक: 11 Jul 2015 12:53:00 |
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किसी भी देश का इतिहास उस राष्ट्र की स्मरण शक्ति तथा मनुष्य के आचरण का ब्योरा होता है। इतिहास अतीत का प्रकटीकरण, वर्तमान में राष्ट्र का मार्गदर्शक तत्व तथा भविष्य में आने वाले तूफानों का एक प्रकाश स्तंभ होता है। यूनेस्को के अनुसार किसी भी इतिहास की जड़ें उसकी संस्कृति में होती हैं। अत: इतिहास अथवा उसके पाठ्यक्रम का उक्त राष्ट्र के समाज तथा देश से गहरा संबंध है। अतीत से प्रेरणा, वर्तमान में आस्था तथा भविष्य की परिकल्पना में इतिहास का सर्वोपरि स्थान है। राष्ट्रोत्थान में, समाज में आत्मविश्वास, स्वाभिमान, आत्मगौरव तथा देशभक्ति जगाने में इतिहास की निर्णायक भूमिका होती है। संभवत: इसीलिए विजयी राष्ट्र विजित राष्ट्र में, वहां के लोगों में उनके इतिहास के प्रति हीनता, शून्यता तथा रिक्तता का भाव जगाने में प्रभावी तथा मनमाने ढंग के तरीके अपनाता है। विजयी राष्ट्र परतंत्र किये राष्ट्र में आत्मविस्मृति तथा राष्ट्रीय अचेतना जागृत करता है। वह वहां के राष्ट्रीय नेताओं का चरित्र हनन करता है।
कनाडा, अमरीका
20वीं शताब्दी में विश्व के विभिन्न देशों में अपने-अपने देश के इतिहास के पाठ्यक्रमों में भारी परिवर्तन, परिवर्द्धन, संशोधन तथा पुनर्लेखन हुआ हैं। ये विभिन्न देशों की पाठ्यपुस्तकों के अध्ययन से ज्ञात होता है। विश्व की अनेक पत्र-पत्रिकाएं भी इस पर समुचित प्रकाश डालती हैं। उदाहरण के रूप में कुछ प्रमुख जर्नल्स को ले सकते हैं, जैसे- 'हिस्ट्री', जर्नल ऑफ करीकूलम स्टडीज, हिस्ट्री एण्ड थ्योरी तथा लोकल हिस्ट्री आदि। इतिहास पाठ्यक्रम में परिवर्तन के उत्तरदायी तत्व समान नहीं होते, बल्कि विभिन्न देशों की आवश्यकता के अनुरूप होते हैं। 1990 में कनाडा के इतिहास में पाठ्य पुस्तकों का पुनर्लेखन हुआ। इसके तीन-चार प्रमुख कारण थे (देखें, के ओसवोर्न, टीचिंग हिस्ट्री इन स्कूल्स: ए कैनेडियन डिबेट, जर्नल ऑफ करीकूलम स्ट्डीज भाग 35 (5) 2003, पृ. 586-626) इसमें सबसे महत्वपूर्ण तत्व, तब तक स्कूलों में जो इतिहास की पुस्तकें पढ़ाई जा रही थीं, उसमें पर्याप्त मात्रा में राष्ट्रवाद का अभाव था। इसके साथ ही पाठ्यपुस्तकों में कनाडा देश की जानकारी बहुत कम थी। कनाडा के अतीत के सामाजिक अध्ययन करते समय पुराने राष्ट्र निर्माण के लिए किये गये प्रयत्नों का वर्णन कम कर दिया गया था। साथ ही यह वर्णन सकारात्मक अध्ययन की अपेक्षा नकारात्मक अधिक पढ़ाया जाता था। इसके साथ ही बाल केन्द्रित सिखाने की पद्धति ने अध्यापकों में तथ्यात्मक ज्ञान की कमी ला दी।
इसी भांति 1990 ई. का दशक दक्षिण अमरीका तथा मैक्सिको में इतिहास के पाठ्यक्रम का विषय गंभीर बना रहा। सामान्यत: यूरोपीय इतिहासकारों तथा लेखकों ने 500 वर्ष पूर्व के इतिहास को विश्व जगत में इसे एक नये विश्व की खोज के रूप में देखा जिससे यूरोप को नये-नये आर्थिक साधनों की उपलब्धि हुई, जबकि दक्षिण अमरीका के इतिहासकारों ने इसे एक स्वतंत्र विकसित सभ्यता के नष्ट होने के रूप में देखा जिसे लूटमार कर, विनष्ट कर दिया। अत: संक्षेप में इसकी 500वीं जयंती की समाप्ति यूरोपवासियों के लिए उत्सव मनाने का पर्व था, जबकि दक्षिण अमरीकियों के लिए हजारों वर्षों से विकसित सभ्यता की प्रलयंकारी भयानक स्मृति का दिवस था। दोनों ही प्रकार का इतिहास पाठ्यक्रम उन देशों के इतिहास में स्पष्ट रूप से झलकता है। अत: देशों के इतिहास के पाठ्यक्रमों में क्रांतिकारी परिवर्तन, संशोधन तथा पुनर्लेखन हुए।
यूरोप में इतिहास
द्वितीय महायुद्ध के पश्चात मई 1949 में जर्मनी को मोटे रूप से दो भागों में विभाजित कर दिया गया। एक भाग में जर्मनी के तीन हिस्सों को मिलाकर संघीय जर्मन गणराज्य तथा दूसरे में जो सोवियत संघ को मिला जर्मन प्रजातांत्रिक गणराज्य नाम दिया गया। दोनों भागों में इतिहास पाठ्यक्रम बदल दिया गया। खासकर सोवियत संघ वाले भाग में मार्क्स, लेनिन तथा स्टालिन के विचारों तथा चिंतन को जबर्दस्ती लादा गया। परंतु जब 1990 ई. में जर्मनी का पुन: एकीकरण हुआ तब इतिहास का पाठ्यक्रम पुन: बदला गया। इस अवसर पर पूर्वी जर्मनी में हम्वोल्ट विश्वविद्यालय के एक छात्र ने अपने इतिहास के प्रोफेसर से पूछा, सर पहले तो आपने कुछ और पढ़ाया था, अब कुछ और पढ़ा रहे हैं? प्रोफेसर ने उत्तर दिया, हां तुम सही कहते हो। वह अपमानजनक था, वह झूठा था, तब मैं वह पढ़ाता था जो सरकार चाहती थी। पर अब वह पढ़ाता हूं जो सही इतिहास है।
इतिहास पाठ्यक्रम की सर्वाधिक दुर्गति तथा उसका वीभत्स रूप सोवियत संघ के शासनकाल (1917-1992) में स्पष्ट रूप से दिखलाई देता है। सामान्यत: मार्क्सवादी या वामपंथी इतिहासकारों ने सदैव इतिहास का प्रयोग एक राजनीतिक हथियार के रूप में किया है (देखें, सतीशचन्द्र मित्तल, मार्क्सवादी चिंतन तथा इतिहास का मुखौटा, इतिहास दर्पण, भाग 13(2) 2008 पृ. 132-140)। वे तथ्यों को तोड़ मरोड़कर अथवा गायब कर अपनी भविष्य की सोच के अनुकूल इतिहास गढ़ते तथा तरासते रहे हैं। सोवियत संघ ने इतिहास पाठ्यक्रम का पूर्णत: सरकारीकरण किया। स्वयं कार्ल मार्क्स (1818-83) का चिंतन 19वीं शताब्दी की परिस्थितियों की उपज था। वह कोई इतिहासकार न था स्वाभाविक रूप से देश-विदेश में मार्क्स के इतिहास की व्यवस्था की कटु आलोचना हुई। प्रो. लास्की ने मार्क्स के इतिहास की व्याख्या को एक कटु असत्य बताया। प्रो. टेलर ने लिखा है कि लगता है मार्क्स को इतिहास का ज्ञान नहीं था। भारत में सुभाषचन्द्र बोस ने मार्क्स की भौतिकवादी व्याख्या को अस्वीकार किया। डॉ. आंबेडकर ने वर्ग संघर्ष को एक 'खोखला नारा' बताया। डॉ. राम मनोहर लोहिया ने इतिहास को सीधी रेखाओं की भांति न मानकर चक्रवत इतिहास का अध्ययन करते हुए मार्क्स की आलोचना की (देखें, द व्हील ऑफ हिस्ट्री)।
लेनिन (1870-1924) ने मार्क्स का मार्ग अपनाया। अनेक समकालीन विरोधी विद्वानों का क्रूरतापूर्वक दमन किया गया। तत्कालीन घटनाओं को अपने अनुकूल मनमाने ढंग से लिखा गया। मार्क्स गोर्की (1864-1936) की अनेक रचनाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया। गोर्की ने उसकी खुलकर आलोचना की थी (देखें, शंकर शरण, मार्क्सवाद के खण्डहर, पृ. 11,13,45 व 47-48)। 1918-19 में लेनिन ने 70,000 व्यक्तियों को दंडित किया (देखें, चन्द्रशेखर शुक्ल, गांधी एण्ड मार्क्स, भवन जनरल, 1961)। 1923 ई. में लेनिन ने सोवियत लेखकों के लिए एक सरकारी निर्देशिका (गाईड बुक) प्रकाशित की, जिसकी सम्पादिका लेनिन की पत्नी क्रुप्सकाया व स्पेशन्शकी थे। स्टालिन ने अपने शासनकाल (1924-1953) में इतिहास को मनमाने ढंग से बदलने तथा अपने नियंत्रण में रखा। उसे सोवियत संघ में इतिहास विज्ञान का पिता कहा जाता था। उसके निर्देशन में इतिहास की एक किताब छपी जिसका नाम था सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास- एक संक्षिप्त पाठ्यक्रम। 1928 में स्टालिन को इतिहास की रचना पर पूर्व अधिकार दे दिये गये। 1934 ई. में इतिहास को पार्टी की विचारधारा के अनुसार लिखने का आदेश हुआ। (देखें, डैविड रैमनिक, लेनिनन्स टूम्ब, द लास्ट डेज ऑफ द सोवियत इम्पायर पृ.17)। इस पर तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इतिहासकार जेनरिख जोथी ने लिखा कि प्रत्येक स्कूल के लड़के एवं लड़कियों को झूठी घटनाओं से भरने का तरीका अपनाया गया। डेविड रैमनिक जो स्वयं रूस के विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे थे, उसने इतिहास के संक्षिप्त पाठ्यक्रम के बारे में लिखा, यह एक पूर्व निश्चित इतिहास की पाठ्यपुस्तक थी। इसमें सभी प्रमुख घटनाएं, आवश्यक रूप से, वर्तमान शासन के सच तथा शक्ति को कठोरता से एक शानदार परिणाम बतलाती है। ऐसी पाठ्यपुस्तक में इतिहास आंतरिक संघर्षों, अनिश्चितता व प्रति इच्छा, निरर्थकता से मुक्त रहता था। किसी प्रकार के प्रश्न या लेखन को अस्वीकार करना 'क्रिमिनल कोड' के विपरीत माना जाता था। अत: लिखित पाठ्यक्रम को नकारना अपनी मौत को बुलाना था। इतिहास पाठ्यक्रम की दिशा स्टालिन के पश्चात भी सोवियत अधिनायकों का मार्गदर्शक बनी रही। ल्योनीड ब्रेझनेव ने अपने काल में (1964-1982) विश्व तथा सोवियत इतिहास के विश्लेषण में स्टालिन का मार्ग अपनाया। किसी अन्य मत या विरोधी चिंतन को लिखने की स्वतंत्रता नहीं दी। इतिहास सहित, स्कूलों के पाठ्यक्रमों पर कठोर नियंत्रण किया गया। 1974 में विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार सोल्फेनित्सिन को देश निकाला दे दिया गया। 1968 ई. में चेकोस्लोवाकिया पर सोवियत संघ के भयंकर आक्रमणों की अनेक घटनाएं इतिहास के पाठ्यक्रम से गायब कर दी अथवा विरोधी मत से अज्ञात रखी। 1979 ई. में सोवियत संघ के अफगानिस्तान आक्रमण को, जिसमें लगभग 1.5 लाख रूसी सेना मारी गई थी, इसे अन्तरराष्ट्रीय कर्त्तव्य या समाजवादी भाइयों का निमंत्रण बतलाया। सोवियत संघ ने अगले दस वर्षों तक अफगानिस्तान में मनमानी की। शिक्षा में आमूल-चूल परिवर्तन किये। इतिहास की पाठ्यपुस्तकों का पुनर्लेखन किया तथा संशोधित पाठ्यक्रम को प्रगतिशील कहा। (देखें एडवर्ड गिरारडेट, अफगानिस्तान द सोवियत वार, पृ.145-46)। 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में समूचे पूर्वी यूरोप में भी इतिहास के पाठ्यक्रम में सोवियत संघ के अधिनायकों द्वारा मनमाने परिवर्तन हुए। इस संदर्भ में पूर्वी यूरोप में पोलैण्ड, चेकोस्लोवाकिया, हंगरी, रुमानिया, बल्गेरिया, यूगोस्लाविया, अल्वेनिया और पूर्वी जर्मनी, बाल्टिक गणराज्य, मंगोलिया (आउटर) अफगानिस्तान, यहां तक कोरिया, क्यूबा तक अपने सामंतवादी साम्राज्य की स्थापना कर सर्वत्र इतिहास के पाठ्यक्रम को तोड़ा-मरोड़ा तथा इसमें अपने ढंग से लीपापोती की गई (विस्तार के लिए देखें, सतीशचन्द्र मित्तल, विश्व में साम्यवादी साम्राज्यवाद का उत्थान एवं पतन)। सामान्यत: यह स्पष्ट रूप से प्रकट होता है कि समस्त यूरोप में जब-जब साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिला या इसके विपरीत राष्ट्रवादी ताकतें बढ़ी, इतिहास के साथ तथा उसके पाठ्यक्रमों में भरी परिवर्तन तथा इससे छेड़छाड़ की गई। अत: सोवियत संघ के विघटन के दौरान अथवा विघटन होने पर पुन: इतिहास के पाठ्यक्रमों में भारी परिवर्तन हुए।
जहां यूनान जैसे छोटे देश में 1929 ई. में स्वतंत्र होने पर वहां के इतिहासकारों ने अपनी पाठ्यपुस्तकों में अपने को विश्व की प्राचीनतम सभ्यता वाला देश (अर्थात) 4004 वर्ष ई. पूर्व) का देश बताया। वहां स्वतंत्रता की लहर आने पर यूनाइटेड किंगडम जो वेल्स, स्काटलैण्ड तथा आयरलैण्ड से बना है। अपने अस्तित्व को खतरा लगा। इतिहास पाठ्यक्रमों को इंग्लैण्ड से मुक्त कर लिया। साथ ही कहा, हम आयरिश हैं, इंगलिश नहीं। वेल्स ने कहा हम वैलिसी हैं, इंगलिश नहीं और स्काटलैण्ड ने 18 सितम्बर 2014 के जनमत संग्रह में 45 प्रतिशत जनता ने बता दिया हम इंगलिश हैं पर ब्रिटिश नहीं। सभी स्थानों पर इतिहास के पाठ्यक्रमों में परिवर्तन, संशोधन तथा पुनर्लेखन की एक बड़ी लहर दिखलाई देती है।
एशिया में इतिहास
समूचे एशिया में भी राजनीतिक परिवर्तन के साथ उपरोक्त लहर चीन, भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, म्यांमार, यहां तक कि हांगकांग जैसे छोटे राज्य में भी दिखलाई देती है। यह सर्वविदित है कि जब हांगकांग ब्रिटिश साम्राज्यवाद से 1997 ई. में मुक्त हुआ तो दो महीने तक स्कूलों में इतिहास का पाठ्यक्रम बंद कर दिया गया तथा इसके बाद ब्रिटेन से मुक्त हांगकांग में नवीन पाठ्यक्रम से इतिहास पढ़ाया गया। इतिहास की पाठ्यपुस्तकें शीघ्र ही चीन में माओत्सेतुंग के शासनकाल (1949-1976) तथा उसके उत्तराधिकारियों की विस्तारवादी नीति का शिकार बनी। अधिनायकवादी माओ को 'न्यू इम्परर ऑफ इविल जीनियस', प्रबलतम जन हत्यारा, पंबलतम बदमाश निरंकुश आदि घृणित शब्दों से उसकी कटु आलोचनाएं हुई। पर उसने भी इतिहास को मनमाने ढंग से बदला। माओ के मरने के पश्चात चीन के इतिहास पर पुन: विचार किया गया तथा एक नवीन इतिहास रचा गया (देखें, डैविड एस.जी. गुडमैन, लीगेसी ऑफ द कल्चरल रिवोल्यूशन, प्राबलम्स ऑफ कम्युनिज्म, सितम्बर, अक्तूबर 1981, पृृ. 62-65)। इतिहास पाठ्यक्रम के संदर्भ में माओत्सेतुंग की एक घटना का प्रसंग देना उपयुक्त होगा। रौस टेररिल एक आस्ट्रेलियन पत्रकार ने चीन के इतिहास का गहन अध्ययन किया। 1970 के दशक में उसने चीन की 25 से अधिक यात्राएं कीं।
उसने माओ की पत्नी पर एक पुस्तक 'व्हाइट बैनेड डेमन' लिखी। पुस्तक मूलत: 1984 में छपी। उसने इसे पुन: 1990 ई. में चीन में छपवाया। छपने के पश्चात देखने से पता चला कि लेखक से बिना पूछे पुस्तक का 20 प्रतिशत मूल तथा मुख्य भाग गायब कर दिया गया। अत: चीन में मनमानी नीति व भ्रष्टाचार न केवल आर्थिक क्षेत्र में बल्कि इतिहास के लेखन तथा प्रकाशन के क्षेत्र पर भी व्याप्त था (देखें, डेविड आईकमैन, पैसिफिक रीम (बोस्टन 1986) पृ. 237)। फलत: अनेक विद्वानों तथा लेखकों को हटा दिया गया। भारतीय इतिहास से यही खिलवाड़ ब्रिटिश इतिहासकारों, प्रशासकों, ईसाई पादरियों तथा वर्तमान में भारतीय कम्युनिस्ट लेखकों, कथित सेकुलरवादियों तथा कांग्रेस शासन ने किया, जिसका वर्णन समय पर किया जाएगा।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि किसी भी देश के इतिहास का पाठ्यक्रम चाहे वह कनाडा या अमरीका हो, जर्मनी, यूनान, इंग्लैंड या रूस तथा पूर्वी यूरोप के देश का हो या एशिया के देश का हो, उसका पाठ्यक्रम वहां की मूल सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा होना चाहिए, जो विश्व के संदर्भ में, तथ्यों पर आधारित संतुलित तथा सही विवेचन करने वाला होना चाहिए।
-डॉ. सतीशचन्द्र मित्तल