उत्तर-पूर्व में दीपावली की जगमग
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उत्तर-पूर्व में दीपावली की जगमग

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Oct 18, 2014, 12:00 am IST
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दिंनाक: 18 Oct 2014 15:02:53

पूरे भारतवर्ष में दीवाली का आनन्द अनूठा ही होता है। सभी राज्यों में यह पर्व अलग अलग तरीके से मनाया जाता है। पूर्वोत्तर भारत में तो यह अवसर पारिवारिक संबंधों को और गहराने का होता है। भारत के इस अंचल में 287 जनजातियां तथा उपजनजातियां हैं। अकेले अरुणाचल प्रदेश में इनकी संख्या 128 है, तो असम में 52, मणिपुर में 33, मिजोरम में 22, नागालैण्ड में 19, त्रिपुरा में 19, मेघालय में 9 और सिक्किम में 5 जनजातियां तथा उपजनजातियां हैं। इनके अलावा असमिया, बंगाली, राजस्थानी, हिन्दी भाषी, मलयाली तथा अन्य प्रांतों के लोग पूरे क्षेत्र में बसे हैं। इनकी आबादी नगरों में घनी तथा देहात में विरल है। यहां दीवाली का पर्व सभी समुदायों के लोग मनाते है। नागालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम व अरुणाचल प्रदेश की कुछ जनजातियों को छोड़कर शेष समाज दीवाली का पर्व कुछ अलग प्रकार से मनाते हैं। किन्तु असमिया, बंगाली, पंजाबी, मलयाली, राजस्थानी व हिन्दी भाषी समाजों में दीवाली पर्व मनाने में काफी
समानता है।
मणिपुर
मणिपुर में दिवाली को निंगोल चाकौबा (निंगोल-पुत्री, चाकौबा-दावत पर आमंत्रण) कहते हैं जो दीवाली के एक या दो दिन बाद मनाया जाता है। मणिपुरी समाज के मैतेई हिन्दू वैष्णव हैं और उत्तर भारत में जिस तरह दिवाली मनायी जाती है उसी प्रकार ये भी दीवाली मनाते हैं। पहले लक्ष्मी पूजा करते हैं, दीए जलाकर घर को सजाते हैं। देवी-देवताओं के स्थानों तथा मन्दिरों में दीए जलाते हैं, नये कपड़े पहनते हैं। बुजुर्ग पुरुष धोती-कुर्त्ता पहनते हैं तो बुजुर्ग माताएं-बहनें मेखला पहनती हैं। प्राय: सभी पुरुषों के गले में तुलसी माला व ललाट पर चन्दन का त्रिपुण्ड लगा होता है। इस अवसर पर आपस में उपहार दिए जाते हैं तथा मिठाइयां बांटी जाती हैं। सभी माताओं-बहनों के ललाट पर भी चन्दन का त्रिपुण्ड होता है।
निंगोल चाकौबा (दीवाली) पर्व यहां के सबसे बड़े व महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है। इस अवसर पर विवाहिता बहनों व उनके बच्चों को भाई एक सप्ताह पूर्व औपचारिक आमंत्रण देता है। उनके लिए एक बड़े भोज का इन्तजाम किया जाता है। इस अवसर पर वे नवीन कपड़े पहनते हैं और दक्षिणा के रूप में पैसे पाते हैं। इस अवसर पर भोजन बनाने के लिए अनुभवी ब्राह्मण को बुलाया जाता है अथवा मां या घर के बुजुर्ग भोजन बनाते हैं। परिवार व सभी संबंधी जुटते हैं, एक साथ भोजन करते हैं, आपसी प्रेम व उपहार का आदान-प्रदान करते हैं। इससे उनमें आपसी भाईचारे व प्रेम को बल मिलता है।
इस अवसर पर न्गा थोंग्बा (मछली कढ़ी), इरोम्बा (चटकदार चटनी), ऊटी (स्थानीय दाल), सोइबम मोथल (बांस की कोपल से बना खाद्य), हीथोंग्बा (फलों से बना भोज्य पदार्थ), विभिन्न प्रकार के मीठे चावल व कई प्रकार की स्वादिष्ट सब्जियां पकायी जाती हैं। इन पकवानों के बनाने में जो श्रद्धा व स्नेह का भाव होता है वह बड़ा महत्वपूर्ण होता है। इसी कारण इस पर्व की पवित्रता व महानता है।
दोपहर का भोजन देर तक चलता है, लोग धीरे-धीरे स्वादिष्ट भोजन का आनन्द लेते हैं और आपस में बातचीत करते रहते हैं। भोजन के बाद बैठकी शुरू होती है जिसमें खूब गप-शप होती है। विवाहिता बेटियों व उनके बच्चों को मां-पिता जी व मामा द्वारा उपहार भेंट दिए जाते हैं। वैसे तो परिवार, सगे संबंधी व बेटियां अन्य अवसरों पर भी मिलते हैं, साथ-साथ खाते-पीते हैं, गप-शप करते हैं, किन्तु दीवाली का मिलन तो विशेष आनन्द प्रदान करता है। इसीलिए विवाहिता बेटियों को इस पर्व का बड़े उत्साह से इन्तजार रहता है।
असम
भौगोलिक दृष्टि से असम देश की राजधानी से काफी दूर चीन की अन्तरराष्ट्रीय सीमा के नजदीक है। असम जाने का मार्ग काफी लंबा है जो मात्र 30 किमी. चौड़ी पट्टी- सिलीगुड़ी गला से गुजरता है। इतना दूर होने पर भी सांस्कृतिक दृष्टि से असम शेष भारतवर्ष से गहराई से जुड़ा हुआ है। यहां जनजातियों की रंगारंग संस्कृति पूरे असम की सांस्कृतिक संपदा को अलौकिक बना देती है।
यहां सभी त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं। दीवाली पर्व यहां के कुछ महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है। यह पांच दिन तक मनाया जाता है। महापापी रावण का वध कर 14 वर्ष का वनवास बिताने के बाद भगवान राम जब अयोध्या लौटे तो उनके सम्मान व स्वागत में रोशनी करके दीवाली मनायी गई। यहां भी तभी से दीवाली मनाने की परंपरा प्रारंभ हुई। अपने घरों तथा आसपास के परिसर को साफ कर संध्या समय पारंपरिक दीयों व मोमबत्तियों से घरों को बाहर-भीतर से सजाया जाता है। प्रवेश द्वार पर दोनों तरफ एक-एक केले का पेड़ खड़ा किया जाता है। उस पर बांस की फट्टी लगाकर एक पंक्ति में दीए सजाये जाते हैं। अतिथियों के स्वागत में प्रवेश द्वार के पास सुन्दर रंगोली बनायी जाती है।
जिस प्रकार बंगाल में काली पूजा की जाती है उसी प्रकार दीवाली के दिन असम में काली पूजा की जाती है। इस दिन काली मां की आरती उतारी जाती है और देवी के स्वागत में रंगोली बनायी जाती है। लोग खुशी में पटाखे फोड़ते हैं, बच्चे फुलझडि़यों से खेलते हैं।
दीवाली उत्सव के अंतिम दिन भाईदूज मनाया जाता है जो भाई-बहन के संबंधों को प्रकट करता है। विशेषकर बंगाली व नेपाली समाज में यह काफी लोकप्रिय है। बंगाली हिन्दू इसे भाई-फोटा तथा नेपाली हिन्दू इसे भाई-टीका कहते हैं। इस दिन बहनें भाई के ललाट पर चावल व सिंदूर से टीका लगाती हैं तथा भाई के सुखी व दीर्घ जीवन की कामना करती हैं। भाई उन्हें भेंट देते हैं। शेष भारतवर्ष की तरह असमिया समाज दिवाली के दिन लक्ष्मी पूजा भी करता है। इस दिन वहां लोग नये पारंपरिक कपड़े पहनते हैं, मिठाइयां खाते हैं, उपहार देते हैं और घर में उत्तम किस्म का भोजन बनाकर रखते हैं।
जनजातीय समाज में दिवाली
इस क्षेत्र की सभी जनजातियों के अपने पारंपरिक तयोहार तथा विशिष्ट पूजा पद्धति है। भौगोलिक कारणों से जब इस क्षेत्र के लोगों का शेष भारतवर्ष के लोगों से व्यापारिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान बहुत कम था तो इनके पारंपरिक त्योहारों तथा पूजा पद्धति में शेष भारतवर्ष में प्रचलित पद्धतियों से ज्यादा अन्तर था। किन्तु आज परिस्थिति बदलती जा रही है। होली, दीवाली, दुर्गापूजा, कृष्ण जन्माष्टमी तथा चैत-रामनवमी आदि पर्व यहां की जनजातियों में भी लोकप्रिय होते जा रहे हैं और उनके अपने पारंपरिक पर्वों को मनाने की पद्धति में भी गुणात्मक विकास होता जा रहा है।
त्रिपुरा
दीवाली त्योहार अधिकांश जनजातीय समाज में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। त्रिपुरा राज्य के हालाम, चकमा, रियांग, जमातिया, देव बर्मा आदि जनजातीय समाज दिवाली से पूर्व अपने-अपने घरों की सफाई करते हैं। दीवाली के दिन नहा-धोकर नवीन पारंपरिक वेश पहनते हैं। घर के प्रवेश द्वार पर केले का पेड़ गाड़ कर उस पर बांस की फट्टी के सहारे दीए सजाते हैं। घर के चारों तरफ दीए जलाते हैं। पटाखे फोड़ते हैं, फुलझडि़यों से खेलते हैं। इनका भी यही विश्वास है कि रावण का वध करके 14 वर्ष के वनवास के उपरांत भगवान राम की अयोध्या वापसी पर दीवाली मनाकर उनका सम्मान व स्वागत किया जाता है। इस अवसर पर बकरी, मुर्गी, कबूतर आदि की बलि दी जाती है और मांस को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। इसके अलावा केला, चिउड़ा तथा सेब आदि फलों को भी प्रसाद के रूप में दिया जाता है। चावल से बना पेय पदार्थ भी ग्रहण किया जाता है। सायंकाल चावल, दाल व विभिन्न प्रकार की सब्जियों का सेवन किया जाता है। गम चावल (मीठा चावल) पकाकर ग्रहण किया जाता है। – जगदम्बा मल्ल

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