हिन्दुत्व - मानवता को गले लगाने वाला हेै हिन्दू धर्म
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हिन्दुत्व – मानवता को गले लगाने वाला हेै हिन्दू धर्म

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Aug 30, 2014, 12:00 am IST
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दिंनाक: 30 Aug 2014 16:12:50

पिछले दिनों मुंबई में विश्व हिन्दू परिषद के स्वर्णजयंती समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत का एक बयान 'हिन्दुत्व राष्ट्र की पहचान है,उसकी यह अन्तर्भूति शक्ति है कि वह और भी पंथ-संप्रदायों को हजम कर सकता है। जो जरा हाजमा बिगड़ जाने के कारण थोड़ा शैथिल्य हो गया, जिसके परिणाम आज हम भुगत रहे हैं,उसको दूर करना है'। श्री भागवत के इस बयान के आते ही सेकुलरों की समाचार चैनलों पर जमात लगनी प्रारम्भ हो गई। ऐसा लगा मानो कोई संकट आ गया हो।
हिन्दुस्थान और हिन्दू की नई-नई परिभाषाएं गढ़ी जाने लगीं। यहां तक कि हिन्दुस्तान टाइम्स समाचार पत्र ने श्री मोहनराव भागवत के बयान पर एक सर्वे किया। और जनता से जानना चाहा कि कितने लोग सहमत हैं कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है। जनता ने सच को उद्घोषित करते हुए 60.92 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और 38.26 प्रतिशत लोग इस मत से सहमत नजर नहीं आए। ऑन लाइन सर्वे में सिर चढ़कर बोलते सच को देखकर यह सर्वे समाचारपत्र में प्रकाशित ही नहीं किया गया। जब इसके विषय में एक बजरंग दल कार्यकर्ता ने हिन्दुस्तान टाइम्स के कार्यालय में फोन करके इस समाचार के न छपने पर जानना चाहा तो वहां के किसी कर्मचारी द्वारा बताया गया कि यह सर्वे 'स्पैम' (सैम्पल खराब) हो गया है। लेकिन इस सर्वे में आए रुझान से एक बात जरूर स्पष्ट हो गई कि देश की जनता का मत किस ओर है।
विश्व हिन्दू परिषद के स्वर्णजयंती समारोह में श्री भागवत ने जो भी कहा वह भारत की भूमि पर हजारों वर्षों तक पल्लवित-पुष्पित होते रहे आदर्श और विचारधन के सातत्य की अभिव्यक्ति ही थी। देश को जानना चाहिए कि हिन्दू राष्ट्र शब्द का प्रयोग या हिन्दू राष्ट्र का सिद्धांत रा.स्व.संघ की कोई नई खोज नहीं है। संघ संस्थापक डॉ.केशवराव बलिराम हेडगेवार ने ठीक वही विचार प्रकट किए,जो स्वामी विवेकानंद,महर्षि अरविंद,तिलक और वीर सावरकर आदि विभूतियों ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कि नाते प्रकट किए। आज जिस प्रकार से श्री भागवत के बयान पर सेकुलर रुदन कर रहे हैं उन्हें बताना चाहिए कि इस देश में रहने वाला बहुसंख्यक जिसकी संख्या नब्बे करोड़ से भी ज्यादा की है वह कौन है? अगर उन्हें हिन्दू न कहें तो उन्हें क्या कहें? इस देश की पहचान गीता,महाभारत हैं या कुरान?
आज के सन्दर्भ सच को सच मानने से इंकार करने वाले लोगों और हिन्दू संस्कृति पर उपजते संकट का आकलन डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने बहुत पहले ही कर लिया था और इसलिए उन्होंने ही घोषित किया था 'यह हिन्दू राष्ट्र है'।
देश के हिन्दू जनमानस को समझना चाहिए कि असल में भारतीय राष्ट्रीयत्व हिन्दू राष्ट्रीयत्व ही है। इसके बारे में किसी के मन में कोई भी संदेह नहीं होना चाहिए। जो लोग इसके विरोध में तर्क देते हैं वे बताएं कि कौन सा समाज है जो इस भूमि को अपनी माता मानता है ? देवता के स्वरूप में मातृभूमि के प्रति उत्कट भावना रखता है?'त्वं हि दुर्गादश प्रहरण धारिणी' कहकर उसका ध्यान करता है? किस समाज के राष्ट्र पुरुष एक ही हैं? आपका राष्ट्र पुरुष कौन है-महाराणा प्रताप या अकबर? यह प्रश्न पूछे जाते ही तत्काल राणा प्रताप का चयन कौन सा समाज करता है? ऐसे अनेकों प्रश्नों का बस एक ही उत्तर निकलकर आता है कि ऐसा समाज हिन्दू समाज ही है। पं.दीनदयाल उपाध्याय: विचार दर्शन में पं. जी ने एक लेख के माध्यम से लिखा 'कि 1947 में हम स्वतंत्र हुए। अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए। राष्ट्र निर्माण के प्रयासों में सबसे बड़ी बाधा हम उन्हें ही मानते थे। वह बाधा दूर हो गई। लेकिन इसके बाद हमारे सामने प्रश्न उपस्थित हुए कि स्वतंत्रता का आशय क्या है? हम यहां किस प्रकार का जीवन खड़ा करना चाहते हैं? राष्ट्र के नाते भारत के जीवन आदर्श क्या हैं? संविधान का निर्माण करते समय विदेशांे में उद्घोषित सिद्धांतों का जोड़तोड़ करने में ही हमने संतोष कर लिया। इसीलिए आजतक हम इस मूल प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाए हैं कि आखिर हम किस प्रकार का जीवन यहां खड़ा करना चाहते हैं।'
जो लोग ऐसे बयानों से देश और मत-पंथों को खतरा बताते हैं उन्हें श्री दत्तोपंत ठंेगड़ी को पढ़ना चाहिए।'हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना' शीर्षक वाली पुस्तिका में उनके भाषण को प्रस्तुत किया गया है। वे कहते हैं 'हिन्दू राष्ट्र की हमारी संकल्पना यह है कि हिन्दू संपूर्ण मानवता को गले लगाने वाला,पूरे विश्व का विचार करने वाला एवं विश्वधर्म का अनुयायी है। और प्रश्न करते हंै ंकि इस प्रकार संपूर्ण विश्व की दृष्टि से विचार करने पर हिन्दू राष्ट्र का स्थान क्या रहेगा?'
हिन्दू संस्कृति पर मनगढंत तथ्यों को रखते सेकुलरों को यह लगता है कि हिन्दू समाज अपना राष्ट्रीयत्व सिद्ध करे लेकिन हिन्दू समाज को इसकी कतई आवश्यकता नहीं है। उसका राष्ट्रीयत्व हजारों वर्षों से स्वयंसिद्ध है। इस देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि जिस देश का राष्ट्र स्वरूप हिन्दू है,यह तत्व वस्तुत: सर्वमान्य होना चाहिए।-– पाञ्चजन्य ब्यूरो

हिन्दू राष्ट्र, हिन्दू दर्शन, इसी कारण सबको स्थान

भारत का एक सनातनविशिष्ट जीवन दर्शन है जिसका आधार आध्यात्मिकता है। यह दर्शन एकात्म औरसर्वांगीण है। इसी दर्शन की अभिव्यक्ति 'एकम् सद् विप्र:बहुधा वदंन्ति' मेंहुुई है। इसलिए यहूदी और पारसी भारत में आकर अपने-अपने उपासना मार्ग काअवलंबन सम्मानपूर्वक कर सके। इसी दर्शन के कारण भारत के संविधान में सभीमतावलंबियों को अपने-अपने मत के अनुसार उपासना करने का स्वातंत्र्य सहजमिला है। भारत का यह दर्शन हिंदू जीवन दर्शन कहलाता है। डॉ. राधाकृष्णन की 'हिंदू व्यू ऑफ लाइफ' पुस्तक प्रसिद्ध है। इस जीवन दर्शन को अपने जीवन मेंउतारने वाला प्रत्येक व्यक्ति हिंदू है, फिर चाहे उसका मजहब या उपासनामार्ग चाहे जो हो। यह हिंदुत्व, हिंदूवाद (ँ्रल्लि४्र२े) नहीं है, यह हिंदूहोना (ँ्रल्लि४ल्ली२२) है। इसलिए यह किसी मजहब या उपासना मार्ग के विरोधमें नहीं है। यह हिंदुत्व भारत के समाज का व्यवच्छेदक लक्षण है,भारत केसमाज की पहचान है, अस्मिता है। इसलिए भारत हिंदू राष्ट्र है। समाज हीराष्ट्र कहलाता है। राज्य व्यवस्था राष्ट्र द्वारा अपनी सुविधा के लिए बनाईगई व्यवस्था है। भारत की राज्य व्यवस्था किसी एक मजहब या उपासना मार्ग केअनुसार नहीं चलेगी। वह पंथ निरपेक्ष तरीके से कार्य करेगी। यह निर्णय इसराष्ट्र ने लिया है (ऐसा निर्णय पाकिस्तान ने नहीं लिया है) और यह निर्णयभी इसी कारण लिया जा सका क्योंकि यह राष्ट्र हिंदू राष्ट्र है। ल्ल मनमोहनवैद्य

 

पाञ्चजन्य ने हिन्दू राष्ट्र के विषय पर अलग-अलग मतों और संप्रदायों के लोगों से बात की जिनके मत यहां प्रस्तुत हैं-

“हमशुरू से ही इस विषय पर सहमत हैं। हिन्दुस्थान को हिन्दू संस्कृति से कैसेअलग किया जा सकता है। आज पाश्चात्य देशों में जिस समुदाय की जनसंख्या 40 प्रतिशत से अधिक हो जाती है उसे उस समुदाय से संबोधित किया जाने लगता है।फिर ऐसे में इस देश में रहने वाले हिन्दु़ओं की संख्या तो 80 प्रतिशत है तोइसे क्यों हिन्दू राष्ट्र नहीं कहा जा सकता ?” –आर.एल.फ्रंासिस, अध्यक्ष, पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेन्ट

यहतो सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत के हृदय की विशालता है। देश में जितने भीपंथ उद्गमित हुए वह हिन्दू कहने में कोई भी संकोच नहीं करते। जिस संदर्भमें बात की जा रही है,उसको समझना जरूरी है।— रिखब चन्द्र जैन, प्रदेश अध्यक्ष,इन्द्रप्रस्थ विहिप

मैंश्री भागवत के बयान से पूरे तरीके से सहमत हूं। मेरे पुरखे हिन्दुस्थानीहैं,हमारी तहजीब हिन्दू और हिन्दी है। भारत के मुसलमानों को इस बात पर गर्वहोना चाहिए। इस देश की पहचान हिन्दुत्व ही है। हम पहले हिन्दू और फिरहिन्दुस्थानी हैं। अगर हम अपनी संस्कृति पर नाज करेंगे तभी असली मुसलमानकहलाएंगे।— मो.अफजाल, राष्ट्रीय संयोजक,मुस्लिम राष्ट्रीय मंच

हिन्दूइस देश की जीवन पद्धति है। इस देश में रहने वाले लोग हिन्दू हैं। इसमेंकोई विवाद ही नहीं है क्योंकि यह राष्ट्र हिन्दू राष्ट्र है। इसकी पहचानगीता,महाभारत गुरुग्रन्थ साहिब जैसे धर्म ग्रन्थों से होती है न कि कुरानसे। देश का दुर्भाग्य है कि लोग सच से आंखें चुराते हैं।— सरदार रविरंजन, वरिष्ठ पत्रकार

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