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बीज प्रकृति की अनमोल विरासत है, जिस पर खेती की बुनियाद टिकी है। बीज का प्रमुख कार्य है, ये नया जीवन लेकर उगता है और खाद्यान्न देकर जीवधारियों की भूख शांत कर उनका पोषण करता है, साथ ही मौसम के अनुसार उगता है। हर एक बीज के अन्दर सूक्ष्म प्राण तत्व होता है। हजारों वर्ष पूर्व हमारे पुर्वजों ने जंगलों में उग रही बाली, फली व कंद मूल फलों को बड़े परिश्रम से जांच-परख कर खाने-पीने की तकनीक विकसित की थी। उनकी मेहनत से खेती, किसान और पशुपालन की संस्कृति का जन्म हुआ और यह संस्कृति पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही। फसल बीजों से किसान खेती करते हैं, किन्तु पेड़-पौधे, लता-बेल, कंदमूल जंगल बनकर स्वत: उग जाते हैं उन्हें न खाद की जरूरत है न सिंचाई की। जिस तरह मानव की अभिलाषा अपने वंश को आगे बढ़ाने की होती है उसी तरह प्रकृति की विरासत बीजों का स्वभाव भी है।
बीजों का संसार हमारे बुजुर्गों की कला, तकनीक एवं उनकी वैज्ञानिक सूझ-बूझ से आगे बढ़ा। अनादि काल में उन्होंने खाद्यान्न, दलहन, तिलहन, साग-सब्जी व फल-फूलों की विविध किस्मों के बीजों का भंडारण किया और बीजों की अदला-बदली मुक्त ढंग से की, इस तरह हजारों तरह के बीजों का उन्होंने संरक्षण संवर्द्धन किया। जैव विविधता एवं प्राकृतिक संसाधनों की बहुलता के कारण ही हमारा देश सोने की चिडि़या कहलाता था। खेती किसान के सम्मान व गौरव का प्रतीक था। हर एक युग में खेती किसान और पशुपालन का सम्मान हुआ। सतयुग में राजा जनक ने हल चलाया तो सीता का जन्म हुआ, जिस पर रामायण की पूरी संस्कृति टिकी है। इसी तरह द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण ने ग्वाला बनकर गोधन की महत्वपूर्ण संस्कृति को आगे बढ़ाया। वर्तमान युग में परतंत्रता के दिनों में अंग्रेज सरकार ने किसानों को अपनी फसलें छुड़वाकर नील की खेती के लिए मजबूर किया तो इसके विरुद्ध चम्पारण का किसान आंदोलन हमारे सामने इतिहास में आज भी दर्ज है। आजादी के बाद प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने भी 'जय जवान जय किसान' का नारा देकर किसान और सैनिक को सम्मान दिया।
1970 के दशक में जब अमरीका से आयी हरित क्रांति का प्रभाव हमारे देश में बढ़ा तो गेहूं एवं धान की बम्पर पैदावार होने से किसानों की खूब सराहना हुई, लेकिन बड़े-बड़े पुरस्कार व सम्मान वैज्ञानिकों को ही मिले। बढ़ी उपज देखकर कुछ दिन किसान फूले नहीं समाये। मुफ्त के बीज, मुफ्त खाद मिली। रासायनिक खाद ने नि:सन्देह उपज बढ़ायी, लेकिन खेती को नशेबाज बना कर मिट्टी का संतुलन बिगाड़ दिया। फलस्वरूप तरह-तरह की बीमारियां व कीड़े-मकोड़े के आक्रमण से फसलें नष्ट होने लगीं। वैज्ञानिकों ने कहा घबराने की बात नहीं कीटनाशक डालो, कीटनाशक डालने से बीमारियां नियंत्रित हुईं तो नई फसलों में खरपतवारों का अम्बार लग गया। अरअसल ये खरपतवार दहेज में नये बीजों के साथ भेजे गये थे। फिर खरपतवारों के नियंत्रण के लिए खरपतवारनाशी जहर भी दवा के रूप में आ गया। गाय के गोबर की जगह रासायनिक खाद और बैलों की जगह ट्रैक्टर ने ले ली।
कुछ दिनों बाद मुफ्त के प्रदर्शन बंद हो गये। किसान को अब खेती के सारे उपकरण बाजार से खरीदने पड़े। खेती में लागत बढ़ती गयी और खाद की मात्रा बढ़ाने पर भी उपज उतनी नहीं हुई। मुनाफे के लिए किसान नगदी फसलों की तरफ बढ़े, किन्तु बढ़ती लागत ने यह कहावत चरितार्थ कर दी 'आमदनी अट्ठन्नी और खर्चा रुपया।' जहां एक समय हजारों तरह के बीज और विविधता की खेती की उनका निर्बीज हो गया। नये गिने-चुने ऐसे बीज दिखायी दिए जिनके बारे में किसान कुछ जानते ही नहीं थे। हजारों सालों का पारंपरिक ज्ञान एवं विविधता लुप्त हो गई। लागत बढ़ने से किसान कर्ज के जाल में फंसे और फंसते चले गये। कर्ज ने किसानों को कंगाल बना कर रख दिया। इसी कंगाली के परिणामस्वरूप पिछले 15-20 सालों में 3 लाख से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं और लाखों किसान खेती छोड़कर मजदूरी करने को मजबूर हैं। आत्महत्या का सिलसिला अब भी जारी है।
एक तरफ किसान के हिस्से कर्ज और कंगाली है तो दूसरी तरफ बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक, खरपतवार नाशी एवं खेती के उपकरण मशीनरी आदि में लगी देसी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां मालामाल होती जा रही हैं। बैंक और साहूकारों का मुनाफे का धंधा मजबूत हुआ है, जहां तक उपभोकताओं के स्वास्थ्य की बात है तो जहरीले खानपान के कारण कैंसर जैसी दर्जनों बीमारियां आम हो गई हैं। सरकार एक तरफ बीमारियां परोस रही है तो दूसरी तरफ बीमारी दूर करने के लिए अस्पतालों व दवाओं का धंधा बढ़ा रही है। यह बड़ी विडम्बना है कि कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियां खाद एवं कीटनाशक भी बनाती हैं और जीवन रक्षा दवा भी, उनके दोनों हाथ में लड्डू हैं।
हाल ही में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली स्थित हरित क्रांति की सबसे बड़ी प्रयोगशाला भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के 86वें स्थापना दिवस के अवसर पर किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए प्रयोगशाला से खेत तक नई तकनीक ले जाने का नया नारा दिया। नि:संदेह प्रधानमंत्री कि चिंता किसानों की आय बढ़ाने के लिाए सराहनीय है। किन्तु जब पानी में ही आग लगी हो तो उसे कैसे बुझाएं? यानी पिछली सरकार की दोषपूर्ण कृषिनीति के चलते यह कैसे संभव होगा। आईसीएआर में जो शोध होते हैं उसमें अधिकांश बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मदद मिलती है। इसलिए उनके मुनाफे को बढ़ाने के पूरे-पूरे प्रयास होते हैं। देश में अब तक नहीं छपा। किसानों की आय एवं टिकाऊ खेती का विकास तब तक संभव नहीं जब तक किसान विरोधी कृषि नीति नहीं बदली जाती।
देश में 70 प्रतिशत से अधिक आबादी छोटे एवं सीमांत किसानों की है, उनकी खेती की संस्कृति एवं जीवन पद्धति को लौटाए बिना न किसान बच सकते हैं न उनकी आय बढ़ सकी है। आज तक हरित क्रांति के उन्नत बीजों से खेती होती थी किंतु, अब दूसरी हरित क्रांति के नाम पर जैव प्रौद्योगिकी के माध्यम से अनेक फसलों के जीएम बीज लाने की तैयारी है। इससे किसान की बची आजादी तो जायेगी ही साथ ही उपभोक्ताओं का स्वास्थ्य एवं प्रकृति व पर्यावरण को भी क्षति पहुंचेगी। जीएम बीज सर्वनाश की तैयारी है। इनके संरक्षण से बची हुई जैव विविधता को भी भारी क्षति पहुंच सकती है। दरअसल उपनिवेशवादी ताकतें अब नये ढंग की गुलामी के तौर तरीके अपना रही हैं। कहां एक जमाने में हमारे किसान प्राण तत्व वाले जिंदा बीजों की खेती करते थे अब ऐसे जीएम बीज उगाएंगे खतरनाक डीएनए के साथ-साथ निरवंश खेती भी होगी इन फसलों से हम बीज नहीं ले सकेंगे। यदि बीज के तौर पर बोएंगे तो बीज सड़ जाएगा, उगेगा नहीं। वस्तुत: वही कम्पनियां किसानों को बीज बेचेंगी।
हालांकि भारतीय खेती का बड़ा हिस्सा आज भी बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद के चंगुल में फंसा है, लेकिन जलवायु और मौसम परिवर्तन के बढ़ते प्रकोप के चलते उनका यह साम्राज्य कभी भी बुरी तरह से ध्वस्त हो सकता है।
बांधों एवं भूमिगत जल की सिंचाई के मार्फत भी बहुत दिनों तक इसे बचाना संभव नहीं क्योंकि दिन-प्रतिदिन पानी की कमी होती जा रही है। ऐसे संकट की घड़ी में पारंपरिक ज्ञान व पारंपरिक प्राकृतिक बीज टिका रह सकता है। पुरखों की हजारों सालों की बीजों की विरासत को देश के अनेक हिस्सों में सूझ-बूझ वाले किसान समुदाय बचाने के प्रयास में लगे हैं। कई पारंपरिक बीज उन्नत बीजों के बराबर उपज देने में सक्षम हैं।
उत्तराखण्ड में 1970 के दशक में चिपको आंदोलन के इस नारे-'क्या है जंगल की उपकार-मिट्टी पानी और बयार मिट्टी' पानी और बयान जिन्दा रहने के आधार से सीख लेकर 20-25 साल पूर्व यहां बीज बचाओ आंदोलन की शुरुआत हुई थी। इस आंदोलन ने यहां की वर्षा आधारित मंडुआ, झंगोरा जैसे पौष्टिक अनाजों को विशेष महत्व दिया। बारहनाजा खेती की पारंपरिक वैज्ञानिक पद्धति को बचाने के लिए लोक चेतना जागृत की। खेती एवं पशुपालन की पारंपरिक संस्कृति को बचाने के इस अद्भुत आंदोलन की आरंभ में खूब आलोचना हुई। खूब विरोध भी झेलना पड़ा। पारंपरिक बीजों के संरक्षण की संवर्धन की इस पहल के कुछ सकारात्मक परिणाम भी निकले। जहां कई बड़े राज्यों में पारंपरिक बीज ढूंढे़ नहीं मिलते, वहीं छोटे से उत्तराखंड में बीज बचाओ आंदोलन ने धान की 350, गेहूं 30, मंडुआ 12, झंगोरा 8, कौणी 3, चीणा 2, रामदाना 3, राजमा 220, गहल 4, भट्ट 4, नौरगी 12, ोबिया 8, ज्वार 4 एवं मक्की 8 किस्मों सहित दर्जनों तरह की साग सब्जी एवं दलहन-तिलहन की किस्मों की पहचान की है। अनेक प्रजातियां उगायी भी जा रही हैं। किसानों के साथ बीजों का मुक्त आदान-प्रदान व अदला-बदली की जाती है। बीज बचाओ आंदोलन जैविक प्राकृतिक खेती को बचाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील है। बीज बचाओ आंदोलन मानता है कि बीज किसान समुदाय की साझा सम्पत्ति है।
बीज किसान की आजादी का प्रतीक है, बीज किसान की मुट्ठी में रहना चाहिए, बीज बचाओ आंदोलन के नारे 'बन्द करो तुम इनसे छेड़छाड़-मिट्टी, पानी बीज और पेड़ खेत हमारे बीज तुम्हारे-नहीं चलेगा, नहीं चलेगा। जोते-बोये जो जमीन-बीज रहें उसके अधीन, खेती पर किसकी मार-जंगली जानवर मौसम और सरकार। ल्ल
लेखक चिपको, खनन विरोधी और
बीच बचाओ आंदोलन के प्रणेता
-विजय जड़धारी











