| दिंनाक: 27 Sep 2014 17:03:36 |
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मंगल अभियान की सफलता ने हमारी दशहरा मनाने के उत्साह और उल्लास को कई गुना बढ़ा दिया है। विजयादशमी के पहले ही विजय की इबारत का लिखा जाना यह बताता है कि अभी कई विजयी क्षण आने बाकी हैं और जल्दी-जल्दी आएंगे। मानवतावादी और एस्ट्रो अंकल के रूप में पहचाने जाने वाले पवन सिन्हा जी से दशहरे की कुछ खास बातें जानने की कोशिश की अजय विद्युत ने।
ल्ल दशहरे का शाश्वत संदेश क्या है? …और कुछ न कुछ और जानने की इच्छा क्यों बनी रहती है?
दशहरा यानी अहंकार का नाश, यानी धैर्य की विजय, यानी ज्ञान की जीत, यानी सही उद्देश्य की जीत। हर दशहरा हर साल यही संदेश देता है। चलिए आज दशहरा के कुछ रहस्यों से पर्दा उठाते हैं। इन प्रश्नों का उत्तर दीजिए, खासकर बच्चों को जरूर बताइए-
1- लंका का मालिक कौन है?
2- भगवान राम लंका से अयोध्या कैसे पहुंचे?
3- पुष्पक विमान किसका था?
4- रावण के पिता कौन थे?
5- रामायण किसने लिखी?
6- भगवान राम ने किस पाठ को पढ़ा था रावण को मारने के लिए?
7- माँ के किस रूप के कारण भगवान रावण को मार सके?
इन सवालों के जवाब तो आप ही से जानेंगे। पर, एक बात बार-बार ख्याल आती है कि खलनायक होते हुए भी रावण के गुणों की इतनी चर्चा क्यों की जाती है?
रावण असाधारण ज्ञान का स्वामी था। वह आयुर्वेद, गणित, कर्मकांड, तथा ज्योतिष का अनुपम विद्वान था। यदि किसी को रावण संहिता में अपनी कुंडली मिल जाय तो वो अपने व अपने परिवार के बारे में वो सूक्ष्म बातें भी जान सकता है जो शायद उसे याद भी ना होंगी। सम्मोहन, तंत्र, भूतविद्या पर उसका अधिकार था। रावण के द्वारा रचित कुमारतंत्र को कैसे भुलाया जा सकता है? हजारों वर्ष पूर्व रावण ने इस शास्त्र में बच्चों को होने वाली बीमारियों व उनके निदानों के बारे मे अद्भुत उपाय बताये हैं। यही नहीं, रावण राज्यतंत्र का भी विलक्षण ज्ञाता था। यही कारण था कि भगवान राम ने लक्ष्मण को उसके पास राज-काज आदि बातें सीखने के लिए भेजा था। रावण ही था शिवतांडव स्तोत्र का रचयिता, जिसे सुनने से शिव की साधना की शक्ति प्राप्त होती है। रावण ने शनि का दंभ भी चूर किया था। अनेकों ग्रह शांति के मंत्र सिद्ध थे रावण को।
ल्ल इसे विजयादशमी क्यों कहते हैं?
मुझे यह लगता है कि यह जानना बहुत जरूरी है कि इस पर्व को विजयादशमी क्यों कहा जाता है। दरअसल भगवान के लिए रावण को मारना कठिन हो रहा था। रावण के अमरत्व के दो प्रमुख कारण थे। एक- भगवान शिव की कृपा और दूसरा- रावण द्वारा कालिका शक्ति का सिद्ध होना।
भगवान जान चुके थे कि जब तक शक्ति का वरदान उन्हें भी प्राप्त नहीं होगा, तब तक रावण को मारना असंभव है। शक्ति रूप में उसके नाभि चक्त्र का अमृत उसे मरने नहीं देगा। इसलिये भगवान ने नौ दिनों तक शक्ति की आराधना की और विजया नामक देवी को प्रसन्न किया और नौवें दिन देवी ने प्रगट होकर भगवान को विजयी होने का आशीर्वाद दिया। यह दिन आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी थी। अगले दिन राम ने रावण का वध किया इसीलिए इस दिन को विजयादशमी कहा जाता है।
युद्ध में मनोबल की महत्ता शस्त्रों से अधिक होती है। भगवान को दसवें दिन का युद्ध करने के लिए अधिक मनोबल की जरूरत थी। यहाँ अगस्त्य मुनि की सलाह काम आई। उन्होंने भगवान को आदित्यहृदय स्तोत्र के पाठ की सम्मति दी जिससे भगवान का शोक दूर हुआ और अतुल्य उत्साह उनके अंदर भर गया और वह रावण का वध करने चल दिए।
ल्ल विजयादशमी को जीवन में सार्थक परिवर्तन का प्रतीक क्यों माना जाता है?
क्योंकि विजयादशमी का जीवन में अत्यधिक महत्त्व है, शास्त्रों के हवाले से बता रहा हूं-
1- इस दिन प्रारम्भ किया गया कार्य बहुत शुभ फल देता है।
2- जीवन की लंबी लड़ाई से हारे लोगों के लिये यह पुनर्जागरण का दिन होता है।
3- अस्वस्थता से जूझ रहे लोगों के लिए संकटमोचन का कार्य करता है।
4- विशेष सिद्धियां प्राप्त करने के लिए भी विलक्षण होता है यह दिन।
5- विद्यार्थियों के लिए शुभतम दिनों मे से एक है यह दिन।
6- नए घर, वाहन व रिश्तों की शुरुआत के लिए भी यह दिन सिद्ध माना जाता है।
7- जीवन मे नई दिशाएं खोलता है यह दिन।
इस बार हम विजयादशमी का सदुपयोग किस प्रकार कर सकते हैं? कुछ ऐसे सामान्य उपाय बताएं जिनसे आमजन अपनी परेशानियों से राहत पा सकें।
-इस बार चूंकि विशेष ग्रह योग है अत: कुछ पूजाएं आप चाहें तो प्रारम्भ करें।
शत्रु बाधा हो तो आदित्यहृदय स्तोत्र का पाठ इसी दिन से करना प्रारम्भ करें।
तंत्र की दृष्टि से भी यह सिद्ध दिन है। विजयादशमी की पूजा में शमी के पेड़ का बहुत महत्व है। किसी भी किस्म का रोग हो तो शमी के पेड़ की जड़ इस दिन निकाल कर गले मे पहनें। गृहस्थी में गंभीर समस्या हो तो शमी के पेड़ की जड़ या लकड़ी इस दिन निकाल कर लाल या काले धागे में बांधकर पहनें।
वाद विवाद की स्थिति बार-बार बन जाती हो तो एक मंत्र याद करें-
ओम् रश्मिमते नम: ओम् समुद्यते नम: ओम् देवसुरनमस्कृताय नम: ओम् विवस्वते नम: ओम् भास्कराय नम: ओम् भुवनेश्वराय नम:
जब भी थक जाएं. अवसाद हो, हार मानने लगें, प्रतिष्ठा दांव पर लग जाए तो इसका जप करें। सामाजिक कार्यांे में लगे लोगों के लिए यह मंत्र अमृत समान है और इस मंत्र का प्रारम्भ इसी दिन से करें।मुकदमेबाजी चल रही हो और आप किसी झूठे मुकदमे में फंस गए हों, तो इसी रात से ओम् अपराजितये नम: का जाप प्रारम्भ करें। यह मंत्र दक्षिण की ओर मुंह करके किया जाता है।पिता थे मुनि विश्रवा, इनके दादा जी थे ऋषि अगस्त और परदादा थे ऋषि पुलत्स जो ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे। ल्ल