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रक्षाबंधन की शुरुआत कब और कैसे हुई? जानिए इस प्यारे त्योहार की पूरी कहानी

रक्षाबंधन के दिन जब बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है, तो वह सिर्फ एक रस्म पूरी नहीं करती। वह अपने भाई के लिए सुखी और लंबी उम्र की कामना करती है।

Written byMahak SinghMahak Singh
Aug 20, 2026, 01:36 pm IST
inधर्म-संस्कृति

रिश्ते बहुत होते हैं, लेकिन भाई-बहन का रिश्ता सबसे अलग होता है। इसमें कभी छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई होती है, तो कभी बिना कहे एक-दूसरे की चिंता भी होती है। बचपन की शरारतों से लेकर बड़े होने तक भाई-बहन एक-दूसरे के जीवन का खास हिस्सा बने रहते हैं। इसी खूबसूरत रिश्ते को और मजबूत बनाने वाला त्योहार है रक्षाबंधन। कलाई पर बंधा राखी का छोटा-सा धागा देखने में भले ही साधारण हो, लेकिन उसके पीछे प्यार, विश्वास, अपनापन और हमेशा साथ निभाने का भाव छिपा होता है।

रक्षाबंधन के दिन जब बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है, तो वह सिर्फ एक रस्म पूरी नहीं करती। वह अपने भाई के लिए सुखी और लंबी उम्र की कामना करती है। वहीं भाई भी बहन को यह भरोसा देता है कि जीवन में चाहे कैसी भी परेशानी आए, वह उसका साथ देगा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस खूबसूरत परंपरा की शुरुआत आखिर कब और कैसे हुई? रक्षाबंधन से जुड़ी कई धार्मिक कथाएं और मान्यताएं हैं, जो इस त्योहार को और भी खास बनाती हैं।

रक्षाबंधन का अर्थ क्या है?

‘रक्षाबंधन’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- रक्षा और बंधन। यानी ऐसा बंधन जो रक्षा और सुरक्षा का भाव पैदा करे। हिंदू पंचांग के अनुसार रक्षाबंधन का त्योहार श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इसी वजह से इसे कई जगह राखी पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है। इसके बाद तिलक लगाकर मिठाई खिलाती है और उसके अच्छे स्वास्थ्य व लंबी उम्र की कामना करती है। भाई भी अपनी बहन को उपहार देता है और उसके सुख-दुख में साथ देने का वचन देता है। हालांकि आज रक्षाबंधन को मुख्य रूप से भाई-बहन के त्योहार के रूप में मनाया जाता है, लेकिन पुराने समय में रक्षा सूत्र का महत्व इससे कहीं बड़ा था। कई धार्मिक परंपराओं में रक्षा सूत्र को शुभ और सुरक्षा का प्रतीक माना गया है।

रक्षाबंधन की शुरुआत कैसे हुई?

रक्षाबंधन की शुरुआत की कोई एक निश्चित तारीख या घटना इतिहास में दर्ज नहीं है। इसके पीछे कई धार्मिक कथाएं और लोक मान्यताएं प्रचलित हैं। इन कथाओं ने समय के साथ इस त्योहार के स्वरूप को मजबूत किया। इनमें भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी से जुड़ी कथा सबसे अधिक प्रसिद्ध है।

भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी की कहानी

महाभारत से जुड़ी मान्यता के अनुसार एक बार भगवान श्रीकृष्ण की उंगली में चोट लग गई थी और उससे खून निकलने लगा। यह देखकर द्रौपदी बहुत चिंतित हुईं। उन्होंने साड़ी का टुकड़ा फाड़कर श्रीकृष्ण की उंगली पर बाँध दिया। द्रौपदी ने यह काम किसी स्वार्थ के लिए नहीं किया था। उनके मन में श्रीकृष्ण के प्रति स्नेह और अपनापन था। श्रीकृष्ण ने भी द्रौपदी के इस भाव को बहुत महत्व दिया। मान्यता है कि उन्होंने द्रौपदी की रक्षा करने का वचन दिया। बाद में जब महाभारत में द्रौपदी को भरी सभा में अपमान का सामना करना पड़ा, तब श्रीकृष्ण ने उनकी लाज बचाई। इसीलिए यह कथा भाई-बहन के प्रेम और रक्षा का प्रतीक है।

रक्षाबंधन से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण कथा भगवान विष्णु, राजा बलि और माता लक्ष्मी से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने राजा बलि को वचन दिया था और इसी कारण उन्हें कुछ समय के लिए राजा बलि के राज्य में रहना पड़ा। भगवान विष्णु के लंबे समय तक वापस न आने से माता लक्ष्मी चिंतित हो गईं। तब माता लक्ष्मी राजा बलि के पास गईं और उन्होंने राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा। राजा बलि ने माता लक्ष्मी को अपनी बहन के रूप में स्वीकार किया और उनसे उनकी इच्छा पूछी। माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने साथ वापस ले जाने की इच्छा बताई। राजा बलि ने अपनी बहन के भाव का सम्मान किया और भगवान विष्णु को उनके साथ जाने दिया। इस कथा में राखी केवल भाई-बहन के रिश्ते का प्रतीक नहीं है, बल्कि प्रेम, सम्मान और वचन निभाने की भावना भी दिखाई देती है। इसी कारण यह कहानी रक्षाबंधन से जुड़ी प्रमुख धार्मिक मान्यताओं में गिनी जाती है।

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Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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