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उत्तराखंड में जिस प्रकार का विनाश देखने में आया है वह एक बहुत बड़ा उदाहरण है पारिस्थितिकी और आर्थिक असंतुलन का। क्योंकि मान लिया गया है कि विकास का मॉडल आर्थिक प्रगति पर आधारित होता है। इस भ्रम में पड़कर हमने सिर्फ अर्थव्यवस्था की ही चिंता की। इसके कारण हमने मान लिया कि हम प्रकृति का चाहे जितना शोषण करें वह उसे स्वीकार लेगी।
सवाल यह है कि आखिर हमने एकतरफा विकास मॉडल की चिंता क्यों की, जिसमें उद्योग, बांध, बड़ी-बड़ी इमारतें होंगी? उसमें हमने एक से दूसर सिरे तक सारे संवेदनशील पहलुओं को नकार दिया जिससे हिमालय का अस्तित्व जुड़ा होता है। हमें फिर से समीक्षा करनी पड़ेगी कि किसी भी हिमालयी राज्य के आर्थिक विकास को ही हम विकास का पैमाना क्यों मानें। दूसरी तरफ हमने ऐसा कोई संकेत तैयार नहीं किया जिससे पता चल जाता कि हम पारिस्थितिकी, पर्यावरण में कहां पर खड़े हैं? यह बताने वाली कोई प्रणाली हमारे पास नहीं थी। क्योंकि देश में सकल घरेलू उत्पाद को हमने मापदंड तय किया है। इसमें न जंगल का जिक्र है, न पानी, न मिट्टी, न प्राणवायु का। जब इनके बिना जीवन असंभव है तो हमने अपनी विकास योजना में इन्हें कैसे नकार दिया? अगर पिछले 50-60 सालों में लगातार ऐसा होता रहा है तो इसके कारण दुनिया और हमारे देश में भी परिस्थितियां धीरे-धीरे परिवर्तित होती चली गईं और स्थानीय पर्यावरण से लेकर देश के पर्यावरण में कहीं न कहीं अंतर आया। देश में बादल फटने की घटना हमेशा से होती रही है। लेकिन इतनी जल्दी जल्दी ऐसा होने के पीछे एक ही कारण है और वह है प्रकृति से छेड़छाड़। बादलों का इकट्ठा होकर बरसना ही बादल फटना होता है। बादल लगातार इसलिए इकट्ठे होते जा रहे हैं क्योंकि जमीन तपी हुई है और वह बार-बार पानी को भाप बना रही है जो ऊपर जाकर बादल बना रही है। बादल के पानी बरसाने की प्रक्रिया धीमी हो गई है। इसके कारण बादल फटने की घटनाएं बढ़ रही हैं।
इसके साथ, ऐसी यात्राएं पहले के जमाने में गाड़ियों, इमारतों, होटलों से दूर थीं। आज से 50-60 साल पहले जब बद्रीनाथ, केदारनाथ तक सड़कें नहीं थीं, तब न तो जानमाल का नुकसान होता था, न स्थानीय पर्यावरण में फर्क आता था। आज हमने अपना रवैया बदल लिया है, आज लोग भगवान के दर्शन कम करने जाते हैं मौज-मस्ती ज्यादा होती है। हमें वहां गाड़ियां, एसी, महंगे पंचतारा होटल चाहिए। जब हम ऐसी चीजों पर उतारू हो जाएंगे तो प्रकृति अपने तरीके से हमें रास्ते पर ले ही आएगी। नदियों के किनारे बसाहटों का सीधा मतलब है तबाही। नदियों ने इस बार बता दिया कि हमारे अगल-बगल मत फटको। आखिर इस बदलाव के पीछे बड़ा कारण क्या है? कारण है शहरीकरण और शहरियों की विलासिता की लोलुपता।
पिछले 50 साल का अध्ययन करें तो पाएंगे त्रासदी का शिकार ज्यादातर हमारे गांव होते हैं। शहरों में जरा पानी भर जाए तो सरकार को सिर पर उठा लेते हैं, लेकिन गांवों में सब तहस-नहस हो जाएं तो दस दिन बाद उसकी किसी को याद नहीं रहती।
देश का आपदा प्रबंधन चलाने वाले लोगों से पूछना चाहिए कि उन्होंने खुद कितनी आपदाएं झेली हैं जो प्रबंधन के सुझाव दे रहे हैं? हमें आपदा प्रबंधन की नीतियों की समीक्षा करनी चाहिए। हमें गांव की रणनीति और आम आदमी को आपदा के समय खुद को तैयार करने की तैयारी करनी होगी। सरकार तो बेचारी खुद ही सहायता चाहती है, वह किसी की सहायता क्या करेगी। अनिल जोशी, पर्यावरणविद्











