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-रमेश पतंगे-
सबकी आंखें अब मई 2014 में होने वाले चुनाव पर हैं। चार राज्यों में विधानसभा चुनावों से पहले 'मोदी बनाम राहुल गांधी' जंग होगी ऐसा दृश्य बना था, इन राज्यों में कांग्रेस की क्या दशा हुई यह जगजाहिर है, लेकिन दिल्ली के चुनाव में 'आम आदमी पार्टी' ने अनपेक्षित सफलता प्राप्त कर ली। इस पार्टी के उदय से आगामी लोकसभा चुनाव के समीकरण में कुछ बदलाव हुए हैं।
लोकतंत्र में चुनाव का मतलब 'युद्ध' ही होता है। इस 'युद्ध' में भी विरोधी दल की रणनीति अध्ययन करना पड़ता है। केवल बड़ी सभाएं , धमाकेदार भाषण करके विरोधी दल को पराजित नहीं किया जा सकता। रणनीति को अनदेखा करने के कारण ही इतिहास में बड़े-बड़े हिन्दू राजाओं की हार हुई है। पानीपत की लड़ाई हारने का कारण कमजोर रणनीति ही थी। भाजपा को चुनाव जीतने के लिए कुशल रणनीति बनानी होगी।
भाजपा इस भ्रम में कतई ना रहे कि कांग्रेस का सफाया हो चुका है। कांग्रेस का बल प्रचंड हैं। शहरों और देहातों में कांग्रेस का समर्थन करने वाले मतदाता मौजूद हैं। उसके पास राजनीति का लंबा अनुभव है। हालांकि स्वाधीनता के बाद कांग्रेस का स्वरूप सत्ता प्राप्ती के यंत्र जैसा हो गया है। जिनको सत्ता चाहिए वे कांग्रेस के साथ हो जाते हैं। शिवसेना छोड़नी है तो चलो कांग्रेस में, प्रादेशिक दल को छोड़ना है तो चलो कांग्रेस में ऐसी ही स्थिति पूरे देश में है।
सर्वोच्च स्थान पर नेहरू-गांधी परिवार का व्यक्ति होना चाहिए ऐसा कांग्रेस ने निर्णय कर रखा है। उसी को सर्वोच्च नेता समझना और आपस में लड़ना-एक दूसरे को पीछे खींचना मगर पार्टी छोड़कर नहीं जाना, अपनी निष्ठा नेहरू परिवार को समर्पित करने की भावना ही कांग्रेस की बड़ी शक्ति है। एक कहानी में जैसे राक्षस के प्राण किसी तोते में होते हैं, उसी तरह कांग्रेस के प्राण गांधी-नेहरू परिवार में है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान सरदार वल्लभभाई पटेल की जमकर तारीफ की। उन्होंने पूरे विश्व में पटेल का सबसे बड़ा पुतला गुजरात में खड़ा करने का संकल्प किया है, लेकिन यहां लोगों को यह बताना ज्यादा जरूरी है कि सरदार पटेल ने अपने देश की अखंडता कैसे बनाई और अलगाववादी मुस्लिम ताकतों को कैसे पानी पिलाया ?
मोदी को रोकने के लिए कांग्रेस क्या कर सकती है, इसका अंदाजा लगाना चाहिए। आज जो खबरें सुनाई देती हैं उसके हिसाब से कांग्रेस चार कार्य कर सकती है- 1. कांग्रेस मायावती से गठजोड़ बनाकर 'बसपा' को उत्तर प्रदेश में समर्थन दे सकती है और पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार इन राज्यों में बसपा के लिए कुछ सीटें छोड़ सकती है। मायावती खुद की ताकत पर पार्टी का विस्तार नहीं कर सकती हैं, मगर उनका चेहरा दलितों को आकर्षित करने के लिए काफी है। 2. कांग्रेस चोरी छुपे केजरीवाल की सहायता करेगी। खासकर शहरी भागों में लोकसभा क्षेत्र में 'आआपा' का प्रत्याशी खड़ा किया जाएगा और वह भाजपा के वोट काटे ऐसी रणनीति बनाई जाएगी। 3. राहुल गांधी की मदद के लिए प्रियंका वाड्रा को लाया जाएगा। राहुल की एक आम आदमी जैसी छवि बनाने का प्रयास रहेगा। प्रियंका पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप भी नहीं हैं, (मगर उनके पति रॉबर्ट वाड्रा पर अवश्य लगे हैं।) प्रियंका की सभाओं में भीड़ जुटने पर भी कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए , क्योंकि वह इंदिरा गांधी की पोती हैं, इस वजह से देहातों में लोगों को प्रियंका के प्रति भावनात्मक आकर्षण है। एक संभावना ऐसी है कि राहुल खुद प्रधानमंत्री पद पर दावा नहीं करेंगे वे कह सकते हैं कि और देश का प्रधानमंत्री जनता तय करेगी। 4. मुसलमानों के मत जुटाना यह कांग्रेस की रणनीति का महत्वपण्ूर हिस्सा होगा। वैसे भी मुसलमान कह रहे हैं कि कांग्रेस ने मुसलमानों की उपेक्षा की है इसलिए उसकी हार हो रही है। 'अलीगढ़ मूवमेंट' नामक पत्रिका में जसीम मोहम्मद लिखते हैं, ह्यराजस्थान में गहलोत सरकार ने मुसलमानों पर अन्याय किया। जयपुर में 16 जुलाई 2013 को मुसलमानों ने एक दिवसीय धरना रखा था और अपनी मांगें रखी थीं। संप्रग सरकार ने केवल बड़ी-बड़ी घोषणाएं करने के अलावा मुसलमानों के लिए कुछ नहीं किया है। भाजपा और कांग्रेस में मुसलमानों को कोई फर्क नजर नहीं आता है।
ऐसे लेख मुख्यधारा के अखबारों में नहीं आते हैं, मगर जिस स्थान पर प्रकाशित होते हैं वहां उनका बड़ा महत्व होता है। देश के विभाजन में अलीगढ़ मुस्लिम विद्यालय की बड़ी भूमिका रही है। अलीगढ़ के मुसलमानों का मत तो कांग्रेस के लिए फतवा होता है। कांग्रेससांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण विधेयक लेकर आई है। इस पर पूरे देश में बहस हुई है। यह हिन्दू विरोधी कानून ही है। इस कानून के अनुसार अगर मुसलमान दंगा करते हैं तो भी हिन्दुओं को जेल जाना होगा। बंगलादेशी घूसखोरों के बारे में भी ऐसा ही कानून सरकार ने बनाया है। अगर किसी व्यक्ति के बंगलादेशी होने की शिकायत की जाती है तो यह सिद्ध करने का दायित्व शिकायतकर्ता का ही होता है। इस अजीब कानून के बारे में सेकुलर मीडिया चुप्पी साध कर बैठा है।
मोदी की लहर है, ऐसा मानकर पूर्ण बहुमत नहीं मिल सकता। यह चुनाव हिन्दू मुसलमान प्रश्न पर नहीं हो रहा है इस देश पर अल्पसंख्यकों को कांग्रेस के माध्यम से शासन करना है या बहुसंख्यकों को राष्ट्रीय शक्ति के माध्यम से शासन करना है, यही सवाल है। बहुसंख्य समाज सांस्कृतिक दृष्टि से एक है, मगर राजनीतिक दृष्टि से एक नहीं है। यह समाज जातियों बंटा हुआ है। देश में मुसलमान और ईसाइयों की जनसंख्या 15-16 प्रतिशत है और दलित और वनवासियों की जनसंख्या 25 प्रतिशत है। इस समुदाय में मेरा देश मेरा राज की भावना निर्माण करना आवश्यक है।
भाजपा ने 1998 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में हिन्दू समाज क ी विविध धाराओं के इंद्रधनुषी समीकरण को साध कर दिखाया था। आज देशभर में मोदी को जो समर्थन मिल रहा है उसका एक प्रमुख कारण जनता का मोदी को एक सशक्त हिन्दू नेता के तौर पर देखना है। मोदी की यह प्रतिमा आज की राजनीतिक परिभाषा में प्रभावी ढंग से सामने लानी होगी।
आज देशभर के मतदाताओं का मानस बदल गया है। मतदाताओं को सही मायने में राजसत्ता में सहभागिता चाहिए। हिन्दू समाज में जो जातिभेद है उसके कारण जो जातियां हजारों सालों से सत्ता से वंचित रही है उन जातियों में सहभागिता की आकांक्षा अत्यंत प्रबल हो गई है। इस तरफ ध्यान देना जरूरी है।
रणनीति बनाते समय अपने देश के साधु महंत, विभिन्न मठों और संप्रदायों के बारे में भी सोचना चाहिए। देश की जनसंख्या का धार्मिक संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है। हाल ही में हुई जनगणना के आंकड़े अभी नहीं आए हैं। लेकिन 2001 की जनगणना के अनुसार 2050 में हिन्दू और अहिन्दू जनसंख्या समान हो जाएगी। तब तक भारत का राजनीतिक चित्र कैसे बदलेगा यह लोगों के सामने रखना चाहिए। भारत के विविध सम्प्रदायों तक एक संदेश हमेशा जाना चाहिए कि भारत में जन्मे पंथों के हाथों में अगर सत्ता रहती है तो ही देश में आप सुरक्षित रह सकते हैं। आप जैन, सिख, आर्य समाजी, महानुभावी, वारकरी, रामदासी, चाहे जो हों मगर आप अहिन्दू शासन में सुरक्षित नहीं रह पाएंगे।
यह चुनाव भारत का भविष्य तय करने वाला मील का पत्थर साबित होगा। लोकतांत्रिक मार्ग से सत्ताबदल होगी। इसके बाद कुछ नए विकल्प सामने आएंगे, लेकिन यदि आज हम दूरगामी सोच से अपना मुंह मोड़ लेते हैं और समय के भरोसे पर चीजें छोड़ देते हैं तो यह बात तय है कि हम अपनी आने वाली पीढि़यों का जीवन असुरक्षित बनाएंगे। इस बात पर कोई शक किसी को नहीं होना चाहिए। समाज को देश के भविष्य को लेकर सही सोच बनाने के लिए बाध्य करना भी चुनाव में राजनीतिक नेतृत्व का एक बहुत बड़ा दायित्व है। हम अपनी आने वाले पीढि़यों के भविष्य को ध्यान में रखकर रणनीति बनानी होंगी। ताकि हमारा राष्ट्र सुरक्षित रह पाए। इस सोच को लेकर हमें आगे बढ़ना चाहिए।











