साक्षात्कार - 'ईसाई मिशनरियों का काम है कन्वर्जन, हमारा काम है सेवा'
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साक्षात्कार – 'ईसाई मिशनरियों का काम है कन्वर्जन, हमारा काम है सेवा'

Written byArchiveArchive
Mar 2, 2015, 12:00 am IST
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दिंनाक: 02 Mar 2015 14:23:30

ईसाई मिशनरियों द्वारा सेवा की आड़ में कन्वर्जन का विषय एक बार फिर उठा है। इस संदर्भ में प्रस्तुत हैं रा. स्व. संघ के स्वयंसेवकों द्वारा देशभर में चलाए जा रहे सेवा प्रकल्पों पर संघ के अ.भा. सेवा प्रमुख श्री सुहासराव हिरेमठ से पाञ्चजन्य के सहयोगी संपादक आलोक गोस्वामी की विस्तृत बातचीत के प्रमुख अंश-
सेवा भारती की स्थापना कब और कैसे हुई?
संघ के प्रारम्भ से ही स्वयंसेवक सेवा कार्य करते आ रहे हैं। कालान्तर में अलग-अलग प्रान्तों में अलग-अलग नामों से सेवा कार्यों का संचालन होता आ रहा है। राष्ट्रीय आपदा में राहत हो या समाज के वंचित वर्ग की सेवा, स्वयंसेवक शुरू से सेवा में संलग्न रहे हैं। महाराष्ट्र में तो आज स्वयंसेवकों को सेवा कार्यों में जुटे 75 वर्ष हो चुके हैं। अन्य प्रान्तों में आपातकाल के बाद यानी 1980 से सेवा कार्यों का विस्तार हुआ है। रा.स्व.संघ का अपना सेवा विभाग 1990 में शुरू हुआ। उत्तर भारत में अधिकांशत: सेवा कार्य सेवा भारती के नाम से चलते हैं तो अन्य प्रान्तों में अलग-अलग नामों से। जैसे-महाराष्ट्र में जनकल्याण समिति, विदर्भ में लोक कल्याण समिति, कर्नाटक में हिन्दू सेवा प्रतिष्ठान और राष्ट्रोत्थान परिषद है।
संघ स्वयंसेवकों, कार्यकर्ताओं द्वारा लंबे अर्से से सेवा कार्य किए जाते रहे हैं। सही अर्थों में सेवा का भाव क्या होता है?
सेवा का अर्थ है, एक, समाज का जो वंचित और अभावग्रस्त वर्ग है उसके अभावों को दूर करके अपने साथ राष्ट्र निर्माण के कार्य में खड़ा करना। दो, समाज में आने वाले दोषों और विकृतियों को दूर करके उसे सुव्यवस्थित और सुचरित्र बनाना। तीन, आज जो सेवित है यानी जिसकी सेवा की जा रही है वह कल सेवक बने। समाज के सभी वर्गों को मिलाकर राष्ट्र को वैभव संपन्न बनाना ही हमारा उद्देश्य है।
सेवा के क्षेत्र में किन आयामों पर खास बल दिया जाता है?
सेवा के चार प्रमुख आयाम हैं-शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक संस्कार और स्वावलंबन। शिक्षा क्षेत्र में बालवाड़ी से लेकर विद्यालय स्तर तक, अलग-अलग प्रकार के सेवा कार्य चलते हैं। स्वास्थ्य के अन्तर्गत एक गांव में रहकर चिकित्सा सेवा देने वाले आरोग्य मित्र से लेकर रक्त कोष, चिकित्सालय तक के सेवा कार्य चलते हैं। सामाजिक संस्कार के अन्तर्गत सेवा बस्ती से लेकर वनवासी क्षेत्रों में स्थित छात्रावासों तक ये कार्य चलते हैं। स्वावलंबन के अन्तर्गत सिलाई-कढ़ाई केन्द्र, कम्प्यूटर केन्द्र तथा स्वरोजगार केन्द्र आदि चलते हैं।
चारों आयामों के अन्तर्गत चल रहे प्रकल्पों की कितनी संख्या है?
कुल मिलाकर संघ द्वारा चलाए जा रहे प्रकल्पों की संख्या है 1,38,667. इनमें सबसे ज्यादा शिक्षा क्षेत्र में 78627 प्रकल्प हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र में 19551, सामाजिक क्षेत्र में 18039 प्रकल्प और स्वावलंबन में 22450 प्रकल्प चल रहे हैं।
क्या सेवा कार्य वनवासी क्षेत्रों और पूर्वोत्तर में भी चलाए जाते हैं?
पूरे देश को मोटे तौर पर सेवा की दृष्टि से तीन भागों में बांटा गया है- एक, नगरीय क्षेत्र जहां सेवा बस्तियों में काम चलता है। दो, दुर्गम ग्रामीण क्षेत्र जो सुख-सुविधाओं से दूर अभावग्रस्त क्षेत्र है। तीसरा है बहुत बड़ा वनवासी क्षेत्र। पूर्वोत्तर भी एक बड़ा क्षेत्र है जो दुर्गम भी है और वनवासी क्षेत्र भी। केवल इसी क्षेत्र में करीब 8000 सेवा कार्य चलते हैं।
सेवा कार्य करते हुए स्वयंसेवक किसी के मत-पंथ, जात-पात, ऊंच-नीच का विचार नहीं करते। तथ्यात्मक दृष्टि से यह बात कितनी सत्य है?
सेवा के अन्तर्गत जिन चार आयामों में विभिन्न प्रकल्प चलते हैं, चाहे सेवा बस्तियों में या वनवासी, जनजातीय क्षेत्रों में, वहां उनमें स्थानीय जन बिना किसी भेदभाव के सेवा पाते हैं। कई मुस्लिम बहुल बस्तियां हैं तो वहां के केन्द्रों में मुस्लिम बंधु बड़ी संख्या में आते हैं। इसी तरह ईसाई बहुल क्षेत्रों में ईसाई बंधु सेवा केन्द्रों में आते हैं। दिल्ली में तो बंगलादेशी मुस्लिम परिवारों के बच्चे हमारे सेवा केन्द्रों में आते हैं। हमारा एक भी केन्द्र ऐसा नहीं है, जहां जाति-पंथ के आधार पर किसी से कोई भेदभाव होता हो। शिक्षा, स्वावलंबन और स्वास्थ्य के अन्तर्गत चल रहे केन्द्रों में लाभार्थियों में अधिक संख्या मुस्लिम बंधुओं की ही है।
पूर्वोत्तर में कई इलाके ईसाई बहुल हैं। उन इलाकों में आप चिकित्सा सेवाएं देते हैं? वहां का क्या अनुभव है?
पूर्वोत्तर में करीब 8000 प्रकल्पों में से लगभग 5000 ऐसे दुर्गम ग्रामीण क्षेत्रों में चल रहे हैं जहां चिकित्सा की कोई सुविधा नहीं है। वहां हमारे आरोग्य मित्र यानी चिकित्सक स्वास्थ्य के साथ-साथ गांव में तरक्की के अन्य उपायों की भी चिंता करते हैं। उस क्षेत्र में बच्चों के लिए हमारे लगभग 200 छात्रावास चल रहे हैं। इनमें से 99 छात्रावास तो सिर्फ पूर्वोत्तर में हैं। अब तक करीब 6000 छात्र वहां रहकर शिक्षा ले चुके हैं। इनमें बहुत बड़ी संख्या ईसाई छात्रों की रही है। मिजोरम, नागालैंड, मेघालय में तो मुख्यत: ईसाई छात्र ही आते हैं। लेकिन हमने कभी उनकी उपासना पद्धति में दखल नहीं दी। वे ईसाई पद्धति से ही उपासना करते रहे हैं। इन छात्रावासों से निकले छात्र बड़े से बड़े पद पर पहुंचे हैं। हमारी दृष्टि कभी परावर्तन की रही ही नहीं, इसीलिए हमने किसी के मत-पंथ को लेकर कभी भेद नहीं किया। दिल्ली में गोपालधाम नाम से एक केन्द्र है जिसमें जम्मू-कश्मीर में आतंकी घटनाओं में हताहत हुए परिवारों के बच्चे रहते हैं। वे अधिकांशत: मुस्लिम ही हैं। ऐसा ही एक केन्द्र जम्मू के निकट कटरा में चल रहा है। कहने का अर्थ है कि हर मत-पंथ के बंधु हमसे जुड़े हुए हैं, हमारी सेवाएं लेते हैं और ऐसा करते हुए वे अपने-अपने मत के अनुयायी ही रहते हैं।
पूर्वोत्तर में चर्च मिशनरियों की बहुत बड़ी संख्या है। क्या उनकी ओर से आपके कार्य में कभी बाधा उत्पन्न करने की कोशिश की गई?
बड़े पैमाने पर तो नहीं, क्योंकि हमारे सेवा केन्द्रों से सेवा लेने वाले बड़ी संख्या में ईसाई बंधु ही होते हैं। वे मिशनरी भी जानते हैं कि हमारा कार्य कन्वर्जन का कार्य नहीं है। हम सिर्फ और सिर्फ सेवा भाव से कार्य करते हैं। इसलिए ईसाई मिशनरियों की ओर से कोई बड़ा भारी विरोध तो नहीं हुआ है। हां, कभी-कभी छोटी-मोटी समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं।
गुजरात का डांग वनवासी बहुल क्षेत्र, ओडिशा, आंध्र प्रदेश में ईसाई मिशनरियों द्वारा वनवासियों का कन्वर्जन करने के समाचार मिलते रहते हैं। वहां आप भी सेवा प्रकल्प चलाते हैं। क्या आप के कार्यों का वहां विरोध हुआ है?
इन स्थानों पर हमारे कामों का विरोध तो होता ही है। कहीं छिटपुट संघर्ष भी हो जाता है। ओडिशा में तो स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या तक कर दी गई। लेकिन इसके बावजूद हमारे कार्यकर्ता समर्पण भाव के साथ काम कर रहे हैं।
वनवासी क्षेत्रों में जाने पर क्या ईसाई मिशनरियों के कन्वर्जन कार्यों की प्रामाणिक जानकारी वहां के निवासियों द्वारा दी जाती है?
हर तरह की जानकारी मिलती है। उससे पता लगता है कि उन स्थानों पर कन्वर्जन चल रहा है। ईसाई कन्वर्जन कार्य तो पूरे देश में ही चल रहा है। पूना में यरवदा नामक स्थान पर बड़ी मात्रा में झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां हैं। वहां वर्ल्ड क्रिश्चियन काउंसिल सक्रिय है। वहां उसके साथ एक सज्जन वेतन पर काम करते थे। संस्था ने उन पर ईसाई बनने का दवाब डाला। उन सज्जन ने विरोध किया तो उन्हें तो नौकरी से निकाल दिया गया। आज वे हमारी संस्था से जुड़कर सेवा कार्य कर रहे हैं। बस्ती के बच्चों के लिए संस्कार केन्द्र, महिलाओं के लिए स्वरोजगार केन्द्र आदि चलाते हैं। उनके कामों में आज भी उस ईसाई संस्था के लोग बाधा डालते हैं पर उस सबका सामना करते हुए वे अपने काम में डटे हुए हैं। ऐसे अनुभव कई स्थानों पर आते रहते हैं।
सेवा की आड़ में हो रहे ईसाई कन्वर्जन पर आपका क्या कहना है?
वंचित वर्ग या व्यक्ति की उन्नति के लिए नि:स्वार्थ भाव से किए जाने वाले कार्य को हम सेवा कहते हैं। लेकिन उस व्यक्ति के मत-पंथ का विचार करके उसे अन्य मत में कन्वर्जन करने के पीछे स्वार्थ होता है। वह सेवा नहीं हो सकती। रा.स्व.संघ में तो सेवा माने नि:स्वार्थ भाव से, कर्तव्य भाव से, सेवा भाव से और पूजा भाव से परहित किया जाने वाला कार्य। जैसा स्वामी विवेकानंद ने भी कहा है, सेवित को परामात्मा मान कर उसकी सेवा करना ही सच्ची सेवा है। नर सेवा-नारायण सेवा। इसमें भय, लालच से मत परिवर्तन करना सेवा नहीं होती। हमारे स्वयंसेवक कभी भी ऐसा कार्य नहीं करते।
पिछले साल कश्मीर घाटी में बाढ़ के बाद से हमारे 250 सेवा कार्य चल रहे हैं। घाटी में हिन्दू तो हैं ही नहीं, सब मुस्लिम हैं। वहां जम्मू-कश्मीर सेवा भारती के नाम से एकल विद्यालय चलते हैं, सिलाई केन्द्र चलते हैं, चिकित्सा केन्द्र चलते हैं। इनमें सेवा का लाभ उठाने वाले सब मुस्लिम ही हैं। इससे भी बढ़कर, सेवा कार्य करने वाले कार्यकर्ता भी मुस्लिम ही हैं। बाढ़ के दौरान भी वहां 40 चिकित्सा केन्द्र चलाये गए थे जिनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात आदि से चिकित्सक गए थे। उन्होंने वहां शत-प्रतिशत मुस्लिम पीडि़तों का ही इलाज किया था।
दुर्भाग्य से, यह सच है कि पूर्वोत्तर में ईसाई मिशनरियों ने बड़ी मात्रा में वहां रहने वालों की मदद की आड़ में ईसाईकरण किया है। इतना ही नहीं, वहां अलगाववाद पनपाया है। इसीलिए जब हमारे कार्यकर्ता सेवा के लिए वहां जाते हैं तो शुरू में उनको भारी विरोध का सामना करना पड़ता है। दक्षिण में तटवर्ती इलाकों में बड़ी मात्रा में ईसाईकरण हुआ है। ऐसे प्रभावित कन्याकुमारी जिले में हमारे 6000 सेवा कार्य चल रहे हैं। इसके कारण बदलाव दिखने लगा है। नशा मुक्ति, कन्वर्जन मुक्ति, महिला सुरक्षा, आर्थिक उन्नति देखने में आ रही है। आज वहां का समाज स्वाभिमानी, स्वावलंबी और परिश्रमी बन रहा है।
कन्वर्जन कार्यों के लिए अमरीका, यूरोप की कई ईसाई संस्थाओं की तरफ से बड़ी मात्रा में पैसा झोका जा रहा है। क्या इसमें कोई संदेह है?
इसमें संदेह नहीं है कि भारत में इन संस्थाओं के लाखों कर्मचारी कार्यरत हैं और बड़ी मात्रा में 'एनजीओ' काम करते हैं। बताते हैं, कुल 40,000 करोड़ रुपये के प्रकल्प सेवा की आड़ में चलाये जा रहे हैं। इस पर कई लोगों ने आपत्ति भी की है और भारत सरकार इस ओर सख्ती कर रही है।

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