| दिंनाक: 23 Aug 2014 15:29:18 |
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खेती प्राणिमात्र के अस्तित्व को बनाये रखने की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। खेती का सबसे महत्वपूर्ण सम्बन्ध सूर्य के प्रकाश, जल और मिटटी से है, वायु भी एक महत्व का अंग है। ये उन पंचमहाभूतों के मूलभूत तत्व हैं जिन्हें आज अंतरराष्ट्रीय विज्ञान परिषद् ने भी मान्य किया है। किन्तु भारतीय दर्शन ने इसे पंचमहाभूत की उपासना के रूप में प्राधान्य दिया। इस सन्दर्भ में खेती एक उपासना है, साधना है, आराधना है।
खेती का एक मूलभूत और महत्व का अंग सूर्य का प्रकाश है। सूर्य-प्रकाश की ऊर्जा शक्ति ही अन्न शक्ति में परिपक्व हरित पत्तों के हरितद्रव्यों में रूपांतरित होती है और इस प्रक्रिया के संपन्न होने में नमी की उपस्थिति भी जरूरी है जो जल द्वारा मिलती है। जल का संचालन और नियोजन चन्द्र और पृथ्वी के अंतर पर आधारित् होता है। हर खेत पर सूर्य-प्रकाश और चंद्र प्रकाश, दोनों की उपस्थिति निश्चित और समान होती है।
कृषि में ऊर्जा का उपयोग अधिकतम होता जा रहा है। एक कैलोरी उत्पादन के लिए नौ कैलोरी खर्च हो रही है। 9 कैलोरी के खर्च की राशि राष्ट्र को राहत निधि के रूप में खर्च करनी पड़ती है, जिसके कारण विकास के अन्य कार्यक्रमों में रुकावट आती है।
अन्न खाने से प्रतिकार शक्ति बढ़नी चाहिए किन्तु जहरीले रसायन के अति उपयोग से खुराक आदमी को जीवन देने के बदले रोग दे रही है।
अमृत कृषि मे जल वहन के सिवाय ऊर्जा का उपयोग कहीं नहीं होता और 'प्राइमरी प्रोडक्टिविटी' से ही खेती की जाती है जो ऊर्जा का पूर्ण रूप से अधिकतम संचय करती है।
अमृत कृषि में कोई भी केमिकल दवाएं या कोई भी सिंथेटिक या जैविक कीटनाशकों का उपयोग नहीं होता, यह अपने आप में पौधों की प्रतिकार शक्ति का द्योतक है यानी अमृत कृषि से उपजे फल, अनाज खाने वाले की जीवन शक्ति का विकास होता है, जो उसे हर प्रकार के रोग से बचाती है।
अमृत कृषि का उद्देश्य भारत के प्रत्येक नागरिक को मानवीय, जैविक और संसाधनों के पूर्ण उपयोग की जानकारी से समृद्घि प्रदान करना और सामान राशि का संयोग करते हुए पूर्ण रूप से पारिवारिक नाता बनाना है, जिससे हर परिवार को सुन्दर, स्वस्थ, आनंदातीत, अर्थपूर्ण और संतोषजनक जीवन जीने की संधि मिले। यह पूर्ण रूप से संभव है, सिर्फ सहयोगी और साहसिक संगठन के जरिये अमृत कृषि के विज्ञान पर अमल करने से यह उद्देश्य साकार हो सकता है।
यह गठबंधन हमारे पर्यावरण को समृद्घ और संपन्न करते हुए संसाधनों के उपयोग से मानव की विशेष सोच और सूझ भरे मस्तिक के विशेष विज्ञान से समृद्धि को बढ़ाने में हमारी मदद करेगा। इसके द्वारा हम इतने सक्षम हो जायेंगे कि रोज की समस्याओं को खुद सुल्झा सकेंगे। यह गठबंधन आगे जाकर पर्यावरण और मानवीय मैत्री भरे संबंध को बढ़ाएगा, जिसके दो मुख्य पहलू होंगे, मानवीय संसाधनों की समृद्घि
और सम्पन्नता।
अमृत कृषि ने ये बताया है कि जटिल और आधुनिक विज्ञान को भी किसानों द्वारा साधारण तरीके से अपनाया जा सकता है, यह भूरी क्रांति लाने के लिए बहुत ही उपयोगी होगा।
अमृत कृषि के विशिष्ट आयाम
अमृत कृषि मानती है कि भारत में प्रतिदिन एक वर्ग फीट पर पड़ने वाले सूर्य-प्रकाश से पौधों में 3 से 4 ग्राम शुष्क भार प्राप्त किया जा सकता है।
अमृत कृषि से किसी भी क्षेत्र में विशिष्ट 'माइक्रो क्लाइमेट' तैयार किया जा सकता है और सभी प्रकार की पैदावार ली जा सकती है।
10 गुठा(10000 वर्ग फीट) भूमि एक परिवार को स्वस्थ जीवन प्रदान करने में
सक्षम है।
अमृत कृषि पांच 'ग' की जीवन शैली को प्रधानता देती है-
1. गांव- जहां किसान रहता है
2. गो आधारित अर्थशास्त्र
3. गीता आधारित ज्ञान
4. गीत गुनगुना कर आनंद की अभिव्यक्ति
5. गोपी जैसा नि:स्वार्थ प्रेम
अब हम समझें इस विज्ञान को साकार करने के लिए अनिवार्य अमृत मिट्टी का विज्ञान। अमृत मिट्टी कुदरत की देन है। कुदरत ने एक इंच उपजाऊ मिट्टी बनाने के लिए सौ साल से पांच सौ साल कोई स्थान स्थल और काल के आधार पर लिया। जमीन का जैव भार प्रतिवर्ष बढ़ने के कारण जल धारण क्षमता बढ़ती रहेगी जिसके कारण पानी की आवश्यकता भी कम होती जायेगी और कुछ साल बाद सिर्फ नमी से ही काम चल जाएगा। इस मिट्टी द्वारा पौधों की जड़ों को विशिष्ट ताकत मिलती है और पच्चीस-पचास साल पुराने फल न देने वाले वृक्ष भी पुन: फल देने में सक्षम हो जाते हैं।
अमृत मिट्टी बनाने के लिए अमृत जल की आवश्यकता पड़ेगी। अमृत जल एक मिश्रण है जिसमें देशी गाय का एक किलो ताजा गोबर, एक लीटर गोमूत्र, पचास ग्राम देशी गुड़, 12 खूब पक्के हुए केले, चीकू, अमृत के फल, काजू के फल, एक लीटर गन्ने का रस उपयोग में लिया जा सकता है। इसका एक मिश्रण बनाकर एक लीटर पानी में मिला दें और बारह दफा सीधा और बारह दफा उल्टा घुमा कर छाया में रखें। इस मिश्रण को तीन दिन रखें और दिन में तीन दफा खूब हिलाएं। चौथे दिन इस मिश्रण को सौ लीटर पानी में मिला दें। इस प्रक्रिया से जो जल बनेगा उसे अमृत जल कहते हैं। इस अमृत जल को चौथे दिन ही उपयोग करना उचित रहेगा। अमृत जल का दूसरा उपयोग पौधों की प्रतिकार शक्ति बढ़ाने में भी होता है।
अमृत कृषि भारतीय तत्व दर्शन 'पिंडे ते ब्रह्मांडे और ब्रमांडे ते पिंडे' को साकार
करता है। हम जानते हैं, छह प्रकृति प्रदत्त नियम हैं- दिनचर्या, खानपान, शुद्घिकरण, ध्यान, आसन और प्राणायाम। इन नियमों में खानपान अति महत्वपूर्ण है, क्योंकि कहते हैं न, जैसा अन्न वैसा मन, जैसा चिंतन वैसा जीवन।
तमाम दूषित अन्न और दूषित गीतों के चलते इंसान शैतान बन गया, जिसके चलते सभी समस्याएं पैदा हुईं। यदि इनसे बचना है तो अन्न और गान को ही बदलना होगा। रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाई से उत्पादित अन्न आपको तन, मन से इतना कमजोर बना देता है जिसके चलते आप तीसरा अन्न खाने के लिए मजबूर हो जाते हैं, जिसे आप मांसाहारी एवं नशाखोरी के नाम से जानते हैं और जो ये तीसरा अन्न खाता है उसे चौथा अन्न खाना ही पड़ेगा, जिसको बेईमानी वाला अन्न कहते हैं। प्राकृतिक अन्न का मतलब जिवाणुओं के सहयोग से उत्पादित अन्न। इसलिए हमारा खान-पान प्रदूषण रहित हो तो, प्राकृतिक हो तो जीवन अनेक व्याधाओं से मुक्त रहता है। -दीपक सचदे
लेखक मध्य प्रदेश देवास में स्थित माल-पानी ट्रस्ट से जुड़े कृषि विशेषज्ञ हैं