| दिंनाक: 31 Jan 2015 15:44:36 |
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अच्छा लगता है जब चिकनी चुपड़ी सूरतों से सजी बेपरवाह और बेमकसद फिल्मों की भीड़ में बेबी जैसी कोई फिल्म आतंकवाद जैसे विषय पर बेहद सुलझे और कसे हुए अंदाज में इशारा करती हुई दिखती है। हर्ष और भी बढ़ जाता है जब ऐसी किसी फिल्म को फिल्म समीक्षकों की बिरादरी से भी आशीर्वाद मिलता है। नहीं तो होता यह है कि अक्षय कुमार जैसे हंसोड़-एक्शन स्टार की फिल्म रिलीज हुई नहीं कि, समीक्षकों का कोड़ा तैयार। पर इस बार उलटा हुआ। इस बिरादरी ने एक स्वर में इस फिल्म की सराहना की और इसे चार-पांच सितारों की रेटिंग से नवाजा। हालांकि इस बीच कुछ कलम के सिपाही फिल्म की बखिया उधेड़ने में पीछे नहीं रहे। उनका मत था कि बेबी को किसी अंग्रेजी खुफिया फिल्म की तरह और ज्यादा सनसनीखेज होना चाहिए था। बेशक, ऐसा लिखने वाले कुछ अंग्रेजीदां मीडिया के लोग हैं जो बात -बात में हमारी फिल्मों की तुलना हॉलीवुड फिल्मों से करने लगते हैं और उस पहल की सराहना करने में कंजूसी कर जाते हैं, जिस पर हाथ रखने से तमाम ख्याति प्राप्त और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक कतराते रहे हैं। क्योंकि बेबी के जरिये संभवत: पहली बार आतंकवाद पर एक अलग तरह की सख्ती की ओर इशारा किया गया है। ये फिल्म अपने कई पहलुओं के माध्यम से ये भी दर्शाती है कि आतंकवाद पर सख्ती केवल कागजों पर नहीं, बल्कि हाव -भाव में भी दिखनी चाहिये।
निर्देशक नीरज पांडे की फिल्म बेबी में अक्षय कुमार ने अजय सिंह के किरदार में सेना के एक ऐसे खुफिया अफसर की भूमिका अदा की है, जिसका महकमा पांच साल के ट्रायल रन पर है। सरकार और कागजों में इस महकमे का कोई अस्तित्व नहीं है। इस महकमे के अफसर से सरकार कभी भी किसी भी स्थिति में यह कहकर पल्ला झाड़ सकती है कि इससे हमारा कोई वास्ता नहीं है। इसके दूसरी ओर महकमे की उपलब्धि यह है कि इसने अपने 'ट्रायल रन' के दौरान कई बड़े-बड़े आतंकियों को न केवल पकड़ा था बल्कि उनके कई खतरनाक मंसूबों पर पानी भी फेरा है। फिर भी अपने हर मिशन के लिए अजय और उसके बॉस फिरोज अली खान (डैनी डैंजोंगप्पा) को आपातकालीन स्थिति में भी मंत्रीजी से मिलने के लिए उनके पीए से कैसे समय लेना पड़ता है, ये आप फिल्म में देखें तो बेहतर है। क्योंकि यह एक ऐसी स्थिति है, जिसे बताने में थोड़ी परेशानी सी होती है। एक दिन अजय को पता चलता है कि आतंकवादी देश के कुछ प्रमुख महानगरों को अपना निशाना बना सकते हैं, जिसकी शुरुआत दिल्ली से होनी है। दिल्ली में एक मॉल में बम विस्फोट की कोशिश को तो अजय किसी तरह नाकाम कर देता है, लेकिन अब उसे देश के अन्य शहरों में होने वाले बम धमाकों को रोकना है। उधर, इस षड्यंत्र से जुड़ा जेल में बंद एक अन्य आतंकी बिलाल (केके मेनन) किसी तरह जेल से फरार हो जाता है। बिलाल का फरार होना और एक अन्य आतंकी का खुद को बम से उड़ा लेना, इस कड़ी को जोड़ने में अजय को देर नहीं लगती और उसके सामने जल्द ही तस्वीर साफ हो जाती है। मामले की तह तक पहुंचने के लिए फिरोज और अजय की तलाश का अगला केन्द्र नेपाल है, जहां से उन्हें एक वसीम खान (सुशांत सिंह) को जिंदा पकड़कर लाना है लेकिन फिर से पहचान उजागर न करने की अड़चन उनके सामने आती है। अजय तमाम लोगों को भरोसे में लेकर अपनी एक अन्य साथी प्रिया सूर्यवंशी (तापसी पन्नू) के साथ नेपाल जाता है और बड़ी ही सूझबूझ के साथ बिना किसी को खबर लगे वसीम को भारत ले आता है।
वसीम से अजय को पता चलता है कि बिलाल इस समय सऊदी अरब में है और एक योजना पर तैयारी कर रहा है। अजय और फिरोज तुरंत हरकत में आते हैं और एक खुफिया 'मिशन' की योजना बनाते हैं। असंभव से दिखने वाले इस मिशन को मंजूरी तो मिल जाती है, लेकिन इस बार अजय के साथ उसके साथी भी हैं। अजय का उद्देश्य तकनीकी विशेषज्ञ ओम प्रकाश शुक्ला (अनुपम खेर) और जय (राणा दग्गुबती), को लेकर सऊदी अरब जाकर केवल बिलाल को खत्म करना है। सब कुछ योजना के हिसाब से चल रहा होता है। लेकिन जब अजय बिलाल को उसके कमरे में मारने के लिए पहुंचता है तो वहां एक अन्य व्यक्ति को देखकर दंग रह जाता है। वह व्यक्ति है पाकिस्तानी मौलाना मोहम्मद सईद रहमान (राशिद नाज) जो इस पूरे मिशन का सर्वे सर्वा है। मौलाना ने ही बिलाल को फरार करवाया था। सीमा पार से होने वाले आतंकी हमलों में इसी का हाथ था।
ऐसे में मौलाना को कमरे में देख अजय समझ नहीं पाता कि मौलाना को मार डाले या पकड़कर भारत ले जाए। अंतत: अजय वही करता है, जिसके लिए वह जाना जाता है। अजय अंतिम समय पर अपनी योजना बदल देता है और बिलाल का खात्मा कर मौलाना को जिंदा भारत लाने की ठान लेता है। इसमें कोई संशय नहीं कि इस सनसनीखेज कहानी को नीरज पांडे ने अपने चिरपरिचित अंदाज में पेश किया है। बेबी में पैनापन है और कई अनछुई बातों को कहने की ताकत भी। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी, कलाकारों का अभिनय, स्क्रीनप्ले आदि की बातें करने से पहले इस कहानी में छिपी एक खास बात पर ध्यान जाता है। फिल्म के एक शुरुआती दृश्य में अजय अपने ही एक साथी जमाल से कड़ी पूछताछ कर रहा है। अजय उससे जानना चाहता है कि दिल्ली के एक शॉपिंग मॉल में बम कहां लगाया गया है। जब जमाल मुंह नहीं खोलता और लगातार पिटते रहने के बावजूद बात-बात पर हंसता रहता है। तब अजय दिल्ली में इस मिशन को नाकाम करने में जुटे अपने साथी जय को फोन पर कहता है कि जमाल के परिवार को उसी शापिंग मॉल में ले आओ। ये सुनकर जमाल के होश उड़ जाते हैं। उसे लगता था कि एक भारतीय फौज का सिपाही होने के नाते चाहे कोई भी स्थिति परिस्थिति हो कोई ऐसा नहीं कर सकता। जमाल अजय को बम की जगह बता देता है।
बेशक किसी फिल्म के दृश्य के लिए ही ऐसा चित्रण पहले कभी नहीं किया गया। जहां तक मुझे याद पड़ता है इससे मिलती जुलती स्थिति का एक दृश्य अनुराग कश्यप की फिल्म ब्लैक फ्राईडे में देखने को मिलता है, जिसमें मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों में संदिग्ध लोगों से पूछताछ के दौरान तत्कालीन पुलिस कमिश्नर उनके सगे-संबंधियों और रिश्तेदारों के कान कसने की वकालत करता दिखता है न केवल वकालत बल्कि वो ऐसा करता भी है। इसका परिणाम ये निकलता है कि जिहाद की बात करने वाले सच्चाई उगल देते हैं। अगर इस सख्ती को आतंकवाद पर सख्त कदम का पैमाना न भी मानें तो यह एक अहम कदम जरूर हो सकता है, जो कहीं न कहीं किसी अंजाम के डर को दर्शाता है। हालांकि कश्मीर में अचानक गुम होने वाले युवाओं पर उनके परिवारवालों का परेशान हो जाना और फिर सेना को कटघरे में खड़ा कर देने वाली बातों पर भी बेबी एक रोशनी डालने वाला काम करती है लेकिन आतंकवाद पर लगाम के लिए सख्ती और कड़े फैसले लाने जरूरी है इसका उदाहरण कई और बातों से भी सामने आता है। अगर अमरीका की बात करें तो ये सख्ती और उसके परिणाम बेहद सहजता से सामने आते हैं।
अमरीकी सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म अन्थिंकेबल (2010) में ऐसी सख्ती के संकेत मिलते हैं। निर्देशक ग्रेगर जार्डन की इस फिल्म में जिहादी से खुफिया पुलिस कुछ उगवाने में लगी है। उसने शहर में यहां-वहां परमाणु बम लगाए हैं और वह चाहता है कि अमरीका अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस बुला ले। जब कोई चारा नहीं मिलता तो एक सिरफिरा एजेंट पहले उस व्यक्ति की पत्नी और फिर बच्चों को उस पूछताछ में शामिल कर लेता है, जिसके बाद वह टूट जाता है। हालांकि इस पूरे दृश्य से अमरीकी व्यवस्था को बचाने की कोशिश भी की गई है और दिखाया गया है कि किस तरह से एफबीआई के लोग इस पूरे घटनाक्रम के प्रति संवेदनशील होते हैं लेकिन जिस बाहरी एजेंट को ये करने की जिम्मेदारी दी गयी थी उसका पक्ष समझने की जरूरत है। वो खुद एक पारिवारिक इंसान है और अपने तथा अन्य हजारों परिवारों को बचाने के लिए उसे एक परिवार को संकट में डालने से गुरेज नहीं है। अब लगता है कि ऐसे परिवेश में सख्ती के समर्थन में आवाजें उठनी शुरू हो गयी हैं।
हाल ही में रिलीज हुई क्लिंट ईस्टवुड की अमरीकी फिल्म 'अमरीकन स्नाईपर' पर भी ध्यान देने की जरूरत है। घात लगाकर निशाना लगाने वाले एक अमरीकी निशांची के जीवन पर आधारित फिल्म के प्रोमो में जो एक बात प्रमुखता से शामिल की गई है वो बेबी और अन्थिंकेबल की मूल भावना से मिलती जुलती है। इस फिल्म के एक दृश्य में इसका नायक को एक कठिन परिस्थिति में एक ही समय में एक महिला और एक बच्चे को अपनी गोली का निशाना बनाना पड़ता है क्योंकि वो महिला और बच्चा भारी असलहे के साथ एक खतरनाक मिशन को अंजाम देने जा रहे हैं। तमाम तरह के दबाव और आत्ममंथन के बाद वो निशांची गोली दाग देता है।
बेबी को केवल इस अर्थ में देखना कि ये अक्षय कुमार की एक बढि़या मारधाड़ वाली फिल्म है या बेबी नीरज पांडे की अब तक की सबसे बेहतर फिल्म है या फिर ये कि हमारे यहां भी अब अच्छी जासूसी फिल्में बनने लगी हैं, इन सब बातों से इतर फिल्म को देखना इसलिए जरूरी है कि अब हमारे यहां आतंकवाद पर सख्ती से कदम उठाने की बात करने वाली फिल्में भी बनने लगी हैं। ऐसी फिल्में, जिनके संवादों पर बेशक तालियां और सीटियां न बजें, लेकिन ये फिल्में हिन्दू-मुस्लिम के दायरे से बाहर निकलकर सही मायने में भारतीय होने की बात करती हैं।
-स्वाति गौड़