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.प्रो़ राकेश सिन्हा
21 अक्तूबर, 1938 को अखिल भारतीय कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सुभाषचन्द्र बोस ने महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष शंकरराव देव को एक पत्र लिखा। दो पृष्ठों के पत्र का विषय था- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बढ़ता आधार। बोस की चिंता का विषय था कि कांग्रेस का आधार संघ की ओर खिसकता जा रहा है। छात्र-नौजवानों में संघ के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। इसका कारण क्या है, इसके बारे में वे किसी सुनिश्चित मत के नहीं थे। देव ने 6 नवम्बर, 1938 को इसका विस्तार से जवाब दिया। अपनी समझ के अनुसार विश्लेषण करते हुए उन्होंने लिखा कि संघ देश की जिस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को लेकर अपनी विचारधारा का प्रतिपादन कर रहा है वह लोगों को आकर्षित कर रही है। बोस के इस सवाल का कि कांग्रेस क्यों नहीं इस तरह का स्वयंसेवी संगठन बना सकती है, देव ने लिखा कि जो काम डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने किया, वह कांग्रेस में सम्भव नहीं है। उन्होंने इसका कारण बताया कि कांग्रेस का प्रत्येक नेता या गुट स्वयंसेवकों का उपयोग अपने विचार, राजनीति और हित के लिए करना चाहता है, जबकि संघ की कार्य संस्कृति में संगठन एक उद्देश्य और एक मिशन के लिए काम करता है। आगे उन्होंने लिखा कि ऐसा स्वयंसेवी संगठन बनाने के लिए पर्याप्त ान चाहिए।
बोस एवं देव दोनों ही कांग्रेस के सुलझे, समर्पित और स्वार्थहीन कार्यकर्त्ता थे। परन्तु वे संघ को बाहर से ताक-झांककर और तात्कालिक हित-अहित के आधार पर देख रहे थे। लेकिन संघ की बढ़ती ताकत, जो उन्हें प्रतिस्पर्द्धी 1938 में नजर आ रहा था वह यथार्थ नहीं था। संघ तो स्थापना के दिन से अपनी राह पर चलता रहा है जिसमें राष्ट्रीयता के संवर्द्धन का लक्ष्य रहा है। दूसरे लोग और संगठन अपने हित-अहित के आधार पर संघ को मापते रहे हैं। इसलिए समर्थन-विरोध की प्रक्रिया समय, स्थान सापेक्ष रही है। तभी तो मात्र दो वषार्ें के बाद बोस जब नागपुर में फारवर्ड ब्लॉक के अधिवेशन में आये तो उनके कार्यक्रम का अगला पड़ाव संघ संस्थापक डॉ़ हेडगेवार से साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन में परस्पर सहयोग के लिए परामर्श हेतु मुलाकात थी। नागपुर से प्रकाशित समाचार पत्र 'हितवाद' ने अपने 23 जून, 1940 के अंक में प्रथम पृष्ठ पर बोस का डॉ़ हेडगेवार से मुलाकात की इच्छा का समाचार प्रकाशित किया। वे 20 जून को डॉक्टर जी से मिलने आये, परन्तु उनकी अस्वस्थता के कारण दोनों में बात नहीं हो पायी। अगले ही दिन 21 जून को डॉक्टर जी का निधन हो गया। उनके निधन से महाराष्ट्र और देश के अन्य भागों में शोक की लहर दौड़ गयी। अपने जीवनकाल में इस अजातशत्रु ने सामाजिक सार्वजनिक जीवन में व्याप्त अनेक भ्रमों को तोड़ने का कार्य तो किया ही, मृत्यु के पश्चात् भी एक बड़े भ्रम को तोड़ दिया।
डॉ़ हेडगेवार और संघ एक-दूसरे के पर्याय थे। जब कभी भी किसी प्रभावशाली व्यक्ति का निधन होता है तो उससे जुड़ी संस्था को अपूरणीय क्षति का सामना करना पड़ता है। संघ के बारे में भी इसके मित्र और ईर्ष्यालु भाव से पीडि़त, दोनों प्रकार के लोग ऐसा ही सोचते थे। परन्तु सार्थक उद्देश्य के लिए समर्पित इस सारथी ने संघ को कालजयी बना दिया। तभी तो लोकमान्य तिलक द्वारा स्थापित अंग्रेजी समाचार पत्र 'मराठा' ने 23 अगस्त, 1940 को अपने प्रथम पृष्ठ पर जो पहला बड़ा समाचार प्रकाशित किया उसका शीर्षक था-'डॉ़ हेडगेवार्स संघ स्टिल गोइंग स्ट्रांग'।
जब व्यक्ति साधना पथ पर साध्य के लिए अपने आपको साधन बना देता है तो उसका हर दृष्टांत, उसकी हर बात, उसके जीवन की हर घटना विचार का लौहपुंज बन जाती है और वह इतिहास नहीं, हमेशा वर्तमान रहता है। वह पीढि़यों को प्रेरित करता है। डॉ़ हेडगेवार भी वैसे ही द्रष्टाओं में एक हैं जो पथ पर चलते-चलते स्वयं पथ बन गए हैं। यही कारण है कि उनके निधन के बाद महाराष्ट्र के अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में उन बुनियादी प्रश्नों पर बहस शुरू हो गयी जिनको आधार बनाकर डॉ़ हेडगेवार ने संघ की स्थापना की थी। अकोला से एक अखबार 'मातृभूमि' प्रकाशित होता था। इसके मालिक कांग्रेस के नेता बृजलाल बृयानी थे और प्रमिला ओक सम्पादिका थीं। संघ के प्रति ईर्ष्या भाव रखने वाले इस अखबार ने अपने सम्पादकीय में दो प्रश्नों को सबसे अधिक विचारणीय माना। पहला, डॉ़ हेडगेवार की राष्ट्रीयता की कल्पना और दूसरा, उनका सार्वजनिक जीवन में योगदान। ओक ने लिखा कि डॉ़ हेडगेवार जैसे समर्पित, स्वार्थहीन, कलंकरहित कार्यकर्त्ता मिलना मुश्किल है और उन्होंने सार्वजनिक कार्यकर्त्ताओं के लिए एक मापदंड छोड़ा है। संगठन कालजयी सिर्फ कल्पना मात्र से या विचार प्रवाह से नहीं होता है। डॉ़ हेडगेवार इस बात से सुपरिचित थे। जब पीढ़ी दर पीढ़ी निश्छल भाव से मूल्यों के आइने में प्रयोगधर्मिता के साथ विचार के प्रवाह में शामिल हो जाती है तब संगठन का फलक जो दिखायी पड़ता है वही नहीं होता है। उसका फलक बड़ा हो जाता है। उसकी संरचना समावेशी हो जाती है। उसमें स्वायत्तता और स्वचालन का बोध आ जाता है। व्यक्ति निमित्त हो जाता है। ऐसा कैसे हो, यह प्रश्न डॉक्टर जी के सामने था। उन्होंने सार्वजनिक कार्यकर्त्ता के नाते समाज को प्रयोगशाला के रूप में देखा एवं समाजशास्त्री तथा समाज विज्ञानी के रूप में घटनाओं और विचारों को सतत् तौलते रहे।
उनके जीवन के प्रारंभिक वषार्ें में मध्य प्रांत कांग्रेस ने उन पर एक अहम जिम्मेदारी सौंपी थी। घटना 1919 की है। तब वे कलकत्ता से डाक्टरी की पढ़ाई पूरी कर नागपुर आ चुके थे। उनकी पहचान एक चिकित्सक की जगह एक प्रतिबद्ध राष्ट्रवादी की बन चुकी थी। उन्होंने परिवार बसाने, पैसा अर्जित करने, प्रतिष्ठा पाने, पुष्पहार पहनने जैसी सभी सम्भावनाओं का स्वयं सुव्यवस्थित एवं सुविचारित रूप से अंत करना शुरू कर दिया था। ऐसा लग रहा था कि राष्ट्रीयता की देवी सही पात्र की खोज में शताब्दियों से थी और डॉ़ हेडगेवार के तन, मन, मस्तिष्क में प्रवेश कर हिन्दू सभ्यता के पुनरोदय और पराक्रम के लिए उन्हें तैयार कर रही हो। तभी तो उनका एक-एक कदम असामान्य होता था। हर कदम के पीछे सूत्र और सारगर्भित विचार होता था। उनके व्यक्तित्व में सोने की तरह चमक ने हर असाध्य कार्य के लिए उनकी पात्रता स्थापित की। इसी क्रम में मध्य प्रांत कांग्रेस ने 1 फरवरी, 1919 को सर्कुलर जारी किया जिसमें हिन्दी साप्ताहिक पत्रिका 'संकल्प' के प्रकाशन की योजना थी। मध्य प्रांत के 18 जिलों में 14 हिन्दीभाषी जिले थे। इनके लिए कांग्रेस के विचार-कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार के लिए कोई अधिकृत पत्र-पत्रिका तब तक नहीं थी। छह हजार रुपए संकल्प की अग्रिम सदस्यता के द्वारा इकट्ठे करने थे। प्रत्येक जिले में 50 ग्राहक बनाने का लक्ष्य था। जब डॉ़ हेडगेवार को इस चुनौती से जूझने के लिए कहा गया तो उन्होंने एक बुनियादी प्रश्न उठाया-'अग्रिम चंदा/धन लेकर कुछ महीने या वषार्ें में पत्र-पत्रिकाएं बंद होती रही हैं, इससे लोगों का विश्वास उठ गया है। प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाया जाता है। अच्छा होता पहले हम पत्रिका का प्रकाशन कर ग्राहक बनाते।' परन्तु कांग्रेस की प्रांतीय समिति ने उनसे इस कार्य को त्वरित गति एवं तत्परता से पूरा करने का अनुरोध किया। वे तन-मन से जुट गए। धन तो उनके पास कभी नहीं था। तभी तो उनकी मृत्यु के बाद उनके एक अभिन्न मित्र ने 'दैनिक काल' में लिखा था कि जीवन में धन की कमी को उन्होंने अपने मन और हृदय की विशालता से पूरा किया था। वे 'संकल्प' का ग्राहक बनाने उन स्थानों पर गये जहां कांग्रेस नहीं पहुंची थी। वे ग्राहक बनाने के क्रम में राष्ट्रवाद के दूत के नाते लोगों को सम्बोधित करते थे, राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं से संवाद करते थे और फिर एक वैचारिक पक्ष उपजता था।
तत्कालीन मध्य प्रांत कांग्रेस के नेता और बाद में हिन्दू महासभा के अध्यक्ष डॉ़ बी़ एस़ मुंजे को 24 फरवरी, 1919 को लिखे पत्र में उन्होंने परिस्थिति का जीवंत वर्णन किया था, 'कांग्रेस के नेता अच्छे वक्ता हैं। वे लोगों को अपने भाषण से प्रभावित करते हैं परन्तु यह प्रभाव अगले दो-तीन दिनों में खत्म हो जाता है। वे अपने व्यवसाय में व्यस्त हो जाते हैं और उनके पास सार्वजनिक कार्य के लिए समय नहीं रहता।' इस पत्र में कांग्रेस कार्य-संगठन की त्रुटि छिपी थी जिसकी 1938 में बोस अनुभूति नहीं कर पा रहे थे। मंुजे जी की डायरी में डॉक्टर जी के अनेक पत्रों में उन प्रसंगों की चर्चा है जो सार्वजनिक कार्य में अन्तर्निहित न्यूनताओं को प्रकाशित करते हैं। वे एक पत्र में ब्रह्मपुर की स्थिति का वर्णन करते हैं। वे लिखते हैं, 'कांग्रेस में 11 वकील शामिल एवं सक्रिय हैं परन्तु किसी को भी देश की राजनीति की जानकारी नहीं है।' एक पत्र में वे एक कांग्रेस के मजूमदार वकील का जिक्र करते हुए उनके मनोविज्ञान पर प्रकाश डालते हैं-'वकील साहब चाहते हैं दूसरे लोग सक्रिय काम कर जोखिम उठायें, परन्तु वे स्वयं जोखिमों से बचे रहें।'
डॉक्टर जी ने क्रांतिकारी जीवन के अनुभवों के बाद सार्वजनिक जीवन का यह अनुभव 'संकल्प' के ग्राहक अभियान के दौरान प्राप्त किया जो बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्य-संस्कृति विकसित करने में सहायक सिद्ध हुआ। संगठन के निर्माण और विकास काल, दोनों में धन की आवश्यकता और महत्ता को लेकर रही भ्रांति को उन्होंने गलत साबित किया। शंकर राव देव ने बोस को लिखे पत्र में कहा था कि स्वयंसेवी संगठन बनाने के लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता है जो कांग्रेस के पास नहीं है। लेकिन यह धारणा संघ निर्माण में ध्वस्त हुई थी, इसकी जानकारी न तब संघ से इतर ताकतों को थी, न अब है। डॉक्टर जी जानते थे कि संगठन की स्वायत्तता, प्रभाव, शुचिता के लिए धन का स्रोत परिभाषित और पारदर्शी हो। तभी तो उन्होंने गुरुदक्षिणा की परम्परा शुरू की। स्वयंसेवकों के समर्पण से संगठन चलता है तो उसके नीति-निर्धारण एवं कठोर कदम उठाने में पूर्ण स्वतंत्रता रहती है। बाह्य जगत पर निर्भरता संघ का चरित्र न बने, यह संघ की नैतिक ताकत को अक्षुण्ण, उसकी स्वतंत्रता को अबाध बनाये रखता है।
मदन मोहन मालवीय ने 1929 में नागपुर में संघ के स्वयंसेवकों को सम्बोधित किया। वे ऐसी बात कह गये जो भूत, वर्तमान और भविष्य, तीनों के लिए प्रहरी की तरह है। उन्होंने कहा,'अन्य संस्थाओं के पास बड़े भवन हैं, पर मानव शक्ति नहीं है। जबकि संघ के पास अपार मानव शक्ति है, पर कोई भवन नहीं है।' ऐसा नहीं था कि संघ का सहयोग करने के लिए 1928-29 में लोग तत्पर नहीं थे। स्वयं डॉक्टर जी की विश्वसनीयता, लोकप्रियता और संबंध यथेष्ट धन एकत्रित करने के लिए पर्याप्त थे। परन्तु वे प्रतीक्षारत थे। स्वयंसेवकों की टोली बढ़ेगी तो भवन भी बनेगा। और भविष्य में वैसा ही होता रहा। उनके जीवनकाल में नागपुर के संभ्रांत लोगों से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बिरला, स्वयं मालवीय जी जैसे लोगों ने वित्तीय मदद की पेशकश की। डॉक्टर जी बिना उनसे धन लिए अनुग्रहीत महसूस करते रहे। डॉक्टर हेडगेवार की विशेषता थी कि वे सामान्य तरीके से असामान्य कार्य कर दिखाते थे, जो संघ कार्य का चरित्र बन गया है। उनका स्वयं का जीवन भौतिकता से परे था। 4 मार्च, 1929 को उन्होंने डायरी में जो लिखा था वे शब्द वस्तुत: उन पर भी शत-प्रतिशत लागू होते हैं, 'श्री समर्थ रामदास को अपने लिए कुछ भी नहीं चाहिए था। अपनी कृति का अहंकार स्वयं को न हो जाए इसका ध्यान रखकर उन्होंने सम्पूर्ण जीवन स्वधर्म बान्धवों की स्थिति के चिंतन एवं आत्मोन्नति का मार्ग खोजने में ही लगा दिया।'
अपने जीवन और विचार से उन्होंने संघ को धन का दास नहीं बनने दिया। वे प्रगतिगामी सोच के स्पष्टवादी व्यक्ति थे, जिनके व्यक्तित्व में निर्णायकता कूट-कूट कर भरी थी। द्वंद्व उनके जीवन का कभी हिस्सा नहीं बना। राष्ट्र सिर्फ स्वर्णिम इतिहास की व्याख्या और भविष्य की स्वर्णिम कल्पनाओं से सम्पन्न नहीं होता बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति और सामान्य लोगों के सशक्तिकरण से होता है। वे हमेशा सामान्य समाज के साथ संबद्ध रहे। इसका एक असाधारण प्रसंग है। 1923-24 में नागपुर में बंद पड़े 'स्वातंत्र्य' अखबार को फिर से खड़ा करने का काम उन पर आया। व्यक्ति की पात्रता परिस्थिति को परिवर्तित करने की कैसी क्षमता रखती है उसका यह अनुपम उदाहरण है। उनका नाम जुड़ते ही 'स्वातंत्र्य' की प्रसार संख्या 1200 हो गयी। पहले से प्रकाशित हो रहे अखबारों यथा 'महाराष्ट्र', 'प्राणवीर' आदि की प्रसार संख्या प्रभावित हुई। राष्ट्रीय अभिलेखागार में समाचार पत्रों पर भेजी गयी मध्य प्रांत की रिपोर्ट में बताया गया कि 'स्वातंत्र्य' के निकलते ही 'महाराष्ट्र' की प्रसार संख्या छह हजार से पांच हजार हो गयी थी। अखबार ने डॉ़ हेडगेवार के दृढ़ व्यक्तित्व को उजागर करने का काम किया।
राष्ट्रहित एवं जनहित के सामने वे किसी से कभी भी स्वत:स्फूर्त टकराने के लिए तैयार रहते थे। संबंधों का लेखा-जोखा तब अप्रासंगिक हो जाता था। ऐसा ही प्रसंग फरवरी, 1924 का था जब डॉ़ मुंजे ने विधान परिषद में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के स्वागत का प्रस्ताव रखा था। तब डॉ़ हेडगेवार ने 22 फरवरी, 1924 के सम्पादकीय में इसकी कटु आलोचना की थी। यह अखबार वर्ष पूरा होने से पहले क्यों बंद हो गया? इस प्रश्न के उत्तर में एक विचार छिपा है। नागपुर में एक इम्प्रेस मिल थी। यह एक बड़े घराने की मिल थी। अखबारों एवं सामाजिक संगठनों को इससे विज्ञापन एवं वित्तीय सहायता मिलती थी। इस मिल में मजदूरों ने बोनस एवं मजदूरी के प्रश्न पर आंदोलन किया। विज्ञापन पाने वाले अखबारों ने या तो मालिक का साथ दिया या उदासीन रहे। विज्ञापन तो 'स्वातंत्र्य' को भी मिलते थे। पर डॉ़ हेडगेवार ने मजदूरों के हितों को अखबार में मुखर कर दिया। परिणाम बताने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने मजदूर नेता आऱ एस़ रुइकर के इम्प्रेस मिल के मजदूरों को संगठित करने के प्रयास और लेबर यूनियन बनाने के लिए उनको शुभकामना दीं। यह वही वैचारिक बीज था जब संघ ने भारतीय मजदूर संघ की स्थापना को सहज, स्वाभाविक प्रक्रिया में लिया। दत्तोपंत ठेंगड़ी इसके रचनाकार बने। यह उसी आर्थिक विचार का परिणाम है। तब भी 'समाजवाद' और 'पूंजीवाद' के नारे खूब चलते थे। एक बार डॉक्टर जी का रुइकर से संवाद हुआ जिसमें उन्होंने कहा था-'आप धनी सर्वहारा हैं, मैं गरीब पूंजीपति हूं।'
संघ स्थापना के एक दशक बाद उन्होंने 8 मार्च, 1935 को बैरिस्टर अग्रवाल को लिखे पत्र में कहा था, 'अब तक कभी भी किसी कार्य के लिए हमने किसी से धनराशि की याचना नहीं की है।' दो वर्ष के बाद उन्होंने लिमये जी को 30 अक्तूबर को लिखे पत्र में उन मनगढ़ंत आरोपों का जिक्र किया जो बनारस में सोशलिस्टों ने एक पत्रक निकालकर संघ पर लगाए थे, संघ धनवान एवं रियासतदारों के रक्षण के लिए स्थापित हुआ है और सवार्ेपरि उन्हीं के आर्थिक सहयोग से उसका पोषण होता है। उन्होंने एवं संघ ने ऐसे काल्पनिक और शत्रुतापूर्ण भाव से लगाये गये आरोपों की चिंता नहीं की, क्योंकि कल्पना करना तो वैचारिक विरोधियों की अपनी सृजनशीलता है और अपने यथार्थ को संतुष्ट रखना हमारी चुनौती है।
जैसे-जैसे संघ का विस्तार होता गया, कुछ धारणाएं टूटती गयीं और कुछ नयी बनती गयीं। महाराष्ट्र में व्यायामशाला की संस्कृति थी। इसके तहत अनेक आधुनिक एवं परम्परागत व्यायामशालाएं चल रही थीं। हनुमान व्यायामशाला, प्रताप व्यायामशाला इत्यादि। इनके गणवेश भी होते थे और वार्षिक उत्सव भी, जिसमें व्यायाम परेड आदि का प्रदर्शन होता था। आरंभिक वषार्ें में नागपुर के कुलीनों, नेताओं एवं सरकार, तीनों को लगा कि यह व्यायामशाला संस्कृति का ही एक उपक्रम है। लेकिन दो-तीन वषार्ें के अंदर ही इस धारणा का अंत हो गया। संघ का साम्राज्यवाद विरोधी रुख और चरित्र प्रभाव दिखाने लगा। 1930 में साम्राज्यवादी खुफिया विभाग ने पहली बार संघ के बारे में चेताते हुए लिखा कि 'इसमें (साम्राज्यवाद के विरुद्ध) आतंकवादी संगठन बनने की अपरिमित क्षमता है।' दो वर्ष बाद ही संघ सविनय अवज्ञा आंदोलन का हिस्सा बन गया। सविनय अवज्ञा आंदोलन के बारे में रिपोर्ट लिखते समय खुफिया विभाग ने लिखा, 'आंदोलन धीमा हो गया था, उत्साह प्राय: समाप्त हो गया था परन्तु डॉ़ हेडगेवार के आंदोलन में प्रवेश करते ही आंदोलन में जान आ गयी, उत्साह का संचार हो गया़.़. जब वे जंगल सत्याग्रह के लिए जा रहे थे तब दस हजार स्त्री-पुरुष उनके पीछे चल रहे थे।' तब डॉक्टर जी को गिरफ्तार कर सश्रम कारावास की सजा दी गयी थी। यह उनकी तीसरी गिरफ्तारी थी। इससे पूर्व वे दो बार जेल जा चुके थे। साम्राज्यवाद के विरुद्ध उनकी चेतना कांग्रेस आंदोलन या किताबों को पढ़कर जागृत नहीं हुई थी अपितु स्वत:स्फूर्त थी जो एक ऐसा विषय है जिस पर कोई मनोवैज्ञानिक ही प्रकाश डाल सकता है। छोटी उम्र की अनेक घटनाएं हैं जो सामान्य बालकों में नहीं पायी जाती हैं। इसी में महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण की हीरक जयंती के उपलक्ष्य में चाटुकारों, साम्राज्यपरस्त लोगों एवं सुविधाभोगी कुलीनों द्वारा जब 22 जून, 1897 को नागपुर में उत्सव मनाया जा रहा था, स्कूलों में मिठाइयां बांटी जा रही थीं तब मात्र 7 वर्षीय इस बालक ने मिठाई फेंकते हुए कहा था, 'वह हमारी रानी नहीं हैं।'
यह घटना अनायास साधारण घटना बन जाती अगर यह बालक अपने व्यक्तित्व में उसी दृढ़ता, जिसके पीछे भावना, विवेक, मूल्य और संकल्प छिपा था, का प्रतिबिम्ब नहीं बन जाता। 1907 में नागपुर के प्रतिष्ठित स्कूल नील सिटी स्कूल में वंदेमातरम् के जयघोष की प्रेरणा और नेतृत्व उन्हीं का था। पारिवारिक पृष्ठभूमि में आर्थिक बदहाली थी, मां-पिता का स्वर्गवास हो चुका था। नागपुर में ब्रिटिश भक्तों का दबदबा था और राजनीतिक संस्कृति में अभी साम्राज्यवाद-विरोधी तेवर सिर्फ चिंगारी के रूप में ही थे। उन परिस्थितियों में उन्होंने चिंगारी को आग बनाने का काम किया। स्कूल से शुरू हुआ वंदेमातरम् का जयघोष नागपुर के कॉलेजों में पहुंच गया। स्कूल इंस्पेक्टर के सामने वंदेमातरम् के नारे के साथ सांकेतिक प्रतिकार नागपुर की राजनीतिक संस्कृति को बदलने की शुरुआत बन गया। समझौते-सुलह की प्रक्रिया में बड़े-बूढ़े, नामी-ग्रामी, प्रभावी लोग शामिल हुए और बच्चे मान गए। बालक हेडगेवार अपनी बात पर अड़े रहे। परिणामस्वरूप स्कूल से निकाल दिये गए। उनके स्कूली मित्र गोविन्द गणेश अवादे ने 'डॉ़ हेडगेवार यांचे क्रांति अठावनी' लेख 'महाराष्ट्र' अखबार में 28 जुलाई, 1940 को लिखा। अपने संस्मरण में उन्होंने लिखा कि डॉ़ हेडगेवार का मानना था कि अगर वंदेमातरम् के जयघोष, जो मात्र मातृभूमि की वंदना है, को औपनिवेशिक सरकार अपराध मानती है तो मैं इसकी पुनरावृत्ति करता रहूंगा और सभी प्रकार की सजा पाने के लिए तैयार रहूंगा।
राष्ट्रवादियों ने केशव में भविष्य देखना शुरू किया। मैट्रिक की परीक्षा पास करने से पूर्व उन्हें दो बार स्कूल बदलना पड़ा। नागपुर से वे यवतमाल के नेशनल स्कूल में गये। बाबासाहब परांजपे ने इसे स्थापित किया था। एम़ एस़ अणे ने उन्हें संरक्षण दिया। उस शहर में 'हरिकिशोर' नामक एक पत्र निकलता था। उसके सम्पादक केशव के छात्रावास के सुपरिटेन्डेंट थे। इस पत्र ने मध्य प्रांत के तत्कालीन इंस्पेक्टर जनरल क्लीवलैंड की तुलना हिरण्यकश्यपु से कर याद दिलायी कि इस राक्षस का वध एक छोटे बालक प्रहलाद ने किया था। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 1908 में इसकी प्रसार संख्या 725 थी जो छोटे शहर के लिए बड़ी बात थी। इसी दौर में केशव को आक्रामक भाषण देने और बम फेंकने के आरोप में भंडारा के रामपायली में पहली बार गिरफ्तार होना पड़ा। क्लीवलैंड का यवतमाल में आना हुआ और उसके पूर्व 2 अगस्त, 1909 को स्कूल को सरकार ने अवैधानिक घोषित कर बंद कर दिया। केशव का अगला पड़ाव समर्थ विद्यालय, तेलगांव था। लेकिन कुछ ही दिनों में इस विद्यालय पर भी ताला लगा दिया गया। तब वे मैट्रिक की परीक्षा के लिए नेशनल स्कूल, अमरावती पहुंचे। इस स्कूल से परीक्षा तो उन्होंने दे दी पर अगस्त, 1910 में उस स्कूल पर ताला लगा दिया गया। इस विद्यालय के बारे में सरकार के गृह-राजनीतिक विभाग की रिपोर्ट में 7वीं कक्षा के एक प्रश्न का जिक्र किया गया था। इसमें अंग्रेजी शासन के दुष्प्रभावों पर एक पैरा लिखना था। इसमें यह भी जोड़ दिया गया था कि एक मुक्त पक्षी और सोने के पिंजरे में बंद तोते के बीच क्या अंतर है?
डॉक्टर साहब की साम्राज्यवाद विरोधी छवि उनकी अंतिम सांस तक बनी रही। तभी तो संघ '40 के दशक में क्रांतिकारियों एवं कांग्रेस दोनों के लिए आकर्षण का केन्द्र बन गया था। ऐसी अनगिनत घटनाएं हैं जब वे साम्राज्यवाद के प्रश्न पर अपने-पराये के बीच भेद नहीं करते थे। मंुजे जी से उनका आत्मीय संबंध था। उनके मन में उनके प्रति आदर भाव था। वे उन्हें 'तीर्थस्वरूप मुंजे जी' कहकर पत्र लिखते थे। पर मातृभूमि के प्रति आत्मीयता के सामने वह फीका पड़ जाता था। इसका उदाहरण 1917 में मिलता है। प्रथम विश्वयुद्घ में ब्रिटेन के मायावादी रुख से बड़े-बड़े राष्ट्रवादी भी उसके झांसे में आ गये और युद्ध में उसकी सहायता करने लगे। मध्य प्रांत की प्रांतीय भर्ती समिति का कार्य लोगों को सेना में सेवा देने के लिए प्रेरित करना था। जी़ एस़ खापर्डे इसके अध्यक्ष थे और डॉ़ मुंजे उपाध्यक्ष थे। मुंजे ने ब्रिटिश सरकार को लिखे पत्र में कहा था, 'हमारा प्रांत सबसे अधिक भर्ती क्यों नहीं कर सकता है?' डॉ़ हेडगेवार ने इस दृष्टिकोण का विरोध किया। तिलक के अनुयायियों की संस्था 'राष्ट्रीय मंडल', जो इस कार्य में लगी थी, में उन्होंने विभाजन कराया एवं युद्ध के दौरान साम्राज्यवाद विरोधी गतिविधियों के लिए उन्होंने नागपुर नेशनल यूनियन की स्थापना की। उनका नारा था- 'क्रांति न कि सहयोग'। लेकिन उनका चिंतन साम्राज्यवाद मुक्त भारत तक नहीं रुका था। उनके मन में प्रश्न था कि कल भारतवर्ष का जो अभिप्राय था वह समकालीन भारतवर्ष का अभिप्राय क्यों नहीं है? क्यों हम भू-भाग और भाई खोते गये और सिमटते गए? यह प्रश्न सभ्यतामूलक था। इसमें भू-भाग से कहीं अधिक महत्वपूर्ण एक सभ्यता का पराभव था। विरासत के गौरव और वर्तमान की दीनता/हीनता को उन्होंने भविष्य के भारत के नव-निर्माण के संकल्प के साथ विचार प्रवाह में विलीन कर दिया। इसी से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बीजारोपण हुआ। विचार का वटवृक्ष एक सूक्ष्म बीज में डालकर उन्होंने भारत की आत्मा को झकझोरने का काम किया। इस कार्य की चौहद्दी अपरिभाषित है।
हम डॉ़ हेडगेवार की इस रचना के बारे में वर्तमान की परिस्थितियों से प्रभावित होकर सोच सकते हैं। इसलिए उनके समकालीन लोगों की राय महत्वपूर्ण हो जाती है। श्री शाम ने 'केसरी' अखबार में 5 जुलाई, 1940 को जो लिखा वह ध्यान देने योग्य है, 'डॉ़ हेडगेवार ने सभी आंदोलनों का करीब से परीक्षण/अवलोकन किया, जिसमें आर्य समाज और स्वामी श्रद्धानन्द का शुद्धि आंदोलन भी था। परन्तु वे उन सबसे संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक बदलाव के अनेक आयामों पर चिंतन-मनन किया। जब प्राय: सभी हिन्दू संगठनकर्त्ता राजनीति में हिन्दू आधिपत्य और मुस्लिम अलगाववाद की दृष्टि से सोच रहे थे तब डॉ. हेडगेवार बुनियादी प्रश्न से जूझ रहे थे-हिन्दू समाज को कैसे फिर से ऊर्जावान बनाएंं? कौन इस महती कार्य को करेगा? कब इसकी शुरुआत होगी? अंतत: वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि एक मजबूत संगठन ही इन सभ्यताई प्रश्नों का समाधान कर हिन्दू समाज को विनाश से बचा पाएगा।' डॉ़ हेडगेवार का विचार सभ्यताई आयाम पर खड़ा था, यह उन समकालीन चिंतकों को समझ में आ चुका था जो तात्कालिकता से ग्रसित होकर संघ को नहीं देख रहे थे।
संघ के द्वारा उन्होंने तीन क्रांतियों की समानान्तर धाराओं का प्रवाह किया है। पहली मानसिक क्रांति, जो प्रत्येक हिन्दू को बड़े क्षितिज पर और व्यापक दृष्टि से सक्रिय करती है। दूसरी, सामाजिक क्रांति जो समाज के भीतर संरचनात्मक एवं गुणात्मक परिवर्तन का प्रवाह है। इसी सामाजिक शक्ति का स्वरूप लोकशक्ति के रूप में होता है जो राज्य शक्ति पर एक नैतिक अंकुश बनती है। और तीसरी, सांस्कृतिक क्रांति, जो हिन्दू राष्ट्र को उस प्राचीन, प्रगतिशील एवं गतिमान सभ्यता का वाहक बना देती है जो कभी राष्ट्र का वाहक हुआ करती थी। आज राष्ट्र की नैतिक, सांस्कृतिक जिम्मेदारी है कि सभ्यताई चेतना को वैश्विक मंच पर प्रभावी रूप में उसी तरह पुनर्स्थापित करे जैसे सदियों पहले हम होते थे। डॉ. हेडगेवार की मृत्यु के बाद 'मराठा' ने सम्पादकीय में जो लिखा वह आज के विमर्शकर्त्ताओं को यथार्थ के दर्शन कराने जैसा है, 'हवा बहती है और घास बढ़ती है। जहां दूसरे अनेक संगठन हवा की तरह बह गये, डॉ़ हेडगेवार का संगठन घास की तरह बढ़ता गया। इसकी जड़ें जमीन में हैं। जहां आलोचक और संशयवादी हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा सही है या गलत, वैज्ञानिक है या नहीं, इस पर विमर्श करते रहे, वहीं दूसरी तरफ पूरे देश में एक लाख समर्पित और अनुशासित स्वयंसेवक तैयार हो गये, जो हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा से जुड़े हैं।'
'राष्ट्रीयता से सभ्यताई उत्थान का यह वैचारिक आंदोलन राष्ट्र के स्व को पुष्पित, पल्लवित और पुष्ट करने का यज्ञ है जिसमें, 'संघ आगे क्या करेगा?' यह प्रश्न निरर्थक है।' अपने अंतिम भाषण में डॉक्टर जी ने यही कहा था, जो सूत्र भी है, गत्यात्मकता का आधार भी और परम वैभव तक पहुंचने का मंत्र भी।











