| दिंनाक: 30 Aug 2014 16:16:30 |
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सिंगापुर या लक्जमबर्ग सरीखे छोटे देश हों, या अमरीका और चीन जैसे विशाल देश, वहां के लगभग हर नागरिक को साफ पता है कि एक सिंगापुरी या एक अमरीकी होने के क्या मायने हैं। आर्थिक या सामाजिक लिहाज से तरक्की कर चुके देशों, जैसे जापान, जर्मनी या यू.के., इनकी अपनी एक स्पष्ट मूल पहचान है जो वहां का हर नागरिक उम्र के साथ जज्ब करता जाता है। इस तरह की पहचान की बुनियाद उस देश के इतिहास की जानकारी में होती है, जो पुस्तकों, सिनेमा, संगीत और कला के जरिए व्यक्त की जाती है। वर्तमान भूतकाल के संदर्भ में बताता है, और वह इस तरह से बताया जाता है कि उस देश से जुड़ाव को लेकर एक गौरव का भाव जगता है। उदाहरण के लिए, इंग्लैंड के लोग इस बात में गर्व करते हैं कि हजार साल पहले, वहां के आम नागरिकों ने राजा को मांगों और हकों का मसौदा मानने के लिए मजबूर कर दिया था। भारत पर अधिकार करने और यहां उनकी उपलब्धियों की चर्चा करते हुए यह नहीं बताया जाता कि विश्व को देन में भारत का हिस्सा 1842 में 24 प्रतिशत से घटकर आजादी मिलने वाले साल यानी 1947 में 1 प्रतिशत क्यों हो गया। बहुत कम अंग्रेज इतिहासकार हैं जो 1940 के दशक में बंगाल में सूखे से हुई तबाही का जिक्र करते हैं जो इस वजह से हुई थी कि अनाज से भरे जहाजों को जरूरतमंदों तक भेजने की बजाय यू.के. की तरफ मोेड़ दिया गया था, जिसके चलते लाखों की जानें गई थीं। जो बात ज्यादा बताई जाती है वह यह है कि ब्रिटिश राज के दौरान ही भारत में रेल की शुरुआत हुई, और कि ये ब्रिटिश लोग ही थे जिन्होंने सती प्रथा को खत्म कराने की कोशिश की थी। ब्रिटिश स्कूलों में लगाई गईं इतिहास की किताबों को पढ़ने वाले यही मानते हैं कि भारत के लोग किस्मत वाले रहे कि उन पर ब्रिटिश हुकूमत का राज रहा।
अब देखते हैं कि उस अमरीका की इतिहास की किताबों में क्या है, जिसके मूल निवासियों को तीन सौ साल पहले बड़ी तादाद में इसके किनारों पर पहंुचे यूरोपीय उपनिवेशवादियों ने कत्ल कर दिया था। स्कूल की किताबों में बेशक इस चीज का जिक्र है, लेकिन बहुत सरसरी तौर पर, ऐसा जिस पर ज्यादा ध्यान न जाए। ऐसी किताबों में अमरीका को 'आजाद और बहादुर' लोगों को देश बताया जाता है, जो हमेशा दूसरे देशों के लोगों के हालात की बेहतरी की कोशिश करता है। दुनिया जानती है दूसरे देशों-इराक, लीबिया, सीरिया-में अमरीका के एकदम ताजा दखल के नतीजे क्या निकले हैं। अमरीका और उसके साथियों फ्रांस, जर्मनी, पोलैंड और यू.के. की सेनाओं के वहां जमे रहने से, सीरिया अल कायदा और उसके गुटों की नर्सरी बन गया है। इन सारे यूरोपीय देशों की सशस्त्र सेनाओं को अफ्रीका और एशिया के देशों पर कब्जा करने के लिए एक बार फिर से इस्तेमाल किया जा रहा है। अमरीका, कनाडा या ऑस्ट्रेलिया (इन तीन देशों में यूरोपीय उपनिवेशवादियों ने मूल निवासियों का कत्ल किया था) के स्कूलों में ऐसा इतिहास पढ़ाया जा रहा है जो ऐतिहासिक घटनाओं को इस तरह से पेश करता है कि उस देश के लिए सम्मान पैदा हो, बजाय विद्वेष या गुस्से के। दूसरे यूरोपीय देशों, या जापान या चीन में भी ऐसा ही है। भूतकाल को इस तरीके से पेश किया जाता है कि वहां के नागरिकों को लगता है कि उनका देश किसी भी दूसरे देश से, बेहतर नहीं तो, बराबर है। इसके फलस्वरूप, बड़े से बड़े काम या चुनौतियों का सामना करने का भरोसा बढ़ता जाता है।
ये पूछने पर कि भारत के सामने सुरक्षा चुनौतियां क्या हैं, विशेषज्ञों का जवाब होता है, आतंकवाद या साम्प्रदायिकता या माओवाद। लेकिन भविष्य के लिए खतरा पैदा करने वाली असल चुनौती है लोगों में इस बात की जानकारी न होना कि भारत के नागरिक के नाते उनकी मूल पहचान क्या है। इस तरह की नासमझी के पीछे बड़ी वजह है कि भारत के इतिहास को ऐसे पेश किया गया कि उससे बीते वक्त के लिए सम्मान कम हो, यह नहीं बताया गया कि देश, पहले एशिया के दूसरे हिस्सों से आए और बाद में यूरोपीय हमलावरों के कब्जे में कब आया। ऐसा लगा था कि 1947 में ये चीज ठीक हो जाएगी, जब देश में अपनी सरकार का राज आया था। लेकिन हमलावर भले चले गए थे, पर इतिहास का उनका संस्करण अब भी बना हुआ है जो आज बच्चों को पढ़ाया जाता है, जिसके चलते उनमें भारत के प्रति गर्व और आत्मविश्वास को पैदा होने से रोका जाता है। अगर देश के लिए रत्तीभर स्वाभिमान नहीं होगा तो न तो भ्रष्टाचार के प्रति अंदर से आदमी में विरोध जगेगा, न व्यापार और राजनीति में लगे लोगों के कुशासन पर लगाम लगेगी। हर देशवासी में अपनी मूल पहचान की समझ की कमी के चलते ही ब्रिटिश राज के बाद यहां राज करने वालों की सोच अपने पहले के शासकों जैसी बनी रही। इसी वजह से उन्होंने कुछ हद तक अपने औपनिवेशिक आकाओं की तर्ज पर यहां के नागरिकों की लूट-खसोट, उन्हें सताना, दोहन करना जारी रखा। भारत की एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान में गौरव की कमी के चलते देश के प्रति असम्मान का भाव उपजा।
ऐसा क्यों है कि भारत के वे नागरिक जो अपने देश में तो गैरजिम्मेदाराना बर्ताव करते हैं, पर बाहर जाकर ईमानदारी दिखाते हैं और उसकी तारीफ करते हैं, क्योंकि उस देश की एक साफ मूल पहचान है? ऐसा क्यों है कि यहां भारत में लोग अपनी गली गंदी रखते हैं, पर सिंगापुर जैसी जगहों पर जाकर आस-पास सफाई रखते हैं? ऐसा इसलिए कि उनके मन में अपने देश को लेकर कोई इज्जत नहीं होती। वे भारत को खराब नजरों से देखते हैं। लेकिन गलती उनकी भी नहीं है। गलती है कि भारत पर राज करने वाले एशियाई, यूरोपीय और उसके बाद उपनिवेशवादी अंग्रेजों ने हमें गलत इतिहास पढ़ाना जारी रखा। इतिहास का ऐसा स्वरूप हमारे देश के लोगों की मूल पहचान को छुपाता रहा, झूठ पर झूठ पढ़ाता रहा कि भारत का प्राचीन इतिहास एक छलावा है, वास्तविकता नहीं।
यूरोप में, उसके बीते जमाने के बारे में प्यार और साज-संभाल साफ देती जा सकती है। संग्रहालयों में मशहूर कलाकारों की कलाकृतियां सहेजी दिखती हैं। बीते दिनों के गौरवपूर्ण इतिहास को देखकर वहां के लोगों में गर्व पैदा होता है और देश के लिए विश्वास जगता है। हर यूरोपवासी जूलियस सीजर या अलेक्जेंडर के कारनामों पर फूला नहीं समाता और दा विंसी या बोत्तीसेली की कला पर रीझता है। लेकिन भारत की महान विभूतियों को अक्सर भुला दिया जाता है, उनके लिखे को अनदेखा किया जाता है और यादों को धुंधला दिया जाता है। सवाल उठता है कि: महात्मा गांधी द्वारा आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री चुने गए जवाहरलाल नेहरू इतने ही विवेकी थे तो भारत चीन सरीखे देशों से इतना पीछे क्यों है? दक्षिण-पूर्व एशिया से इतना पीछे क्यों है? अगर नेहरूवादी तंत्र इतना बेजोड़ था तो आज इतनी गरीबी और अज्ञानता क्यों है? मुद्दे की बात है कि वह तंत्र भारत के लोगों की भावना के बिल्कुल उलट था।
नेहरू ने प्राचीन भारत के इतिहास को मिथक बताने की ब्रिटिश पॉलिसी को ही अपनाया था। उन्होंने महाभारत और रामायण को ऐतिहासिक दस्तावेज न मानकर उपन्यास ही माना, कपोल कल्पना माना। नतीजा यह हुआ कि आज रामायण का भारत नहीं, इण्डोनेशिया में ज्यादा सम्मान है। रामायण और महाभारत ही नहीं, पंचतंत्र और जातक कथाएं भी स्कूली किताबों से हटा दी गईं, क्योंकि ये 'हिन्दू ग्रंथ' हैं, जबकि तथ्य यह है कि ये भारत के हर नागरिक, चाहे वह हिन्दू हो, ईसाई, मुस्लिम, सिख, जैन या बौद्ध, सबसे उतने ही जुड़े हैं। ये तो भारत के स्कूलों में खूब पढ़ाए जाने चाहिए ताकि बच्चों को अपने गौरवशाली अतीत का भान हो। उनमें देश के अनूठे महापुरुषों, देवी देवताओं के बारे में जानकर गौरव जगे। भगवान राम जिस रास्ते से अयोध्या से लंका गए थे उसे सांस्कृतिक पर्यटन के लिहाज से फिर से निखारना चाहिए। पाकिस्तान से मोहन जोदड़ो और गुरु नानक से जुड़े स्थानों को संवारने की बात होनी चाहिए। भारत और नेपाल को जुड़कर भगवान बुद्ध के यात्रा मार्ग और सीखों पर काम करना चाहिए। अपने बीते काल को अनदेखा करने की बजाय भारत को उस पर गर्व होना चाहिए। समय आ गया है कि भारत की शिक्षा और संस्कृति को अंग्रेजों और उसके बाद उनके नेहरूवादी उत्तराधिकारियों द्वारा डाली बेडि़यों से आजाद कराया जाए।
इसके ये मायने नहीं हैं कि अंग्रेजी से बिल्कुल मुंह मोड़ लिया जाए। जो इसे पढ़ना चाहे, जरूर पढ़े। हम 21वीं सदी में जी रहे हैं इसलिए आज की दुनिया में जो चीज वैश्विक नजरिए से जरूरी है, उसे अपनाना ही चाहिए। लेकिन इसके लिए हमें अपने बीते काल को समझना और उस पर गौरव करना आना चाहिए। -एम. डी. नालापाट