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झांसे में आए और चर्च ने भी ठुकराया

Written byArchiveArchive
Oct 18, 2014, 12:00 am IST
inArchive

दिंनाक: 18 Oct 2014 14:09:33

दूसरे की आंख में तिनका खोजने से पहले तू अपनी आंख में पड़ा लट्ठा देख', बाइबिल का यह वचन मनुष्य को अपने अंदर झांकने को कहता है। पर वास्तविकता में ऐसा होता है क्या? नहीं, नहीं होता। प्राय: व्यक्ति या समाज, पंथ या जाति की तो निन्दा करता है, स्वयं के सुधार के प्रति उसकी दृष्टि प्राय: शिथिल बनी रहती है। कुछ ही समझबूझ वाले लोग अपने गिरेबां में झांकने का प्रयास करते हैं।
गरीब परीवार में जन्मे तथा जीवन के कठोर रास्तों पर चलते वंचित ईसाइयों की सतत् चिंता में जुटे रहने वाले आऱ एल़ फ्रांसिस ने अपनी ताज़ा पुस्तक 'अनसुने ईसाइयों की आवाज' में कुछ ऐसी ही कोशिश की है। उन्होंने वंचित विमर्श को एक निखरा रूप देते हुए ईसाई समुदाय में एक अनदेखे रखे गए तबके की दयनीय दशा से जोड़ा है। लेखक, जो ईसाई समाज को एक समाज सुधारक की दृष्टि से देख रहा है, ने पुस्तक में गरीब भाई-बहनों की वेदना तर्कपूर्ण, सुसंगत ढंग से प्रकट की है।
मोटे तौर पर दुनिया में सिर्फ दो ही वर्ग हैं अमीर और गरीब। फ्रांसिस इसी दृष्टि से ईसाई समुदाय में उस गरीब तबके का आकलन करते हैं, न कि कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट की नजर से। वे ईसा के समानता के सिद्घान्त को पुस्तक की चर्चा का केन्द्र बनाते हैं। पुस्तक लेखक फ्रांसिस के विभिन्न सम्मेलनों में प्रस्तुत वक्तव्यों तथा प्रपत्रों का एक संकलन है। 80 पृष्ठ की पुस्तक के 11 भागों में प्रत्येक भाग जातिवाद तथा शोषण के खात्मे की वकालत करता है। लेखक ईसाइयत के भीतर टूटते मानवीय ढांचे की ओर इशारा करता है।
बताया जाता है कि पंथ सेवा तथा जाति-मुक्त भावना को प्राथमिकता देता है। लेकिन सेवकाई में समानता और उदारता का मूल तत्व चर्च व्यवस्था के अधिकार सम्पन्न प्रमुख, पादरी वर्ग के मध्य धुंधला पड़ता दिख रहा है। फ्रांसिस पुस्तक में इस धुंधलके की बात करते हैं। पुस्तक ईसाई समाज में व्याप्त असमानता और वर्गभेद की पर्याप्त आलोचना प्रस्तुत करती है।
पुस्तक के प्रथम भाग में 'चर्च में डायवर्सिटी की जरूरत' शीर्षक के तहत चर्चा में लेखक चर्च को जातिवाद से बचने की सलाह देता है। 'चर्च नेतृत्व ने जाति प्रथा का कोढ़ ईसाइयत पर हावी कर दिया है', जैसा शब्द लिखकर लेखक ने ईसाई समाज के मानवीय तंत्र के क्षरण की आशंका प्रकट की है। पुस्तक कहती है-चर्च वंचित ईसाइयों के साथ वर्तमान में वैसा ही खेल खेल रहा है जैसा फरीसियो ने ईसा मसीह के साथ खेला था। यह चर्च में पनपती सड़ांध की सीधी आलोचना है।
पुस्तक में भारतीय चर्च में वंचित वर्ग के 70 प्रतिशत मतांतरित ईसाइयों के प्रति बरते जाने वाले भेदभाव और उपेक्षा की चर्चा की है। ये वे लोग हैं जिन्हें ईसाइयत का सब्जबाग चर्च की ओर खींच ले गया था। इनमें अधिकांश वंचित वनवासी, ग्रामीण क्षेत्रों से आए हैं। इनका जल, जंगल, जमीन से रिश्ता तो टूटा ही बल्कि ईसाइयत की नाव की सवारी का भी लाभ न मिल सका।
पुस्तक के अंतिम भाग 11 'जनजातियों की संस्कृति पर मंडराता खतरा' में लेखक वनवासी समाज में मतांंतरण से उपजी वैमनस्यता तथा शोषण के प्रति गम्भीर दृष्टि डालता है। छोटा नागपुर, झारखण्ड के उदाहरण से कहा गया है कि- चर्च ईसा मसीह की जीवनी तथा शिक्षाओं से भटक गया है। ल्ल समीक्षक : प्रेमकुमार गौतम

पुस्तक – अनसुने ईसाइयों की आवाज
लेखक – आऱ एल़ फ्रांसिस
पृष्ठ – 80, मूल्य -100 रुपए
प्रकाशक – जे.के़ प्रकाशन, डब्ल्यू बी-27 शकरपुर, दिल्ली – 110 092

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