भक्ति की मिसाल सहजोबाई
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भक्ति की मिसाल सहजोबाई

Written byArchiveArchive
Mar 25, 2014, 12:00 am IST
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दिंनाक: 25 Mar 2014 13:12:26

सहजोबाई की गुरु-निष्ठा का जवाब नहीं था। उनकी भक्ति, सत्यनिष्ठा, शालीनता, करुणा, क्षमा, सेवा, योग की चर्चा चारों ओर फैलने लगी। वे गुरु और प्रभु में भेद नहीं जानती थीं।

इस देश की नारी धर्म-अध्यात्म में प्राचीनकाल से अग्रणी रही है, ये उसी श्रृंखला की महत्वपूर्ण कड़ी है सहजोबाई। वे अपने आध्यात्मिक अनुभवों के बल पर काव्यमय सुगंध को निराकार से साकार कर सकीं। चरणदास की शिष्या होकर उन्होंने 108 शिष्यों में वरिष्ठता प्राप्त की।

मीराबाई व दायाबाई की तरह सहजोबाई अपनी साधना से लोगों के आकर्षण का केन्द्र बनीं। इनके नाम से आज भी दिल्ली में गद्दी है जिसके वर्तमान संत घनश्याम दास जी हैं, जिन्होंने सन 2000 में उनका ग्रंथ ह्यसहज प्रकाशह्ण प्रकाशित किया, जिसके अनुसार उनका जन्म विक्रमी सम्वत् 1782 के सावन महीने में शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन (तदनुसार 2 अगस्त 1725) माना गया।

इसे डा. श्याम सुंदर शुक्ल ने भी अपनी पुस्तक ह्यचरनदासी सम्प्रदाय और उसका साहित्यह्ण में पृष्ठ सं. 246 में प्रमाणिक माना है। सहजोबाई मूलत: राजस्थान की निवासी थीं, जिनके पूर्वज दिल्ली के परीक्षितपुर में आकर बसे। ये भार्गववंशी थीं। पिता का नाम हरिप्रसाद व माता अनूपी देवी थीं। इनकी शिक्षा घर व गुरुचरण में ही मानी गई, अत: ज्ञान ग्रंथमत न होकर आत्मगत अनुभवों पर आधारित है।

कम आयु में ही विवाह की रस्म पूरी की जा रही थी, परन्तु स्वामी समर्थदास की तरह या मीरा की तरह-ह्यचुडलो अमर हो जायेह्ण की पद्धति पर मंडप से उठ खड़ी हुईं और भक्ति पथ पर चल पड़ीं। लौटते समय बारात का घोड़ा बिदक कर पेड़ से टकरा गया और वर ने प्राण त्याग दिया। इस घटना से सहजो की गुरु-निष्ठा और भी बढ़ गई कि शायद इसी सत्य को जानकर गुरु ने कहा था-ह्यचलना है रहना नहीं, चलना बिस्वाबीस, सहिजो तनिक सुहाग पर, कहां गुंथावो सीस।ह्ण डा. टी. आर. शंगारी ने इसे लालित्यपूर्ण शब्दों में लिखा है।

स्वाति बूंद केले में गिरती है तो कपूर बन जाती है, सीप में गिरती है तो, मोती बन जाती है, सांप के मुंह में गिरती है तो विष बन जाती है। खारी धरती में बोया गया बीज नष्ट हो जाता है, अगर वही बीज उचित समय पर उपजाऊ धरती में डाला जाए, तो जल्द ही अंकुरित हो जाता है।

सहजो के हृदय-भूमि पर गुरु ज्ञान के बीज तत्काल प्रकट हो गए। गुरु निष्ठा का जवाब नहीं था। उनकी भक्ति, सत्यनिष्ठा, शालीनता, करुणा, क्षमा, सेवा, योग की चर्चा चारों ओर फैलने लगी। उनके गुरु भाई जोगजीत जी ने श्री लीला सागर में सहजोबाई की सराहना करते हुए लिखा है कि –

सत्य शील में सांवत सांची,

जग कुल व्याधि सबन सो बांची

दया, क्षमा की मूरत मानो,

ज्ञान, ध्यान भरपूर सु जानो

साधुन को ऐसी सुखदाई,

मानो भक्ति रूप धर आई

प्रेम लगन मांही अधिकाई,

कभी औ ज्यों मीरा बाई

योग युक्ति बैराग सुहाये,

ये अंग जनु भूषण छवि छाये

अनुभव हिए प्रकाश जु ऐसी,

पूरण शशियर चांदन जैसी

सहजोबाई की गुरु-निष्ठा अद्वितीय थी। वे गुरु और प्रभु में भेद नहीं जानती थीं। जैसे कबीर ने कहा था-

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागू पाय

बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय

वे गुरु ही नहीं उहें परमात्मा से भी महान मानती थीं, और वे परमशक्ति को पाने में योद्धा की भांति लग गईं। समाधि में लीन रहना उनकी सहज प्रवृत्ति बन गई। उन्होंने गुरु का आभार मानते हुए कहा-

सहजो गुरु दीपक दियो, रोम-रोम उजियार

तीन लोक दृष्टा भए, मिट्यो भरम अंधियार

सहजो गुरु दीपक दियो, नैना भए अनन्त

आदि अंत मध एक ही, सूझि पड़े भगवंत

गुरु के आन्तरिक व बाह्य दोनों ही दर्शन उन्हें सुलभ थे। एक बार गुरु के शाहजहांपुर प्रवास पर चले जाने व दर्शन-द्वय से विहीन हो जाने पर वे मछली की तरह अकुला उठीं। स्वामी रामरूप ने इसका वर्णन किया है-

उंही पलकें खुल गईं, उठी देखि घबराय,

चरणों ऊपर हाथ धरि, और कही महाराज

तुम तो रामत को गए, कैसे आए आज

महाराज हंस यों कही,यूं ही आया गोप

बाजू बकसा हाथ का, फिर भए तुरत अलोप

भोर भए फैली घनी, सभी हवेली माहि

नर-नारी पछताइयों, दरसन पायो नाहिं

सहजोबाई के संगठन व सेवा के स्वरूप को पहचान कर गुरुदेव ने इन्हें भ्रमण व अध्यात्म-प्रचार का अवसर दिया और देश में सैकड़ों चरनदासी संप्रदाय केन्द्र स्थापित हुए। तत्कालीन समय में नारी के लिए यह चुनौती भरा कार्य था। पहला तो यही कठिन कि कोई नारी घर-गृहस्थी त्याग कर, योग व आश्रम का आश्रय ले, उस पर उसकी प्रचारक बन कर देश के कोने-कोने में प्रचार करे, पर यही तो उनकी साधना थी, जिसमें शरीर गौड़ व साधन मात्र था, आत्मा प्रमुख थी। वे तन नहीं, मन से संस्कारित थीं।

योग का मार्ग जिसे सूर की गोपियों ने यह कहकर नकारा कि-ह्यउधो जोग-जोग हम नाहीं या उधो मन न भए दस बीस।ह्ण और उधो को खाली हाथ लौटना पड़ा। सूर का भ्रमरगीत जिस निर्गुण भक्ति पर सगुण भक्ति को प्रतिष्ठापित करता है, उसमें नारी कारक तत्व भी समाहित हैं। उसी तत्व व मार्ग से सहजो लोहा लेती हैं। वैचारिक धरातल पर अपनी सुदृढ़ आस्था भी कभी खंडित नहीं होने देती हैं।

एक घटना प्रचलित है कि-सहजोबाई की सिद्धि व प्रसिद्धि से प्रभावित होकर तत्कालीन सम्राट शाह आलम ने सम्वत् 1827 में उन्हें 1100 मोहरें भेंट में दीं और गाजियाबाद के पास एक गांव जागीर में दिया। उनके दस प्रमुख अनुयायियों के नाम-श्याम विलास , कर्तानंद, अगमदास, गुरु निवास, राम प्रसाद, संत हुजूरी, हरनाम, रघुनाथ सनेही, लक्ष्मीबाई, सुमिता बाई थे। ऐसा माना जाता है कि इसवीं 1805 में उन्होंने भौतिक शरीर का परित्याग किया। सामाजिक जीवन में 24 वर्षों तक अध्यात्म का प्रचार करती रहीं। 1800 फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को उनकी कृति ह्यसहज प्रकाश की सहज प्रस्तुतिह्ण प्रारंभ हुई-

फाग महीना अष्टमी, सुकल पाख बुधवार

संवत अठारह सै हुते, सहजो किया विचार

गुरु अस्तुति के करन कूं, बाद्यो अधिक हुलास

होते-होते हो गई, पोथी सहज प्रकाश

दिल्ली सहर सुहावना, प्रीक्षितपुर में बास

तहां समापत ही भई, नवका सहज प्रकास

सहज प्रकास पोथी कही, चरनदास परताप

पढ़ै सुनै जो प्रीत सूं, भाजै सबही पाप।

(संकलन- डा. संगीता गोयल- चरनदास और उनकी परम्परा में निर्गुणवादी महिला संत)

इनकी वाणी विचारशील, अगम व भावपूर्ण होते हुए भी विशाल नहीं है। इसमें मुख्य रूप से प्रभु नाम व सद्गुरू के स्वरूप का वर्णन है। साथ ही मानवजीवन, शरीर की उपादेयता, प्रेम, विनम्रता, नवधा भक्तिआदि का वर्णन है। कर्म व कर्मफल को उन्होंने अपने दर्शन का अंग बनाया। कुंडलियां, चौपाई और दोहे के रूप में उनका काव्य उपलब्ध है, जिसमें ब्रजभाषा, राजस्थानी, पंजाबी, खड़ी बोली का मिश्रण है। रागो में बंधी इनकी बानी में भाषा की तरलता-सरलता, भावों की अथाहता व अलौकिक रसानुभूति है।

निजी अनुभवों के आधार पर लोकहित भावना से लिखी बानी पाठकों को परमार्थ की ओर यथोन्मुख करती है। भावना, दर्शन, सिद्धांत व संगीत के मिश्रण से इनकी निर्गुणी भक्तिधारा सगुणता, सौम्यता, सहजता का रूप ले सकी।

ज्ञानी, ध्यानी होना आसान है, सहज होना दुष्कर पर जब तक सहज न हो, ज्ञान का श्रृंगार अधूरा रहता है- संकर सहज स्वरूप संभारा, लागि समाधि अखंड अपारा। ध्यान के अभिलेख अदृश्य, अव्यक्त रहते हैं। सहज होना भक्ति की पराकाष्ठा है, जिसे तुलसी ने लिखा है- सहज सुभाव छुअत छल नाहीं। या

निर्मल मन जन सो मोहिं पावा

मोहिं कपट छल, छिद्र न भावा

जैसा है- वैसा होना आदमी अपने को कितना कृत्रिम कर लेता है, कितने आवरण हैं उस पर, ये सब उतारने के लिए कितने जन्म व साधना की आवश्यकता होती है। अंदर-बाहर एक, मन, कर्म वाणी एक, बुद्धि, विचार, चिंतन एक, सब एक तो दूरी कहां? अगुनहिं सगुनहिं नहिं कछु भेदा, उभय हरहिं भव संभव खेदा। ईश्वर अंश जीव अविनासी हैं हम। हमारी लिप्साएं हमें क्षणभंगुर बना रही हैं। सहज होना इतना सहज तो नहीं, सहज की पराकाष्ठा हैं सहजो।

 

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