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देवेन्द्र स्वरूप
स्वाधीन भारत की राजनीतिक यात्रा 15 अगस्त, 1947 को प्रारंभ होती है। इस दिन को हम अंग्रेजों की दौ सौ साल लम्बी राजनीतिक दासता से मुक्ति के रूप में देखें या भारत में इस्लाम के प्रवेश के साथ प्रारंभ हुई 1200 साल लम्बे मजहबी विस्तारवाद के विरुद्ध भारतीय सभ्यता के संघर्ष की देश विभाजन की दुखांत परिणति में? उस समय राजनीतिक सत्ता जिस कांग्रेस पार्टी के पास आई उसके तीन शिखर नेताओं महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल की इन प्रश्नों पर क्या दृष्टि थी? ऊपर से देखने पर लगता है कि तीनों स्वाधीन भारत के शिल्पी की तरह एक मत होकर काम कर रहे थे। किंतु उस काल के विशाल दस्तावेजी साहित्य का अध्ययन करने पर पता लगता है कि सत्ता सूत्रों का वास्तविक संचालन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उप प्रधानमंत्री सरदार पटेल के हाथों में केन्द्रित था। महात्मा गांधी महज एक मार्गदर्शक और परामर्शदाता की भूमिका निभा रहे थे। दोनों के बीच में जब-जब मतभेद उभरते, महात्मा गांधी उन पर अपने स्नेहपूर्ण परामर्श का मरहम लगा देते। अंतत: गांधी जी की मृत्यु के कुछ दिन पूर्व नेहरू और पटेल के संबंध टूटने के कगार पर पहुंच गए और नेहरू ने पटेल से अपने मतभेदों पर एक लम्बा नोट 6 जनवरी, 1948 को गांधी जी के पास भेज दिया। इस नोट के आरंभ में ही नेहरू ने स्वीकार किया कि यह सच है कि सरदार और मेरे बीच न केवल स्वभावगत मतभेद हैं, अपितु साम्प्रदायिक और आर्थिक प्रश्नों के प्रति दृष्टि में भी भारी दूरी है। हमारे बीच ये मतभेद अनेक वर्षों से यानी कि जबसे हमने साथ काम करना शुरू किया तभी से चले आ रहे हैं।
नेहरू की यह स्वीकारोक्ति बहुत महत्वपूर्ण है और इन मतभेदों की जड़ तक पहुंचने के लिए हमें नेहरू की विचारधारा के उद्गम स्रोत तक जाना होगा। नेहरू की पारिवारिक पृष्ठभूमि सरदार पटेल से बिल्कुल भिन्न थी। सरदार का जन्म काठियावाड़ के एक ठेठ कृषक परिवार में हुआ था। वे पूरी तरह जमीन से जुड़े हुए थे। जबकि नेहरू का जन्म इलाहाबाद के एक नामी वकील के घर में हुआ था। यह परिवार अपने को आधुनिक सभ्यता का प्रतिनिधि मानता था। खान-पान, रहन-सहन और रीति-रिवाज में अपने को परंपरागत बंधनों से मुक्त समझता था। इलाहाबाद का परंपरावादी बहुसंख्यक समाज नेहरू परिवार को अपने से पराया और पं.मदन मोहन मालवीय के परिवार को अपना सच्चा प्रतिनिधि समझता था। संस्कारों की इस दूरी के कारण मालवीय और नेहरू परिवार इलाहाबाद के सार्वजनिक जीवन में भी दो विपरीत धु्रव बन गए थे। यह ध्रुवीकरण 1926 में एक स्थानीय चुनाव में खुलकर सामने आ गया जब मोतीलाल नेहरू और मदनमोहन मालवीय आमने-सामने आ गए। उस समय 2 दिसम्बर, 1926 को मोतीलाल ने अपने पुत्र जवाहरलाल को एक पत्र में लिखा कि मालवीय गुट ने मुझ पर गोमांस खाने का आरोप लगाया, मुझे हिन्दू विरोधी घोषित कर दिया है। इसके पूर्व 1923 में खिलाफत आंदोलन के सूत्रधार मो. मुहम्मद अली ने कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद जवाहरलाल नेहरू को अपना मुख्य सचिव बनाया और कांग्रेस के राष्ट्रवादी नेतृत्व के प्रति अपनी संकीर्ण मजहबी राजनीति में नेहरू को अपने विश्वसनीय सहयोगी के रूप में देखा था। उसी समय से गांधी जी और मोतीलाल नेहरू के बीच घनिष्ठता प्रारंभ हो गई थी। जवाहरलाल अपनी संभ्रांत पृष्ठभूमि, विदेश में शिक्षा, दर्शनीय व्यक्तित्व व अंग्रेजी वक्तृता व लेखन पर अधिकार के कारण कांग्रेस में आगे बढ़ रहे थे। वे अंग्रेजी शिक्षित युवा वर्ग में लोकप्रिय हो रहे थे और गांधी जी उनकी इस लोकप्रियता का लाभ उठाना चाहते थे।
कांग्रेस में जवाहरलाल नेहरू की इस प्रगति को देख कम्युनिस्ट आंदोलन भी उनकी ओर आकर्षित हुआ। 1917 में रूस में सत्ता परिवर्तन को साम्राज्यवाद पूंजीवाद विरोधी कम्युनिस्ट क्रांति के रूप में प्रक्षेपित किया जा रहा था। लेनिन ने अपनी विस्तारवादी योजनाओं में भारत की बड़ी भूमिका निर्धारित की थी। उस समय भारत अपना एकमेव शत्रु ब्रिटेन को समझता था और इसलिए ब्रिटिश विरोधी प्रचार के कारण सोवियत रूस को अपना सहज मित्र मानने लगा था। सोवियत एजेंट भारत में ऐसे लोग ढूंढ रहे थे जो उनके काम आ सकें। संयोग से जवाहरलाल नेहरू अपनी पत्नी कमला नेहरू, जो तपेदिक की मरीज थीं, को इलाज के लिए यूरोप ले गए उन्हें स्विटजरलैंड में रखकर वे यूरोप के राजनीतिक आंदोलनों एवं नेताओं से सम्पर्क जोड़ने लगे। इस अवसर का लाभ उठाकर सोवियत एजेंटों ने उन्हें फरवरी, 1927 में ब्रसेल्स में आयोजित साम्राज्यवाद एवं औपनिवेशिक उत्पीड़न के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का निमंत्रण दे दिया। नेहरू जी ने उस निमंत्रण को लपक कर पकड़ लिया। ब्रसेल्स में उन्हें भारत पर एक प्रस्ताव तैयार करने का मौका दिया गया। इस सम्मेलन पर मार्क्सवाद लेनिनवाद की भाषा छायी हुई थी और नेहरू ने उस भाषा को पूरी तरह हृदयंगम कर लिया। नेहरू को लीग का मानद सदस्य और कार्य समिति का सदस्य घोषित किया गया। वस्तुत: ब्रुसेल्स सम्मेलन के पीछे सोवियत रूस काम कर रहा था। वहां नेहरू को सोवियत संघ की राजधानी मास्को आने का निमंत्रण मिला। नेहरू दौड़ते हुए मास्को पहुंचे, पर जिस समारोह को वे देखने को लालायित थे उसे नहीं देख पाए। इस पूरी दौड़-धूप में नेहरू ने केवल चार दिन सोवियत संघ, विशेषकर मास्को में बिताए। इन चार दिनों की प्रायोजित यात्रा में ही नेहरू को विश्वास हो गया कि रूस ने असामान्य भौतिक प्रगति की है और भारत का विकास भी रूस की विचारधारा को अपनाने और उसके विरुद्ध मॉडल का अनुकरण करके ही हो सकता है।
यूरोप से लिखे पत्रों में उन्होंने रूस और मार्क्सवाद का स्तुतिगान आरंभ कर दिया। 19 फरवरी, 1927 को ही कांग्रेस कार्य समिति की एक गोपनीय रिपोर्ट में नेहरू ने अपने लिए अन्तरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ की भूमिका अपना ली। उन्होंने लिखा कि चीन की विजय से पूरब में एक महान सोवियत गणतंत्र की स्थापना हो सकेगी। इसका अर्थ यह नहीं कि चीन और रूस पूरी तरह मार्क्स के बताए मार्ग पर चल रहे हैं क्योंकि वे कृषि प्रधान देश हैं।अपनी यूरोप यात्रा से नेहरू सीधे मद्रास में हो रहे कांग्रेस अधिवेशन में पहुंचे और वहां उन्होंने इस यात्रा में अर्जित मार्क्सवादी शब्दावली का चयन प्रारंभकर दिया जिसे सुनकर गांधी जी को भारी धक्का लगा। उन्होंने 4 फरवरी, 1928 में नेहरू को पत्र लिखा कि तुम बहुत तेज दौड़ रहे हो। तुम्हें सोचने और भारतीय स्थिति के अनुरूप विचारों को ढालने को समय देना चाहिए था। यदि अपने देश की स्थिति का सूक्ष्म अध्ययन करके अपने यूरोपीय अनुभव के प्रकाश में तुम्हें लगता है कि हमारा वर्तमान रास्ता गलत है तो बात अलग है। इस पत्र के उत्तर में नेहरू ने 4 जनवरी 1928 को एक बहुत लम्बा पत्र लिखकर रूस की चार दिन की यात्रा में प्राप्त मार्क्सवादी विचारधारा में अपनी आस्था को दोहराया जिसे पढ़कर गांधी जी चौंक गये। उन्होंने 17 जनवरी को उत्तर लिखा कि तुम्हारे और मेरे दृष्टिकोण में भारी अंतर है। उसके रहते हम लोगों का साथ काम करना कठिन है। यदि तुम्हें मेरे प्रति वफादारी से छुट्टी चाहिए तो वह मैं अपना एक सहयोगी खोने की कीमत पर भी तुम्हें देने को तैयार हूं। तुम्हें केवल इतना करना है कि तुम एक पत्र में मुझे अपने मतभेद लिख भेजो और फिर मेरे विरुद्ध विद्रोह का झंडा उठा लो।
गांधी जी के इस दो टूक पत्र का जवाब नेहरू की ओर से नहीं आया, उल्टे उनके पिता मोतीलाल नेहरू ने गांधी जी को पत्र लिखकर सुझाव दिया कि जवाहरलाल को अगले कांग्रेस अधिवेशन का अध्यक्ष बनाया जाए। गांधी जी 1928 के कलकत्ता अधिवेशन में सुभाष चन्द्र बोस की लोकप्रियता से चिंतित थे। संभवत: इसलिए उन्होंने जवाहरलाल को सुभाष की काट के रूप में आगे बढ़ाना आवश्यक समझा। मद्रास और कलकत्ता अधिवेशनों में जवाहरलाल, सुभाष के अनुयायी की तरह व्यवहार कर रहे थे। किंतु 1929 के लाहौर अधिवेशन के अध्यक्ष पद से उन्होंने कार्य समिति घोषित की उसमें सुभाष का नाम एक साधारण सदस्य के रूप में भी नहीं रखा गया।
मार्क्सवादी विचारधारा को नेहरू ने युवा पीढ़ी के सामने एक क्रांतिकारी छवि पाने के लिए इस्तेमाल करना प्रारंभ कर दिया। 1928 में ही उन्हें इलाहाबाद से सोवियत रूस के अपने अनुभवों पर एक पुस्तक 'सोवियत एशिया: समरैण्डम स्केचेज एंड इम्प्रेशंस' प्रकाशित कर दी। कलकत्ता अधिवेशन में अपने पिता मोतीलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत 'नेहरू रिपोर्ट' से असहमति प्रगट करते हुए जवाहरलाल ने मांग उठाई कि 'भारत के संविधान का लक्ष्य लोकतांत्रिक समाजवादी गणतंत्र होनी चाहिए। उसमें भौगोलिक प्रतिनिधित्व और चुनाव की कोई व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व का आधार आर्थिक इकाइयां होना चाहिए और प्रत्येक आर्थिक हित को स्थान मिलना चाहिए। इससे साम्प्रदायिक समस्या अपने आप हल हो जाएगी।'
मार्क्सवादी आवेश में नेहरू ने इतिहास की आर्थिक व्याख्या को अपनाया, मजहब की प्रेरणा को अस्वीकार कर दिया। सर्वदलीय समिति के सामने जिन्ना द्वारा प्रस्तुत चौदह सूत्री मांगों का नेहरू ने विरोध किया। प्रो.के.टी.शाह को 12 जुलाई, 1929 के पत्र में नेहरू ने लिखा कि क्या मि.जिन्ना इतिहास की आर्थिक व्याख्या को स्वीकार करते हैं? मार्क्सवाद द्वारा प्रतिपादित इतिहास की आर्थिक व्याख्या के नशे में जवाहरलाल ने भारत में हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक समस्या के अस्तित्व को पूरी तरह नकार दिया। उन्होंने न केवल जिन्ना के 14 सूत्री कार्यक्रम का विरोध किया, अपितु सिंध को अलग प्रांत बनाने के सुझाव को भी अस्वीकार कर दिया। उनका मत था कि इसका परिणाम भारत के मजहबी पुनर्गठन में होगा।
प्रारंभिक चरण में नेहरू मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभाव में न केवल मुस्लिम समस्या के अस्तित्व को नकारते रहे, बल्कि भारत के पतन का मुख्य कारण अतीत के महिमामंडन को बताया। एक जगह उन्होंने लिखा भारत के किसी कारखाने में काम करने से अच्छा सोवियत संघ का जेल जीवन है।
मार्क्सवाद और सोवियत संघ के प्रति उनकी यह भक्ति उनके सम्पूर्ण साहित्य में उपलब्ध है। सोवियत संघ के अनुभव (1929) के बाद 1934 में उन्होंने 'विश्व इतिहास की झलक' शीर्षक विशालकाय ग्रंथ लिखा। 1941 में 'भारत की एकता' और 1946 में 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' प्रकाशित की। इन सब पुस्तकों से मार्क्सवाद और सोवियत रूस के लम्बे उद्धरणों को देकर हम इस लेख को बोझिल नहीं करना चाहते। नेहरू लगातार कोशिश करते रहे कि कांग्रेस पार्टी अधिकृत तौर पर समाजवाद की विचारधारा को अपना ले। अपने 1936 के अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने समाजवाद शब्द का उल्लेख कर ही दिया। कम्युनिस्ट नेता पी.पी.जोशी ने लिखा है कि इस भाषण को तैयार करने में ब्रिटेन निवासी रजनी पाम दत्त का मुख्य योगदान था। अपनी कार्य समिति में कई समाजवादी चेहरों को सम्मिलित किया जिसके विरोध में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, आचार्य कृपलानी, राजगोपालाचारी, सरदार पटेल आदि वरिष्ठ नेताओं ने त्यागपत्र दे दिए और तब नेहरू, गांधी जी की शरण में गए। गांधी जी ने लिखा कि क्या तुम नहीं जानते कि तुम कांग्रेस में अल्पमत पर हो? नेहरू ने उन्हें समाजवाद पढ़ाने के लिए पुस्तकें भेजीं। एक पत्र में गांधी जी ने लिखा कि तुम्हारी भेजी सब पुस्तकें मैं पढ़ गया किंतु उन्होंने मुझे समाजवाद की ओर एक इंच आगे नहीं बढ़ाया।
नेहरू जी ने मार्क्सवाद के प्रभाव में आकर एक ओर तो अपने को धार्मिक कर्मकांड से दूर रखा, दूसरी ओर हिन्दू समाज को सम्प्रदायवाद घोषित कर दिया। प्रारंभ में वे कुछ समय तक मुस्लिम साम्प्रदायिकता का हल इतिहास की मार्क्सवादी दृष्टि में खोजते रहे। आगे चलकर उन्होंने अल्पसंख्यकवाद की अवधारणा के अनुसार मुस्लिम पृथकतावाद को सेकुलरिज्म का पर्याय बना दिया। नेहरू की हिन्दू विरोधी और मुस्लिम पोषक मानसिकता का और बारीक अध्ययन करना आवश्यक है। (17 सितम्बर, 2014)











