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पश्चिम बंगाल सिर्फ सारदा घोटाला ही नहीं, बल्कि चिट फंड कंपनी घोटालों का गढ़ बनता जा रहा है। राज्य में करीब 95 चिट फंड कंपनियों के विरुद्ध मामले दर्ज हैं। रोजाना नई-नई कंपनियों द्वारा घोटाला करने के खुलासे हो रहे हैं और एक से एक बड़ी हस्तियां करोड़ों रुपए के घोटाले में नामजद हो रही हैं। हालत यह है कि ऊपर से निचले स्तर तक सभी घोटालों में लिप्त हैं और घोटालों की चपेट में आकर करीब 70 लोगों की मौत भी हो चुकी है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार एक सरकारी घोषणा से खुलासा हुआ है कि सारदा चिट फंड घोटाले के समय तो जनता से 2460 करोड़ रुपए इकट्ठा किए गए थे, जबकि रोजवैली चिट फंड कंपनी ने 10280 करोड़ रुपया गरीब जनता से वसूल किया था। हैरानी की बात यह है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि उनके द्वारा बनाया गया एक चित्र 1.85 करोड़ रुपए में बिका, लेकिन यह खरीदा किसने? इस संबंध में सारदा के मालिक सुदिप्त सेन कहते हैं कि तृणमूल कांग्रेस की ओर से आकर किसी ने पार्टी के नाम पर इतनी राशि उनसे मांगी थी, जो कि उन्हें दे दी गई। सीबीआई को पूछताछ में सेन ने बताया है कि उन्होंने तो कोई चित्र अभी तक देखा ही नहीं। उन्हें भी नहीं मालूम कि ममता बनर्जी ने ऐसा कोई चित्र बनाया भी है या नहीं। सीबीआई ने हाल ही में तृणमूल कांग्रेस को एक नोटिस जारी कर पूछा है कि आखिर किस व्यक्ति ने इस चित्र को खरीदा है? क्या तृणमूल कांग्रेस की ऑडिट रपट में चित्र से प्राप्त आय का उल्लेख है?
रोजवैली चिट फंड कंपनी के पास पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक रुपया है और इसके मालिक गौतम कुन्डु पर वामपंथी नेता और मंत्रियों का हाथ है। वामपंथी मंत्री गौतम देव कुन्डु के सहायक रहे हैं। इन्हीं के इशारे पर प्रवर्तन निदेशालय रोजवैली के देश भर में फैले 2631 बैंक खातों में से 2500 बैंक खातों को बंद नहीं कर सका। उस समय निदेशालय ने ओडिशा के बैंक खातों में केवल 67 करोड़ रुपया छोड़कर 295 करोड़ रुपया जब्त कर लिया था। ममता सरकार के सत्ता में आने के बाद कुन्डु इनके भी चहेते हो गए। इस तरह रोजवैली का कारोबार बाधित नहीं हुआ। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद रोजवैली की जांच करने में सीबीआई को दस माह लग गए। इसके लिए कांग्रेस के सांसद रहे अबु हसन गनी खान चौधरी की आड़ लेकर भी पार्टी व प्रशासन पर प्रभाव डाला था। रोजवैली का काम कैसे चलता रहा? यह बात सीबीआई जांच में पता लगी कि रोजवैली की 'होटल एंड इंटरटेनमेंट' कंपनी ने दूसरी कंपनी 'रियल्टी एस्टेट' कंपनी को बहुत बड़ी राशि उधार के रूप में दी थी।
ऑडिट के दौरान पाया गया कि उधार देने वाली कंपनी को 4.68 करोड़ रुपए का नुकसान है। ऐसे में सवाल उठता है कि कंपनी के पास उधार देने के लिए राशि कहां से उपलब्ध कराई गई, इससे स्पष्ट है कि अमानतकारियों की रकम को शातिर तरीके से इधर से उधर किया गया। ल्लअसीम कुमार मित्र
संघ कार्यकर्ता की हत्या में माकपा नेताओं की भूमिका
केरल में हुई राजनीतिक हत्याओं के पीछे माकपा का गढ़ कहे जाने वाले कन्नूर जिले के पार्टी नेताओं का हाथ रहा है। हर बार हत्या के तुरंत बाद माकपा नेता राज्य स्तर पर पंचायत कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं कि उनकी पार्टी का इन हत्याओं से कोई लेना-देना नहीं है।
ठीक ऐसा ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता मनोज की हत्या के दौरान हुआ था जब एक सितम्बर, 2014 को माकपा के बदमाशों ने उनकी नृशंस हत्या कर दी थी। उसके बाद माकपा ने अपनी ओर से सफाई देते हुए कहा था कि इस हत्या के पीछे उनका कोई हाथ नहीं है। रा.स्व.संघ के नेता की हत्या के बाद रा.स्व.संघ, भाजपा और विहिप ने असली हत्यारों को पकड़ने के लिए सीबीआई जांच की मांग को लेकर प्रदर्शन किए थे। इनके दबाव में आखिरकार राज्य सरकार ने मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी थी। ऐसा पहली बार हुआ था कि जब राज्य सरकार ने किसी राजनीतिक हत्या के मामले की जांच सीबीआई को सौंपी हो।
इस हत्या के छह माह बाद आखिर सच्चाई उजागर हो ही गई। गत 7 मार्च को सीबीआई द्वारा न्यायालय में दाखिल आरोपपत्र में स्पष्ट हो गया कि मनोज की हत्या राजनीतिक प्रतिशोध के चलते की गई थी। केरल के थालास्सेरी सत्र न्यायालय में दाखिल किए गए 120 पृष्ठों के इस आरोपपत्र मंे जरूरी कागजात और साक्ष्य भी लगाए गए हैं। सीबीआई सूत्रों के मुताबिक हत्या राजनीतिक कारणों से प्रेरित थी, खासकर कन्नूर में माकपा कार्यकर्ताओं का भाजपा में शामिल होना इसका अहम कारण बना। इस कारण से रा. स्व. संघ के नेता की हत्या कर दी गई क्योंकि पुलिस को जांच के दौरान मृतक और हत्यारों के बीच कोई आपसी प्रतिद्वंद्विता भी नहीं मिली। हत्यारे माकपा काडर की ओर से स्पष्ट संदेश देना चाहते थे कि यदि कोई पार्टी छोड़कर जाएगा तो उसका हश्र मनोज जैसा ही होगा। आरोपपत्र के मुताबिक क्षेत्रीय स्तर पर माकपा की तीन समितियां हत्या में शामिल रही हैं।
गत 5 नवम्बर को सीबीआई ने अपराध शाखा से मामले की जांच ली थी, इस मामले में 19 लोग आरोपी थे और सभी गिरफ्तार हो चुके थे। सीबीआई जांच के दौरान राज्य के माकपा नेताओं की हत्या के पीछे की भूमिका और झूठ का खुलासा हो सका, जो कि अभी तक हत्या के पीछे अपना हाथ होने से इंकार कर रहे थे। इस घटना ने पूर्व में हुई माकपा नेता टी. पी. चन्द्रशेखरन की नृशंस हत्या की याद को भी ताजा कर दिया जिसमें जिला स्तर के माकपा नेताओं का हाथ पाया गया था। अपराध शाखा ने तब एक मुख्य आरोपी कुन्हानंदन का पर्दाफाश किया था, जो कि क्षेत्रीय समिति का सदस्य था। उस समय माकपा नेता वी. एस. अच्युतानंदन ने बड़े स्तर पर अपना विरोध दर्ज कराया था।
एक बार फिर से माकपा की राज्य स्तर की समिति का सच सामने आ गया है। कन्नूर में माकपा का बढ़ता वर्चस्व लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन गया है, ये लोग वर्चस्व के लिए हिंसा का भी सहारा ले रहे हैं।
ल्ल प्रदीप कृष्णन
कोयला घोटाले की कालिख के छींटे मनमोहन तक
मैं दु:खी हूं। यह भी जिंदगी का हिस्सा है। कानूनी प्रक्रिया से गुजरने को तैयार हूं। मुझे यकीन है कि सच्चाई सामने आएगी और हमारी जीत होगी।
– मनमोहन सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री
सीबीआई की विशेष अदालत ने कोयला घोटाले में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आगामी आठ अप्रैल को तलब किया है। इनके अलावा आदित्य बिरला समूह के मालिक कुमार मंगलम बिरला, पूर्व कोयला सचिव पी. सी. पारेख, हिंडाल्को के अधिकारी शुभेंदु अमिताभ और डी. भट्टाचार्य सहित पांच लोगों को भी समन भेजा गया है।
हिंडाल्को कंपनी के संबंध में कोयला ब्लॉक आवंटन के दौरान हुई अनियमितता के चलते ही पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आरोपी बनाया गया है। संप्रग सरकार ने पहले हिंडाल्को को आवंटन करने से मना कर दिया था, लेकिन कुमार मंगलम बिरला के दो बार पत्र लिखे जाने पर सरकार ने अपना फैसला बदल दिया था। अदालत ने आरोपियों को आठ अप्रैल को पेश होने का आदेश देते हुए कहा कि हिंडाल्को को कोयला ब्लॉक आवंटन में उपस्थित दस्तावेज से आपराधिक षड्यंत्र दिखाई देता है।
इससे साफ होता है कि हिंडाल्को कंपनी को लाभ पहंुचाया गया है। अदालत ने यह भी कहा कि क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री ने कोयला मंत्रालय स्वयं अपने पास रखा था, इसलिए वे यह सफाई नहीं दे सकते हैं कि वे प्रत्येक मामले या फाइल को नहीं देख सके।
सीबीआई ने पहले पूर्व प्रधानमंत्री और कुमार मंगलम बिरला से बिना पूछताछ किए ही 'क्लोजर रिपोर्ट' दाखिल कर दी थी, लेकिन अदालत ने जांच एजेंसी की 'क्लोजर रिपोर्ट' को खारिज कर दिया था। इसके बाद सीबीआई ने गत 21 जनवरी को पूर्व प्रधानमंत्री से पूछताछ की थी। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर ही कोयला घोटाले की जांच कर रही सीबीआई ने अक्तूबर, 2013 में कुमार मंगलम बिरला और पी. सी. पारेख के खिलाफ मामला दर्ज किया था। प्रतिनिधि











