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राजेन्द्र कुमार मिश्र
शरिया कानूनों को सर्वोच्च बताकर उनकी आड़ में छुपा रहने वाला मुस्लिम समाज जब तक सेकुलर दलों की असलियत नहीं समझेगा, तब तक तरक्की नहीं कर पाएगा।
आखिर कब तक वोट बैंक बने रहकर सेकुलर दलों की बिसात पर गोटियों की तरह यहां से वहां होता रहेगा ?
देश की मुख्य धारा में समरस होकर तरक्की और खुशहाली की राह पर बढ़ सकते हैं भारत के मुसलमान।
एम.जे. अकबर की तरह आगे आकर वोट बैंक के दम पर चुनाव लड़ने वालों को सबक सिखाएंगे देश के समझदार मुसलमान?
स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने खुले तौर पर देश को विभाजित कर मुसलमानों के लिए एक अलग देश बनाने व गैर मुस्लिम सेकुलर भारत निर्माण की मांग का समर्थन किया था। इसके पीछे दो कारण थे, पहला, उन्हें स्तालिन द्वारा ऐसा करने का आदेश था और दूसरा, उन्हें यह प्रतीत होता था कि इस्लाम की विचारधारा और अविभाजित भारत में एक बड़ी मुस्लिम आबादी होने की वजह से उन्हें सत्ता मिलने के कम आसार हैं जितने एक हिन्दू बहुल देश में हैं। बहरहाल,जब उन्हें लगने लगा कि बंटवारा होकर रहेगा,तो उन्होंने उसकी खिलाफत का नाटक शुरू कर दिया ताकि बंटवारे के विरोधी हिन्दू समाज का समर्थन मिल जाए। उन्होंने मौका ताड़कर अपनी अवसरवादिता और मुसलमानों पर टीका-कटाक्ष, दोनों का प्रदर्शन किया। नेहरू यद्यपि कम्युनिस्ट नहीं थे, लेकिन एक सेकुलर और वामपंथ की तरफ झुकाव वाले व्यक्ति ही थे,फिर भी वे मुस्लिम प्रगतिशीलता को लेकर सशंकित रहते थे।
वर्ष 1952 में जब हिन्दू कोड बिल पर संसद में बहस चल रही थी तो आचार्य कृपलानी ने नेहरू से बहुविवाह को देश के प्रत्येक नागरिक के लिए अवैध ठहराने का अनुरोध किया था। नेहरू मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार करने को तैयार नहीं थे, क्योंकि उन्हें आगामी चुनाव में मुसलमानों के वोट खिसकने का खतरा था। कृपलानी का मानना था कि यह समान नागरिक संहिता की ओर एक कदम होता,जिसका संविधान सभा में मुस्लिम प्रतिनिधियों ने जमकर विरोध किया था। लेकिन नेहरू ने कृपलानी की मांग को अनदेखा कर दिया। देखा जाए तो नेहरू का रवैया आश्चर्यजनक नहीं था। कुछ को यह राजनीतिक समझदारी की बात लगी होगी।
मुसलमानों को लेकर एक अजीब सा भय और भ्रम स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान चरम पर था,असल में इन दोनों ने मिलकर पाकिस्तान की मांग को एक तरह से बल दिया था। समान नागरिक संहिता की तरफ पहला प्रयास राजीव गांधी सरकार की शुरुआती हिचकिचाहट से हुआ था, जब सर्वोच्च न्यायालय ने प्रसिद्ध शाहबानो केस में अपना फैसला दिया और उसे बदलने के लिए राजीव की सरकार संविधान में संशोधन करने से पहले आनाकानी ही कर रही थी। लेकिन मुसलमानों के देशभर में भारी विरोध के सामने सरकारी हिचक हार गई।
कट्टरवादी मुसलमानों ने अपने शरिया कानूनों में किसी भी प्रकार के परिवर्तन के खिलाफ आंदोलन खड़ा कर दिया था। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय हिन्दुओं और गैर मुस्लिम की कीमत पर शरिया कानून के दुरुपयोग को लेकर सचेत रहा है। सरला मुदगल बनाम भारत संघ मामले में 1995 में अदालत ने कहा था कि हिन्दू विवाह अधिनियम-1955 के तहत हुआ हिन्दू विवाह उस कानून के प्रावधानों के तहत ही खारिज हो सकता है।
इस्लाम में मतान्तरित होने या पुन: विवाह करने पर हिन्दू विवाह अधिनियम के अधीन यह स्वत: खारिज नहीं हो सकता अत: इस्लाम में मतान्तरित होकर दूसरा विवाह करना भारतीय दंड संहिता की धारा 494 (5) के अन्तर्गत अपराध माना जायेगा। यह आदेश केवल हिन्दुओं और गैर मुस्लिम को ही सुरक्षा नहीं देता अपितु भटकते मन वाले पतियों पर भी एक नियंत्रण उपलब्ध कराता है। सरला का पति इस्लाम में मतान्तरित हो गया था और बिना तलाक लिए अपनी पहली पत्नी को बेसहारा करके उसने दूसरी शादी कर ली थी।
इस मामले में फैसला देने वाले न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह ने यह राय भी दी थी कि भारत में, जहां 80 प्रतिशत से ज्यादा लोग पहले से ही वैयक्तिक कानूनों के दायरे में लाए जा चुके हैं, इसलिए अब सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लाने में आनाकानी को सही नहीं ठहराया जा सकता।
सर्वोच्च न्यायालय ने 2003 में समान नागरिक संहिता लागू करने के संवैधानिक कर्तव्य पर केन्द्र सरकार को स्मरण पत्र भेजा था। उस समय भारत के कानून मंत्री अरुण जेटली थे। वर्ष 1997 में केरल के एक पादरी जॉन वलामत्तन ने अदालत में एक याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने उल्लेख किया था कि जब हम कोई सम्पत्ति किसी पांथिक संस्थान को दान करना चाहते हैं तो नहीं कर सकते, क्योंकि उसमें ईसाई पर्सनल लॉ के कुछ प्रावधान आड़े आते हैं, उनके तहत वैसा करने में बेवजह की रोक लगाई गई है।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने उस कानून के पक्षपातपूर्ण हिस्से को सिरे से खारिज करते हुए उसे असंवैधानिक बताया था। इस फैसले के खिलाफ ईसाई समाज की ओर से कोई उग्र विरोध नहीं हुआ जैसा कि शाहबानो मामले में देखने में आया था।
आज एम.जे.अकबर जैसे पढ़े-लिखे मुसलमान नेता का भारतीय जनता पार्टी में आना संकेत करता है कि उनके और उन जैसे दूसरे शिक्षित मुसलमानों का कथित सेकुलर दलों जैसे कांग्रेस, सपा, जद यू से मोहभंग हो गया है। ये दल मुसलमानों का शोषण करके उन्हें सिर्फ वोट बैंक के रूप में प्रयोग करते रहे हैं। वे जब सत्ता में होते हैं तब उनके लिए कुछ करते नहीं हैं। हालांकि इतना ही पर्याप्त नहीं है। जब तक मुसलमान पुराने पड़ चुके वैयक्तिक कानूनों का फायदा उठाते रहने पर अड़े रहेंगे,उनका पिछड़ापन दूर नहीं किया जा सकेगा। यहां तक कि कई इस्लामिक देशों ने अपने पुराने मजहबी कानूनों में बदलाव किया है। जैसे कि पाकिस्तान में न्यायालय से अनुमति मिलने के बाद ही कोई मुसलमान दूसरा विवाह कर सकता है, लेकिन भारत में एक मुसलमान चार पत्नियां रख सकता है और एक या सबको तीन बार तलाक बोलकर उनसे निकाह तोड़ सकता है।











