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अपने जापान दौरे में एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने श्रोताओं में से एक जापानी सज्जन से खड़े होकर सबसे अपना परिचय करवाने का आग्रह किया। उन सज्जन ने परिचय देने के बाद कहा कि उन्होंने पत्र लिखकर मोदी जी से आग्रह किया था कि जब वे जापान आएं तो हर अवसर पर हिन्दी में ही बोलें। प्रधानमंत्री ने ऐसा किया भी। श्रोताओं ने उक्त जापानी सज्जन के लिए तालियां बजाईं और भारत के प्रधानमंत्री के लिए भी। भारतीय कूटनीति में ताजी हवा का एक झोंका आया है जिसमें भारत की मिट्टी की सुगंध रची-बसी है। भारत के नेतृत्व द्वारा द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिन्दी के प्रयोग से देश का मान बढ़ा है। ढर्रे से हटकर चल रही कूटनीति में तथ्य का बहुत बड़ा योगदान है।
कोई राष्ट्राध्यक्ष जब किसी अंतरराष्ट्रीय मंंच पर अपने देश की भाषा में बोलता है तो उस भाषा को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलती है। जब कोई राष्ट्राध्यक्ष किसी दूसरे देश में जाकर अपनी भाषा में बोलता है, तो दोनों की जनता के बीच भावनात्मक सम्बंध बनता है और एक-दूसरे को जानने की ललक बढ़ती है। सारी दुनिया में गर्व से जापानी बोलने वाले जापानियों को पहली बार लगा होगा कि भारत से कोई प्रधानमंत्री आया है। सब कुछ कितना सरल था। मोदी सहज प्रवाह में बिना पढ़े बोले। रोज की बातचीत जितनी सहजता में ही उन्होंने अपनी बातें रखीं। एक व्यक्ति श्रोताओं के लिए जापानी में अनुवाद करता गया। दो राष्ट्रों के बीच हुई इस बातचीत पर न नौकरशाही का बंधन था, न ही अंगे्रजी का बोझ।
इस पहल का जापान ने भी गर्मजोशी से प्रति उत्तर दिया। दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में जापान के छात्रों का एक दल अपने हिन्दी कौशल को निखारने के लिए कुछ दिनों के प्रवास पर पहुंचा है। वे 'कोनिचिवा' की जगह हाथ जोड़कर नमस्ते कहते हैं, और 'गैंगिडस्का' के स्थान पर 'आप कैसे हैं' बोलते हैं। राजकपूर की फिल्म का पुराना गाना 'मेरा जूता है जापानी' बजता रहता है। छात्रों के दल के साथ आए प्रोफेसर हिदेकी इशिदा हिन्दी के विद्वान हैं।
हिन्दी सीखना जापानियों के लिए कोई आसान काम नहीं है। पहले उन्हें देवनागरी लिपि से दो-दो हाथ करने पड़ते हैं। सबसे बड़ी कठिनाई उन्हे आती है, उच्चारण में। 'र' और 'ल' में अंतर करना जापानियोंें को मुश्किल पड़ता है। 'ड' और 'ढ' का भेद तथा अल्पप्राण व महाप्राण आदि अभ्यास किसी जापानी के लिए कष्ट-साध्य ही होते हैं। इस सबके बाद भी जापानी बड़ी संख्या में भगवान बुद्ध की इस भूमि के आकर्षण में बंधकर हिन्दी की ओर खिंचे चले आ रहे हैं। प्रेमचंद और अज्ञेय की रचनाओं के जापानी में अनुवाद हो रहे हैं। जापान में बनी एनीमेशन फिल्म रामायण दुनिया भर में लोकप्रिय हुई है। हिन्दी में प्रचार-प्रसार के लिए संगठन काम कर रहे हंै। जापान की ओसाका यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज़ के प्रोफेसर के कोगाजी ने 80,000 से अधिक शब्दों का हिन्दी-जापानी शब्दकोष तैयार किया है। जिसमें इन शब्दों का प्रयोग भी बताया है। टोकियो के अति प्रतिष्ठित विदेशी भाषा अध्ययन विश्वविद्यालय में सौ वषार्ें से हिन्दी पढ़ाई जा रही है। यहां के पुस्तकालय में 70,000 के लगभग हिन्दी पुस्तक-पत्रिकाएं उपलब्ध हैं। हिन्दी फिल्में भी खूब देखी जा रही हैं। जापान की फिल्म निर्माता कंपनी निक्कात्सू के उपाध्यक्ष का कहना है कि जापान में हिन्दी फिल्मों की मांग बढ़ गई है, इसीलिए उनकी कंपनी ने हिन्दी फिल्म उद्योग के यशराज बैनर से समझौता कर लिया है। हिन्दी फिल्मों का संगीत भी लोकप्रिय हो रहा है। कहा जा सकता है कि हिन्दी स्वयं अपना प्रचार कर रही है। परंतु साथ ही जापान के उन हिन्दी विद्वानों की भी प्रशंसा करनी होगी जो तन-मन-धन से हिन्दी के प्रचार-प्रसार में लगे हुए हैं।
वैश्विक परिदृश्य में हिन्दी
सारे विश्व मंे हिन्दी जानने वालों की संख्या और हिन्दी सीखने की इच्छा रखने वालों की संख्या, दोनों बढ़ रही हैं। इसके तीन कारण हैं – एक भारतीय संस्कृति के प्रति बढ़ता आकर्षण, दूसरा विश्वभर के विभिन्न समाजों में अपना रचनात्मक योगदान देते भारतवासी और तीसरा भारत के मध्यमवर्गीय विशालतम बाजार में प्रवेश कर उपभोक्ता से सीधा संवाद करने की इच्छा। इसीलिए विश्व के 150 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिन्दी को एक विषय के रूप में पढ़ाया जाने लगा है। दक्षिण अफ्रीका, रूस, जापान, जर्मनी, कोरिया, ब्रिटेन, अमरीका, चीन, त्रिनिदाद, मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम में भी आपको हिन्दी के विद्वान मिल जाएंगे। इंटरनेट, मोबाइल और सोशल मीडिया में भी हिन्दी खूब चल रही है।
मॉरीशस में हिन्दी का प्रचार-प्रसार है। हिन्दी के विद्यालय और महाविद्यालय हैं। 2001 में यहां विश्व हिन्दी सचिवालय का शिलान्यास किया गया। फिजी में रेडियो नवरंग चौबीस घण्टे हिन्दी कार्यक्रम प्रस्तुत करता है। फिजी सरकार का सूचना मंत्रालय 'नवज्योति' नामक हिन्दी पत्रिका का प्रकाशन करता है जिसमें सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों की जानकारी रहती है। त्रिनिदाद की प्रधानमंत्री कमलाप्रसाद बिसेसर हिन्दी भाषी हैं। अब वहां हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में पढ़ाने की मांग की जा रही है। अमरीका में हिन्दी विश्वविद्यालय स्तर पर पढ़ाई जाती रही है। अब विद्यालयों में भी हिन्दी की पढ़ाई की शुरुआत हो रही है। हिन्दी के अध्यापकों की मांग है। अमरीकी सरकार द्वारा प्रारंभ किए 'स्टारटॉक प्रोग्राम' में हिन्दी शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए धन उपलब्ध करवाया गया है। न्यूयॉर्क की विश्व हिन्दी समिति हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए काम कर रही है। यहां से 'सौरभ' नामक त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका का प्रकाशन होता है। इसी प्रकार ऑस्ट्रेलिया में 'न्यू साउथ वेल्स' से 'हिन्दी समाचार पत्रिका' (मासिक), गुयाना से 'ज्ञानदा', सूरीनाम से 'सरस्वती' और 'आर्यदिवाकर' आदि का प्रकाशन हो रहा है।
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कहा जा सकता है कि हिन्दी का विश्व मंच पर पदार्पण हो चुका है। प्रधानमंत्री की जापान यात्रा ने इसको एक नया आयाम दिया है। हमें उस दिन का स्वप्न देखना चाहिए जिस दिन भारत की गलियां, हाट और घाट विश्व मानव से सीधा संवाद कर सकेंगे। भारत अपनी कहानी अपनी भाषा में कहने को तैयार है। आवश्यक्ता है यह कहने की कि – 'खुलकर बोलो, विश्व सुनने को तैयार खड़ा है।' ल्ल प्रस्तुति: प्रशांत बाजपेई











