| दिंनाक: 06 Sep 2014 15:34:38 |
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 5 दिन की सफल जापान यात्रा के बाद 3 सितम्बर को स्वदेश लौट आए। यह यात्रा एक विकसित देश (जापान) और विकासशील देश (भारत) को जोड़ने वाली रही। दोनों देशों के बीच कई ऐतिहासिक समझौते हुए। 'स्मार्ट सिटी', 'बुलेट ट्रेन', तकनीकी विकास, गंगा-सफाई, पंूंजीनिवेश, काशी का विश्व स्तरीय स्वरूप आदि समझौतों पर दोनों देशों ने हस्ताक्षर किए। यही नहीं रक्षा व सामरिक क्षेत्र में भी ऐतिहासिक पहल हुई। उल्लेखनीय है कि अब तक जापान के केवल तीन देशों से ही रक्षा सम्बंध हैं। अब भारत चौथा देश है जिससे जापान ने रक्षा क्षेत्र में समझौता किया है। इससे रक्षा क्षेत्र में भारत की निर्भरता अमरीका और यूरोप से कम होगी और भारत हथियारों के निर्माण में स्वावलम्बी बन सकता है।
दोनों देश परमाणु करार पर सहमति बनाने हेतु वार्ता जारी रखने के लिए भी सहमत हो गए हैं। इसके लिए अधिकारियों का समूह बनाया गया है। यह कोई छोटी बात नहीं है। जापान की आन्तरिक राजनीति के कारण परमाणु करार आसान नहीं था। द्वितीय विश्वयुद्घ में जापान ने परमाणु हमले की त्रासदी झेली है। उस विनाशकारी दृश्य को वह भूल नहीं सका है। भारत ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहंी किए हैं। जापानी कानून के अनुसार परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर न करने वाले देश के साथ परमाणु करार नहीं हो सकता। जापान में बहुत ऐसे लोग हैं, जो परमाणु समझौते का विरोध करते हैं। संसद ही नहीं मंत्रिमण्डल मंे ऐसे कई सदस्य हैं, जो परमाणु करार का विरोध करते हैं। इस वातावरण में भारत यह समझाने में सफल रहा कि यहां की भौगोलिक स्थिति अलग है। बिना नाम लिए कहा कि हमारे पड़ोस में पाकिस्तान और चीन जैसे हिंसक प्रवृत्ति के देश हैं। इस कारण भारत का परमाणु प्रसार निषेध संधि पर हस्ताक्षर करना संभव नहीं है। मोदी की इस यात्रा ने चीन को भी जवाब दिया है। जापान ने छह भारतीय कम्पनियों से भी प्रतिबंध हटा लिया है। 1998 में वाजपेयी सरकार ने परमाणु परीक्षण किया था, उसी समय जापान ने इन कम्पनियों पर प्रतिबंध लगाया था।
द्वितीय विश्व युद्ध में पूरी तरह टूटने के बाद भी जापान ने, जो प्रगति की है, वह दुनिया को चमत्कृत कर देती है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में अब कोई भी देश उसकी अवहेलना नहीं कर सकता। नरेन्द्र मोदी के मामले मंे भी जापान ने दूरदर्शिता दिखाई है। जिस समय अमरीका और यूरोप के देश नरेन्द्र मोदी को वीजा देने हेतु तैयार नहीं थे, उस समय जापान और गुजरात व्यापारिक व औद्योगिक विकास का नया अध्याय लिख रहे थे। उस समय मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। वह वीजा के चक्कर में नहीं पड़ा। उसने विकास को प्राथमिकता दी। गुजरात और जापान दोनों को इसका भारी लाभ मिला। जापान ने दूसरे विश्व युद्ध की तबाही के बाद अपने को संभाला-संवारा था। गुजरात को भूकम्प के बाद नरेन्द्र मोदी ने पुन: विकास के रास्ते पर चलाया था। मोदी के आपदा प्रबंधन से जापान बहुत प्रभावित हुआ था।
यही कारण है कि आज जापान और भारत आपसी सहयोग का नया अध्याय लिख रहे हैं। भारत और जापान के बीच हुए समझौतों या मित्रता का महत्व इन दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर विश्व स्तर पर होगा। सबसे पहले तो अमरीका को लगा होगा कि वह नरेन्द्र मोदी को समझने में विफल रहा। जापान के साथ भविष्य में होने वाले परमाणु करार की संभावना से अमरीका मायूस हुआ है। वहां की कम्पनियां भारत के साथ परमाणु करार तेज करने का दबाव बना रही थीं। जापान के साथ परमाणु करार हुआ तो उनके लिए संभावना कम होगी। भारत और जापान के प्रधानमंत्रियों ने आपसी समझ से आपसी सहयोग बढ़ाने का नया अध्याय लिखा है। नरेन्द्र मोदी ने जो कहा जापानी प्रधानमंत्री उसको मानते चले गए। कदम-कदम पर उन्हांेने मोदी का साथ निभाया। क्योटो से लेकर टोकियो तक वह मोदी के साथ रहे।
क्योटो में दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक रिश्तों मंे नई ऊर्जा का संचार हुआ। क्योटो की तरह काशी का विकास होगा। यह जापान और भारत के सांस्कृतिक सम्बंधों को आगे बढ़ाएगा। इसी प्रकार जापान अपनी पवित्र नदी 'कामा' की तर्ज पर गंगा की सफाई में सहयोग देगा। ऐसे रिश्ते अमरीका या यूरोपीय देशों से संभव नहीं हैं।
मोदी बौद्ध मंदिर गए, शिंजो आबे को गीता और विवेकानन्द पर लिखी गई किताब दी। जापान ने इन प्रतीकों का महत्व समझा। नरेन्द्र मोदी पूरी तैयारी के साथ जापान गए। उन्होंने सम्बंधों के प्रतीक स्थापित किए। क्योटो, काशी, कामा-गंगा, बौद्ध मंदिर, गीता, बांसुरी, विवेकानन्द आदि सभी प्रतीक बिना बोले रिश्तों की जड़ों को गहरा बना गए। व्यापार वार्ता मंे मोदी का अलग रूप था। उसमंे भारत और जापान के दिग्गज उद्योगपति शामिल हुए। मोदी ने अलग अन्दाज में भारतीय उद्योगपतियों का परिचय कराया। व्यापारिक-आर्थिक सम्बंध तेजी से बढ़ाने का फैसला किया गया। गुजरात में मोदी ऐसा कर चुके हैं। अब उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा करना है। प्रस्तुति : अरुण कुमार सिंह