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11 जनवरी 1998 को प्रकाशित आलेख
-देवेन्द्र स्वरूप
15 दिसम्बर 2013 के अंक में ह्यपटेल निन्दा में जुटे नूरानीह्ण शीर्षक से एक लेख प्रकाशित हुआ था, जिसमें बताया गया था कि देश के कुछ बुद्धिजीवी यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि नेहरू और पटेल के बीच कोई मतभेद नहीं था। लेकिन इतिहास साक्षी है कि कुछ मुद्दों पर सरदार पटेल के मतभेद नेहरू ही नहीं, गांधी जी से भी थे। इस लेख में यह बताया गया है कि विरोध के बावजूद नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष कैसे बने और सरदार पटेल प्रधानमंत्री नहीं बन पाए।
स्वाधीनता के स्वर्ण जयन्ती वर्ष में भारत की पिछले पचास वर्ष की यात्रा का सिंहावलोकन करते समय लगभग सभी ने यह महसूस किया कि यह यात्रा स्वाधीनता आंदोलन की मूल प्रेरणाओं से भटकाव और भारत की एकता और अखंडता के बिखराव की यात्रा ही है। ऐसा क्यों हुआ? इस प्रश्न का उत्तर खोजते समय यह टीस पैदा हुई कि यदि सरदार वल्लभ भाई पटेल को अंतरिम सरकार और स्वाधीन भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला होता तो शायद हमारे राष्ट्रजीवन के स्खलन, अध:पतन और बिखराव का वर्तमान दृश्य हमें कदापि नहीं देखना पड़ता। यहां प्रश्न उठता है कि सरदार प्रधानमंत्री बने क्यों नहीं? क्या कांग्रेस संगठन में उनकी स्थिति ऐसी नहीं थी, यदि थी तो उन्होंने उस स्थिति का लाभ क्यों नहीं उठाया? क्यों ऐसे महत्वपूर्ण अवसर को अपने हाथ से निकल जाने दिया?
स्वाधीनता की ओर भारत की यात्रा के अंतिम चरण का अध्ययन करें तो 24 मार्च 1946 को 3 सदस्यीय ब्रिटिश कैबिनेट मिशन के भारत आगमन को एक महत्वपूर्ण बिन्दु कहना होगा। इस मिशन का उद्देश्य सत्ता हस्तांतरण के लिए कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौते का संवैधानिक मार्ग खोजना था। उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष मौलाना आजाद थे। आपात स्थितियां उत्पन्न होने के कारण वे सन् 1939 से ही इस पद पर डटे हुए थे। यह कांग्रेस के संविधान द्वारा निर्धारित अध्यक्ष के वार्षिक चुनाव के नियम के विरुद्ध था। अध्यक्ष के नाते मिशन के साथ, वार्तालाप करने का अधिकार उन्हें सहज रूप से प्राप्त था। जब वह वार्तालाप निर्णायक मोड़ पर पहुंचा तब गांधीजी को यह पता चला कि कांग्रेस अध्यक्ष के नाते मौलाना ने दो पत्र एक वायसराय लार्ड बावेल को और एक कैबिनेट मिशन को बिना गांधी जी एवं अन्य वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं की जानकारी के लिखे और इन पत्रों में उन्होंने जो भूमिका अपनायी वह कांग्रेस की अधिकृत भूमिका से भिन्न थी। मौलाना द्वारा अपनायी गयी भूमिका में राष्ट्र के हितों के बजाय मुस्लिम हितों की अधिक चिन्ता थी। इस जानकारी से गांधी जी बहुत चिन्तित हो गये और उन्होंने मौलाना को अध्यक्ष पद के दायित्व से मुक्त करने का मन बना लिया। संयोग से तभी अध्यक्ष का कार्यकाल पूरा हो रहा था, और अगले अध्यक्ष के लिए चुनाव का समय आ गया था। कांग्रेस के समूचे इतिहास में इस वर्ष का अध्यक्ष पद अत्यधिक महत्वपूर्ण था क्योंकि ब्रिटिश सरकार सत्ता के हस्तांतरण से पूर्व अन्तरिम सरकार के गठन का प्रयोग करने जा रही थी और उस अन्तरिम सरकार का निमंत्रण कांग्रेस अध्यक्ष को ही प्राप्त होना था। इसलिए मौलाना की इच्छा थी कि वे इस वर्ष भी अध्यक्ष बने रहें। पर उन्हें इधर-उधर से यह सूचना मिल रही थी कि गांधीजी नहीं चाहते कि वे अगले वर्ष भी अध्यक्ष बने रहें।
तिलमिलाए मौलाना
आचार्य कृपालानी उस समय कांग्रेस के महासचिव थे। उन्होंने अध्यक्ष पद के लिए चुनाव का कार्यक्रम घोषित कर दिया। इस कार्यक्रम के अनुसार नामांकन पत्र भरने की अन्तिम तिथि 29 अप्रैल तय की गई। इन सब घटनाओं से तिलमिलाए मौलाना ने एक सार्वजनिक वक्तव्य दे डाला जिसमें गांधी जी पर आरोप लगाया कि कि वे उन्हें अध्यक्ष पद से हटाने पर तुले हुए हैं। यह वक्तव्य 20 अप्रैल को प्रकाशित हुआ, गांधी जी ने उसी दिन मौलाना को एक पत्र द्वारा स्पष्ट बता दिया कि वे नहीं चाहते कि इस अवसर पर कोई मुसलमान कांग्रेस अध्यक्ष बना रहे, उचित होगा कि कोई अन्य व्यक्ति यह दायित्व संभाले। यदि आप मेरे मत से सहमत हों तो आपको एक वक्तव्य जारी करके घोषणा कर देनी चाहिए कि आप अध्यक्ष नहीं बनना चाहेंगे। गांधी जी ने यह भी लिखा कि बादशाह खान के नाम पर प्रस्ताव मेरे सामने आया तो मैंने उसका भी कड़ा विरोध किया और इस विषय पर बादशाह खान से चर्चा भी कर ली है। अन्त में गांधी जी ने लिखा है कि यदि इस बार मेरी सलाह मानी गई तो मैं जवाहरलाल को पसन्द करूंगा। इसके लिए अनेक कारण हैं पर यहां मैं उनकी चर्चा नहीं कर सकता। गांधी जी के इस बेबाक पत्र को पाकर मौलाना ने एक वक्तव्य देकर स्वयं अध्यक्ष न बनकर अपने उत्तराधिकारी के रूप में नेहरू के नाम का सुझाव दिया। इससे उनकी आत्मकथा ह्यइण्डिया विन्स फ्रीडमह्ण का यह कथन झूठा सिद्ध हो जाता है कि गांधी जी उन्हें हटाकर सरदार पटेल को अध्यक्ष बनाना चाहते थे, इसलिए उनकी इच्छा के सार्वजनिक होने के पूर्व ही उन्होंने (मौलाना) नेहरू का नाम उछाल दिया।
मौलाना ने यह वक्तव्य दे तो दिया किन्तु वे तुरन्त अध्यक्ष पद छोड़ना नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने 28 अप्रैल को एक वक्तव्य जारी करके घोषणा कर दी कि वर्तमान कार्य समिति नवम्बर मास तक बनी रहेगी। जिसका अर्थ हुआ कि वे तब तक कांग्रेस के अध्यक्ष बने रहेंगे। 29 अप्रैल को यह पत्र प्रकाशित होने पर इसी दिन गांधी जी ने मौलाना को पत्र लिखा कि ह्ययदि आपको अध्यक्ष बने ही रहना है तो यह उचित नहीं होगा कि इसके लिए आप अध्यक्षीय व्यवस्था दें। ऐसी व्यवस्था देना बहुत खतरनाक बात है। यदि ऐसा होना है तो नये चुनाव के माध्यम से ही होना चाहिए।ह्ण
सच तो यह है कि गांधी जी और मौलाना का सुझाव नेहरू के पक्ष में होने के बाद भी 29 अप्रैल तक 15 में से एक भी प्रदेश कांग्रेस समिति की ओर से नेहरू के नाम का प्रस्ताव नहीं आया। उल्टे बारह प्रदेश समितियों ने सरदार पटेल के नाम का प्रस्ताव किया। और शेष ने आचार्य कृपलानी के नाम का। इस स्थिति में लोकतांत्रिक विधि से सरदार का अध्यक्ष चुना जाना सुनिश्चित था। किन्तु गांधी जी, नेहरू को अध्यक्ष बनाने पर तुले हुए थे। आचार्य कृपलानी ने अपनी ह्यमहात्माह्ण नामक पुस्तक में रहस्योद्घाटन किया है कि ह्यगांधी जी की स्पष्ट इच्छा का पालन करते हुए मैंने नेहरू जी का नाम प्रस्तावित किया और इस प्रस्ताव पर कार्यसमिति के कुछ अन्य सदस्यों के भी हस्ताक्षर करवाए। साथ ही उन्होंने नेहरू के पक्ष में अपना नाम भी लिखित रूप से वापस ले लिया और ऐसा ही नाम वापसी का एक कागज सरदार के हस्ताक्षरों के लिए उनके सामने भी बढ़ा दिया। सरदार पूरा खेल समझ गए पर मौन रहे। उन्होंने वह कागज गांधी जी को दिखायाह्ण गांधी जी के पौत्र राजमोहन गांधी ने अपनी ह्यपटेलह्ण नामक पुस्तक में लिखा है कि गांधी जी ने सरदार के मनोभाव को समझकर नेहरू से यह विषय छेड़ा और कहा कि तुम्हारा नाम किसी भी प्रदेश कांग्रेस समिति ने नहीं भेजा। शालीनता का तकाजा तो यह था कि नेहरू तुरन्त अपना नाम वापस ले लेते किन्तु वे मौन रहे। जिसका गांधी जी ने अर्थ निकाला कि यदि नेहरू को अध्यक्ष नहीं बनाया गया तो वे पटेल के साथ दूसरे नम्बर पर कार्य करना पसन्द नहीं करेंगे। अर्थात् वे बगावत के रास्ते पर चले जाएंगे। गांधी जी ने सारी स्थिति पटेल को बतायी और उनसे नाम वापसी के कागज पर हस्ताक्षर करने को कहा, सरदार ने बेझिझक उस कागज पर हस्ताक्षर करके अपना नाम वापस ले लिया। इस प्रकार नेहरू चौथी बार गांधी जी के हस्तक्षेप के कारण निर्विरोध अध्यक्ष चुने जा सके।
इसके पूर्व 1929, 1936 व 1939 में भी सरदार को कांग्रेस संगठन के भारी बहुमत का समर्थन प्राप्त होने पर भी गांधी जी की इच्छा का आदर करते हुए अपना नाम वापस लेना पड़ा था। पर इस बार का निर्णय बहुत सरल नहीं था। सरदार आयु के 71वें वर्ष में प्रवेश कर चुके थे। जबकि नेहरू ने अभी 58वां वर्ष भी पूरा नहीं किया था। यह एक प्रकार से सरदार के जीवन का अन्तिम अवसर था, फिर इस बार कांग्रेस अध्यक्ष बनने का अर्थ था ब्रिटिश सरकार से अन्तरिम सरकार का निमंत्रण पाने का अधिकारी बनना। अन्तरिम सरकार में सत्ता केन्द्र बनने का अवसर मिलता, तो वे अपनी क्षमता और योग्यता के बल पर स्वाधीन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री सहज ही बन जाते। सत्ता पाने का ऐसा अवसर हाथ में आने पर भी स्वेच्छा से उसे त्याग देने का निर्णय सरल नहीं था। ऐसे ही कठिन क्षणों में व्यक्ति के वास्तविक स्वत्व की अग्नि परीक्षा होती है। यही अन्तर था नेहरू और सरदार पटेल में। दोनों देशभक्त थे किन्तु नेहरू की देशभक्ति पर उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा हावी थी, जबकि सरदार की देशभक्ति आत्मत्याग की नीति पर टिकी थी। उनके लिए सत्ता व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति का लक्ष्य न होकर राष्ट्रनिर्माण का साधन मात्र थी। देशभक्ति और महत्वाकांक्षा के टकराव में सरदार विजयी हुए और नेहरू पराजित।
सरदार की उदारता
सरदार के व्यक्तित्व की दृढ़ता एवं प्रभाव को स्वीकार करते हुए तत्कालीन वायसराय बावेल ने 8 जुलाई 1946 को ब्रिटिश सम्राट के नाम एक पत्र लिखा था 'सरदार वल्लभ भाई पटेल कांग्रेस कार्य समिति के एक बड़े व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं, इनका चरित्र अन्यों की अपेक्षा कहीं अधिक शक्तिशाली है … उन सबसे वे अकेले व्यक्ति हैं जो गांधी से आंख मिलाकर बात कर सकते हैं।'
गांधी जी से मतभिन्नता रखते हुए भी सरदार पटेल ने उनकी इच्छा का पालन किया और जीवन के अन्त तक नेहरू की भूलों को झेलकर भी उन्हें पूरा सहयोग दिया। 6 जुलाई 1946 को अध्यक्ष पद संभालते ही नेहरू ने भूलों का सिलसिला शुरू कर दिया। जिनका उल्लेख करते हुए सरदार ने मध्य प्रदेश के द्वारिका प्रसाद मिश्र को 29 जुलाई 1946 के पत्र में लिखा, 'यद्यपि वे चौथी बार अध्यक्ष चुने गये हैं पर अभी भी उनका व्यवहार बहुत बचकाना है, जिससे हम सब लोग अचानक मुसीबत में फंस जाते हैं। कश्मीर में उनकी कार्यवाही, संविधान सभा के लिए सिखों के निर्वाचन में हस्तक्षेप, अ.भा. कांग्रेस कमेटी की बैठक के तुरन्त बाद पत्रकार सम्मेलन में उनके उद्गार आदि सब कार्य भावुक पागलपन लगते हैं जिनसे हम सबको बहुत परेशानी हुई है।' ये सब लिखकर भी सरदार ने मिश्र को सलाह दी कि हमें नेहरू के हाथों को मजबूत करना है। पर प्रश्न ये है कि गांधी जी सरदार की संगठन क्षमता, समर्पण भावना, नेतृत्व की योग्यता से परिचित होने के बाद भी राष्ट्रजीवन के इस महत्वपूर्ण मोड़ पर भी सरदार को आत्मत्याग के लिए विवश करके नेहरू को आगे बढ़ाने पर क्यों तुले हुए थे? एक कारण तो उन्होंने एक वर्ष बाद 1 जुलाई 1947 को अपनी प्रार्थना सभा में दिया था कि इस समय जब अंग्रेजों से सत्ता ली जा रही है नेहरू को हटाकर दूसरे को नहीं लाया जा सकता है। वह कैम्ब्रिज का ग्रेजुएट है, और बैरिस्टर है, वह अंग्रेजों के साथ ठीक प्रकार से संवाद कर सकता है। किन्तु गांधी जी के इस तर्क में कोई वजन नहीं है। अंग्रेजों से संवाद के लिए अंग्रेजी भाषा और शिष्टाचार से अधिक ब्रिटिश कूटनीति और अपने राष्ट्रीय हितों की यथार्थवादी समझ आवश्यक थी। आगे के इतिहास ने सिद्ध कर दिया कि नेहरू के पास ये गुण कतई नहीं थे। उन्होंने भूल पर भूल की जिसका महंगा मूल्य राष्ट्र को आज तक चुकाना पड़ रहा है। राजाजी को आगे चलकर यह पछतावा हुआ कि सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाने के लिए उन्होंने प्रयास क्यों नहीं किया?
गांधी जी के मन में यह भय भी काम कर रहा था कि सरदार को मौलाना आजाद और मुस्लिम समाज पसंद नहीं करता जबकि नेहरू उनके बीच लोकप्रिय हैं, सरदार के प्रति मौलाना की वितृष्णा किसी से छिपी नहीं थी किन्तु इसका मात्र कारण यह था कि सरदार मुस्लिम मांगों के सामने झुक कर राष्ट्रहित की बलि देने को तैयार नहीं थे। किन्तु आगे चलकर मौलाना आजाद के विचार बदले। स्वर्गीय हुमायूं कबीर, जो कई वर्ष नेहरू मंत्रिमंडल के सदस्य रहे और जो मौलाना आजाद के निकटतम सहयोगी थे, जिन्हें मौलाना की आत्मकथा का वास्तविक लेखक माना जाता है, ने 22 जुलाई 1969 को एक पत्र में और अपनी मृत्यु के एक सप्ताह पूर्व 25 जुलाई 1969 को स्टेट्समैन को बताया कि अपने अंतिम दिनों में मौलाना कहा करते थे कि सरदार पटेल नेहरू से कहीं बेहतर प्रधानमंत्री सिद्ध होते।
समाजवादियों द्वारा पटेल के विरोध और नेहरू के समर्थन ने भी गांधी जी को प्रभावित किया था। किन्तु नेहरू जी की मृत्यु के पश्चात 1964-1965 में दिल्ली में पटेल जयन्ती समारोह में बोलते हुए राम मनोहर लोहिया ने स्वीकार किया था कि उन्होंने नेहरू और पटेल का गलत आकलन किया था। ह्यविभाजन के अपराधीह्ण नामक पुस्तक में लोहिया ने स्पष्ट लिखा कि उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल यह थी कि सुभाष और पटेल के विरुद्ध उन्होंने (लोहिया ने) नेहरू का साथ दिया।
इतिहास की कसौटी पर नेहरू के बारे में गांधी जी का मूल्यांकन गलत सिद्ध हुआ और राष्ट्र को उनकी इस भूल का भारी मूल्य चुकाना पड़ रहा है। उनकी इस भूल ने ही कांग्रेस के भीतर वंशवाद और चापलूसी का बीज बोया। नेहरू परिवार के बाहरी चमक-दमक के प्रति कांग्रेसजनों में अंधभक्ति इसी में से उपजी है। जिसके कारण कांग्रेसी अब नेहरू परिवार की अपार सम्पत्ति और स्मारकों पर काबिज रोम-पुत्री सोनिया को अपना एकमात्र उद्धारक मानने की भूल कर रहे हैं।











