इधर वाले लड़ते रहे, उधर वाले बढ़ते रहे
|
प्रथम विश्व युद्ध के सौ वर्ष :
इन दिनों पूरी दुनिया इस्रायल और फिलिस्तीन के बीच चल रहे भीषण युद्ध का वृतांत पढ़ रही है और घर में बैठकर दूरदर्शन के पर्दे पर इंसानों का बहता खून देख रही है। हम जब इस प्रकार के दृश्य देखते हैं और समाचार सुनते हैं तब मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि दो महायुद्धों की भीषण मार-काट के बाद भी इस दो पांव के इंसान ने कुछ नहीं सीखा। पिछले 150 वर्षों में शांति स्थापना के लिए शांति के चहेतों ने कभी लीग ऑफ नेशन्स की स्थापना की तो कभी राष्ट्र संघ की बुनियाद डाल कर यह सोचना शुरु कर दिया कि अब यह धरती इंसान के खून से लाल नहीं होगी। लेकिन शांति के लाख प्रयास करने के बावजूद कभी वियतनाम और कोरिया के युद्ध हुए तो कभी भारत की धरती पर पाकिस्तान और चीन की कारस्तानियों के कारण बर्बादी की लपटें देखीं। आज भी अरब-इस्रायल के बीच फिलिस्तीनी बच्चों की चीख पुकार सुनाई पड़ती है। मजहब के नाम पर इराक में जो कुछ हो रहा है उसे देखकर तो ऐसा लगता है कि धरती के मानव ने उन घटनाओं से कुछ नहीं सीखा। क्या कभी दुनिया में शांति कायम होगी?
इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए पिछली चार अगस्त को फ्रांस और जर्मनी के राष्ट्रपति प्रथम महायुद्ध में मारे गए सैकड़ों इंसानों को श्रद्धाञ्जलि देने के लिए पेरिस पहुंचे। फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने अपने मतभेदों को भुलाते हुए अत्यंत मार्मिक शब्दों में कहा-मरने वाला किसी जगह विशेष का बाद में पहले वह इंसान होता है। उन्होंने कहा कि इन सौनिकों को सच्ची श्रद्धाञ्जलि यही होगी कि फिलिस्तीन और इस्रायल के बीच जो युद्ध चल रहा है वह थम जाए। दोनों देशों के नेता आरमंड नामक नगर के कब्रिस्तान में खड़े थे। इस स्थान को जर्मनी में हार टमांसु विलर कोफ के नाम से जाना जाता है, यहां लगभग 3000 लोग मारे गए थे। इस कब्रिस्तान में 12000 कब्र हैं जिनकी पहचान नहीं हो सकी। दोनों नेताओं ने इन शहीदों की याद में बनाई जाने वाली एक मीनार की नींव रखी। जर्मनी के जवाश्म कुक ने अपने सम्बोधन में कहा कि यह स्थान सौ साल पहले घटी उस घटना की याद दिलाता है जब इंसान, इंसान का गला काट रहा था।
सौ वर्ष पूर्व 3 अगस्त 1914 को जर्मनी ने फ्रांस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की थी। वेल्जियम में ब्रिटेन के जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की याद को ताजा कर देने वाला एक कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड केमरन ने भी एक स्थान पर इस कार्यक्रम में भाग लिया। वहीं पर एक संग्रहालय स्थापित करने का भी निर्णय लिया गया जो इस इतिहास की याद जिंदा रखेगा। ये नेता बेल्जियम भी गए। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि इस युद्ध में वेल्जियम के हस्तक्षेप करते ही यूरोप दो भागों में बट गया। आज तो यूरोप फिर से एक है। लेकिन प्रथम और द्वितीय महायुद्ध के साथ अनेक छोटी बड़ी लड़ाइयों के निरंतर चलते रहने से एक प्रश्न उठता है कि क्या एशिया भी कभी एक होगा?
हम पर राज करने वाले चले गए। वे इतने सभ्य हो गए कि अब आपस में नहीं टकराते हैं। फिलिस्तीन और इस्रायल के नाम पर कभी मध्यपूर्व के देशों में आपसी भिड़ंत होते हुए और कभी भारत-चीन और भारत पाकिस्तान के आपस में हो रहे संघर्ष समाप्त हो सकेंगे? जिस एशिया में दुनिया की अनेक सभ्यताएं फलीं वही एशिया आज सबसे अधिक युद्ध ग्रस्त है। समय से सबक लेकर अमरीका और यूरोप एक हो सकते हैं तो फिर एशिया के देश क्यों नहीं? आज भी शांति कायम करने वालों के पास वीटो का अधिकार है लेकिन दुनिया के सभ्य एशियाई देश आज भी रक्तरंजित युद्ध की लपटों में घिरे हुए हैं।
वास्तविकता तो यह है कि 1928 की 4 जुलाई को ही इस महायुद्ध की शुरुआत हो चुकी थी जिनका अंत 8 नवम्बर 1932 को हुआ। चार वर्ष तक चले इस युद्ध में लाखों लोग मारे गए। मौत के घाट उतारे गए इन निर्दोष लोगों का इस युद्ध से दूर-दूर तक का कोई वास्ता नहीं था। जब यह युद्ध समाप्त हुआ तो एक नई दुनिया अस्तित्व में आई। अनेक नए देश विश्व के मानचित्र पर उभरकर आए। रूस यूनियन ऑफ सोशलिस्ट रिपब्लिक में बदल गया। उस्मानी खिलाफत, जो दुनिया की एक बड़ी ताकत थी, उसके टुकड़े-टुकड़े हो गए।
इस युद्ध में मुस्लिम एकता तार-तार हो गई। इसके पश्चात मुस्लिम राष्ट्रों का कभी कोई ताकतवर गुट नहीं बन सका। इतिहास बतलाता है कि तुकोंर्ने यूरोप को लगभग अपने कब्जे कर लिया था। यहां तक कि तुर्क फ्रांस की सीमा तक पहुंच चुके थे। इसके पश्चात तुर्कों का पतन प्रारम्भ हो गया। परिणामस्वरूप अनेक छोटे-छोटे देश अस्तित्व में आ गए। जब मध्य पूर्व के इन छोटे देशों में खनिज तेल बड़ी मात्रा में निकल आया जिससे उनका महत्व बढ़ गया। इस युद्ध के कारण यूरोप के देश भी टूटे इसलिए वहां भी अनेक छोटे-छोटे देश अस्तित्व में आ गए। लेकिन इन देशों में प्राकृतिक संसाधन बहुत थे इसलिए समय के साथ वे प्रगति कर गए। आज तक जितने युद्ध हुए हैं उनमें धर्म का महत्व इतना अधिक नहीं रहा है जितना की प्राकृतिक संसाधनों का। इसलिए यूरोप के ये देश तकनीकी दुनिया में तेजी से आगे बढ़ गए। युद्ध में जहां बर्बादी ही बर्बादी है वहीं उसका सकारात्मक पहलू यह है कि अपने दुश्मन को मात देने के लिए ऐसे यंत्र तैयार किए गए जिससे तकनीकी का बोलबाला हुआ। आज जो हम बदली हुई दुनिया देखते हैं उसका सकारात्मक पहलू यह है कि युद्ध के कारण अपने शत्रु को पराजित करने के लिए आधुनिक यंत्रों का जन्म होता चला गया, जिससे आज हमारी दुनिया विकसित हुई है। विमान की खोज और उसके बाद बड़े सामान ढोने वाले जहाजों की खोज इसी उद्देश्य से होती चली गई। स्टीम इंजन, भूमिगत रेल, हेनरी फोर्ड की मोटर कार, रॉकेट और मिसाइल, यह सब कुछ युद्ध जीतने की ही लालसा में खोजे गए।
दूसरे महायुद्ध को जीतने के लिए एटम बम और हाइड्रोजन बम इसी की देन है, लेकिन इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि मुट्ठी भर जमीन को प्राप्त करने की लालसा में खोजे गए विज्ञान के ये यंत्र और मशीनें आज के शांतिकाल के लिए वरदान भी साबित हुए हैं। लेकिन फिर भी लाखों इंसानों की जान लेने वाले दो बड़े महायुद्ध केवल इसलिए याद नहीं रखे जाएंगे कि आवश्यकता पड़ने पर वैज्ञानिक साधन विकसित होते चले गए।
सच बात तो यह है कि हमारे लाखों पूर्वजों की आत्मा को शांति देने वाले इन यंत्रों के नाम पर हम उन इंसानों की और विशेषत: उन नेताओं की उस लालसा को मान्यता प्रदान नहीं कर सकते जिन्होंने कल भी युद्ध लड़े और आज भी इंसान का खून बहाने में ये सबसे आगे हैं। इस महायुद्ध में हताहत होने वाले सैनिकों की संख्या कई करोड़ बतलाई जाती है जबकि आम जनता के मारे जाने का आंकड़ा किसी भी कीमत पर दो करोड़ से कम का नहीं थी। इस हिसाब से प्रतिदिन मरने वालों का आंकड़ा 6500 था। इस महायुद्ध के दौरान एक और बड़ी घटना घटी।
1997 में रूस में जारशाही का अंत हो गया और वहां कम्युनिस्ट सरकार बन गई। दुनिया की विचारधाराओं में कार्ल मार्क्स एक जर्मन विचारक थे। इस महायुद्ध का ही परिणाम था कि रूस और जर्मनी मित्र बन गए। 1918-19 में वरसेलिस की संधि के कारण यह महायुद्ध समाप्त हो गया, लेकिन इस बीच इतनी अंतरराष्ट्रीय घटनाएं घट गईं कि दूसरे महायुद्ध की भूमिका तैयार हो गई।
प्रथम और द्वितीय महायुद्ध की समाप्ति पर राष्ट्र संघ की जबसे स्थापना हुई, सारी दुनिया युद्ध से बचने का भरसक प्रयास कर रही है। लेकिन इन दिनों मध्य पूर्व में जो कुछ चल रहा है उसका अंत तृतीय महायुद्ध तो नहीं होगा, इस पर मानवता के रखवाले बड़ी बेचैनी से विचार कर रहे हैं। -मुजफ्फर हुसैन











