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पाठकों के पत्र- अंक संदर्भ : 26 अक्तूबर, 2014
आवरण कथा 'उजाला मेहनत का' से प्रतीत होता है कि अगर मेहनत और काम के प्रति सच्ची लगन हो तो इस दुनिया में ऐसा कोई भी कार्य नहीं है जो संभव नहीं है। पाञ्चजन्य के इस विशेष अंक में जिन महानुभावों के जीवन पर प्रकाश डालकर उनकी उपलब्धियों को बताया गया है वह हमारे समाज को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। अगर भारत को पुन: विश्व में गौरव पाना है तो प्रत्येक भारतवासी को कड़ी मेहनत करनी होगी । जिसके बाद ही भारत का नाम पूरे विश्व में गौरव से ऊंचा होगा। ये कुछ लोग हैं, जिन्होंने अपने दम पर अपना व देश का नाम रोशन किया है।
—लक्ष्मी चन्द्र
बांध कसौली,जिला-सोलन (हि.प्र.)
ङ्म दीपोत्सव पर प्रकाशित विशेष अंक जिसमें सभी मेहनती व्यक्तियों के जीवन पर प्रकाश डाला गया है वह समाज के लिए एक उपहार से कम नहीं है। इस अंक के माध्यम से पत्रिका ने उन लोगों के लिए पथ प्रदर्शन व उत्साह जगाने का कार्य किया है,जो अकर्मण्यता का शिकार हो गए थे। यह अपने आप में ऐतिहासिक संग्रह है। इस विश्ेाष अंक के प्रकाशन के लिए समस्त पाञ्चजन्य परिवार को शुभकामनाएं।
—अमित गोपाल
500/12 नई मंडी,मुजफ्फरनगर(उ.प्र.)
ङ्म दीपावली पर पाञ्चजन्य ने युवाओं में एक नया जोश भरने का काम किया है। देश का युवा आज अगर कड़ी मेहनत और लगन के साथ अपने देश की ही बनी चीजों की मार्केटिंग विश्व में करने लगे और विदेशी वस्तुओं का वहिष्कार करने लगे तो भारत का प्रत्येक नागरिक मजबूत हो सकता है। देश की पिछली सरकारों ने अपनों को दुतकारा और विदेशियोंं को पुचकारा है,जिसका परिणाम आज हमारे सामने है। देश के कई हिस्सों में लोगों को दो समय के भोजन के लिए तरसना पड़ रहा है। लेकिन अब समय में परिवर्तन आया है और सरकार भी चाहती है कि देश में रोजगार बढ़े और यहीं पर चीजों का निर्माण हो। जिस दिन यह हो गया उस दिन सभी मजबूत हो जाएंगे।
—पंकज कुमार शुक्ल
खदरा, लखनऊ (उ.प्र.)
ङ्म आज हमें कई क्षेत्रों में पुन: प्रशिक्षण की जरूरत है। यह स्वीकार करना होगा कि युगान्तर में कई आविष्कारों और अन्यान्य प्रयोगों के स्वरूप एवं पैमाने बदले हैं,जिनसे हमें कई सूक्ष्म चीजों को समझने की अद्भुत शक्ति मिली है। आज संभावनाओं का युग है। इसलिए मान्यताओं और बाध्यताओं को समझकर समाज को एक नया स्वरूप देना होगा। इसका पूरा भार आज की युवा पीढ़ी पर है।
—रमेश माथुर,
गगन विहार (दिल्ली)
ङ्म दीपावली विशेषांक का संपादकीय सारगर्भित व प्रेरणास्पद था। कुछ लोगों के अथक परिश्रम को पत्रिका में स्थान देकर समस्त समाज को एक संदेश गया है कि अगर कड़ी मेहनत की जाए तो कुछ भी असंभव नहीं है।
—भवेश मरोलिया 'योगेंद्र'
दुर्ग कालोनी, चूरू (राज.)
ङ्म दीपावली पर प्रकाशित विशेष सामग्री अत्यधिक उत्कृष्ट थी। संपादकीय समेत आवरण व कथा तक ऐसा लग रहा था जैसा किसी एक सूत्र में पिरोई गई हो। अथक मेहनत व संघर्षों के रूप में कुछ लोगों को पत्रिका में स्थान देकर देश व समाज को संदेश देने का प्रयास किया है कि अगर मेहनत की जाए तो अंधेरा दूर किया जा सकता है।
—डॉ. रंगनाथ शिंदे
किला, बागलकोट (कर्नाटक)
आस्था से खिलवाड़
आस्था व विश्वास से भरपूर समर्पित जीवन हिन्दू धर्म का परम कर्तव्य है। यह परम्परा आज से नहीं बल्कि सनातन चली आ रही है। लेकिन जिस प्रकार आज पैसे की अंधी दौड़ में कुछ लोग, जिनमें फिल्म निर्माता-निर्देशक शामिल हैं कला का दुरुपयोग करके देश की आस्था और श्रद्धा से खिलवाड़ कर रहे हैं। सरकार को चाहिए कि ऐसे लोगों पर कड़ी कार्रवाई करे। भारतीय सेना का इतिहास रहा है कि उसने कभी भी जात-पात व मत-पंथ में विश्वास नहीं किया, उसके लिए देश ही सर्वोपरि रहा है। फिर भी कुछ लोग सेना को बदनाम करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते हैं। ऐसे लोगों को पता होना चाहिए कि यह वही भारतीय सेना है,जो सीमा पर रात-दिन जागकर अपने प्राणों की आहुति देकर देश की रक्षा करती है। अगर कुछ पल के लिए भी अपने कर्तव्य पथ से हट जाएं तो क्या हो सकता है,यह पूरे देश को पता है?
—उमेदू लाल 'उमंग'
ग्राम पटूड़ी, टिहरी गढ़वाल (उत्तराखंड)
देश का कैंसर
देश में अवैध रूप से रह रहे बंगलादेशी इस समय संपूर्ण देश के लिए एक गंभीर समस्या बने हुए हैं। अधिकांश गंभीर अपराधों और आतंकवादी गतिविधियों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उनके हाथ होने के प्रमाण मिलते हैं और लगातार जारी हैं। असम सहित पूरा बंगाल इन अवैध घुसपैठियों का प्रमुख अड्डा बन चुका है। कुछ आंकड़ों पर गौर करें तो प्रतिवर्ष लगभग 20 हजार बंगलादेशी अवैध तरीके से भारत में घुसते हैं और उसके बाद वे कहां गायब हो जाते हैं यह किसी को भी नहीं पता। इसी का फायदा उठाकर यह भारत की नागरिकता भी प्राप्त कर लेते हैं। ये देश के सीमावर्ती राज्यों व अन्य राज्यों के लिए भी एक बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। सरकार को चाहिए कि तत्काल एक अभियान चलाकर इनकी छानबीन की जाए और देश से बाहर किया जाये।
—प्रो.योगेश चन्द्र शर्मा
10/611 मानसरोवर-जयपुर (राज.)
गोरक्षा पर जोर हो!
सन् 1966 में दिल्ली में एक बहुत बड़ा गोरक्षा आंदोलन हुआ था। इतिहास में आजतक इतना बड़ा आंदोलन कभी भी नहीं हुआ। इस आंदोलन के बाद से आज तक गोरक्षा के लिए छोटे और बड़े स्तर पर अनेक संघर्ष जारी हैं। लेकिन दु:ख की बात यह है कि इतना सब होने के बाद भी देश में सुबह होते ही लाखों गायों की हत्या कर दी जाती है और हम सोते ही रहते हैं। यह सत्य ऐसा नहीं है कि किसी को पता नहीं है। इस सत्य से आज हर कोई परिचित है,फिर क्या समस्या है कि अभी तक गोवध पर पूर्ण अंकुश नहीं लगाया गया? केन्द्र सरकार को चाहिए कि वह तत्काल इस दिशा में ठोस कानून बनाकर गोरक्षा का कार्य करें। यह समय हिन्दू समाज के लिए अतिमहत्वपूर्ण है।
—जंगबहादुर क्षत्रिय, मंदिर मार्ग (नई दिल्ली)
बढ़ा आत्म गौरव
देश की आजादी के बाद शायद पहली बार भारत की संस्कृति और उसके मन को समझने वाली सरकार ने सत्ता संभाली है। सत्ता संभालने के बाद से अब तक का जो लेखा-जोखा रहा वह बड़ा ही उत्साहजनक रहा है। जिसका परिणाम यह है कि भारत की जनता अब अपनी समस्याओं का निदान इस सरकार में ढूंढ़ने लगी है। भले ही वर्तमान सरकार का कार्य अभी धरातल पर न दिखाई देता हो पर जो भी कार्य हो रहे हैं वह बड़े ही दूरगामी हो रहे हैं। बच्चों से लेकर वृद्धों तक में एक उत्साह और आत्मगौरव की भावना जागृत हुई है।
—डॉ. उदय प्रताप सिंह
हरिनारायण बिहार, वाराणसी (उ.प्र.)
अपना अस्तित्व खोता पाक
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से और आज तक समाज और सरकारें पाकिस्तान के साथ संबंध साधते-साधते थक गई हैं। असल में जब पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो भारत के राज्य बंगाल,बिहार व उ.प्र. सहित पंजाब के मुसलमानों ने पाक को बनाने के लिए अधिक सहभागिता दिखाई। यह शक्ति आज भी न थकी है और न ही इसकी प्रकृति बदली है, उसका कार्य अभी भी अनवरत रूप से जारी है। पूरे हिन्द को इस्लाम के तले लाना उसका लक्ष्य है। इन सभी की समस्या यह है कि पैदा तो पंजाब और सिंध की धरती पर हुए पर इनका दिल और दिमाग अरब में है। आज देश को ऐसी ताकतों से सजग रहने का समय है।
—डॉ.ब्रह्मदत्त अवस्थी
नगलादीना-फतेहगढ़, फर्रूखाबाद (उ.प्र.)
मातृभूमि का विरोध क्यों?
हम सब भारत के निवासी हैं, भारत हमारी जन्मभूमि है। यहां की संस्कृति में हम रचे-बसे हैं। यही एक ऐसा देश है, जहां विविधता ही इसका श्रृंगार है और सभी जात-पात,मत-पंथ के लोग मिलकर रहते हैं। लेकिन इसमें भी कुछ ऐसे लोग हैं,जो इस शुद्ध समाज को विषाक्त बनाने का कार्य करते हैं और किसी न किसी बहाने राष्ट्र का अपमान करते हैं। समाज को चाहिए कि वह ऐसे संकीर्ण सोच के लोगों का तिरस्कार करे और उनके गलत कार्यों का प्रभावी जवाब दंे।
—कु. शहरोज अनवीर
कोर्ट कंपाउंड,सिविल लाइंस,कानपुर (उ.प्र.)
कंाग्रेस की खीझ
कांग्रेस के शासनकाल मे देखें तो कोई भी ऐसा विभाग नहीं था, जहां भ्रष्टाचार ने पैर न पसार रखे हों। सभी कांग्रेसी इस राज में लूटने में लगे थे। जिस तरीके से आज कांग्रेस के नेता भाजपा सरकार पर बदले की भावना से काम करने का आरोप लगा रहे हैं वह निराधार है क्योंकि भाजपा ने कभी इस विचारधारा से काम नहीं किया। अगर किया होता तो कांग्रेस के अधिकतर नेता आज या तो जेल में होते या फिर जांच के दायरे में होते।
—सतीश सिंघल,कैथल (हरियाणा)
संघ की शक्ति
राजनीति अब भोगपरायण से कर्तव्यपरायणता की ओर अग्रसर हो रही है और मीडिया इस परिवर्तन से आश्चर्यचकित है कि इस ध्रुवीकरण का केंद्र संघ है। आज मीडिया की भूमिका और दृष्टिकोण भी अब धीरे-धीरे करवट बदल रहा है।
—गौरी द्विवेदी
जवाहर, भरतपुर (राज.)
पुरस्कृत पत्र –
भारत को आजाद हुए 68 वर्ष बीत गए। यह समय एक राष्ट्र को पूर्ण विकसित और आत्मनिर्भर होने के लिए बहुत अधिक नहीं है पर कम भी नहीं है। आजादी के बाद देश में लगातार कांग्रेस का एकछत्र शासन रहा है। अगर 10-12 वर्ष का विपक्ष का समय निकाल दें तो 50 वर्ष एक ही परिवार ने प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से शासन किया है। फिर भी भारत की जनता मूलभूत समस्याओं बिजली,पानी,चिकित्सा,कुपोषण एवं भ्रष्टाचार से जूझ रही है। ग्रामीण अंचलों के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र बिना कर्मचारियों और डॉक्टरों के चल रहे हैं। प्राथमिक विद्यालयों में एक चौथाई अध्यापक अनुपस्थित रहते हैं तथा कई स्कूलों में तो सैकड़ों बच्चों पर एक ही अध्यापक हैं। तो इन सबका जिम्मेदार कौन है? भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 'आदर्श ग्राम योजना' का शुभारम्भ करते हुए ठीक ही कहा कि अगर संसद के करीब आठ सौ सांसद 2019 तक तीन गांवों को आदर्श बनाने में सफल होते हैं तो देश के मानचित्र पर हजारों गांव ऐसे उभरेंगे जिन पर हमें गर्व होगा। भारत विकास के पथ पर चल पड़ा है और जनता ने अंगड़ाई ली है। हरियाणा-महाराष्ट्र में वर्षों से चला आ रहा भ्रष्टाचार ध्वस्त हुआ है। भारत को चुनौती दे रही महंगाई, भ्रष्टाचार,संप्रदायवाद,आतंकवाद 'एक भारत-मजबूत भारत' बनते ही नेश्तेनाबूद हो जाएंगे।
—डॉ. सुभाष शर्मा
हरिभवन, रुड़की रोड,
मुजफ्फरनगर (उ.प्र.)











