| दिंनाक: 13 Sep 2014 16:06:13 |
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क्या आप जानते हैं कि अंग्रेजी अक्षर 'अ' ए कैसे, कब और क्यों बना? लगभग 3200 वर्र्ष पहले फोनेशियन (वर्तमान लेबनान) व्यापारियों ने 22 व्यापारिक सांकेतिक चित्र (प्रोटो सिनायटिक लिपि) को बनाया। अब इस लिपि को अल्फा-बैट व अबजाद (सेमेटिक) कहा जाता
है। फोनेशियनों की यह चित्रात्मक वर्णमाला भूमध्य सागरीय देशों से पूरे यूरोप, अफ्रीका, मध्यपूर्व एशिया की विभिन्न सभ्यताओं तक विस्तारित हुई।
विश्व की लिपियां चित्रों द्वारा निर्मित हुई हैं। यह चित्र अक्षर नहीं वरन् सम्पूर्ण शब्द हैं। सभी अक्षर चित्र-शब्द के प्रथम अक्षर के आधार पर बने हैं। मूल फोनेशियन शब्द अल्प, अ ं'स्र बिगड़ते-बिगड़ते अंग्रेजी में अल्फा तथा अरबी में अलिफ हो गया। भाषा विज्ञानी कहते हैं कि अल्फा या अलिफ का अर्थ 'बैल या बैल का सिर' है। वास्तव में फोनेशियन व्यापारियों द्वारा थोड़ी मात्रा में क्रय-विक्रय के लिए बनाया गया अल्प का चिह्न मूल संस्कृत भाषा का शब्द अल्प ही है, जिसका अर्थ-थोड़ा, कम, नगण्य, तुच्छ, थोड़ा, सूक्ष्म, जरा सा होता है।
यदि आपको कागज का पृष्ठ देकर कहा जाए कि इसमें से बहुत थोड़ा या अल्प हिस्सा अलग कीजिए। आप क्या करेंगे? निश्चय ही आप पृष्ठ के किसी एक कोने से छोटा सा तिकोने आकार का टुकड़ा अलग करेंगे। 3200 वर्ष पहले यह तिकोना टुकड़ा ही अंग्रेजी का अक्षर 'ए अ' बना था। उदाहरण देखिए-1-..
….(2) मूल फोनेशियन अल्प
(पहले चित्र में अल्प भाग को केवल कोने से ही अलग किया जा सकता है, बीच से नहीं। दूसरे चित्र में अल्प को अलग कर दिया गया है, जो मिथ्या अल्फा या अलिफ नहीं वरन् मूल फोनेशियन अल्प 'ए अ' को दिखाता है। त्रिभुज के दोनों ओर लटकी हुई रेखाएं क्यों बनाई गईं? ये रेखाएं पूर्ण से अल्प हिस्से की पृथकता को प्रदर्शित करती हैं। इसे एक कहानी द्वारा समझा जा सकता है-
विद्यालय में अध्यापक ने श्यामपट्ट पर एक रेखा खींचकर विद्यार्थियों को बिना मिटाए रेखा को छोटी करने को कहा। बहुत देर पश्चात केवल एक विद्यार्थी ने उस खिंची हुई रेखा के समानान्तर एक बड़ी रेखा बना दी। इस प्रकार पहली रेखा स्वत: ही बिना मिटाए छोटी हो गई। क्या आप जानते हैं? वह विद्यार्थी नरेन्द्रनाथ बाद में स्वामी विवेकानन्द के नाम से प्रसिद्ध हुए। चित्र का मिस्र के हाइरोग्लफ बैल के चित्र (एलन गार्डनर के हाइरोग्लिफ सूची क्रमांक एफ-1) से कोई सम्बन्ध नहीं है।)
अरबी अलिफ में अधिक कटाव हुआ और वह अपभ्रंश होकर घटता हुआ वर्तमान में अंग्रेजी अक्षर 'आई क' की तरह लिखा जाने लगा। भारतीय मूल की संस्कृत भाषा पर आधारित फोनेशियन भाषा के अल्प का अक्षर-चित्र निर्विवाद, शंका रहित तथा वैज्ञानिक तर्क पर आधारित है। भाषा किसी भी संस्कृति या सभ्यता के निश्चित मूल स्थान को इंगित करने में पूर्णत: समर्थ है, जबकि डीएनए (ऊठअ) सिद्धान्त मानव शरीर के गुण-सूत्र का विश्लेषण करता है किसी मूल स्थान का नहीं। उसका स्थान से कोई लेना-देना नहीं।
'भारत ने विश्व को शून्य ही नहीं वरन् अल्फा-बेट लिपि भी दी है। फोनेशियन (मूल भारतीय) व्यापारियों द्वारा बनाए गए प्रारम्भिक सभी 22 अक्षर संस्कृत भाषा के शब्द-चित्र हैं। फिर भी विश्व के समस्त वैज्ञानिक मानव का मूल स्थान-अफ्रीका की रट लगा रहे हैं। क्यों?'
यह तर्क प्रस्तुत करते हैं 16 फरवरी 1949 को दसूहा पंजाब में जन्मे नरेन्द्र पिपलानी जो एक शिक्षाविद्, भाषाविद् और इतिहास के अध्येता होने के साथ चित्रलिपि के विशेषज्ञ हैं। धर्मसमाज कालेज अलीगढ से भूगोल तथा दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर की शिक्षा कर कांग्रेस विरोधी विचारधारा के कारण 1975 के आपातकाल में भूमिगत हुए। इसी बीच राजस्थान में 1979 तक अध्यापन कार्य किया। तत्पश्चात अध्यापन छोड़ व्यावसायिक एवं वैवाहिक जीवन के साथ पानीपत में प्रवास करने लगे। 2005 में गृहस्थी से मुक्त होकर पिपलानी अबतक भारतीयता की खोज में निरन्तर संलग्न हैं।
संस्कृत भाषा को विश्व की सभी भाषाओं का मूल मानने वाले नरेन्द्र पिपलानी कहते हैं कि कक्षा आठ में पढ़ी हुई पंक्ति 'विश्व की सभी भाषाएं संस्कृत से बनी हैं' की मस्तिष्क में अमिट स्मृति बन गई, विश्व की विभिन्न भाषाओं की प्राचीनता खोजने के लिए उनके मत पंथों में स्थापित प्राचीन शब्दों को खोजते हुए उनके रहस्य भी खोलने लगे। वैज्ञानिक एवं तार्किक आधार पर सभी विश्व भाषाएं ही नहीं वरन् उनकी लिपियां भी संस्कृत का अपभ्रंश रूप हैं। यरुशलम के सभी मत-पंथों की भाषा वेदों की संस्कृत ही है। आश्चर्य होता है कि आज तक कोई भी भारतीय या विदेशी विद्वान इसे खोज नहीं सका।
नरेन्द्र पिपलानी के अनुसार मिस्र के पिरामिडों पर लिखी 6000 वर्षों पुरानी चित्रलिपि हाइरोग्लिफ आज तक कोई नहीं पढ़ सका। यूरोपीय विद्वान इसे पढ़ने का अवैज्ञानिक दावा प्रस्तुत करते हैं, यद्यपि उन्होंने 800 चित्रों में से केवल 110 का आधा-अधूरा व झूठा प्रमाण ही प्रस्तुत किया है। पिपलानी ने मिस्र के 700 सेे अधिक चित्र-शब्दों पर वैज्ञानिक एवं तार्किक शोध कार्य करके धुरंधंर मिस्र-विज्ञानियों के समक्ष एक चुनौती खड़ी कर दी है।
हिन्दी साहित्य सदन दिल्ली द्वारा नरेन्द्र पिपलानी की पुस्तक 'इतिहास की मृत्यु' प्रकाशित हो चुकी है, जिसमें यूरोपीयों द्वारा लिखे आर्यों के झूठे इतिहास को वैज्ञानिक एवं अकाट्य तकार्ें के आधार पर ध्वस्त किया गया है। नरेन्द्र पिपलानी कहते हैं कि वे मिस्र के पिरामिडों की लिपि को संस्कृत के सन्निकट एवं उपयुक्त सिद्ध करेंगे। -सूर्य प्रकाश सेमवाल