| दिंनाक: 08 Feb 2014 15:39:31 |
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बहुत समय पहले की बात है। एक सुदंर हरे-भरे वन में चार मित्र रहते थे। उनमें से एक था चूहा, दूसरा कौआ, तीसरा हिरण और चौथा कछुआ। अलग-अलग जाति के होने के बावजूद उनमें बहुत गहरी मित्रता थी। चारों एक-दूसरे पर जान छिड़कते थे। वन में एक निर्मल जल का सरोवर था, जिसमें कछुआ रहता था। सरोवर के तट के पास ही एक जामुन का बड़ा पेड़ था। उसी पर बने घोंसले में कौवा रहता था। पेड़ के नीचे जमीन में बिल बनाकर चूहा रहता था और निकट ही घनी झाडि़यों में ही हिरण का बसेरा था। दिन में कछुआ तट पर आकर धूप सेंकता था। बाकी तीनों मित्र भोजन की तलाश में जाते दूर तक घूमकर सूर्यास्त के समय लौट आते। शाम को चारों मित्र इकठ्ठे होते एक दूसरे के दुख सुख बांटते।
एक दिन शाम को चूहा और कौवा तो लौट आए, लेकिन हिरण नहीं लौटा। तीनों मित्र बैठकर उसकी राह देखने लगे। उनका मन खेलने को भी नहीं हुआ। कछुआ भर्राए गले से बोला वह तो तुम दोनों से भी पहले लौट आता था। आज पता नहीं, क्या बात हो गई, जो अब तक नहीं आया। मेरा तो दिल डूबा जा रहा है।
चूहे ने चिंतित स्वर में कहा हां, बात बहुत गंभीर है। जरूर वह किसी मुसीबत में है। अब हम क्या करें? कौवे बोला, मित्रो वह जिस तरह चरने जाता है, मैं वहां उड़कर देख आता, पर अंधेरा घिरने लगा है। नीचे कुछ नजर नहीं आएगा। हमें सुबह तक प्रतीक्षा करनी होगी। सुबह होते ही मैं उड़कर जाऊंगा और उसकी खबर लाकर तुम्हें दूंगा।
कछुए बोला, मैं तो उस ओर अभी चल पड़ता हूं। मेरी चाल भी बहुत धीमी है, तुम दोनों सुबह आ जाना। चूहा बोला मुझसे भी हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठा जाएगा। मैं भी कछुए भाई के साथ जाता हूं, कौए भाई, तुम पौ फटते ही चल पड़ना।
जैसे ही पौ फटी, कौआ उड़ चला उड़ते-उड़ते चारों ओर नजर डालता जा रहा था। आगे एक स्थान पर कछुआ और चूहा जाते उसे नजर आए। कौवे ने कां कां करके उन्हें सूचना दी कि उन्हें देख लिया है और वह खोज में आगे जा रहा है। अब कौवे ने हिरण को पुकारना भी शुरू किया मित्र हिरण, तुम कहां हो? आवाज दो मित्र।
तभी उसे किसी के रोने की आवाज सुनाई दी। स्वर उसके मित्र हिरण का-सा था। उस आवाज की दिशा में उड़कर वह सीधा उस जगह पहुंचा, जहां हिरण एक शिकारी के जाल में फंसा छटपटा रहा था। हिरण ने रोते हुए बताया कि कैसे एक निर्दयी शिकारी ने वहां जाल बिछा रखा था। दुर्भाग्यवश वह फंस गया। हिरण बोला शिकारी आता ही होगा वह मुझे पकड़कर ले जाएगा और मेरी कहानी खत्म समझो। मित्र कौवे! तुम चूहे और कछुए को भी मेरा अंतिम नमस्कार कहना।
कौआ बोला मित्र, हम जान की बाजी लगाकर भी तुम्हें छुड़ा लेंगे। कौवा बोला सुनो, मैं अपने मित्र चूहे को पीठ पर बिठाकर ले आता हूं। वह अपने पैने दांतों से जाल कुतर देगा। हिरण को आशा की किरण दिखाई दी।
कौआ उड़ा और तेजी से वहां पहुंचा, जहां कछुआ तथा चूहा आ पहुंचे थे। कौवे ने समय नष्ट किए बिना चूहे को अपनी पीठ पर बिठाया और हिरण के पास ले आया। चूहे ने कुछ ही देर में जाल कुतर दिया। तभी कछुआ भी वहां आ पहुंचा चारों मित्र खुशी से एक दूसरे के गले से लिपट गए। तभी हिरण चौंका उसने कहा मित्रों देखो शिकारी आ रहा है। तुम सब छिप जाओ।
चूहा फौरन पास के एक बिल में घुस गया। कौआ उड़कर पेड़ की ऊंची डाल पर जा बैठा। हिरण एक ही छलांग में पास की झाड़ी में जा घुसा व ओझल हो गया। परंतु कछुआ दो कदम भी न जा पाया कि शिकारी आ पहुंचा। उसने जाल कटा देखकर अपना माथा पीटा लिया। वह इधर-उधर देख ही रहा था कि उसकी नजर कछुए पर पड़ी। उसने कहा हिरण ना सही कछुआ सही, अब यही मेरे परिवार के आज के भोजन के काम आएगा।
बस उसने कछुए को उठाकर थैले में डाला और वहां से जाने लगा। कौवे ने तुरंत हिरण व चूहे को बुलाकर कहा मित्रो, हमारे मित्र कछुए को शिकारी थैले में डालकर ले जा रहा है। हमें अपने मित्र को छुड़ाना चाहिए। लेकिन कैसे ?
इस बार हिरण ने समस्या का हल सुझाया मित्रो, मैं लंगड़ाता हुआ शिकारी के आगे से निकलूंगा। मुझे लंगड़ा जान वह मुझे पकड़ने के लिए कछुए वाला थैला छोड़ मेरे पीछे दौडे़गा। मैं उसे दूर ले जाकर चकमा दूंगा। इस बीच चूहा थैले को कुतरकर कछुए को आजाद कर देगा। योजना अच्छी थी लंगड़ाकर चलते हिरण को देख शिकारी की बांछे खिल उठी। वह थैला पटककर हिरण के पीछे भागा। हिरण उसे लंगड़ाने का नाटक कर घने वन की ओर ले गया और फिर चौकड़ी भरता उसकी आंखों से ओझल हो गया। शिकारी दांत पीसता रह गया। वह वापस लौटा तो थैला उसे खाली मिला। उसमें छेद बना हुआ था। शिकारी मुंह लटकाकर खाली हाथ घर लौट गया। पंचतंत्र से साभार